By पं. अमिताभ शर्मा
सकट चौथ 2026 पर शिवलिंग और गणेश पूजा के साथ बिल्व पत्र, शमी पत्र, दूध, तिल, गन्ने का रस और दूर्वा से संतान संरक्षण

माघ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी, जिसे सकट चौथ, संकट चौथ और तिलकुटा चौथ के नाम से जाना जाता है, माताओं के लिए अत्यंत भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व वाला दिन मानी जाती है। वर्ष 2026 में यह व्रत 6 जनवरी को रखा जाएगा, जब माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छी सेहत और जीवन पथ से बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना के साथ पूरे दिन व्रत रखती हैं। सकट चौथ भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है, पर इस दिन शिव परिवार की संयुक्त पूजा को विशेष रूप से फलदायी बताया गया है।
हिंदू पंचांग के अनुसार माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सकट चौथ का व्रत रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन व्रत मंगलवार, 6 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन माताएं प्रातः से ही निर्जला या कड़े नियमों वाला व्रत रखती हैं और रात्रि में चंद्रोदय के बाद ही अर्घ्य देकर व्रत का पारण करती हैं।
इस व्रत की मूल भावना संतान की दीर्घायु, अच्छा स्वास्थ्य और भविष्य के मार्ग से संकटों को दूर करने से जुड़ी है। माना जाता है कि भगवान गणेश संतान के जीवन से विघ्न हटाते हैं और माता सकट तथा शिव परिवार की संयुक्त कृपा से बाल्यकाल के संकट, शिक्षा में बाधा, करियर की रुकावटें और अचानक आने वाली मुसीबतें धीरे धीरे कम होने लगती हैं।
सकट चौथ को तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन तिल और गुड़ से बने विशेष भोग और दान का महत्व बहुत अधिक माना गया है।
सकट चौथ व्रत मूल रूप से श्री गणेश जी को समर्पित है, परंतु शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो शिव परिवार की पूर्ण कृपा के बिना कोई भी पूजा संपूर्ण नहीं मानी जाती। गणेश जी स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं।
इस कारण सकट चौथ के दिन केवल गणेश पूजा ही नहीं, बल्कि शिवलिंग पर विशेष अर्पण का विधान भी अत्यंत शुभ माना गया है। जब माता भगवान गणेश के साथ शिवलिंग की भी पूजा करती है तब संतान के ऊपर शिव, पार्वती और गणेश तीनों की संयुक्त कृपा मानी जाती है। यह त्रिकोणीय कृपा संतान के मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक स्तर पर संरक्षण का एक सशक्त आधार बनती है।
सकट चौथ 2026 पर यदि भगवान गणेश की पूजा के साथ शिवलिंग पर भी कुछ विशेष वस्तुएं श्रद्धा से अर्पित की जाएं, तो संतान से जुड़ी अनेक मुश्किलें शांत होने लगती हैं। इन अर्पणों के पीछे गहरा प्रतीकात्मक अर्थ भी समझा जाता है।
भगवान शिव को बिल्व पत्र अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। यह त्रिदेव, त्रिगुण और त्रिकाल के संतुलन का प्रतीक भी समझा जाता है। दूसरी ओर गणेश जी को शमी पत्र बहुत प्रिय माना गया है।
सकट चौथ के दिन शिवलिंग पर 11 बिल्व पत्र और 11 शमी पत्र चढ़ाने का सरल उपाय बताया जाता है। यह संख्या एकाग्रता और दृढ़ संकल्प का संकेत मानी जाती है। माना जाता है कि इस अर्पण से संतान का अनावश्यक गुस्सा धीरे धीरे कम होने लगता है और उसे सही दिशा में आगे बढ़ने की बुद्धि प्राप्त होती है।
बिल्व पत्र मन के वासनात्मक विकारों को शांत करने का प्रतीक हैं और शमी पत्र संघर्षों के बीच संतुलन और संयम का संदेश देते हैं। इस दृष्टि से यह अर्पण संतान के लिए आंतरिक शांति और विवेक दोनों का आशीर्वाद बन सकता है।
