By पं. अमिताभ शर्मा
षटतिला एकादशी की कथा, अर्थ, महत्व, व्रत नियम, पारण विधि, एकादशी के लाभ और विवाह से जुड़े प्रश्नों का विस्तृत मार्गदर्शन

षटतिला एकादशी माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कहा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इसका विशेष संबंध तिल से जुड़ा होता है। परंपरा के अनुसार इस दिन तिल के छह प्रकार के प्रयोग बताए गए हैं, जिनके कारण इसका नाम ही शततिला या षटतिला हो गया है। यह व्रत पापों के क्षय, दरिद्रता के नाश, पितृ संतोष और आध्यात्मिक उन्नति के लिए रखा जाता है।
हिंदू धर्म में वर्ष की चौबीसों एकादशियों को अत्यंत पावन माना जाता है, किंतु माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी को दान, संयम और करुणा की दृष्टि से विशेष दर्जा दिया गया है। इस दिन उपवास के साथ साथ दान और विशेष रूप से तिल दान का विधान है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति ईमानदारी से षटतिला एकादशी व्रत करता है, उसके जीवन में अभाव कम होते हैं, मन की कठोरता घटती है और भीतरी संवेदनशीलता बढ़ती है।
षटतिला एकादशी व्रत में केवल भोजन छोड़ देना ही मुख्य उद्देश्य नहीं होता। यह व्रत शरीर के साथ साथ विचारों और व्यवहार को भी अनुशासित करने की साधना माना जाता है। इस दिन व्रतधारी प्रातःकाल तिल युक्त जल से स्नान करते हैं, स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु के समक्ष शततिला एकादशी व्रत का संकल्प लेते हैं। दिन भर या तो निर्जल रहते हैं, या फलाहार या हल्के सात्त्विक भोजन से व्रत निभाते हैं।
पूजा के समय भगवान विष्णु, श्री नारायण या शालिग्राम जी की मूर्ति की स्थापना कर पुष्प, धूप, दीप और तिल युक्त जल से अभिषेक किया जाता है। तिल से बने नैवेद्य जैसे तिल लड्डू, गजक या अन्य पदार्थ भी अर्पित किए जाते हैं। दिन के किसी समय शततिला एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है, जिससे व्रत के पीछे छिपा भाव और संदेश समझ में आता है। संध्या के समय फिर से भगवान की आरती, तिल दान और मंत्रजप करना शुभ माना जाता है।
| चरण | क्या किया जाता है | उद्देश्य |
|---|---|---|
| स्नान | तिल युक्त जल से स्नान | बाहरी और आंतरिक शुद्धि |
| संकल्प | भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प | मन को एकाग्र और दृढ़ करना |
| पूजा | तिल, पुष्प, दीप, नैवेद्य से पूजन | विष्णु कृपा और आशीर्वाद की कामना |
| कथा श्रवण | शततिला एकादशी व्रत कथा सुनना | भाव, करुणा और दान का महत्व समझना |
| दान | तिल, अन्न, वस्त्र, दक्षिणा का दान | पितृ संतोष और दरिद्रता के दोष में कमी |
| जप और ध्यान | हरि नाम, विष्णु सहस्रनाम, छोटे मंत्रों का जप | मन की चंचलता को शांत करना |
इस प्रकार देखा जाए तो षटतिला एकादशी व्रत एक दिन का कर्मकांड भर नहीं बल्कि नियमित जीवन में सजगता और करुणा को स्थान देने की शुरुआत जैसा माना जा सकता है।
षटतिला एकादशी व्रत की कथा का वर्णन पद्म पुराण सहित कई ग्रंथों में मिलता है। कथा का मूल भाव यह है कि केवल व्रत और पूजा कर लेने से ही सब कुछ नहीं मिलता, जब तक कि उसके साथ सच्चा दान और करुणा न हो। कथा इस प्रकार बताई जाती है कि एक ब्राह्मणी अत्यंत धार्मिक थी। वह नियमित रूप से व्रत रखती और जप, तप करती, पर आवश्यकता से अधिक कंजूस स्वभाव के कारण किसी को भोजन या दान देने में कतराती थी।
