By पं. सुव्रत शर्मा
माघ मास की कृष्ण त्रयोदशी पर आने वाला यह शुक्र प्रदोष व्रत दांपत्य संतुलन, मानसिक शांति और शिव भक्ति का सुंदर अवसर देता है

माघ मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी पर आने वाला जनवरी 2026 का दूसरा प्रदोष व्रत भक्तों के लिए एक ऐसी आध्यात्मिक संध्या लेकर आता है जो मन, घर और ग्रह स्थिति तीनों को संतुलित करने का सुंदर अवसर देती है। इस दिन व्रत रखने वाला साधक भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा से जीवन के कई कष्टों से धीरे धीरे मुक्त होता है और अंदर से एक गहरी शांति अनुभव करता है।
माघ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 15 जनवरी 2026 को रात 08 बजकर 16 मिनट से प्रारंभ होकर 16 जनवरी 2026 को रात 10 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगी। यह तिथि सीमा पूरे व्रत के लिए आधार बनती है परन्तु उपासना का मुख्य समय प्रदोष काल माना जाता है जब सूर्य अस्त होने के बाद और रात्रि गहराने से पहले का विशेष संधिकाल रहता है। इस बार त्रयोदशी तिथि के फैलाव के कारण प्रदोष व्रत 16 जनवरी 2026, दिन शुक्रवार को रखा जाएगा, जिसे विशेष रूप से शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाएगा।
प्रदोष काल आमतौर पर सूर्यास्त से लगभग 2 घंटे के भीतर माना जाता है, इसलिए 16 जनवरी को अपने शहर के सूर्यास्त समय के अनुसार भगवान शिव की मुख्य पूजा प्रदोष काल में करना अधिक शुभ माना जाता है। जो लोग केवल सूर्यास्त के बाद ही पूजा कर पाते हैं उन्हें चाहिए कि वे स्नान कर शुद्ध होकर प्रदोष काल में दीप, जल और बिल्वपत्र के साथ शिव आराधना अवश्य करें।
शुक्रवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत स्वयं में अत्यंत शुभ माना गया है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी पर जब यह व्रत आता है तो इसे परिवार, दाम्पत्य जीवन और भौतिक सुख सुविधाओं के संतुलन के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शिव के साथ साथ माता पार्वती की आराधना करने से दांपत्य में चल रही खींचतान धीरे धीरे कम होती है और आपसी संवाद में मधुरता आती है।
जो साधक शुक्र प्रदोष व्रत को नियमपूर्वक करते हैं उनके लिए कहा जाता है कि जीवन में आर्थिक स्थिरता, मान सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ने की संभावना प्रबल हो जाती है। जिन लोगों की कुंडली में शुक्र या चंद्र से संबंधित दोष हों, उनके लिए भी यह व्रत एक प्रकार का शांतिदायक उपाय माना जा सकता है, बशर्ते कि वे इसे श्रद्धा और सात्विकता के साथ करें।
विभिन्न पुराणों में प्रदोष व्रत के महत्व का विस्तार से उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि त्रयोदशी तिथि पर संध्या के समय देवाधिदेव महादेव कैलाश से अपनी विशेष कृपा दृष्टि संसार पर डालते हैं। एक प्रसिद्ध संदर्भ के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय हलाहल विष प्रकट हुआ था तो देव और दानव दोनों संकट में पड़ गए थे। तभी शिव ने वह विष कंठ में धारण किया और नीलकंठ के रूप में समूचे लोकों की रक्षा की।
इसी करुणा, त्याग और संरक्षण की ऊर्जा को स्मरण करते हुए प्रदोष काल में शिव की आराधना की जाती है। माघ मास की त्रयोदशी को जब शुक्र प्रदोष का योग बनता है तो उसमें सौम्यता, प्रेम और समर्पण का संकेत और भी प्रबल माना जाता है। इस दिन व्रत से न केवल पाप क्षीण होते हैं बल्कि साधक के भीतर कृतज्ञता और धैर्य भी बढ़ता है।
नीचे दी गई तालिका इस विशेष व्रत की तिथि और समय को सरल रूप में समझने में मदद करती है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मास | माघ मास, कृष्ण पक्ष |
| तिथि प्रारंभ | 15 जनवरी 2026, रात 08 बजकर 16 मिनट |
| तिथि समाप्त | 16 जनवरी 2026, रात 10 बजकर 21 मिनट |
| व्रत रखने की तिथि | 16 जनवरी 2026, शुक्रवार |
| व्रत का प्रकार | शुक्र प्रदोष व्रत |
| मुख्य पूजन का समय | 16 जनवरी की संध्या में प्रदोष काल |
प्रदोष व्रत का मूल भाव शरीर और मन दोनों को साधारण से थोड़ा अधिक अनुशासित और पवित्र बनाना है। इसलिए पूरे दिन को जितना हो सके सरल, सात्विक और संयमित रखने का प्रयास करना चाहिए।
