By पं. नरेंद्र शर्मा
भगवान मुरुगन की आराधना के लिए 2026 की स्कंद षष्ठी तिथि, नियम और विधि

स्कंद षष्ठी व्रत 2026 भगवान कार्तिकेय के भक्तों के लिए पूरे वर्ष विशेष साधना का अवसर लेकर आ रहा है। तमिल समाज में इसे कंद षष्ठी या स्कंद शष्टी के नाम से अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह दिन भगवान स्कंद की उस दिव्य शक्ति की याद दिलाता है जिसने देवताओं को असुर अत्याचार से मुक्त कराया। जो भी साधक स्कंद षष्ठी व्रत को नियमपूर्वक अपनाता है, उसके जीवन में साहस, स्पष्टता और आध्यात्मिक स्थिरता बढ़ती है।
स्कंद षष्ठी केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है। अब पूरे भारत में भगवान मुरुगन के भक्त इस व्रत को वर्ष के हर महीने श्रद्धा से मनाने लगे हैं। 2026 के कैलेंडर में भी हर माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी भगवान स्कंद की उपासना के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है।
वर्ष 2026 में हर महीने की शुक्ल पक्ष षष्ठी पर स्कंद षष्ठी व्रत रखा जा सकता है। नीचे दी गई सारणी में माह, वार और तिथि समय का विवरण दिया गया है, जिससे साधक पूरे वर्ष की योजना आसानी से बना सकें।
| माह 2026 | पक्ष और तिथि | वार | तिथि समय (आरंभ - समाप्त) |
|---|---|---|---|
| जनवरी स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | रविवार | 24 जनवरी 2026, 01:46 am से 25 जनवरी 2026, 12:40 am तक |
| फरवरी स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | सोमवार | 22 फरवरी 2026, 11:10 am से 23 फरवरी 2026, 09:09 am तक |
| मार्च स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | मंगलवार | 23 मार्च 2026, 06:38 pm से 24 मार्च 2026, 04:08 pm तक |
| अप्रैल स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | बुधवार | 22 अप्रैल 2026, 01:20 am से 22 अप्रैल 2026, 10:50 pm तक |
| मई स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | शुक्रवार | 21 मई 2026, 08:27 am से 22 मई 2026, 06:25 am तक |
| जून स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | शनिवार | 19 जून 2026, 05:00 pm से 20 जून 2026, 03:47 pm तक |
| जुलाई स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | सोमवार | 19 जुलाई 2026, 03:43 am से 20 जुलाई 2026, 03:30 am तक |
| अगस्त स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | मंगलवार | 17 अगस्त 2026, 05:00 pm से 18 अगस्त 2026, 05:51 pm तक |
| सितंबर स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | गुरुवार | 16 सितंबर 2026, 08:59 am से 17 सितंबर 2026, 10:48 am तक |
| अक्टूबर स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | शनिवार | 16 अक्टूबर 2026, 03:25 am से 17 अक्टूबर 2026, 05:54 am तक |
| नवंबर स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | सोमवार | 14 नवंबर 2026, 11:24 pm से 16 नवंबर 2026, 02:01 am तक |
| दिसंबर स्कंद षष्ठी | शुक्ल पक्ष षष्ठी | मंगलवार | 14 दिसंबर 2026, 07:16 pm से 15 दिसंबर 2026, 09:19 pm तक |
इन तिथियों पर स्कंद षष्ठी व्रत रखना भगवान मुरुगन की कृपा प्राप्त करने का सरल और प्रभावी मार्ग माना जाता है। स्थान के अनुसार थोड़ी भिन्नता संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग देख लेना उपयोगी रहता है।