एक बार भगवान विष्णु भिक्षुक के रूप में उसके द्वार पर आए और भोजन की याचना की। उस स्त्री ने उन्हें मिट्टी की एक मुठ्ठी दे दी। भगवान ने उसे स्वीकार तो कर लिया, पर उसके व्यवहार का फल उसे आगे चलकर भोगना पड़ा। मृत्यु के बाद वह स्वर्ग समान स्थान पर पहुंची, जहां सुंदर महल तो था, पर भीतर अन्न, जल और आवश्यक वस्तुओं का अभाव था। उसे समझ में आया कि जीवन में उसने व्रत और पूजा तो बहुत की, पर दान में खरे भाव नहीं रखे, इसलिए महल तो मिला, पर संपन्नता नहीं मिली।
कष्ट में पड़े होने पर उस स्त्री ने भगवान से मुक्ति का उपाय पूछा। तब उसे माघ कृष्ण पक्ष की शततिला एकादशी का व्रत करने और तिल दान करने की प्रेरणा दी गई। इस व्रत के प्रभाव से उसका अभाव दूर हुआ, घर में अन्न और सुख संपन्नता आई और अंततः उसे उत्तम लोक की प्राप्ति हुई। इस कथा से यह संकेत मिलता है कि व्रत का वास्तविक फल तब मिलता है, जब उपवास के साथ दान, विनम्रता और सच्ची करुणा भी शामिल हो।
षटतिला शब्द दो भागों से मिलकर बना है। शत या षट् का अर्थ है छह और तिल का अर्थ है तिल के बीज। इस प्रकार षटतिला एकादशी वह तिथि है, जिस पर तिल को छह अलग अलग तरीकों से प्रयोग करने की परंपरा बताई गई है। यह केवल एक भाषाई अर्थ नहीं बल्कि साधना का संकेत भी है कि एक ही पवित्र तत्व को जीवन के कई स्तरों पर अपनाकर व्यक्ति अपने भीतर संतुलन और शुद्धि ला सकता है।
तिल स्वयं में बहुत सूक्ष्म और छोटे बीज होते हैं, पर उनमें तेल, ऊष्मा और पोषण की शक्ति छिपी रहती है। इसी प्रकार मनुष्य के छोटे छोटे सात्त्विक कर्म भी आगे चलकर बहुत बड़े परिणाम दे सकते हैं। षटतिला एकादशी में तिल को स्नान, उबटन, हवन, दान, भोजन और जल में मिलाकर उपयोग करना यह दर्शाता है कि शुद्धता केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं बल्कि स्नान, भोजन, लेनदेन और व्यवहार सब जगह उतरनी चाहिए।
| तिल का प्रयोग | बाह्य उपयोग | आंतरिक संकेत |
|---|---|---|
| स्नान में तिल | शरीर की शुद्धि | पुराने दोषों और आलस्य को धोना |
| उबटन में तिल | त्वचा पर लेप | स्वभाव की कठोरता को मुलायम करना |
| हवन में तिल | अग्नि में आहुति | नकारात्मक संस्कारों का दहन |
| दान में तिल | जरूरतमंद को तिल देना | संग्रह प्रवृत्ति को छोड़ उदारता अपनाना |
| भोजन में तिल | तिल युक्त व्यंजन | जीवन में सात्त्विक स्वाद और संतुलन लाना |
| जल में तिल | तिल मिला जल पीना | विचारों में संयम और शांत दृष्टि विकसित करना |
इस प्रकार षटतिला शब्द स्वयं बता देता है कि यह व्रत केवल उपवास का नाम नहीं बल्कि छह स्तरों पर तिल के माध्यम से शुद्धि और दान की साधना है।
षटतिला एकादशी का महत्व कई स्तरों पर समझा जा सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत से जन्म जन्मांतर के पापों का क्षय होता है, पितृजन प्रसन्न होते हैं, दरिद्रता में कमी आती है और व्यक्ति को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त जीवन के व्यवहारिक और भावनात्मक पक्ष पर भी इसका गहरा प्रभाव माना जाता है।