जो लोग निराहार रह सकते हैं वह केवल जल, फल और कुछ स्थानों पर मान्य फलों से बने हल्के उपवास आहार पर दिन व्यतीत करते हैं। यदि स्वास्थ्य या जीवनशैली के कारण पूर्ण उपवास संभव न हो तो केवल एक समय सात्विक भोजन लिया जा सकता है परन्तु तली भुनी या अत्यधिक तीखी वस्तुओं से बचना बेहतर माना जाता है।
उपवास के दौरान भोजन का स्वरूप भी साधना का हिस्सा माना जाता है। कई लोग पूरे दिन केवल फल, दूध, दही या सूखे मेवे लेते हैं। जो व्यक्ति अन्न सेवन करते हैं वे भी कुछ बातों का ध्यान रखकर व्रत को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
इस प्रकार के संयम से शरीर हल्का महसूस करता है और मन भी पूजा के समय अधिक एकाग्र हो पाता है। धीरे धीरे यह अभ्यास साधक के स्वभाव में स्थिरता और धैर्य भी ला सकता है।
शिव पूजा के विधि पक्ष में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि भावनाओं के साथ साथ कुछ सरल नियम भी जुड़े होते हैं। प्रदोष काल में पूजा करने से पहले पुनः हाथ पैर धोकर या संक्षिप्त स्नान करके स्वयं को ताजा कर लेना अच्छा माना जाता है।
पूजा के दौरान मन में “Om Namah Shivaya” मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना गया है। जो लोग अधिक समय दे सकते हैं वे कम से कम 108 बार या अपनी सुविधा के अनुसार इस मंत्र का जप कर सकते हैं। अंत में आरती कर के भगवान शिव और माता पार्वती से अपनी मनोकामनाओं के साथ साथ समस्त परिवार की स्वास्थ्य, शांति और प्रगति की प्रार्थना करनी चाहिए।
शुक्रवार का संबंध ज्योतिष में शुक्र ग्रह से जोड़ा जाता है जो प्रेम, सौंदर्य, दांपत्य सुख और जीवन की भौतिक सुविधाओं का कारक माना जाता है। जब इसी दिन प्रदोष व्रत का संयोग बनता है तो भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त उपासना दांपत्य जीवन की कई जटिलताओं को धीरे धीरे सरल करने वाली मानी जाती है।
जो दंपति आपसी दूरी, संवाद की कमी या अविश्वास जैसी स्थिति से गुजर रहे हों, वे यदि इस दिन एक साथ शिव परिवार की पूजा करें तो उनके बीच समझ और करुणा बढ़ने की संभावना मजबूत मानी जाती है। यह व्रत केवल विवाह योग्य युवाओं के लिए ही नहीं बल्कि लंबे समय से विवाहित दंपतियों के लिए भी उपयोगी माना जा सकता है जो अपने संबंध में नया संतुलन और गरिमा लाना चाहते हैं।
ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से प्रदोष व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक प्रकार का ग्रह शांति उपाय भी माना जा सकता है। माघ मास का यह शुक्र प्रदोष विशेषतः उन लोगों के लिए सहायक हो सकता है जिनकी कुंडली में शुक्र, चंद्र या सप्तम भाव से संबंधित किसी प्रकार की अशुभ स्थिति हो।
यह व्रत किसी चमत्कार की अपेक्षा से नहीं बल्कि आंतरिक अनुशासन, संयम और भक्ति के रूप में किया जाए तो साधक को उसके परिणाम जीवन के कई क्षेत्रों में सूक्ष्म रूप से दिखाई देने लगते हैं।
सामान्य रूप से प्रदोष व्रत स्त्री पुरुष दोनों के लिए समान रूप से फलदायक माना गया है। विवाहित, अविवाहित, गृहस्थ, नौकरीपेशा और व्यापारी सभी इस व्रत को अपनी सुविधा के अनुसार अपना सकते हैं। यदि किसी कारणवश पूरा दिन उपवास करना संभव न हो तो भी प्रदोष काल में श्रद्धापूर्वक शिव पूजा अवश्य करनी चाहिए।
मुख्य बात यह है कि व्रत किसी भी प्रकार के दिखावे से दूर, सहज और श्रद्धा पूर्ण होना चाहिए। जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए व्रत का नियम बनाया जाए तो इसे वर्षों तक सहजता से निभाया जा सकता है।
व्रत की पूर्णता केवल पूजा की विधियों से नहीं बल्कि दिन भर के आचरण से भी जुड़ी होती है। इसीलिए प्रदोष व्रत के दिन कुछ बातों से दूरी बनाकर रखना उत्तम माना गया है।
इन छोटे छोटे संयमों से मन धीरे धीरे शुद्ध होने लगता है, जिससे केवल प्रदोष व्रत ही नहीं बल्कि अन्य आध्यात्मिक साधनाओं में भी सफलता बढ़ती दिखाई दे सकती है।
कई लोग यह प्रश्न करते हैं कि क्या जीवन में केवल एक बार प्रदोष व्रत कर लेने से ही सब कुछ बदल जाएगा। परंपरा यह बताती है कि साधना का वास्तविक प्रभाव निरंतरता से आता है, अचानक किसी एक दिन के प्रयास से नहीं। इसलिए जो लोग अपने जीवन में शिव कृपा को स्थिर रूप से महसूस करना चाहते हैं, वे वर्ष भर या किसी निश्चित अवधि तक नियमित प्रदोष व्रत करने का संकल्प लेते हैं।
