By पं. संजीव शर्मा
पोंगल 13–16 जनवरी 2026: सूर्य पूजा, कृषि उत्सव और परिवार के साथ खुशियाँ

पोंगल तमिलनाडु का प्रमुख फसल पर्व है जो सूर्य देव सूर्य नारायण को समर्पित माना जाता है। यह पर्व प्रकृति की कृपा, भरपूर फसल और जीवन में समृद्धि के लिए धन्यवाद देने का सुंदर अवसर देता है। पोंगल का अर्थ ही होता है “उफनना” या “ऊपर तक भरकर छलकना” और इसी भाव को पूरे उत्सव में जीवंत रूप में देखा जा सकता है।
साल 2026 में पोंगल का चार दिन का पर्व 13 जनवरी से 16 जनवरी तक मनाया जाएगा। इस दौरान हर दिन का अपना एक विशेष नाम, तिथि और आध्यात्मिक संदेश होता है। परंपरा के अनुसार, इस समय जब नया सूर्य वर्ष और कृषि चक्र एक नए मोड़ पर आते हैं तब लोग मिट्टी के पात्र में चावल और गुड़ को उबालकर उसे जानबूझकर बर्तन से बाहर छलकने देते हैं। यह अधिकता, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
पोंगल को समझने के लिए उसके चारों दिनों का क्रम और स्वरूप एक साथ देखना उपयोगी रहता है।
| दिन | तिथि (2026) | नाम | मुख्य विषय |
|---|---|---|---|
| पहला दिन | 13 जनवरी | भोगी पंडिगई | इंद्र देव की कृपा, घर और मन की शुद्धि |
| दूसरा दिन | 14 जनवरी | थाई पोंगल | सूर्य देव की आराधना, मुख्य पोंगल उत्सव |
| तीसरा दिन | 15 जनवरी | मट्टु पोंगल | गायों और बैलों के प्रति कृतज्ञता |
| चौथा दिन | 16 जनवरी | कानुम पोंगल | परिवार, मेल मिलाप और सामाजिक सद्भाव |
इसके साथ ही पोंगल से जुड़ा पोंगल संक्रांति शुभ मुहूर्त वर्ष 2026 में दोपहर 03:13 बजे से प्रारंभ होगा। यह समय सूर्य के संक्रमण का संकेत देता है, इसलिए सूर्य आराधना और धन्यवाद भावना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
पोंगल शब्द का अर्थ उफनना या उबालकर ऊपर आ जाना माना जाता है। पोंगल के मुख्य दिन मिट्टी के बर्तन में दूध, चावल और गुड़ को पकाया जाता है। जब यह मिश्रण ऊपर उठ कर बर्तन से बाहर बहने लगता है, तो परिवार के लोग प्रसन्न होकर “पोंगलो पोंगल” का उच्चारण करते हैं। यह दृश्य ऐसे मानो प्रकृति कह रही हो कि जीवन में दान, प्रेम और समृद्धि की धारा रुके नहीं बल्कि उफन कर चारों ओर फैले।
यह उफनना केवल भौतिक abundance का संकेत नहीं बल्कि मन के भीतर आभार और संतोष के भाव के ऊपर उठने का प्रतीक भी है। इसी कारण पोंगल को फसल के साथ साथ आशा, नए आरंभ और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव कहा जाता है।
पोंगल का पहला दिन भोगी पंडिगई कहलाता है, जो वर्ष 2026 में 13 जनवरी को मनाया जाएगा। यह दिन इंद्र देव को समर्पित माना जाता है, जिन्हें वर्षा के देवता और कृषि का संरक्षक माना गया है। किसानों के लिए वर्षा का संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए भोगी के दिन इंद्र के प्रति आभार और प्रार्थना की भावनाएँ विशेष रूप से प्रकट की जाती हैं।
भोगी पर घरों से पुराने और अनुपयोगी लकड़ी या कचरे की वस्तुओं को अलग किया जाता है। इन लकड़ी और काष्ठ सामग्री को एक जगह इकट्ठा कर भोगी आग जलाई जाती है। प्रतीक रूप में यह पुरानी नकारात्मकता, जड़ता और बेकार वस्तुओं को छोड़कर नए वर्ष के लिए स्थान बनाने का संकेत है। घर के सामने सुंदर रंगोली और कोलम बनाए जाते हैं, बच्चे पटाखे छोड़ते हैं और वातावरण में उत्सव की शुरुआत महसूस होने लगती है।
