By पं. अमिताभ शर्मा
जानिए 2025 में आने वाले सभी प्रदोष व्रत की तिथियां, महत्व, पूजा विधि और शास्त्रों के अनुसार इनका लाभ

प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्ति का अत्यंत शुभ अवसर है। यह प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को आता है और प्रदोष काल में की गई शिव उपासना साधक को पाप शांति रोग निवारण मानसिक स्थिरता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है। वैदिक ज्योतिष में भी प्रदोष व्रत को शनि पीड़ा पितृ दोष पारिवारिक कलह और ग्रह बाधाओं को शांत करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
| तिथि | वार | प्रकार |
|---|---|---|
| 11 जनवरी | शनिवार | शनि प्रदोष शुक्ल |
| 27 जनवरी | सोमवार | सोम प्रदोष कृष्ण |
| 9 फरवरी | रविवार | रवि प्रदोष शुक्ल |
| 25 फरवरी | मंगलवार | भौम प्रदोष कृष्ण |
| 11 मार्च | मंगलवार | भौम प्रदोष शुक्ल |
| 27 मार्च | गुरुवार | गुरु प्रदोष कृष्ण |
| 10 अप्रैल | गुरुवार | गुरु प्रदोष शुक्ल |
| 25 अप्रैल | शुक्रवार | शुक्र प्रदोष कृष्ण |
| 9 मई | शुक्रवार | शुक्र प्रदोष शुक्ल |
| 24 मई | शनिवार | शनि प्रदोष कृष्ण |
| 8 जून | रविवार | रवि प्रदोष शुक्ल |
| 23 जून | सोमवार | सोम प्रदोष कृष्ण |
| 8 जुलाई | मंगलवार | भौम प्रदोष शुक्ल |
| 22 जुलाई | मंगलवार | भौम प्रदोष कृष्ण |
| 6 अगस्त | बुधवार | बुध प्रदोष शुक्ल |
| 20 अगस्त | बुधवार | बुध प्रदोष कृष्ण |
| 5 सितंबर | शुक्रवार | शुक्र प्रदोष शुक्ल |
| 19 सितंबर | शुक्रवार | शुक्र प्रदोष कृष्ण |
| 4 अक्टूबर | शनिवार | शनि प्रदोष शुक्ल |
| 18 अक्टूबर | शनिवार | शनि प्रदोष कृष्ण |
| 3 नवंबर | सोमवार | सोम प्रदोष शुक्ल |
| 17 नवंबर | सोमवार | सोम प्रदोष कृष्ण |
| 2 दिसंबर | मंगलवार | भौम प्रदोष शुक्ल |
| 17 दिसंबर | बुधवार | बुध प्रदोष कृष्ण |
• प्रदोष का अर्थ वह संध्याकाल है जब दिन और रात का मिलन होता है और प्रकृति की ऊर्जा शांत तथा अत्यंत पवित्र मानी जाती है।
• सोम प्रदोष संतान सुख के लिए, शनि प्रदोष कष्ट और शनि पीड़ा निवारण के लिए, भौम प्रदोष स्वास्थ्य और ऊर्जा के लिए, शुक्र प्रदोष सौभाग्य और दांपत्य सुख के लिए तथा गुरु प्रदोष ज्ञान और समृद्धि के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
• शास्त्रीय मान्यता कहती है कि प्रदोष व्रत साधक के जीवन से रोग शत्रु बाधा ग्रह दोष मानसिक तनाव और दरिद्रता तक को शांत करता है और शिव कृपा के मार्ग खोलता है।
• वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रदोष काल में सूर्य चंद्र और मंगल की संयुक्त ऊर्जा अद्भुत प्रभाव देती है जिससे साधना और मंत्र जाप का फल कई गुना बढ़ जाता है।
• प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के समय में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
• शिवलिंग पर जल दूध शहद दही और घी से अभिषेक करें।
• बेलपत्र धतूरा सफेद फूल फल धूप दीप और अक्षत अर्पित करें।
• ॐ नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें।
• प्रदोष व्रत की कथा सुनें आरती करें और भगवान को भोग अर्पित करें।
• अगले दिन व्रत का पारण करें और ब्राह्मण को भोजन वस्त्र या दान दें।
प्रदोष व्रत केवल अनुष्ठान नहीं बल्कि श्रद्धा संयम और भक्ति का पवित्र सेतु है जिसके माध्यम से शिव कृपा साधक के जीवन में उजास प्रसन्नता धैर्य और समृद्धि लाती है। वर्ष 2025 में इन सभी शुभ तिथियों पर की गई उपासना साधक को आध्यात्मिक ऊर्जा और पारिवारिक शांति का अमूल्य वरदान प्रदान करती है।
1. क्या प्रदोष व्रत सभी लोग कर सकते हैं
हाँ यह व्रत स्त्री पुरुष सभी के लिए शुभ है।
2. क्या प्रदोष व्रत में निर्जला उपवास आवश्यक है
नहीं आवश्यक नहीं है। फलाहार से भी व्रत किया जा सकता है।
3. क्या प्रदोष व्रत ग्रह दोष शांत कर सकता है
हाँ विशेष रूप से शनि राहु और केतु के दोष पर इसका प्रभाव शुभ होता है।
4. प्रदोष काल कब होता है
सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पूर्व से 45 मिनट बाद तक का समय प्रदोष काल माना जाता है।
5. क्या इस दिन नए कार्य आरंभ करना शुभ है
यह दिन विशेष रूप से साधना और पूजा का है इसलिए नए कार्य का आरंभ अनुशंसित नहीं माना जाता।
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