By पं. अमिताभ शर्मा
अक्षय तृतीया पर किए गए पुण्यकर्म कभी समाप्त नहीं होते और नए आरंभों के लिए अत्यंत शुभ हैं

भारतीय परंपरा में अक्षय तृतीया को वर्ष के सबसे शुभ और मंगलकारी दिनों में माना जाता है। माना जाता है कि इस तिथि पर किया गया दान, जप, पूजन और शुभ कार्य अक्षय हो जाते हैं, अर्थात उनका फल कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन नए कार्यों की शुरुआत, निवेश, दान और आध्यात्मिक साधना विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है। कथाओं में उल्लेख है कि इसी तिथि से जुड़ी अनेक पवित्र घटनाएं घटित हुईं। गंगा का पृथ्वी पर अवतरण, भगवान कृष्ण द्वारा द्रौपदी को अक्षय पात्र प्रदान करना और सुदामा की गरीबी का अंत, सबको अक्षय तृतीया के शुभ संदर्भ में स्मरण किया जाता है। इन प्रसंगों के माध्यम से यह तिथि भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर समृद्धि और कृपा का प्रतीक बन जाती है।
अक्षय तृतीया वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आती है। इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी उच्च या अत्यंत शुभ स्थिति में माने जाते हैं, इसलिए इसे कई परंपराओं में सर्व सिद्धि या सर्वार्थ सिद्धि प्रदान करने वाली तिथि भी कहा जाता है। संक्षेप में अक्षय तृतीया से जुड़े मुख्य बिंदु इस सारणी से स्पष्ट हो सकते हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| तिथि | वैशाख शुक्ल तृतीया |
| विशेषता | किए गए शुभ कर्मों के अक्षय फल की मान्यता |
| ज्योतिषीय संकेत | सूर्य और चंद्रमा की अत्यंत शुभ स्थिति, कई परंपराओं में अलग मुहूर्त देखने की आवश्यकता कम मानी जाती है |
| अनुशंसित कार्य | दान, स्वर्ण क्रय, जप, हवन, विवाह, नया व्यवसाय या निवेश, धर्म और सेवा से जुड़े आरंभ |
| मुख्य भाव | समृद्धि, सेवा, भक्ति, दैवी कृपा और सतत बढ़ने वाला पुण्य |
कई परिवार इस तिथि को इतना शुभ मानते हैं कि सामान्य कार्यों के लिए अलग से मुहूर्त न देखकर भी आरंभ कर लेते हैं। फिर भी श्रद्धा, विवेक और व्यक्तिगत ज्योतिषीय संकेतों पर ध्यान देना हितकारी माना जाता है।
लोक विश्वास के अनुसार अक्षय तृतीया को ही पवित्र नदी गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। गंगा को पाप नाशिनी, जीवनदायिनी और तीनों लोकों को पवित्र करने वाली नदी माना जाता है। इस प्रसंग से संकेत मिलता है कि यह दिन आंतरिक और बाह्य शुद्धि के लिए अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि गंगा केवल जल ही नहीं बल्कि पावनता और कृपा का भी प्रतीक है। इस तिथि पर स्नान, दान और जप द्वारा साधक अपने जीवन के पुराने बोझ को हल्का कर सकता है और नए आध्यात्मिक संकल्पों के साथ आगे बढ़ सकता है। इसी कारण अक्षय तृतीया के दिन बहुत से लोग नदियों, सरोवरों या उपलब्ध पवित्र जल में स्नान करते हैं और भगवान विष्णु, लक्ष्मी तथा गंगा देवी की आराधना करते हैं।
अक्षय तृतीया से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में महाभारत काल का एक प्रसंग विशेष रूप से याद किया जाता है। पांडवों और उनकी पत्नी द्रौपदी के वनवास के समय की बात है। एक दिन एक महात्मा ने संदेश भेजा कि वे पांडवों के यहां भोजन ग्रहण करने आएंगे। तब तक पांडव भोजन कर चुके थे और पात्र खाली हो चुके थे। द्रौपदी चिंतित हो गईं। उन्हें लगा कि अतिथि सत्कार धर्म है, पर भोजन न होने के कारण वे क्या करें। उसी समय उन्होंने भगवान कृष्ण को मन से