By पं. अभिषेक शर्मा
18 जनवरी 2026 थाई अमावस्या, उत्तरायण के पहले अमावस्या में पितृ तर्पण और पूजन

दक्षिण भारत की परंपराओं में थाई अमावस्या वह दिवस माना जाता है जब घर परिवार श्रद्धा के साथ अपने पितरों का स्मरण करते हैं और संपूर्ण वंश के लिए आशीर्वाद की कामना करते हैं। यह अमावस्या उत्तरायण की पहली अमावस्या होने के कारण भी विशेष मानी जाती है और इसी समय फसल का मौसम, पोंगल उत्सव और नई ऊर्जा का आरंभ एक साथ अनुभव किया जाता है।
तमिल पंचांग के अनुसार थाई अमावस्या, तमिल महीने थाई की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह अमावस्या मकर संक्रांति के बाद उत्तरायण के प्रारंभिक काल में पड़ रही है और पितृ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है।
| विवरण | तिथि | समय |
|---|---|---|
| थाई अमावस्या 2026 | रविवार, 18 जनवरी 2026 | पूरे दिन अमावस्या व्रत और श्राद्ध के अनुष्ठान |
| अमावस्या तिथि प्रारंभ | 18 जनवरी 2026 | रात 12 बजकर 03 मिनट |
| अमावस्या तिथि समाप्त | 19 जनवरी 2026 | रात 01 बजकर 21 मिनट |
थाई अमावस्या 18 जनवरी के सूर्योदय पर विद्यमान होने के कारण धार्मिक कार्य, तर्पण, श्राद्ध और दान के मुख्य अनुष्ठान इसी दिन किए जाते हैं। अमावस्या की यह तिथि उत्तरायण की पहली अमावस्या मानी जाती है, इसलिए पितृ कर्मों और पुण्य कर्मों के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।
तमिल कैलेंडर के अनुसार थाई अमावस्या, थाई महीने की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः 15 जनवरी से 12 फरवरी के बीच आती है। यही समय नई फसल के पकने, पोंगल उत्सव के आयोजन और खेत खलिहानों में चहल पहल बढ़ने का भी होता है।
सूर्य के उत्तरायण गमन के बाद आने वाली यह पहली अमावस्या होने से इसका महत्त्व और बढ़ जाता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि के रूप में समझाया जाता है, इसलिए उत्तरायण अवधि में किए गए पुण्य कर्म, स्नान, दान और श्राद्ध अधिक फलदायी माने जाते हैं।
थाई अमावस्या पर की गई पितृ तृप्ति से संबंधित साधना को विशेष रूप से पितृ दोष शमन, बाधा निवारण और परिवार की उन्नति के लिए सहायक माना जाता है।
थाई अमावस्या को उत्तर भारत में प्रायः मौनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
मौनी अमावस्या पर कई साधक मौन व्रत धारण करते हैं और दिन भर बोलने से यथासंभव विरत रहकर मन को भीतर की ओर मोड़ने का प्रयास करते हैं। मौन का यह अभ्यास केवल शब्दों की कमी नहीं बल्कि विचारों को शांत करने, अनावश्यक विवादों से बचने और पितृ तर्पण के समय मन को अधिक एकाग्र रखने के लिए भी उपयोगी माना जाता है।
इसी दिन उड़ीसा में त्रिवेणी अमावस्या का भी विशेष उल्लेख मिलता है, जहाँ नदियों के संगम पर स्नान और पितृ कार्यों की परंपरा है। इस प्रकार थाई अमावस्या दक्षिण भारत में, मौनी अमावस्या उत्तर भारत में और त्रिवेणी अमावस्या कुछ अन्य क्षेत्रों में, अलग अलग नामों से मनाए जाने वाले एक ही आध्यात्मिक भाव के विविध रूप बन जाते हैं।
तमिलनाडु में थाई अमावस्या के दिन प्रातःकाल पवित्र नदियों, समुद्र तटों और तीर्थस्थलों पर स्नान की विशेष परंपरा है।