सकट चौथ के दिन शिवलिंग पर कच्चे दूध और काले तिल से अभिषेक करने का उपाय विशेष रूप से संतान की सेहत और सुरक्षा के लिए बताया जाता है। दूध को शुद्धता, पोषण और मातृत्व का प्रतीक माना जाता है, जबकि काले तिल को पाप क्षय, नज़र दोष निवारण और सुरक्षा कवच के रूप में समझा जाता है।
यदि कोई संतान बार बार बीमार पड़ती हो, छोटी छोटी बातों से जल्दी नज़र लगती हो या कमजोर प्रतिरोधक क्षमता के कारण बारंबार अस्पताल जाना पड़ता हो, तो सकट चौथ के दिन दूध और काले तिल से शिवलिंग का अभिषेक बहुत शुभ माना जाता है। इस अभिषेक के बाद शिवलिंग पर सफेद पुष्प चढ़ाकर संतान के स्वास्थ्य, मानसिक स्थिरता और सुरक्षा के लिए शांत मन से प्रार्थना की जाती है।
यह उपाय केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि नज़र दोष और सूक्ष्म नकारात्मक प्रभावों को शांत करने के लिए भी उपयोगी माना गया है।
सकट चौथ के दिन शिवलिंग पर गन्ने का रस अर्पित करने का उपाय विशेष रूप से संतान के आर्थिक भविष्य और करियर की बाधाओं को दूर करने से जोड़ा जाता है। गन्ना मिठास, श्रम का फल और दीर्घकालिक समृद्धि का प्रतीक है।
जब गन्ने का रस शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है, तो यह संतान के जीवन में धन से जुड़ी रुकावटों, पढ़ाई के बाद नौकरी न मिल पाने की समस्या और करियर में बार बार आने वाले अवरोधों को शांत करने की प्रार्थना के रूप में देखा जाता है। यह उपाय उन माता पिता के लिए विशेष रूप से उपयोगी माना जा सकता है जो संतान के भविष्य को लेकर आर्थिक दृष्टि से चिंतित रहते हैं।
दूर्वा, गणेश जी की आराधना का अत्यंत प्रिय अंग है। सकट चौथ पर शिवलिंग के पास स्थित गणेश प्रतिमा पर या सीधे शिवलिंग पर 21 दूर्वा की मालाएं चढ़ाने का उपाय बताया जाता है। संख्या 21 गणेश से जुड़े मंत्रों और संकल्पों में विशेष स्थान रखती है।
इस अर्पण का भाव यह है कि संतान की बुद्धि तीव्र हो, स्मरण शक्ति बढ़े और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की संभावना सुदृढ़ हो। जो संतान पढ़ाई में मेहनत तो करती है, परंतु परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आते, उनके लिए दूर्वा माला का यह उपाय विशेष रूप से अर्थपूर्ण माना जाता है। यह उपाय मानसिक एकाग्रता, स्थिरता और सही निर्णय क्षमता को सूक्ष्म रूप से बल प्रदान करता है।
सकट चौथ का व्रत केवल अर्पणों पर आधारित नहीं, बल्कि पूरे दिन की साधना, संयम और श्रद्धा पर आधारित माना जाता है।
सकट चौथ व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य न दिया जाए। व्रतधारी माता पूरे दिन निराहार या निर्जला व्रत रखती है और संध्या के बाद जब चंद्रमा आकाश में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है तब उसे अर्घ्य अर्पित करती है।
अर्घ्य के जल में दूध और तिल मिलाना शुभ माना गया है। तिल पाप क्षय और रक्षा के प्रतीक हैं और दूध शांति तथा शुद्धता का संकेत है। इस अर्घ्य के समय संतान का नाम मन ही मन लेकर उसके लिए स्वस्थ, सुरक्षित और सुंदर भविष्य की प्रार्थना की जाती है।
सकट चौथ को तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है। इस दिन तिल और गुड़ से बना विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है, जिसे तिलकुटा कहा जाता है। तिलकुटा में तिल और गुड़ दोनों का सम्मिलन होता है जो पाप क्षय, ग्रह शांति और मिठास का संयुक्त प्रतीक माना जाता है।
यह भोग पहले भगवान गणेश और माता सकट को अर्पित किया जाता है। इसके बाद इसे परिवार, बच्चों और जरूरतमंदों में बांटा जाता है। व्रतधारी स्वयं भी व्रत खोलने के बाद फलाहार के साथ तिलकुटा प्रसाद ग्रहण करती है।