पुकारा। कृष्ण उसी क्षण उनके द्वार पर आ पहुंचे और मुस्कुराते हुए बोले कि उन्हें बहुत भूख लगी है, क्या कुछ खाने को है। द्रौपदी के पास उन्हें देने के लिए भी कुछ नहीं था। जब पात्रों की जांच की गई तो एक बर्तन में केवल एक चावल का सूखा दाना चिपका हुआ मिला। भगवान कृष्ण ने प्रेमपूर्वक उसी एक चावल दाने को उठा कर खा लिया। कथा में बताया जाता है कि उसी क्षण वह पात्र अक्षय पात्र बन गया। अक्षय पात्र का अर्थ है ऐसा पात्र जिसका भंडार कभी समाप्त न हो। जब संत अपने लगभग चार सौ साथियों के साथ आए तो द्रौपदी ने उसी बर्तन से उन्हें भोजन परोसना शुरू किया। जितना निकालती गईं उतना ही उसमें पुनः भरता चला गया। सभी अतिथि तृप्त हो गए, पर पात्र खाली नहीं हुआ। इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर की कृपा से सीमित संसाधन भी अक्षय बन सकते हैं, सच्ची श्रद्धा और सेवा भाव से जो कुछ भी अर्पित किया जाए उसका फल अनेक गुना हो सकता है और कभी कभी एक छोटा सा सच्चा समर्पण भी जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। आज भी किसी अत्यंत उदार और सेवा भाव से भरपूर व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि वह स्वयं एक अक्षय पात्र की तरह है जो दूसरों के लिए सदैव देने को तत्पर रहता है।
अक्षय तृतीया को भगवान कृष्ण और उनके मित्र सुदामा की कथा से भी जोड़ा जाता है। सुदामा अत्यंत निर्धन ब्राह्मण थे, पर हृदय से अत्यंत शुद्ध और प्रेममय। एक दिन उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि वे द्वारका जाकर अपने सखा कृष्ण से मिलें, क्योंकि वे अत्यधिक गरीबी में जीवन गुजार रहे हैं और कृष्ण वैभव के स्वामी हैं, इसलिए उनसे सहायता मांगना उचित होगा। सुदामा ने सहमति तो दी, पर यह भी कहा कि मित्र के घर खाली हाथ नहीं जाया जाता। घर में विशेष कुछ न था, इसलिए पत्नी ने प्रेमपूर्वक फूले हुए चावल की तीन मुट्ठी एक कपड़े में बांधकर उन्हें दे दी, वही सुदामा की सबसे बड़ी भेंट थी। द्वारका पहुंचने पर कृष्ण ने सुदामा का अत्यंत सम्मान से स्वागत किया, उनके चरण धोए और उन्हें गले लगाया। मित्रता का प्रेम इतना गहरा था कि सुदामा अपनी गरीबी और उद्देश्य को लगभग भूल गए। वे कुछ मांग नहीं पाए। जब वे लौटने लगे तो कृष्ण ने स्वयं उनसे पूछा कि क्या वे उनके लिए कोई भेंट साथ लाए हैं और यह भी कहा कि उन्हें पता है कि सुदामा की पत्नी ने कुछ न कुछ अवश्य भेजा होगा। सुदामा संकोच से वह बंधा हुआ चावल का गठ्ठर सौंपते हैं। कृष्ण प्रेमपूर्वक एक मुट्ठी खाते हैं, फिर दूसरी मुट्ठी भी लेते हैं। कथा में कहा जाता है कि तीसरी मुट्ठी लेने ही वाले थे कि उनकी पत्नी रुक्मिणी ने आकर उन्हें रोका, जैसे संकेत हो कि अब सुदामा के जीवन में पर्याप्त कृपा जुड़ चुकी है। सुदामा बिना कुछ मांगे ही वापस चल दिए। उन्हें लगा कि मित्र से मिलना ही सबसे बड़ा लाभ है। पर जब वे अपने घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनकी कुटिया धन, वैभव और समृद्धि से भर चुकी है। उनकी गरीबी समाप्त हो चुकी थी। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि सच्ची भक्ति और प्रेम में मांगने से अधिक देने का भाव होता है, ईश्वर भक्त की छोटी सी भेंट को भी अत्यधिक सम्मान से स्वीकार करते हैं और कभी कभी बिना मांगे ही, केवल प्रेम के कारण, जीवन में कृपा की वर्षा हो जाती है। इसी भाव के कारण अक्षय तृतीया पर लोग स्वर्ण या अन्य स्थायी वस्तुएं खरीदते और उपहार में देते हैं, विश्वास है कि इस दिन जो भी शुभ वस्तु ली जाए वह जीवन में धीरे धीरे बढ़ती रहती है।
