विजय एकादशी 2026: तिथि और पारणा समय

By पं. सुव्रत शर्मा

13 फरवरी 2026 विजय एकादशी का महत्व, व्रत पालन और पारणा का सही समय

विजय एकादशी 2026: तिथि, व्रत और पारणा समय

2026 में विजय एकादशी कब है और पारण कब करें

विजय एकादशी का व्रत उन तिथियों में माना जाता है जहाँ साधक सफलता, बाधा से मुक्ति और भीतर के संकल्प को मजबूत करने की प्रार्थना करता है। यह एकादशी केवल पाप क्षय के लिए ही नहीं बल्कि सही दिशा में विजय प्राप्त करने की भावना से भी जुड़ी हुई मानी जाती है।

वर्ष 2026 में विजय एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आएगी और पंचांग के अनुसार इसकी तिथि और पारण का समय इस प्रकार रहेगा।

विवरण समय और तिथि
विजय एकादशी की तिथि 13 फरवरी 2026, शुक्रवार
पारण तिथि 14 फरवरी 2026, शनिवार
पारण का समय प्रातः 07 बजकर 00 मिनट 50 सेकंड से 09 बजकर 14 मिनट 43 सेकंड तक
पारण अवधि लगभग 2 घंटे 13 मिनट

व्रत का मुख्य पालन 13 फरवरी को किया जाएगा और पारण 14 फरवरी की सुबह निर्दिष्ट समयावधि में करना श्रेष्ठ माना गया है। एकादशी व्रत में पारण समय का पालन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यही व्रत की पूर्णता का सूचक होता है।

विजय एकादशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व क्या है

हिंदू धर्म में विजय एकादशी को अत्यंत पुण्यदायक और प्राचीन व्रत माना गया है। इसका नाम ही संकेत देता है कि यह एकादशी साधक के जीवन में विजय का मार्ग प्रशस्त करने वाली मानी जाती है।

  • यह मान्यता है कि जो भी साधक इस एकादशी पर विधि विधान के साथ व्रत रखता है, उसे सफलता, समृद्धि और आत्मबल प्राप्त होता है
  • यह व्रत जीवन में आने वाली बाधाओं और अड़चनों को दूर करने में विशेष सहायक माना जाता है
  • विजय एकादशी पर उपवास करने से पूर्व जन्मों के पाप भी क्षीण होने लगते हैं और व्यक्ति धर्ममार्ग पर अधिक दृढ़ता से चल पाता है
  • पद्म पुराण के अनुसार स्वयं भगवान महादेव ने नारद जी को विजय एकादशी की महिमा बताते हुए कहा कि इस व्रत का फल अत्यंत श्रेष्ठ है

एक और महत्त्वपूर्ण मान्यता यह भी है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा से यह व्रत रखता है, वह अपने पितरों को भी नरक जैसी कठिन दशाओं से बाहर निकालने में सहायक बनता है और उन्हें उच्च लोकों की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।

विजय एकादशी से जुड़ी कथा क्या बताती है

विजय एकादशी की कथा त्रेता युग से जुड़ी हुई मानी जाती है और यह कथा स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन प्रसंग को स्पर्श करती है।

कथा के अनुसार जब भगवान श्रीराम लंका जाने के लिए समुद्र तट पर पहुँचे, तो उन्होंने समुद्र देव से विनम्रतापूर्वक मार्ग देने की प्रार्थना की। समुद्र देव ने पहले इस निवेदन को स्वीकार न किया और मौन बने रहे। तब श्रीराम ने ऋषि वकदालभ्य से मार्गदर्शन लिया। ऋषि ने उन्हें विजय एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी।

श्रीराम ने पूर्ण श्रद्धा से विजय एकादशी का व्रत रखा और नियमपूर्वक पूजा संपन्न की। उनके व्रत और साधना से प्रसन्न होकर समुद्र देव ने लंका तक जाने के लिए मार्ग उपलब्ध कराया। इस प्रकार यह व्रत श्रीराम की असुर शक्तियों पर विजय की तैयारी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बना और इसी से इस एकादशी को विजय एकादशी नाम मिला।

कथा यह संदेश भी देती है कि जब साधक धैर्य, नियम और श्रद्धा के साथ भगवान की शरण लेता है तब असंभव प्रतीत होने वाली बाधाएँ भी हट सकती हैं।