एक प्रमुख संदेश यह है कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए ही जोड़ता रहता है, वह भीतर से कभी संतुष्ट नहीं हो पाता। पर जो थोड़े से संसाधनों में भी दान और सेवा का भाव रखता है, उसका मन धीरे धीरे हल्का और प्रसन्न होता जाता है। शततिला एकादशी इसी दान और करुणा की भावना को जगाने वाला व्रत है। इसके द्वारा साधक सीखता है कि व्रत का असली फल तब मिलता है, जब उससे किसी और के जीवन में प्रकाश और राहत पहुंचती है।
| लाभ | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| पाप क्षय | पुराने दोषों और भूलों के प्रभाव में कमी |
| दरिद्रता निवारण | अभाव, तंगी, लगातार कमी की स्थिति में राहत |
| पितृ तृप्ति | तिल दान और श्राद्ध तुल्य कर्म से पितरों का आशीर्वाद |
| मानसिक शांति | संयम, जप और दान से मन में हल्कापन |
| आध्यात्मिक उन्नति | विष्णु उपासना से मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसरता |
इस तरह षटतिला एकादशी को केवल एक तिथि न मानकर, दान, संयम और करुणा की शिक्षा देने वाला व्रत समझा जा सकता है।
एकादशी पारण का अर्थ है व्रत को विधिवत समाप्त करना। पारण के नियमों की विशेषता यह है कि व्रत जितनी श्रद्धा से शुरू किया जाए, उतनी ही सावधानी से पूरा भी किया जाए। पारण सामान्यतः एकादशी के अगले दिन, अर्थात द्वादशी तिथि में किया जाता है। यह ध्यान रखा जाता है कि पारण का समय द्वादशी के भीतर होना चाहिए।
पारण के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान विष्णु का स्मरण कर आरती, पुष्प अर्पण और प्रार्थना की जाती है। इसके बाद तुलसी पत्र और जल अर्पित कर यह भाव रखा जाता है कि आज का उपवास पूरा हो चुका है और व्रत से प्राप्त शक्ति के लिए आभार प्रकट किया जा रहा है। पारण के समय हल्का सात्त्विक भोजन जैसे फल, खिचड़ी, मूंग दाल या हल्के व्यंजन ग्रहण करना उचित माना जाता है। अचानक बहुत भारी, तीखा या तला भोजन लेना शरीर के लिए कठिन हो सकता है, इसलिए धीरे धीरे सामान्य दिनचर्या में लौटना ही शास्त्रसम्मत माना गया है।
कई परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि जब तक पारण न हो जाए तब तक अनावश्यक क्रोध, कठोर वाणी या तामसिक प्रवृत्तियों से बचना चाहिए। इससे व्रत का प्रभाव गहरा होता है और मन संयम की आदत को धीरे धीरे रोजमर्रा के जीवन में भी अपनाने लगता है।
एकादशी का व्रत सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए उपयोगी माना गया है, पर उसकी कठोरता व्यक्ति की क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार बदल सकती है। मूल रूप से एकादशी व्रत के तीन बड़े महत्व बताए जाते हैं। पहला, यह इंद्रियों को संयमित करता है और बार बार भोजन, मनोरंजन या तनाव में लगे रहने की प्रवृत्ति को विराम देता है। दूसरा, यह मन को भगवान के स्मरण की तरफ मोड़ता है, जिससे भीतर का संवाद सकारात्मक होता है। तीसरा, यह दान, जप और सेवा की ओर प्रेरित करके जीवन में संतुलन लाता है।
सामान्यतः निम्न लोग एकादशी व्रत रख सकते हैं।
जिन्हें गंभीर बीमारी, गर्भावस्था या कोई विशेष चिकित्सीय स्थिति हो, वे अपने चिकित्सक की सलाह से ही कठोर व्रत करने का निर्णय लें। ऐसे लोगों के लिए मानसिक व्रत, यानी सामान्य भोजन रखते हुए भी क्रोध, कटु वाणी, आलस्य और नकारात्मकता से दूर रहना भी एक प्रकार की एकादशी साधना मानी जा सकती है।