स्कंद षष्ठी व्रत पूरी तरह भगवान स्कंद के नाम समर्पित है, जिन्हें मुरुगन, कार्तिकेय और सुब्रमण्य भी कहा जाता है। भगवान स्कंद भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र तथा भगवान गणेश के बड़े भाई माने जाते हैं। दक्षिण भारत विशेष रूप से तमिलनाडु में भगवान मुरुगन को युद्ध देवता, संरक्षक और धर्म के रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान स्कंद ने असुरराज सुरपद्मन का वध कर देवताओं को आतंक से मुक्त कराया था। यह विजय केवल बाहरी युद्ध की जीत नहीं मानी जाती, बल्कि इसे धर्म, साहस और सत्य की स्थापना का प्रतीक समझा जाता है। स्कंद षष्ठी का हर दिन साधक को यह याद दिलाता है कि जीवन के संघर्षों में सत्य पक्ष पर टिके रहना ही वास्तविक विजय है।
कंद षष्ठी को कई स्थानों पर स्कंद शष्टी भी कहा जाता है। तमिल समाज में परिवार के लोग मिलकर भगवान मुरुगन के मंदिरों में विशेष पूजा, अभिषेक और पालकी यात्रा में भाग लेते हैं। भक्ति गीत, नृत्य और कीर्तन के माध्यम से भगवान के पराक्रम का गुणगान किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार स्कंद षष्ठी की तिथि चयन के पीछे एक स्पष्ट नियम बताया गया है। जब पंचमी तिथि का समापन और षष्ठी तिथि का आरंभ सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच होता है तब वही दिन स्कंद षष्ठी व्रत के लिए मुख्य माना जाता है। इस नियम का उल्लेख धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु ग्रंथों में भी मिलता है।
तमिलनाडु के अधिकांश मुरुगन मंदिरों में इसी नियम के अनुसार तिथि तय की जाती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि व्रत का मुख्य भाग दिन के समय में रहे और भक्त षष्ठी के प्रभावी काल में पूजा पाठ कर सकें। कुछ साधक केवल प्रमुख कार्तिक मास की स्कंद षष्ठी पर विशेष रूप से व्रत रखते हैं, जबकि कई भक्त वर्ष की हर शुक्ल पक्ष षष्ठी पर साधारण या फलाहार व्रत भी करते हैं।
स्कंद षष्ठी व्रत को अत्यंत तेजस्वी और रक्षण प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है। परंपरा है कि जो भक्त नियमित रूप से स्कंद षष्ठी व्रत रखते हैं, उनके शत्रु शांत होते हैं और जीवन में अदृश्य बाधाएँ धीरे धीरे कम होती हैं। भगवान मुरुगन को शौर्य और विवेक की शक्ति का देवता माना गया है। इसलिए यह व्रत व्यक्ति के भीतर छिपी कमजोरी, भय और भ्रम को कम कर मानसिक दृढ़ता को बढ़ाता है।
माना जाता है कि स्कंद षष्ठी व्रत से पापों का क्षय होता है। देवताओं पर हुए अत्याचार से मुक्ति का जो प्रसंग भगवान स्कंद के माध्यम से हुआ, वह साधक के भीतर चल रहे अधर्म और धर्म के संघर्ष का भी प्रतीक है। जब साधक उपवास, जप और पूजा के माध्यम से अपने भीतर के नकारात्मक विचारों पर विजय पाने का प्रयास करता है तब धीरे धीरे आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ने लगती है।
कई भक्त मानते हैं कि यह व्रत संतान सुख, स्वास्थ्य और करियर में स्थिरता के लिए भी शुभ है। विशेष रूप से युवाओं के लिए जो लक्ष्य, प्रतियोगी परीक्षाओं या निर्णयों को लेकर उलझन में रहते हैं, स्कंद षष्ठी पर भगवान मुरुगन की आराधना मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।
स्कंद षष्ठी की कथा का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग सूरससंहारम् माना जाता है। परंपरा के अनुसार भगवान स्कंद और असुरराज सुरपद्मन के बीच छह दिन तक युद्ध चला। अंततः षष्ठी तिथि के दिन भगवान ने अपने दिव्य आयुध वेल के द्वारा सुरपद्मन का संहार किया। इस विजय दिवस को सूरससंहारम् कहा जाता है और इसे कई स्थानों पर एक दिन पहले या उसी क्रम में नाट्य रूप में मंचित किया जाता है।
सूरससंहारम् केवल एक धार्मिक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि यह साधक को भीतर के छह शत्रुओं यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर पर विजय की प्रेरणा देता है। जब भक्त इस प्रसंग का चिंतन करते हैं तो समझ में आता है कि भगवान मुरुगन का वेल ज्ञान और साहस का प्रतीक है, जो अज्ञान और नकारात्मकता को काटता है। इसलिए स्कंद षष्ठी के दिनों में सूरससंहारम् का स्मरण आत्मशुद्धि की साधना बन जाता है।