विजय एकादशी व्रत से मिलने वाले लाभ

विजय एकादशी को केवल फल प्राप्ति का माध्यम न मानकर एक गहरी साधना के रूप में समझा जाए तो इसके फल भी अधिक सार्थक अनुभव किए जा सकते हैं।

  • इस व्रत से सफलता, समृद्धि और कार्यों में सिद्धि की प्रार्थना की जाती है
  • बार बार असफल होने वाले कार्यों में धीरे धीरे सही दिशा और सहयोग मिलने की आशा बढ़ती है
  • यह व्रत पाप कर्मों के प्रभाव को कम करने और मन को सात्त्विक बनाने की दिशा में सहायक माना गया है
  • पितृ ऋण और पितृ दोष से जुड़ी बेचैनी में भी इस व्रत के माध्यम से शांति की प्रार्थना की जाती है
  • बाधाओं, मानसिक उलझनों और नकारात्मक परिस्थितियों के बीच यह व्रत आत्मविश्वास और भीतर की स्थिरता को मजबूत करने का अवसर बन सकता है

विजय एकादशी का भाव यही है कि साधक केवल बाहरी जीत ही नहीं बल्कि भीतर की कमजोरी पर विजय की दिशा में भी कदम बढ़ाए।

विजय एकादशी व्रत और पूजा विधि कैसे करें

विजय एकादशी की पूजा और व्रत विधि विस्तार से बताई गई है, ताकि साधक हर चरण को सजगता से निभा सके। व्रत से पूर्व और व्रत वाले दिन की साधना, दोनों महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं।

व्रत से एक दिन पहले की तैयारी

विजय एकादशी से एक दिन पहले सरल, सात्त्विक और शुद्ध शाकाहारी भोजन करना चाहिए।

  • व्रत से पहले तैलीय, भारी और तामसिक भोजन से बचना उचित है
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना इस व्रत की शुद्धता को और मजबूत करता है
  • रात को मन ही मन व्रत के संकल्प को याद करते हुए शांत भाव से विश्राम करना शुभ माना जाता है

विजय एकादशी के दिन विशेष विधि

एकादशी के दिन की पूजा विधि में कई सूक्ष्म चरण बताए गए हैं।

  • प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें
  • एक मंडल या वेदी बनाकर उसके भीतर सात प्रकार के विभिन्न अनाज रखें
  • उसी वेदी के भीतर सोना, चाँदी, ताँबा या मिट्टी से बना एक पात्र या कलश स्थापित करें
  • पंच पल्लव कलश या कलश पर भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें
  • श्रीहरि की पूजा धूप, चंदन, दीपक, पुष्प, फल और तुलसी दल से करें
  • दिन भर व्रत का पालन करते हुए भगवान की कथा, विशेषतः विजय एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें
  • रात्रि में यथासंभव जागरण करके नामस्मरण, भजन और हरि कीर्तन करें

इस विधि में वेदी पर रखे अनाज, पात्र और कलश सभी समृद्धि, स्थिरता और रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। इनका प्रयोग साधक और उसके घर परिवार के कल्याण की प्रार्थना के लिए किया जाता है।

द्वादशी तिथि पर पारण और दान

विजय एकादशी का व्रत द्वादशी तिथि पर पारण के साथ पूर्ण होता है।

  • निर्दिष्ट पारण समय में स्नान कर भगवान विष्णु को प्रणाम करें
  • ब्राह्मणों या किसी योग्य साधु को भोजन कराएँ
  • वेदी में रखा पात्र या कलश और अन्नादि सामग्री यथाशक्ति दान करें
  • इसके बाद हल्का और सात्त्विक भोजन करके व्रत का पारण करें

इस प्रकार दान, अतिथि सत्कार और प्रसाद ग्रहण के साथ व्रत की पूर्णता मानी जाती है।

विजय एकादशी व्रत में साधक के लिए विशेष सावधानियाँ

विजय एकादशी की फलदायकता के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना भी आवश्यक माना गया है।