कन्याकुमारी, धनुष्कोडी, मुहुंथरयारचत्रम, सेतुक्करई और देविपट्टिनम जैसे स्थानों पर भी विशेष स्नान, पूजा और श्राद्ध कर्म आयोजित होते हैं। हजारों श्रद्धालु इस दिन पवित्र तटों पर पहुँचकर जल अर्पण, पिंडदान और तर्पण के माध्यम से अपने पितरों को स्मरण करते हैं।
थाई अमावस्या का सबसे प्रमुख पक्ष पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म से जुड़ा है।
मान्यता है कि इस दिन पितृ लोक में स्थित पूर्वज धरती पर अपने वंशजों को आशिष देने के लिए सूक्ष्म रूप में उपस्थित होते हैं। जब संतान श्रद्धा के साथ तर्पण, तिल होम और पिंडदान करते हैं, तो उनके द्वारा अर्पित जल, तिल और अन्न पितरों तक सूक्ष्म रूप से पहुँचते हैं और उनकी तृप्ति का कारण बनते हैं।
श्राद्ध कर्म को जितनी श्रद्धा, पवित्रता और नियम से किया जाए, उतना ही परिवार के लिए पितृ कृपा और आशीर्वाद के द्वार खुलते हैं। थाई अमावस्या पर किया गया पितृ तर्पण वर्ष भर के समष्टिगत पितृ कार्य का एक महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है।
थाई अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण के लिए कुछ मुख्य विधियाँ विशेष रूप से बताई गई हैं।
इन अनुष्ठानों को तीर्थस्थलों, नदी या सागर के तट पर करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। हरिद्वार, प्रयागराज त्रिवेणी संगम, रामेश्वरम्, कन्याकुमारी और अन्य पवित्र नदी घाटों पर इन कर्मों के द्वारा पितृ तृप्ति की परंपरा गहरी मानी गई है।
थाई अमावस्या पर तर्पण करते समय तिल और जल की धारा का विशेष महत्व बताया गया है।
तर्पण में सामान्यतया काले तिल, जल और कभी कभी दूध या गंगाजल के मिश्रण से पितरों को स्मरण करके अर्घ्य दिया जाता है। यह माना जाता है कि श्रद्धा के साथ किया गया तर्पण पितरों के अपूर्ण इच्छाओं, कष्टों और बंधनों को धीरे धीरे शांत करने में सहायक होता है।
एक मान्यता यह भी है कि तर्पण के प्रभाव से सात पीढ़ियों तक के पितरों को लाभ पहुँचता है। तर्पण के द्वारा केवल बीते कर्मों के दोष और शाप हल्के नहीं होते बल्कि पितरों के मन के असंतोष और अधूरे भाव भी शांत होते हैं, जिससे वंशजों के जीवन में बाधाएँ कम होने की संभावना बढ़ती है।
थाई अमावस्या पर किए गए तर्पण और श्राद्ध के अनेक लाभ बताए जाते हैं।
विश्वास है कि इस दिन सच्ची भावना से किया गया तर्पण स्वास्थ्य, धन और संबंधों से जुड़े अनेक प्रकार के संकटों को शांत करने में सहायक होता है। पितृ दोष, वंशगत बाधाएँ या बार बार आने वाले अनदेखे अवरोध, थाई अमावस्या पर किए गए पितृ कार्यों से काफी हद तक शांत हो सकते हैं।
जब पितृ संतुष्ट होते हैं तो वे वंशजों को आशीर्वाद देते हैं, जिससे दीर्घायु, शांति और उन्नति की दिशा में ऊर्जा खुलती है। यह भी कहा जाता है कि पितृ शापों से मुक्ति की दिशा में थाई अमावस्या विशेष रूप से सहायक हो सकती है।
अमावस्या स्वयं ही हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी गई है।
जब अमावस्या का दिन सोमवार के साथ संयोग बनाता है, तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। ऐसा योग वर्ष में कभी कभी ही आता है और इसे विशेष रूप से पति की दीर्घायु और परिवार की कुशलता के लिए शुभ माना जाता है। सोमवार का सीधा संबंध भगवान शिव से है, इसलिए सोमवती अमावस्या पर शिव पूजन और व्रत का महत्व और बढ़ जाता है।
