By पं. संजीव शर्मा
22 फरवरी 2026 स्कंद षष्ठी व्रत, भगवान मुरुगन पूजा और धार्मिक महत्व

तमिल पंचांग के अनुसार स्कन्द षष्ठी हर माह के चंद्र मास की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है, जो विशेष रूप से भगवान मुरुगन की उपासना के लिए मानी जाती है। दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में यह दिन अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ मनाया जाता है।
फरवरी 2026 में स्कन्द षष्ठी व्रत की तिथि इस प्रकार है।
| विवरण | तिथि | वार |
|---|---|---|
| स्कन्द षष्ठी व्रत | 22 फरवरी 2026 | रविवार |
इस दिन श्रद्धालु भगवान स्कन्द अर्थात भगवान मुरुगन की आराधना करते हैं, व्रत रखते हैं और छह दिन चले दिव्य युद्ध की स्मृति में कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
स्कन्द षष्ठी व्रत भगवान स्कन्द, कार्तिकेय या मुरुगन की विजय गाथा से जुड़ा है। भगवान स्कन्द को देवताओं की सेना के सेनापति और युद्ध के देवता के रूप में जाना जाता है। वे भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र हैं और देवताओं के रक्षक माने जाते हैं।
परंपरा में उन्हें वह शक्ति माना गया है जो अधर्म पर धर्म की विजय सुनिश्चित करती है। स्कन्द षष्ठी के दिन भक्त उसी दिव्य संकल्प को स्मरण करते हैं कि जब भी नकारात्मकता और अत्याचार बढ़े, तो ईश्वरीय शक्ति किसी न किसी रूप में रक्षा के लिए अवश्य खड़ी होती है।
इस दिन व्रत रखकर भगवान स्कन्द की पूजा करना केवल एक पर्व नहीं बल्कि अपने भीतर के भय, आलस्य और नकारात्मक विचारों पर विजय का संकल्प भी माना जाता है।
हिंदू ग्रंथों के अनुसार भगवान स्कन्द की उत्पत्ति का उद्देश्य दैत्यों का संहार और देवताओं की रक्षा था।
तारकासुर, सिंहमुख और सुरपद्म जैसे असुर राजाओं ने मिलकर भयंकर अत्याचार शुरू किए। उन्होंने विशाल असुर सेना बनाकर स्वर्ग लोक पर अधिकार जमा लिया और देवताओं को उनके स्थान से बेदखल कर दिया। देवताओं के लिए असुरों पर नियंत्रण रखना अत्यंत कठिन होता चला गया।
तब सभी देवता भगवान शिव के पास पहुँचे और उनसे निवेदन किया कि वे इन दैत्यों का विनाश करें। भगवान शिव समाधि से प्रकट हुए और अपने तीसरे नेत्र से तेज प्रकट करके भगवान स्कन्द की रचना की। देवी पार्वती और अन्य देवताओं ने उन्हें विविध दिव्य अस्त्र शस्त्र और शक्तियाँ प्रदान कीं, ताकि वे असुरों के विरुद्ध युद्ध कर सकें।
इसके बाद छह दिनों तक चला भीषण युद्ध बताया जाता है। इन छह दिनों में भगवान स्कन्द ने तारकासुर, सिंहमुख और सुरपद्म जैसे असुरों को परास्त कर स्वर्ग लोक को उनके कब्जे से मुक्त कराया। स्कन्द षष्ठी इन्हीं छह दिनों की विजय स्मृति का प्रतीक है, इसलिए भक्त इन दिनों भगवान स्कन्द के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए व्रत और पूजा करते हैं।
स्कन्द षष्ठी व्रत को जीवन में प्रगति, सुरक्षा और आत्मबल के लिए अत्यंत प्रभावी माना गया है।
विश्वास है कि जो भी भक्त इस दिन भगवान स्कन्द की पूरी श्रद्धा से उपासना करता है, उसे समृद्धि, सम्मान और खुशहाली का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भगवान स्कन्द साधकों को मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति देते हैं, ताकि वे कठिन परिस्थितियों, बाधाओं और विरोध के बीच भी अपने धर्म और प्रयास पर टिके रह सकें।
यह व्रत केवल बाहरी फल के लिए नहीं बल्कि भीतर के साहस और स्थिरता को जागृत करने के लिए भी रखा जाता है। स्कन्द षष्ठी का अनुशासन व्यक्ति को लापरवाही से निकालकर सजगता और संयम की ओर ले जाता है।
स्कन्द षष्ठी व्रत के पालन की विधि सरल है, पर उसमें अनुशासन और शुद्ध भावना का विशेष महत्त्व है।
व्रत के अंत में सूर्यास्त के बाद या निर्धारित समय पर भगवान की आरती के साथ व्रत खोला जाता है और प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
स्कन्द षष्ठी के प्रसंग में “स्कन्द षष्ठी कवचम्” का विशेष उल्लेख मिलता है।
यह प्रभु स्कन्द को समर्पित एक भक्तिपूर्ण रचना मानी जाती है, जिसे तमिल भाषा में रचा गया बताया जाता है। इसके प्रथम चार पंक्तियों को काप्पु और आगे के अनेक श्लोकों को कवचम् कहा जाता है। परंपरा है कि व्रत के दिनों में इस कवच का जप बार बार किया जाए, ताकि मन सतत रूप से भगवान स्कन्द की स्मृति में जुड़ा रहे।