फिर भी यदि किसी कारण से पूरे वर्ष व्रत करना संभव न हो तो भी माघ मास का यह शुक्र प्रदोष हृदय से किया जाए तो बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन की गई प्रार्थना, दान और संयमित जीवनशैली आने वाले समय के लिए एक सकारात्मक दिशा दे सकते हैं।
जब पूरा परिवार मिलकर प्रदोष व्रत करता है तो उसके लाभ केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं बल्कि सामूहिक स्तर पर भी दिखाई पड़ सकते हैं। भोजन में सादगी, वाणी में मधुरता और घर के वातावरण में शांति की भावना उस दिन कुछ अधिक ही स्पष्ट होती है।
इस प्रकार प्रदोष व्रत धीरे धीरे केवल एक धार्मिक कर्मकांड न रहकर जीवनशैली का हिस्सा बनने लगता है जो पूरे परिवार के संस्कारों को भी संतुलित कर सकता है।
शास्त्रों में व्रत, जप और दान को त्रिविध साधना माना गया है। प्रदोष व्रत के संदर्भ में भी यह समझा जाता है कि यदि सामर्थ्य हो तो उस दिन किसी जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार कोई उपयोगी वस्तु दान अवश्य करनी चाहिए।
इन सब के पीछे मूल भावना यह है कि भगवान शिव की कृपा केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के लिए भी प्रार्थित की जाए। जब व्रत के साथ दान और सेवा का भाव जुड़ जाता है तो उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा और भी गहराई से काम करती है।
माघ मास स्वयं ही तप, साधना और आध्यात्मिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। जब इसी मास में शुक्र प्रदोष व्रत आता है तो यह पूरे महीने के आध्यात्मिक लक्ष्य को स्पष्ट करने का एक अच्छा अवसर बन सकता है।
ऐसे छोटे छोटे संकल्प आने वाले महीनों में मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन और संबंधों में सहजता लाने में सहायक होते हैं।
अंत में यदि इस पूरे विषय को सहज रूप में समझना हो तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ध्यान रखने योग्य हैं।
| प्रमुख बिंदु | सार |
|---|---|
| व्रत की तिथि | 16 जनवरी 2026, शुक्रवार |
| तिथि का फैलाव | 15 जनवरी रात 08:16 से 16 जनवरी रात 10:21 |
| व्रत का स्वरूप | शुक्र प्रदोष, माघ कृष्ण त्रयोदशी |
| मुख्य उपास्य देव | भगवान शिव और माता पार्वती |
| प्रमुख लाभ संकेत | दांपत्य संतुलन, मानसिक शांति, संयम |
जो भी साधक इस दिन श्रद्धा पूर्वक व्रत रखकर प्रदोष काल में शिव की आराधना करेगा उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा अवश्य निर्मित होने लगेगी, भले ही वह परिवर्तन धीरे और शांत रूप में दिखाई दे।
जनवरी 2026 का दूसरा प्रदोष व्रत किस दिन रखा जाएगा
जनवरी 2026 का दूसरा प्रदोष व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के अनुसार 16 जनवरी 2026, दिन शुक्रवार को रखा जाएगा।
इस बार तिथि दो दिनों में फैली है तो व्रत किस दिन मान्य होगा
त्रयोदशी तिथि 15 जनवरी की रात से 16 जनवरी की रात तक रहती है परन्तु प्रदोष काल और शुक्रवार का संयोग 16 जनवरी को बन रहा है, इसलिए व्रत उसी दिन रखा जाएगा।
शुक्र प्रदोष व्रत दांपत्य जीवन के लिए कैसे उपयोगी माना जाता है
शुक्रवार को शुक्र ग्रह और दांपत्य सुख का कारक माना जाता है, इसलिए इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा से संबंधों में मधुरता, संवाद और सम्मान बढ़ाने का संकेत समझा जाता है।
क्या प्रदोष व्रत के दिन पूर्ण उपवास न कर पाने पर भी लाभ मिल सकता है
यदि स्वास्थ्य या परिस्थितियों के कारण पूर्ण उपवास संभव न हो तो भी सात्विक एक समय भोजन और प्रदोष काल में श्रद्धापूर्वक शिव पूजा करके व्रत किया जा सकता है, इससे भी आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।
प्रदोष व्रत में कौन सा मंत्र सबसे सरल और प्रभावी माना जाता है
प्रदोष व्रत में “Om Namah Shivaya” मंत्र का जप सबसे सरल और प्रभावी माना जाता है, जिसे कोई भी साधक अपनी सुविधा के अनुसार निश्चित संख्या में प्रदोष काल में जप सकता है।
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