तिलकुटा का प्रसाद एक ओर माघ मास के तिल दान की परंपरा से जुड़ा है, दूसरी ओर यह जीवन में मधुरता, स्थिरता और ग्रह कृपा का संकेत भी देता है।
सकट चौथ व्रत की पूर्ति के लिए सकट माता और श्री गणेश जी की कथा सुनना या पढ़ना महत्वपूर्ण माना गया है। कथा सुनने से मन में व्रत का उद्देश्य और भी स्पष्ट होता है और भक्त के भीतर श्रद्धा तथा धैर्य की भावना मजबूत होती है।
कथा में वर्णित प्रसंग यह स्मरण कराते हैं कि कठिन समय में भी धैर्य, भक्ति और सही संकल्प के साथ आगे बढ़ने वाला परिवार अंततः संकटों से निकल आता है। माता इस कथा के माध्यम से संतान के लिए आंतरिक संरक्षण और दिव्य सहायता की भावना को और गहराई से अनुभव कर सकती है।
सकट चौथ 2026 उन सभी माता पिता के लिए एक विशेष अवसर लेकर आएगी जो अपने बच्चों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और सफल जीवन की कामना रखते हैं। इस दिन किया गया निर्जला व्रत, शिव और गणेश की संयुक्त पूजा, शिवलिंग पर बिल्व पत्र, शमी पत्र, दूध, तिल, गन्ने का रस और दूर्वा माला का अर्पण, साथ में तिलकुटा का भोग और चंद्र अर्घ्य, सब मिलकर एक सशक्त आध्यात्मिक साधना बन जाते हैं।
इस साधना का प्रभाव केवल एक दिन तक सीमित नहीं माना जाता। श्रद्धा से किया गया यह व्रत संतान के दीर्घकालिक भविष्य पर भी सूक्ष्म रूप से कार्य कर सकता है। जब माता पूरे भाव से यह व्रत करती है तब उसके मन से भय धीरे धीरे कम होता है और भरोसा, संतुलन तथा प्रार्थना की शक्ति बढ़ती है। यही शांत शक्ति आगे चलकर संतान के निर्णयों, स्वास्थ्य और करियर पर भी सकारात्मक छाप छोड़ सकती है।
सकट चौथ 2026 कब है और यह व्रत किस तिथि को रखा जाएगा
सकट चौथ 2026 माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाएगी। यह तिथि 6 जनवरी 2026 को पड़ेगी और इसी दिन माताएं संतान की दीर्घायु और सुख के लिए व्रत रखेंगी।
सकट चौथ का व्रत किन उद्देश्यों के लिए रखा जाता है
यह व्रत मुख्य रूप से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन से बाधाओं को दूर करने की भावना से रखा जाता है। भगवान गणेश और सकट माता की कृपा से संतान के जीवन में संकट, दुर्घटना और शिक्षा या करियर से जुड़े अवरोध कम होने की कामना की जाती है।
सकट चौथ के दिन शिवलिंग पर बिल्व पत्र और शमी पत्र चढ़ाने से क्या लाभ होता है
सकट चौथ पर शिवलिंग पर 11 बिल्व पत्र और 11 शमी पत्र चढ़ाने से संतान का गुस्सा कम होने और उसकी बुद्धि सही दिशा में लगने की मान्यता है। बिल्व पत्र मन के विकारों को शांत करने और शमी पत्र जीवन के संघर्षों के बीच संतुलन देने के प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं।
दूध और काले तिल से शिवलिंग का अभिषेक करने का क्या फल बताया गया है
यदि कोई संतान बार बार बीमार पड़ती हो या नज़र दोष से प्रभावित प्रतीत होती हो, तो सकट चौथ के दिन शिवलिंग पर कच्चे दूध और काले तिल से अभिषेक शुभ माना जाता है। इस उपाय से रोगों के प्रभाव में कमी, नज़र दोष के शमन और संतान की सुरक्षा में वृद्धि की भावना जुड़ी है।
सकट चौथ व्रत में चंद्र दर्शन और तिलकुटा प्रसाद को क्यों विशेष माना जाता है
सकट चौथ का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना पूर्ण नहीं मानते। अर्घ्य के जल में दूध और तिल मिलाने से चंद्र से जुड़े दोष शांत करने की परंपरा है। तिल और गुड़ से बना तिलकुटा भगवान गणेश को अर्पित कर प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है, जो माघ मास के तिल दान, ग्रह शांति और जीवन में मधुरता का प्रतीक माना जाता है।
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