पोंगल का सबसे महत्वपूर्ण दिन दूसरा दिन होता है, जिसे थाई पोंगल कहा जाता है। वर्ष 2026 में थाई पोंगल 14 जनवरी को मनाया जाएगा। यह दिन सीधे तौर पर सूर्य देव को समर्पित है। यह तमिल माह थाई की शुरुआत भी है, जिसे नए काम, विवाह, शुभारंभ और उत्सव के लिए बेहद शुभ माना जाता है।
इस दिन परिवार सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं, नए वस्त्र धारण करते हैं और घर के सामने बहुत सुंदर कोलम बनाते हैं। आंगन में या खुले स्थान पर मिट्टी के बर्तन में चावल, दूध और गुड़ के साथ पारंपरिक सक्करै पोंगल या मीठा पोंगल पकाया जाता है। जब यह पकवान उबलकर बर्तन से ऊपर निकलने लगता है तब सब मिलकर हर्ष के साथ “पोंगलो पोंगल” कहते हैं और सूर्य देव को प्रणाम करते हैं।
थाई पोंगल के दिन
यह दिन उस बिंदु का प्रतीक है, जहाँ आकाश, धरती, किसान और भोजन सब एक साथ मिलकर एक समन्वित उत्सव बन जाते हैं।
तीसरा दिन मट्टु पोंगल के नाम से जाना जाता है और वर्ष 2026 में यह उत्सव 15 जनवरी को मनाया जाएगा। तमिल में “मट्टु” शब्द का अर्थ पशु या मवेशी होता है, विशेष रूप से गाय और बैल। कृषि जीवन में बैल और गायों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। खेत जोतना, सामान ढोना और कई कामों में उनका सहयोग किसान के जीवन का आधार रहा है।
मट्टु पोंगल पर
किसान इस दिन अपने पशुओं के सामने दीपक जलाकर उन्हें सम्मान के साथ प्रणाम करते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। कई गाँवों में इस दिन जल्लिकट्ṭु जैसे पारंपरिक बैल क्रीड़ा कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं, जहाँ परंपरा और साहस दोनों का मेल दिखाई देता है।
पोंगल का चौथा दिन कानुम पोंगल कहलाता है और वर्ष 2026 में यह 16 जनवरी को मनाया जाएगा। तमिल भाषा में “कानुम” का अर्थ होता है देखना, मिलना या भेंट करना। यह दिन मुख्य रूप से सामाजिक मेल मिलाप, परिवारिक घूमने फिरने और विश्राम का माना जाता है।
कानुम पोंगल पर
यह दिन पूरे पोंगल पर्व को एक मधुर समापन देता है, जहाँ फसल, सूर्य और पशु के प्रति कृतज्ञता के बाद अब मनुष्य एक दूसरे के साथ मिलने और जुड़ने का उत्सव मनाता है।
पोंगल की जड़ें तमिलनाडु के संगम युग तक जाती हैं, जब प्राचीन तमिल समाज में कृषि, वर्षा और प्रकृति के चक्र को अत्यंत श्रद्धा के साथ देखा जाता था। यह पर्व प्रकृति की प्रचुरता और ऋतुओं के परिवर्तन का उत्सव के रूप में विकसित हुआ। पोंगल इस बात की याद दिलाता है कि जीवन की हर सुविधा के पीछे धरती, सूर्य, वर्षा और अन्न की अनदेखी मेहनत छिपी होती है।
समय के साथ पोंगल केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित न रहकर शहरों, नगरों और विदेशों में बसे तमिल समुदायों तक फैल गया। लेकिन इसका मूल संदेश आज भी वही है कि जीवन में जो भी मिला है, उसके लिए प्रकृति का आभार मानना और अन्न की एक एक कण को सम्मान की दृष्टि से देखना आवश्यक है।
पोंगल का संबंध सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से भी जोड़ा जाता है। वर्ष 2026 में पोंगल संक्रांति शुभ मुहूर्त दोपहर 03:13 बजे से प्रारंभ माना गया है। इस समय सूर्य के संक्रमण का प्रभाव मजबूत माना जाता है, इसलिए सूर्य आराधना, कृतज्ञता और मानसिक संकल्प के लिए यह समय अत्यंत उपयुक्त रहता है।