सूरससंहारम् के अगले दिन को थिरु कल्याणम के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान स्कंद का देवी वल्ली और देवसेना के साथ दिव्य विवाह उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव केवल विवाह समारोह नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि जब साधक भीतर की नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करता है तब जीवन में सौहार्द, पूर्णता और संतुलन स्थापित होता है।
मंदिरों में थिरु कल्याणम के समय भगवान और देवियों की अलंकारिक शोभा यात्रा निकाली जाती है। भक्त फूल, प्रसाद और भक्ति गीतों के माध्यम से इस मंगल समय में सहभागी होते हैं। यह दिन परिवारिक सुख, दांपत्य जीवन की स्थिरता और रिश्तों में प्रेम बढ़ाने के लिए विशेष शुभ माना जाता है।
स्कंद षष्ठी व्रत को साधक अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार विभिन्न प्रकार से निभा सकते हैं। कुछ लोग छः दिन तक निराहार या फलाहार रहकर कंद षष्ठी विरतम के रूप में इसे करते हैं। कई लोग केवल मुख्य षष्ठी के दिन व्रत रखते हैं और बाकी दिन साधारण पूजा करते हैं।
व्रत के दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ और हल्के रंग के वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर भगवान मुरुगन की प्रतिमा या फोटो स्थापित करें।
फिर यह क्रम अपनाया जा सकता है।
दक्षिण भारत में कई भक्त स्कंद पुराण के चयनित अध्यायों का पाठ भी करते हैं। दिन भर जहाँ तक संभव हो, मन को भगवान मुरुगन के नाम स्मरण में जोड़े रखना लाभकारी माना जाता है।
कुछ साधक स्कंद षष्ठी को छः दिन के लंबे व्रत के रूप में भी करते हैं, जो नए चंद्रमा के बाद से षष्ठी तक चलता है। इस रूप में भक्त रोजाना विशेष पूजा, जप और संयमित आहार अपनाते हैं। यह विधि शरीर और मन दोनों के लिए कठोर अनुशासन मांगती है, इसलिए इसे स्वास्थ्य और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही अपनाना उचित रहता है।
व्रत की प्रमुख विशेषता आहार अनुशासन है। स्कंद षष्ठी व्रत रखते समय साधक को सात्विक, सरल और संयमित भोजन पर ही ध्यान देना चाहिए। कई भक्त फलाहार या दूध, फल और हल्के व्रत अनुकूल भोजन पर टिके रहते हैं। कुछ लोग केवल एक समय भोजन करते हैं और दिन भर जल या नींबू जल से काम चलाते हैं।
जो लोग कड़ा व्रत रखते हैं, वे निराहार या केवल जल पर रहने का संकल्प भी ले सकते हैं। परन्तु यह प्रकार वही साधक अपनाएँ जिनकी शारीरिक स्थिति इसकी अनुमति देती हो। मुख्य बात यह है कि भोजन का स्वरूप मन को स्थिर और हल्का रखने वाला हो। मांसाहार, लहसुन, प्याज, तामसिक मसाले और शराब जैसे पदार्थों से पूर्ण रूप से दूरी बनाना आवश्यक है।
तमिलनाडु के मुरुगन मंदिरों में स्कंद षष्ठी व्रत को अत्यंत भव्यता के साथ मनाया जाता है। कई प्रसिद्ध मंदिरों जैसे पालयमकोट्टई, तिरुचेंदूर, पलानी, स्वामिमलाई और तिरुपरंकुंद्रम में इस अवसर पर विशेष उत्सव होते हैं। भक्त मंदिर प्रांगण में दिन भर भजन, कीर्तन और नृत्य के माध्यम से अपनी भक्ति व्यक्त करते हैं।
मंदिरों में शोभायात्रा, अलंकरण, अभिषेक और अन्नदान की परंपरा भी देखने को मिलती है। बहुत से भक्त स्कंद षष्ठी के दिनों में इन तीर्थ स्थानों की यात्रा कर भगवान मुरुगन के दर्शन करना अपना सौभाग्य मानते हैं। जो लोग दूर रहते हैं, वे घर में ही दीपक जलाकर, मंत्र जप कर और अपनी क्षमता के अनुसार दान देकर इस व्रत में जुड़ सकते हैं।
यद्यपि प्रत्येक महीने की शुक्ल पक्ष षष्ठी भगवान मुरुगन को समर्पित मानी जाती है, तथापि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी को सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। तमिल पंचांग के अनुसार यह समय दीपों और उत्सवों का काल होता है। कार्तिक की स्कंद षष्ठी को महान उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