मान्यता है कि यदि किसी घर में कोई व्यक्ति लंबे समय से रोग या कष्ट से जूझ रहा हो तो उसकी पत्नी सोमवती अमावस्या के दिन व्रत रखकर पीपल वृक्ष की परिक्रमा करे और उसके चारों ओर घुमकर प्रार्थना करे, तो स्वास्थ्य में सुधार की संभावना बढ़ सकती है। सोमवती अमावस्या पर किया गया श्राद्ध और तर्पण भी पितरों को प्रसन्न करने वाला माना जाता है।
थाई अमावस्या 2026 को केवल एक कर्मकांड की तरह न देख कर, इसे पितरों के प्रति कृतज्ञता और अपने जीवन के प्रति सजगता का दिवस माना जाए, तो इसका प्रभाव गहरा हो सकता है।
इस दिन स्नान, श्राद्ध और तर्पण के साथ साथ परिवार के बुजुर्गों का सम्मान, उनसे आशीर्वाद लेना और उनके अनुभवों को सुनना भी पितृ साधना का ही हिस्सा समझा जा सकता है। जो लोग तीर्थ पर न जा सकें, वे घर पर ही नियमपूर्वक तर्पण, दीपक प्रज्वलन और शांत मंत्र जप कर सकते हैं।
जब थाई अमावस्या के अनुष्ठान के साथ यह संकल्प जुड़ता है कि आगे के दिनों में पितरों की इच्छाओं के अनुरूप अधिक सच्चा, अनुशासित और सदाचारपूर्ण जीवन जिया जाएगा तब यह अमावस्या परिवार और जीवन दोनों के लिए एक नई दिशा का प्रारंभ बन सकती है।
थाई अमावस्या 2026 कब है और अमावस्या तिथि का समय क्या रहेगा
थाई अमावस्या 2026 रविवार, 18 जनवरी को मनाई जाएगी। अमावस्या तिथि 18 जनवरी को रात 12 बजकर 03 मिनट पर शुरू होकर 19 जनवरी को रात 01 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगी, इसलिए मुख्य श्राद्ध, तर्पण और पितृ कार्य 18 जनवरी के दिन किए जाएँगे।
थाई अमावस्या को पितृ कार्यों के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है
थाई अमावस्या उत्तरायण की पहली अमावस्या होती है और इसी अवधि में फसल कटाई तथा पोंगल जैसे उत्सव भी आते हैं। इस समय पितरों की तृप्ति के लिए किया गया तर्पण, तिल होम और पिंडदान पितृ दोष शमन, बाधा निवारण और परिवार की उन्नति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
थाई अमावस्या पर कौन से मुख्य अनुष्ठान किए जाते हैं
इस दिन तर्पणम् के रूप में तिल और जल से पितरों को अर्घ्य दिया जाता है, तिल होम और पिंड दान किए जाते हैं। विशेष तीर्थस्थलों पर श्राद्ध, अभिषेक, पूजा और मंत्र जप के साथ पितृ कार्य पूरे किए जाते हैं और अंत में ब्राह्मण या जरूरतमंदों को दान दिया जाता है।
थाई अमावस्या और मौनी अमावस्या में क्या समानता है
दक्षिण भारत में इसे थाई अमावस्या और उत्तर भारत में मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। दोनों ही रूपों में यह अमावस्या पितृ तर्पण, स्नान, दान, मौन व्रत और आत्मचिंतन के लिए विशेष मानी जाती है और मन को शांत कर भीतर की ओर मोड़ने का अवसर देती है।
थाई अमावस्या 2026 को व्यक्तिगत जीवन में किस प्रकार सार्थक बनाया जा सकता है
थाई अमावस्या 2026 के दिन पितरों के नाम से तर्पण, दान और पूजन के साथ यह संकल्प लिया जा सकता है कि आगे से परिवार, परंपरा और अपने आचरण के प्रति अधिक सजग रहा जाएगा। बुजुर्गों का सम्मान, संबंधों में विनम्रता और जीवन में संयम बढ़ाने का प्रयास थाई अमावस्या को केवल एक तिथि नहीं बल्कि जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत बना सकता है।
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