  • व्रत के दौरान झूठ, कठोर वचन और अनावश्यक वाद विवाद से बचने की कोशिश करनी चाहिए
  • बिना कारण किसी का मन दुखाने से व्रत की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ सकता है
  • भोजन में अत्यधिक आसक्ति रखने के स्थान पर जप, ध्यान और चिंतन को प्राथमिकता देना व्रत को अधिक सार्थक बनाता है
  • यदि पूर्ण निराहार व्रत संभव न हो तो फलाहार या केवल एक समय सात्त्विक भोजन लेकर भी व्रत किया जा सकता है, पर नियम से विचलित न होना आवश्यक है

व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं बल्कि मन को संयम और भगवान की ओर उन्मुख करना है।

विजय एकादशी 2026 को जीवन में कैसे उतारें

विजय एकादशी 2026 को केवल तिथि के रूप में न देखकर, इसे जीवन में नई शुरुआत के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है।

  • इस दिन अपने जीवन के किसी एक बड़े भय या बाधा को पहचानकर ईमानदारी से भगवान के सामने स्वीकार करना और उसे बदलने का संकल्प लेना उपयोगी हो सकता है
  • जो कार्य बार बार रुक जाते हों या जिनमें असफलता मिली हो, उनके लिए भी इस दिन शांत मन से योजना और प्रार्थना दोनों करना लाभकारी हो सकता है
  • पुराने अपराधबोध और आत्मग्लानि को छोड़कर, आगे के लिए अधिक स्पष्ट और सच्चा जीवन जीने का संकल्प भी विजय एकादशी के भाव से मेल खाता है

जब व्रत, पूजा और कथा के साथ साथ सोच और व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगे तब विजय एकादशी साधक के जीवन में वास्तविक विजय का मार्ग खोलने लगती है।

सामान्य प्रश्न

विजय एकादशी 2026 कब है और पारण कब किया जाएगा
वर्ष 2026 में विजय एकादशी का व्रत 13 फरवरी 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा। व्रत का पारण 14 फरवरी 2026, शनिवार को प्रातः 07 बजकर 00 मिनट 50 सेकंड से 09 बजकर 14 मिनट 43 सेकंड के बीच करना श्रेष्ठ माना गया है।

विजय एकादशी व्रत से क्या फल मिलने की मान्यता है
धार्मिक मान्यता है कि विजय एकादशी का व्रत रखने से जीवन के अनेक कार्यों में सफलता और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह व्रत पूर्व जन्मों के पापों के क्षय, पितरों को नरक से मुक्ति और साधक को धर्म तथा विजय के मार्ग पर अग्रसर करने में सहायक माना गया है।

विजय एकादशी पर पूजा की मुख्य विधि क्या है
इस दिन वेदी बनाकर उसमें सात प्रकार के अनाज रखे जाते हैं और उसके भीतर सोना, चाँदी, ताँबा या मिट्टी का पात्र रखा जाता है। पंच पल्लव कलश पर भगवान विष्णु की स्थापना कर धूप, दीप, चंदन, पुष्प, फल और तुलसी से पूजा की जाती है, साथ ही व्रत, कथा श्रवण, रात्रि जागरण और द्वादशी को ब्राह्मण भोजन तथा दान के बाद पारण किया जाता है।

इस एकादशी की कथा में भगवान श्रीराम और समुद्र देव का प्रसंग क्यों महत्त्वपूर्ण है
त्रेता युग की कथा के अनुसार जब श्रीराम लंका जाने के लिए समुद्र पार करना चाहते थे, तो समुद्र देव ने मार्ग देने में विलंब किया। ऋषि वकदालभ्य की सलाह पर श्रीराम ने विजय एकादशी का व्रत रखा, जिससे प्रसन्न होकर समुद्र देव ने मार्ग दिया और आगे चलकर रावण पर विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसीलिए इस एकादशी को विजय एकादशी कहा जाता है।

विजय एकादशी व्रत के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए
इस व्रत में शुद्ध शाकाहारी और सात्त्विक भोजन, व्रत से पूर्व संयम, ब्रह्मचर्य, व्रत के दिन जप, कथा और पूजा पर ध्यान देना, झूठ, क्रोध और अनावश्यक वाद विवाद से बचना और द्वादशी के दिन समय पर पारण करना महत्त्वपूर्ण माना गया है। इन नियमों का पालन व्रत की आध्यात्मिक शक्ति को और बढ़ा देता है।

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पं. सुव्रत शर्मा

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