थाई पोंगल के दिन कई परिवार इस समय के आसपास
जैसी साधना करते हैं। यह सूर्य की ऊर्जा, फसल और जीवन के बीच के अदृश्य संबंध को सम्मान देने का प्रतीक माना जा सकता है।
पोंगल के सभी दिनों में भोजन और प्रसाद की अपनी खास भूमिका होती है। प्रत्येक व्यंजन केवल स्वाद के लिए नहीं बल्कि प्रतीकात्मक अर्थ के साथ बनाया जाता है।
सबसे प्रमुख व्यंजनों में
इसके अलावा
यह सब व्यंजन मिलकर केवल भोजन का स्वाद ही नहीं बढ़ाते बल्कि पूरे परिवार को एक साथ बैठकर साझा भोजन का अवसर भी देते हैं।
पोंगल के दौरान घरों की सजावट भी बहुत खास होती है। मुख्य दरवाजे पर और आंगन में कोलम बनाए जाते हैं, जो चावल के आटे से बनाई गई जटिल और सुंदर आकृतियाँ होती हैं। इन्हें समृद्धि, शुभता और सकारात्मक ऊर्जा के स्वागत का संकेत माना जाता है। कई घरों में गन्ने के बंडल द्वार पर या पूजा स्थान पर सजाए जाते हैं।
भोजन परोसने के लिए पारंपरिक रूप से केले के पत्ते का उपयोग किया जाता है, जो शुद्धता और धरती से सीधे जुड़े रहने का प्रतीक है। पुरुष प्रायः वेश्टि और शर्ट पहनते हैं, जबकि महिलाएँ साड़ी या पावडै धारण करती हैं। मट्टु पोंगल के दिन पशुओं को भी फूल, कपड़े और रंगीन सींगों से सजाया जाता है, जिससे पूरा वातावरण अत्यंत उत्सवमय और जीवंत हो उठता है।
जो परिवार पोंगल 2026 को अधिक अर्थपूर्ण ढंग से मनाना चाहें, वे कुछ छोटे लेकिन गहरे कदम अपना सकते हैं। जैसे
इस प्रकार पोंगल केवल परंपरा न रहकर, जीवन में प्रकृति के सम्मान, साझेदारी और आभार का जीता जागता अभ्यास बन सकता है। वर्ष 2026 का यह पोंगल नए वर्ष के लिए मन, परिवार और समाज में एक उजला आरंभ बना सकता है।
पोंगल 2026 किस तिथि से किस तिथि तक मनाया जाएगा
पोंगल 2026 चार दिनों तक मनाया जाएगा। भोगी पंडिगई 13 जनवरी, थाई पोंगल 14 जनवरी, मट्टु पोंगल 15 जनवरी और कानुम पोंगल 16 जनवरी को मनाए जाएँगे।
थाई पोंगल को मुख्य दिन क्यों माना जाता है
थाई पोंगल सूर्य देव को समर्पित मुख्य दिन है और तमिल माह थाई की शुरुआत का संकेत देता है। इसी दिन पारंपरिक पोंगल पकवान बनाकर सूर्य देव को कृतज्ञता के साथ अर्पित किया जाता है।
मट्टु पोंगल पर पशुओं के साथ क्या विशेष किया जाता है
मट्टु पोंगल के दिन गायों और बैलों को स्नान कर साफ किया जाता है, उनके सींग रंगे जाते हैं, फूलों की माला और कपड़े से सजाया जाता है, विशेष भोजन खिलाया जाता है और उन्हें सम्मानपूर्वक प्रणाम किया जाता है।
पोंगल संक्रांति का शुभ मुहूर्त 2026 में कब रहेगा
साल 2026 में पोंगल संक्रांति का शुभ मुहूर्त दोपहर 03 बजकर 13 मिनट से प्रारंभ माना गया है। इस समय सूर्य के संक्रमण के कारण सूर्य आराधना और कृतज्ञता की भावना विशेष फलदायी मानी जाती है।
पोंगल के पारंपरिक भोजन में क्या खास प्रतीक छिपे होते हैं
सक्करै पोंगल समृद्धि और मिठास का, वेन पोंगल संतुलन और सादगी का, गन्ना abundance और मधुरता का और केले के पत्ते पर परोसा भोजन प्रकृति से सीधा जुड़ाव और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।
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