इसके साथ साथ “Om Sharavana Bhava” मंत्र का जप भी अत्यंत फलदायी माना जाता है। भक्त प्रायः 108 बार जप करने के लिए माला फेरते हैं, ताकि जप के माध्यम से ध्यान और भक्ति दोनों गहरी हो सकें।
ज्योतिषीय दृष्टि से भी स्कन्द षष्ठी का विशेष महत्त्व बताया जाता है।
जिन लोगों की जन्मकुंडली में राहु, केतु, कालसर्प दोष या सर्प शाप जैसे योग हों, उन्हें स्कन्द षष्ठी व्रत और भगवान स्कन्द की पूजा करने की सलाह दी जाती है। विश्वास है कि इस दिन व्रत, पूजा और स्तोत्र पाठ से इन ग्रहों के दुष्प्रभाव काफी हद तक शांत हो सकते हैं।
जो साधक ईमानदारी से व्रत रखते हैं, भगवान स्कन्द के मंत्रों का जप करते हैं और अपने आचरण में संयम लाते हैं, उनके लिए बाधाओं में धीरे धीरे कमी, दृष्टिदोष और भय में शांति और निर्णय क्षमता में बढ़ोतरी का अनुभव संभव हो सकता है।
कथा के अनुसार भगवान स्कन्द और असुरों का युद्ध छह दिनों तक चला था, इसलिए कई स्थानों पर स्कन्द षष्ठी की साधना भी छह दिनों तक चलती है।
यह छह दिनों का अनुशासन मन को भटकाव से निकालकर एक लक्ष्य पर स्थिर रहने की कला सिखाता है।
स्कन्द षष्ठी का मूल संदेश यह है कि जब भीतर का साहस जागृत हो जाए, तो बाहरी चुनौतियाँ उतनी भयावनी नहीं लगतीं।
भगवान स्कन्द की लीला यह सिखाती है कि ईश्वरीय शक्ति के साथ जुड़कर व्यक्ति अपने जीवन के तारकासुर जैसे नकारात्मक विचारों, आदतों और भय को परास्त कर सकता है। व्रत, जप और अनुशासन के माध्यम से धीरे धीरे आत्मविश्वास, धैर्य और संयम बढ़ने लगता है।
जो लोग बार बार असफलता, हताशा या विरोध का सामना कर रहे हों, वे स्कन्द षष्ठी को एक ऐसे अवसर के रूप में ले सकते हैं जहाँ वे अपने भीतर की कमजोरी को भगवान स्कन्द के चरणों में रखकर नए संकल्प के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा लें।
स्कन्द षष्ठी केवल इस भाव से न मनाई जाए कि एक दिन व्रत रख लिया और बात समाप्त हो गई।
इस व्रत के साथ यह संकल्प जोड़ना उपयोगी होता है कि आगे चलकर कठिन परिस्थितियों से भागने के बजाय उनका शांत और साहसपूर्ण सामना किया जाएगा। भगवान स्कन्द की पूजा के साथ व्यक्ति यह भी निश्चय कर सकता है कि क्रोध, कटु वाणी और असंयमित व्यवहार पर ध्यान देगा और उन्हें धीरे धीरे बदलने की कोशिश करेगा।
जब स्कन्द षष्ठी की साधना केवल एक पर्व न रहकर जीवन में अनुशासन, साहस और ईमानदारी की शुरुआत का आधार बन जाए तब उसका वास्तविक फल समृद्धि, सम्मान और भीतर की स्थिरता के रूप में दिखाई देने लगता है।
फरवरी 2026 में स्कन्द षष्ठी व्रत कब रखा जाएगा
स्कन्द षष्ठी व्रत फरवरी 2026 में रविवार, 22 फरवरी को रखा जाएगा। यह दिन तमिल पंचांग के अनुसार षष्ठी तिथि पर आने वाली विशेष स्कन्द षष्ठी के रूप में माना गया है।
स्कन्द षष्ठी व्रत रखने का मूल उद्देश्य क्या है
स्कन्द षष्ठी व्रत का उद्देश्य भगवान स्कन्द की विजय लीला का स्मरण करते हुए जीवन में साहस, आत्मबल, प्रगति और समृद्धि की कामना करना है। भक्त इस दिन व्रत रखकर, जप और पूजा के द्वारा अपने भीतर के भय और नकारात्मकता को कमजोर करने का संकल्प लेते हैं।
स्कन्द षष्ठी के दिन व्रत कैसे रखा जाता है
भक्त प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक व्रत रखने का संकल्प लेते हैं। कई लोग पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करते हैं, जबकि कुछ लोग केवल फल और दूध ग्रहण करते हैं। दिन भर भगवान स्कन्द की पूजा, मंदिर दर्शन और मंत्र जप के साथ व्रत को निभाया जाता है।
स्कन्द षष्ठी कवचम् और “Om Sharavana Bhava” मंत्र का क्या महत्त्व है
स्कन्द षष्ठी कवचम् भगवान स्कन्द की स्तुति में रचित एक भक्तिमय रचना मानी जाती है, जिसे व्रत के दिनों में बार बार पढ़ना या सुनना शुभ माना जाता है। “Om Sharavana Bhava” मंत्र के 108 जप से मन केंद्रित होता है और भगवान स्कन्द की कृपा के प्रति सजगता बढ़ती है।
किन लोगों के लिए स्कन्द षष्ठी व्रत विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है
ज्योतिषीय दृष्टि से जिन लोगों पर राहु, केतु, कालसर्प दोष या सर्प शाप के संकेत हों, उनके लिए स्कन्द षष्ठी व्रत लाभकारी माना जाता है। साथ ही जो लोग आत्मविश्वास की कमी, भय, बार बार असफलता या बाधाओं से परेशान हों, वे भी इस व्रत के अनुशासन और पूजा से मानसिक बल और स्थिरता पाने की दिशा में लाभ अनुभव कर सकते हैं।
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