By पं. संजीव शर्मा
फाल्गुन शुक्ल द्वितीया पर फूलों की होली और राधा कृष्ण पूजा का महत्व

फाल्गुन के महीने में जब होली का उत्साह वातावरण में घुलने लगता है, ठीक उसी समय फुलेरा दूज का पावन दिन प्रेम, भक्ति और रंगों की हल्की शुरुआत जैसा सौम्य उत्सव लेकर आता है। यह दिन राधा कृष्ण की मधुर लीला, फूलों की कोमल होली और वैवाहिक जीवन में मधुरता के संकल्प से जुड़ा हुआ माना जाता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में फुलेरा दूज की तिथि और प्रमुख समय इस प्रकार हैं।
| विवरण | तिथि और वार | समय |
|---|---|---|
| फाल्गुन शुक्ल द्वितीया तिथि प्रारंभ | 18 फरवरी 2026 | दोपहर 04 बजकर 57 मिनट |
| फाल्गुन शुक्ल द्वितीया तिथि समाप्त | 19 फरवरी 2026 | दोपहर 03 बजकर 58 मिनट |
| फुलेरा दूज पर्व | 19 फरवरी 2026 | गुरुवार |
| सूचक समय | समयावधि |
|---|---|
| सूर्योदय | सुबह 06 बजकर 56 मिनट |
| सूर्यास्त | शाम 06 बजकर 14 मिनट |
| चन्द्रोदय | सुबह 07 बजकर 54 मिनट |
| चन्द्रास्त | रात 08 बजकर 11 मिनट |
| ब्रह्म मुहूर्त | सुबह 05 बजकर 14 मिनट से 06 बजकर 05 मिनट तक |
| ब्रह्म मुहूर्त (अन्य उल्लेख) | सुबह 05 बजकर 14 मिनट से 06 बजकर 24 मिनट तक |
| अमृत काल | दोपहर 01 बजकर 40 मिनट से 02 बजकर 34 मिनट तक |
| विजय मुहूर्त | दोपहर 02 बजकर 28 मिनट से 03 बजकर 13 मिनट तक |
| गोधूलि मुहूर्त | शाम 06 बजकर 12 मिनट से 06 बजकर 37 मिनट तक |
द्वितीया तिथि का सूर्योदय 19 फरवरी को होने के कारण फुलेरा दूज 2026 इसी दिन मनाई जाएगी। पूजा, फूलों की होली और दान के लिए ब्रह्म मुहूर्त, अमृत काल, विजय मुहूर्त और गोधूलि मुहूर्त को विशेष रूप से उपयोगी माना जा सकता है।
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व फुलेरा दूज कहलाता है। फाल्गुन स्वयं ही बसंती ऊर्जा, रास लीला और होली के रंगों से जुड़ा हुआ महीना है, इसलिए इस तिथि को राधा कृष्ण की लीला की कोमल झलक माना जाता है।
फुलेरा शब्द का संबंध फूलों से माना जाता है, इसलिए फुलेरा दूज को फूलों की सौम्य होली का संकेत समझा जाता है। इस दिन रंगों की पूरी होली नहीं बल्कि पुष्पों, माला और सुगंधित वातावरण के माध्यम से आनंद व्यक्त किया जाता है।
यह पर्व राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम, सौहार्द और माधुर्य को घर घर तक पहुँचाने वाला माना जाता है, इसलिए ब्रज क्षेत्र में तो विशेष रूप से और अन्य स्थानों पर भी, इसे श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
मान्यता है कि फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी और गोपियों के साथ फूलों की होली खेली थी।
कथा के अनुसार उस दिन वृंदावन और ब्रज की गलियाँ पुष्पों की सुगंध से भर गईं, वृक्षों से फूल तोड़ कर श्रीकृष्ण ने राधा और सखियों पर बरसाए और वातावरण में प्रेम, हँसी और विश्वास की लहर दौड़ गई। फूलों की यह होली रंगों से पहले आने वाली एक सौम्य भूमिका के रूप में देखी जाती है।
इसी स्मरण में आज भी फुलेरा दूज के अवसर पर ब्रज के मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। ठाकुर जी के विग्रह पर फूलों की वर्षा, झूलों की सजावट और फूलों की होली के कार्यक्रमों से पूरा वातावरण सजीव हो उठता है।
पंचांग में दिए गए समय के आधार पर फुलेरा दूज के दिन पूजा और विशेष अनुष्ठान के लिए कुछ महत्वपूर्ण कालांश सामने आते हैं।
इन मुहूर्तों का उद्देश्य केवल समय बताना नहीं बल्कि यह स्मरण कराना भी है कि दिन के कुछ हिस्से विशेष रूप से सजगता और भक्ति के लिए सुरक्षित रखे जाएँ।
फुलेरा दूज की सबसे प्रमुख मान्यताओं में से एक विवाह और दांपत्य जीवन से जुड़ी है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से विवाह में आ रही रुकावटों के दूर होने की संभावना बढ़ जाती है। जिनका विवाह बार बार टल रहा हो या अनुकूल संबंध न बन पा रहा हो, वे इस दिन विशेष भक्ति के साथ राधा कृष्ण का ध्यान करते हैं।
पहले से विवाहित दंपतियाँ भी इस दिन राधा कृष्ण की पूजा करके अपने संबंध में मधुरता, संवाद और विश्वास बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं। यह दिन केवल विवाह के योग के लिए ही नहीं बल्कि वर्तमान रिश्तों में प्रेम की कोमलता लौटाने के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
फुलेरा दूज पर दान का भी विशेष महत्त्व बताया गया है।
मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया दान धन लाभ के अवसरों को बढ़ाता है और सुख समृद्धि में वृद्धि करता है। दान केवल आर्थिक लाभ के लिए नहीं बल्कि मन की उदारता और कृतज्ञता को मजबूत करने के लिए भी किया जाता है।
जो लोग आर्थिक स्थिरता और गृहस्थ जीवन में संतुलन चाहते हैं, वे इस दिन अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल, मिष्ठान्न या कुछ उपयोगी सामग्री दान कर सकते हैं। दान के साथ राधा कृष्ण के चरणों में यह भाव रखा जाता है कि जो प्राप्त हुआ है, उसमें से थोड़ा हिस्सा समाज और जरूरतमंदों के साथ बाँटा जाए।
फुलेरा दूज 2026 को सार्थक बनाने के लिए कुछ सरल लेकिन महत्वपूर्ण कर्म बताए गए हैं।
इन छोटे छोटे कर्मों में बाहरी आयोजन से अधिक अंदर की भक्ति और प्रेम की भावना की महत्ता होती है।
फुलेरा दूज केवल एक उत्सव नहीं बल्कि मन की कोमलता को जगाने वाला दिन भी है।
राधा कृष्ण की लीला हमें यह सिखाती है कि जीवन में जब प्रेम, विश्वास और हल्का हास्य बना रहे, तो कठिन परिस्थितियाँ भी हल्की लगने लगती हैं। फूलों की होली इस बात का प्रतीक है कि जीवन में रंगों का प्रवेश धीरे धीरे, मृदुता के साथ भी हो सकता है, केवल तेज और शोरगुल के साथ ही नहीं।
जो लोग रिश्तों में तनाव, दूरी या संकोच महसूस कर रहे हों, वे फुलेरा दूज को एक ऐसे अवसर के रूप में लेकर अपने भीतर से थोड़ा कठोरपन छोड़ने और संबंधों में संवाद बढ़ाने का संकल्प कर सकते हैं।
यदि फुलेरा दूज केवल पूजा, प्रसाद और फोटो तक सीमित रह जाए, तो उसके आध्यात्मिक फल का बड़ा हिस्सा अधूरा रह जाता है।
इस दिन कोई व्यक्ति राधा कृष्ण के सामने यह निश्चय कर सकता है कि आगे से संबंधों में अधिक ईमानदार संवाद रखेगा, अपनी अपेक्षाओं को थोड़ा सरल करेगा और दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करेगा। अविवाहित लोग भी इस दिन यह संकल्प रख सकते हैं कि जीवनसाथी की खोज के साथ साथ स्वयं को भी भीतर से परिपक्व बनाने पर ध्यान देंगे।
जब फुलेरा दूज की पूजा, फूलों की होली और दान के साथ साथ सोच और व्यवहार में भी थोड़ा परिवर्तन शुरू हो तब यह पर्व वास्तव में प्रेम, समृद्धि और सौभाग्य की दिशा में कदम बन जाता है।
फुलेरा दूज 2026 कब है और द्वितीया तिथि का समय क्या रहेगा
फुलेरा दूज 2026 फाल्गुन शुक्ल द्वितीया के रूप में 19 फरवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी। द्वितीया तिथि 18 फरवरी 2026 को दोपहर 04 बजकर 57 मिनट पर शुरू होकर 19 फरवरी 2026 को दोपहर 03 बजकर 58 मिनट पर समाप्त होगी, इसलिए पर्व और पूजा 19 फरवरी को रखे जाएँगे।
फुलेरा दूज को फाल्गुन महीने में ही क्यों मनाया जाता है
फुलेरा दूज फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आती है। फाल्गुन स्वयं राधा कृष्ण की लीला, बसंती मौसम और होली के उत्सव से जुड़ा महीना है, इसलिए फूलों की होली और प्रेममय भक्ति का यह पर्व इसी महीने में विशेष रूप से मनाया जाता है।
फुलेरा दूज पर राधा कृष्ण की पूजा कैसे करनी चाहिए
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को स्नान, वस्त्र, आभूषण और फूलों की माला से सुशोभित किया जाता है। फूलों की होली के रूप में हल्के पुष्प अर्पित किए जाते हैं, माखन, मिश्री, फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है और फिर यह प्रसाद पूरे परिवार में बाँटा जाता है।
फुलेरा दूज का विवाह और दांपत्य जीवन से क्या संबंध माना जाता है
मान्यता है कि फुलेरा दूज के दिन श्रद्धा से राधा रानी और श्रीकृष्ण की पूजा करने से विवाह में आ रही बाधाएँ कम हो सकती हैं और अच्छे संबंधों के योग मजबूत हो सकते हैं। विवाहित दंपतियाँ भी इस दिन राधा कृष्ण की आराधना कर अपने संबंध में प्रेम, मधुरता और संवाद बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं।
फुलेरा दूज 2026 को व्यावहारिक रूप से कैसे सार्थक बनाया जा सकता है
इस दिन भक्ति के साथ साथ कुछ ठोस कदम भी लिए जा सकते हैं, जैसे जरूरतमंदों को दान देना, घर के वातावरण में प्रेमपूर्ण संवाद बढ़ाना और अपने रिश्तों में छोटी छोटी बातों पर विवाद कम करने का संकल्प लेना। ऐसा करने से फुलेरा दूज केवल पर्व नहीं बल्कि जीवन में स्थायी सौहार्द और समृद्धि की दिशा में एक सुंदर शुरुआत बन सकता है।
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