By अपर्णा पाटनी
एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2025 पर पूजन विधि, मुहूर्त और आध्यात्मिक महत्व सहित संपूर्ण मार्गदर्शिका

वैदिक संस्कृति एवं सनातन धर्म में भगवान गणेश की पूजा का खास महत्व है। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 16 मई को एकदंत संकष्टी चतुर्थी है। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से गणेश जी की कृपा बनी रहती है। यहाँ जानें पूजा की विधि और ज्योतिष शास्त्र के द्वारा बताया गया मुहूर्त।
संकष्टी चतुर्थी यानी संकट से मुक्ति दिलाने वाला व्रत। आज ज्येष्ठ माह की एकदंत संकष्टी चतुर्थी है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को एकदंत संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है, जो भगवान गणेश के अनेक रूपों में से एक ‘एकदंत’ को समर्पित होते हैं। ये भी महत्त्वपूर्ण है कि चतुर्थी के दिन चन्द्र दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है। मान्यता यह है कि जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है उसकी संतान संबंधी समस्याएं भी दूर होती हैं। चंद्र दोष खत्म होता है एवं अपयश और बदनामी के योग समाप्त हो जाते हैं। ध्यान देने योग्य बात ये है कि ये व्रत चन्द्रोदय के बाद ही पूर्ण होता है।
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हिंदू धर्म में किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य की शुरुआत करने से पहले देवों के देव महादेव और माता पार्वती के पुत्र भगवान गणेश की पूजा की जाती है। हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष में चतुर्थी तिथि आती है। इसी तरह पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर एकदंत संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। पंडितों के अनुसार इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ बप्पा की पूजा करने और व्रत रखने से सभी बाधाओं से छुटकारा मिलता है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
गणपति जी की पूजा-अर्चना के दौरान गणेश जी के मंत्रों का जप भी जरूर करें। इससे आपको बप्पा की खास कृपा मिलती है।
अर्थ: हे घुमावदार सूंड वाले, विशालकाय, करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी देव! कृपया मेरे सभी कार्यों में हमेशा बिना किसी बाधा के सफलता प्रदान करें
अर्थ: हे सौभाग्यशाली गणेश, जो हर जन्म में हमें वरदान देते हैं, हम आपकी कृपा से हर बाधा को दूर कर खुशहाल जीवन जीना चाहते हैं।
अर्थ: हम एक दांत वाले (एकदंत) हाथी दांत वाले भगवान को जानते हैं और उनके घुमावदार सूंड (वक्रतुण्ड) का ध्यान करते हैं। वह हमें ज्ञान प्रदान करें।
अर्थ: मैं भगवान गणेश को प्रार्थना करता हूं, जो वरदान देने वाले हैं और सर्वजन को वश में करते हैं।
पंचांग के अनुसार 16 मई को सुबह 4 बजकर 2 मिनट पर ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का शुभारंभ हुआ है। यह तिथि अगले दिन 17 मई को सुबह 5 बजकर 13 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत 16 मई शुक्रवार को है।
एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन सिद्ध और साध्य योग बन रहे हैं। सिद्ध योग प्रात:काल से लेकर सुबह 7 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। उसके बाद से साध्य योग होगा। एकदंत संकष्टी चतुर्थी की पूजा आप सिद्ध योग में कर सकते हैं, जबकि चंद्रमा का अर्घ्य साध्य योग में दिया जाएगा। एकदंत संकष्टी चतुर्थी पर मूल नक्षत्र शाम को 4 बज के 7 मिनट तक रहेगा, उसके बाद पूर्वाषाढा नक्षत्र है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:06 AM से 04:48 AM तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:50 AM से दोपहर 12:45 PM तक है। उस दिन का निशिता मुहूर्त रात में 11:57 PM से 12:38 AM तक है। व्रत के दिन लाभ-उन्नति मुहूर्त 07:12 AM से 08:54 AM तक है, उसके बाद अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह में 08:54 AM से 10:36 AM तक है।
एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत करने वालों को चांद के निकलने का इंतजार रहता है। कृष्ण पक्ष का चंद्रमा देर से निकलता है। एकदंत संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय रात 10:39 PM पर होगा। इस समय में आप चंद्रमा को अर्घ्य दें और पूजा करें। उसके बाद पारण करके व्रत को पूरा करें।
संकष्टी चतुर्थी के दिन शिववास कैलाश पर रहेगा। उस दिन प्रात:काल से लेकर अगले दिन शनिवार को सुबह 5 बजकर 13 मिनट तक शिववास कैलाश पर है। उसके बाद शिववास नंदी पर है. शिववास होता है तो रुद्राभिषेक करते हैं।
संकष्टी चतुर्थी पर चांदी या पीतल के लोटे में जल भर लें। फिर उसमें गाय का कच्चा दूध, अक्षत् और सफेद फूल डाल लें। उसके बाद चंद्र देव का स्मरण करके उनको अर्घ्य दें। अपने संकटों को दूर करने और संतान के सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करे। ध्यान रहे व्रत करने वालों को चंद्रमा की पूजा के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए, तभी ये व्रत फलित होता है। गणेश जी ने चंद्रमा को कांतिहीन होने का श्राप दिया था लेकिन बाद में चंद्रदेव के प्रायश्चित के बाद उन्होंने कहा कि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर जो भी व्रत रखकर उनकी पूजा करेगा, उसे रात में चंद्रमा की भी पूजा करनी होगी. इसके बिना व्रत पूर्ण नहीं होगा।
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥
अर्थ: हे चन्द्रमा! जो आकाश रूपी समुद्र का माणिक्य है, जो दक्ष की कन्या रोहिणी का पति है और गणेश का रूप है, कृपया मेरा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण करें।
इस संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के एकदन्त रूप की पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान एकदन्त को गणेश जी के अष्टविनायक रूपों में से एक माना जाता है। एकदन्त गणेश का शाब्दिक अर्थ है - एक दांत वाले गणेश। हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार गणेश जी द्वारा भगवान शिव से मिलने के लिए रोकने पर भगवान परशुराम ने अपने परशु से गणेश जी पर प्रहार किया था जिससे उनका एक दांत टूट गया और वे एकदन्त के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनकी पूजा से रोग, दोष, भय दूर होता है।
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