एकादशी व्रत रखने के पीछे केवल परंपरा का पालन ही कारण नहीं है। इसके पीछे शरीर, मन, समाज और आध्यात्मिक यात्रा, चारों दृष्टियों से लाभ बताए गए हैं। आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो एकादशी व्रत मन को इंद्रियों के वश से निकालकर ईश्वर स्मरण की ओर मोड़ता है। जब भूख को संयमित तरीके से स्वीकार किया जाता है, तो भीतर के अहंकार को भी एक जगह रुककर स्वयं को देखने का अवसर मिलता है।
शारीरिक दृष्टि से, नियमित अंतराल पर हल्का उपवास पाचन तंत्र को विश्राम देता है। पुराने समय में जब भोजन पूर्णतः घर में पकने वाला, मौसम के अनुरूप और सात्त्विक होता था तब एकादशी के उपवास से शरीर को स्वाभाविक रूप से हल्कापन मिलता था। आज भी संयमित उपवास सही मार्गदर्शन के साथ किया जाए तो शरीर को लाभ पहुंचा सकता है। सामाजिक दृष्टि से, एकादशी जैसे व्रत दान, सेवा और सामूहिक पूजा के अवसर बनाते हैं, जिससे समाज में जुड़ाव और संवेदनशीलता बढ़ती है।
इस प्रकार एकादशी का व्रत रखना केवल पुण्य प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि अपने जीवन की दिशा, आदतों और संबंधों को शुद्ध और संतुलित बनाने के लिए भी आवश्यक माना जा सकता है।
यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या एकादशी विवाह के लिए शुभ होती है और क्या एकादशी व्रत दांपत्य जीवन के लिए लाभदायक है। दो अलग अलग बातों को अलग करके समझना आवश्यक है। पहली बात, विवाह की तिथि के रूप में एकादशी लेना। दूसरी बात, विवाहित या अविवाहित व्यक्तियों द्वारा एकादशी व्रत का पालन करना।
बहुत से पंचांग और परंपराओं में विवाह के गोत्र, नक्षत्र, योग और ग्रह स्थिति के साथ साथ तिथि का भी विचार होता है। कई क्षेत्रों में विवाह के लिए एकादशी को सामान्यतः टाला जाता है, क्योंकि उस दिन अधिकतर लोग उपवास में रहते हैं, अतिथि और परिवारजन पूर्ण उत्सव भोजन नहीं कर पाते और दिन मुख्यतः ईश्वर भक्ति के लिए माना जाता है। दूसरी ओर कुछ विद्वानों की राय है कि यदि कुल परंपरा और परिवार की मान्यता अनुमति दे, तो ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ योग होने पर एकादशी पर भी विवाह किया जा सकता है। इसलिए विवाह की तिथि के लिए एकादशी को लेकर अंतिम निर्णय स्थानीय परंपरा, कुल नियम और अनुभवी ज्योतिषी की सलाह से ही लेना उचित रहेगा।
दूसरी ओर एकादशी व्रत स्वयं विवाह और दांपत्य जीवन के लिए अत्यंत हितकारी माना जाता है। जब कोई व्यक्ति या दंपति मिलकर एकादशी व्रत रखता है, तो उसमें संयम, धैर्य और परस्पर सहयोग की भावना विकसित होती है। उपवास का अभ्यास इच्छाओं पर नियंत्रण और मन की स्थिरता सिखाता है, जो किसी भी वैवाहिक संबंध की मजबूती के लिए आवश्यक गुण हैं। साथ में पूजा, जप और दान करने से पति पत्नी के बीच आध्यात्मिक निकटता बढ़ती है और संबंध केवल व्यवहारिक स्तर पर नहीं बल्कि भीतर से भी मजबूत होता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो एकादशी व्रत विवाह पूर्व और विवाह के बाद, दोनों अवस्थाओं में शुभ ही माना जा सकता है, बशर्ते कि इसे दिखावे के लिए नहीं बल्कि समझदारी और श्रद्धा के साथ अपनाया जाए।
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