कई स्थानों पर कार्तिक स्कंद षष्ठी के अवसर पर सूर्यास्त के बाद भव्य सूरससंहारम् का मंचन होता है। भक्त उस प्रस्तुति को देख कर भगवान की विजय और धर्म की ताकत को अपने जीवन से जोड़ने का प्रयास करते हैं। इस अवधि में मंदिरों में भीड़ और भक्ति का स्तर सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक होता है।
स्कंद षष्ठी व्रत से भक्तों को अनेक आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ प्राप्त होने की मान्यता है। यह व्रत शत्रु बाधा, भय और नकारात्मक विचारों को दूर करने में सहायक माना जाता है। जो साधक ईमानदारी से यह व्रत करते हैं, उन्हें लक्ष्य के प्रति स्पष्टता और निर्णय क्षमता में वृद्धि अनुभव हो सकती है।
माना जाता है कि भगवान मुरुगन की कृपा से जीवन में धन, समृद्धि और प्रतिष्ठा का संतुलित रूप से आगमन होता है। यह व्रत केवल इच्छापूर्ति के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को अनुशासन और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाने का माध्यम भी है। जो माता पिता संतान के अच्छे संस्कार और शिक्षा के लिए चिंतित रहते हैं, वे भी स्कंद षष्ठी पर विशेष प्रार्थना कर अपने बच्चों के लिए शुभ मार्गदर्शन की कामना कर सकते हैं।
धीरे धीरे नियमित व्रत और भक्ति से साधक अपने भीतर अधिक सरलता, विनम्रता और आत्मविश्वास अनुभव करने लगता है। यही इस व्रत का वास्तविक फल माना जा सकता है।
स्कंद षष्ठी व्रत 2026 में कब कब रखा जा सकता है?
वर्ष 2026 में हर महीने की शुक्ल पक्ष षष्ठी पर स्कंद षष्ठी व्रत रखा जा सकता है। जैसे जनवरी में 24 जनवरी, फरवरी में 22 फरवरी, मार्च में 24 मार्च, अप्रैल में 22 अप्रैल, मई में 21 मई, जून में 20 जून, जुलाई में 20 जुलाई, अगस्त में 18 अगस्त, सितंबर में 17 सितंबर, अक्टूबर में 17 अक्टूबर, नवंबर में 16 नवंबर और दिसंबर में 15 दिसंबर को।
स्कंद षष्ठी व्रत की तिथि निर्धारण का मूल नियम क्या है?
जब पंचमी तिथि समाप्त होकर षष्ठी तिथि सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच प्रभावी होती है तब वह दिन स्कंद षष्ठी व्रत के लिए चुना जाता है। यह नियम धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु में वर्णित है और तमिलनाडु के अनेक मुरुगन मंदिरों में प्रचलित है।
स्कंद षष्ठी व्रत का आध्यात्मिक महत्व क्या माना जाता है?
यह व्रत भगवान मुरुगन की कृपा प्राप्त करने, शत्रु बाधा से मुक्ति, साहस, विवेक और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है। स्कंद षष्ठी की साधना पाप क्षय, मानसिक स्थिरता और जीवन के संघर्षों में संतुलन प्रदान करने में सहायक होती है।
सूरससंहारम् और थिरु कल्याणम का स्कंद षष्ठी से क्या संबंध है?
सूरससंहारम् भगवान स्कंद द्वारा असुरराज सुरपद्मन पर विजय की स्मृति है, जिसका मंचन स्कंद षष्ठी के अवसर पर किया जाता है। इसके अगले दिन थिरु कल्याणम मनाया जाता है, जिसमें भगवान स्कंद का वल्ली और देवसेना के साथ दिव्य विवाह उत्सव मनाया जाता है, जो जीवन में पूर्णता और सौहार्द का प्रतीक है।
स्कंद षष्ठी व्रत के दौरान आहार और पूजा के मुख्य नियम क्या हैं?
व्रत के दिन सात्विक, सरल और संयमित आहार रखना चाहिए। कई भक्त फलाहार या एक समय का भोजन करते हैं। मांसाहार, लहसुन, प्याज और तामसिक पदार्थों से दूरी रखी जाती है। पूजा में भगवान मुरुगन को दूध, फल, चंदन और फूल अर्पित किए जाते हैं, अभिषेक, दीपक और मंत्र जप के साथ दिन को भक्ति में बिताना शुभ माना जाता है।
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