अक्षय तृतीया के संदर्भ में यह मान्यता प्रचलित है कि इस दिन यदि स्वर्ण खरीदा जाए, किसी को उपहार दिया जाए या किसी शुभ कार्य की नींव रखी जाए तो वह समय के साथ बढ़ता और फलता फूलता है। इसी कारण बहुत से लोग स्वर्ण, चांदी या अन्य धातु के आभूषण, भूमि या संपत्ति से जुड़ी योजनाओं और नए व्यवसाय या दीर्घकालिक निवेश का आरंभ इस तिथि पर करते हैं। साथ ही अक्षय तृतीया का श्रेष्ठ उपयोग दान और सेवा में माना गया है। किसी भूखे को भोजन, वस्त्र, शिक्षा या स्वास्थ्य में सहयोग देकर भी साधक अक्षय पुण्य का संचित कर सकता है। जब दान में विनम्रता और करुणा जुड़ जाए तब वह केवल लेन देन न रहकर आध्यात्मिक साधना बन जाता है।
कथाएं यह भी स्मरण कराती हैं कि संसार की हर वस्तु अनित्य है। शरीर भी एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा, पर आत्मा अक्षय है, नाश रहित है। अक्षय तृतीया साधक को यह समझने में मदद करती है कि भौतिक समृद्धि के साथ साथ आध्यात्मिक उन्नति भी आवश्यक है। जब भक्ति गहरी हो तब केवल आध्यात्मिक ही नहीं, कई बार भौतिक सहायता भी सहज रूप से प्राप्त हो जाती है। मानव जीवन कुछ वर्षों का है, पर सृष्टि का चक्र अनादि अनंत है और उसी के बीच आत्मा की यात्रा चलती रहती है। यह दिन यह चिंतन भी प्रेरित करता है कि सूरज, चंद्रमा, बादल, बारिश, वृक्ष और पक्षी सदियों से अपना क्रम निभा रहे हैं। कुछ दशकों बाद वर्तमान पीढ़ी बदल जाएगी, पर यह सृष्टि अपने नियम के साथ चलती रहेगी। इसी निरंतरता के बीच जो कुछ वास्तव में अक्षय है वह है आत्मा की ज्योति और ईश्वर के साथ संबंध।
सामान्य प्रश्न
अक्षय तृतीया को इतना शुभ क्यों माना जाता है?
क्योंकि इस दिन किए गए दान, जप, पूजन और शुभ आरंभ को अक्षय फल देने वाला कहा गया है। सूर्य और चंद्रमा की अत्यंत शुभ स्थिति के कारण इसे सर्वसिद्धि प्रदान करने वाली तिथि माना जाता है और लोग इसे नए कार्यों के लिए अनुकूल मानते हैं।
अक्षय पात्र की कथा से क्या सीख मिलती है?
द्रौपदी और कृष्ण की कथा से यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर की कृपा से सीमित साधन भी अक्षय बन सकते हैं। सच्ची श्रद्धा और समर्पण से किया गया छोटा सा अर्पण भी अनंत फल देने वाला बन सकता है और सेवा भाव से जुड़ा हर कार्य विशेष रूप से फलित होता है।
सुदामा और कृष्ण की कहानी का अक्षय तृतीया से क्या संबंध है?
सुदामा की कथा से यह संकेत मिलता है कि प्रेम और भक्ति के साथ की गई छोटी भेंट भी ईश्वर को अत्यंत प्रिय होती है। इस दिन दी गई भेंट, निवेश या उपहार के बढ़ने की मान्यता इसी भाव से जुड़ी है कि कृपा केवल बाहरी मूल्य पर नहीं बल्कि भाव पर आधारित होती है।
अक्षय तृतीया पर क्या करना उत्तम माना जाता है?
स्नान, दान, स्वर्ण या स्थायी संपत्ति का क्रय, जप, हवन, जरूरतमंदों की सहायता, नया शुभ कार्य या व्यवसाय का आरंभ और भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी की आराधना करना उत्तम माना जाता है। प्रत्येक कार्य में शुद्ध भाव और संयमित दृष्टि बनाए रखना आवश्यक है।
अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
यह दिन याद दिलाता है कि भौतिक वस्तुएं नश्वर हैं, पर आत्मा और भगवान के साथ संबंध अक्षय है। भक्ति, सेवा और सद्भाव से जो पुण्य संचित होता है वही वास्तव में जीवन की सबसे स्थायी पूंजी माना जा सकता है और वही आगे के मार्ग को प्रकाश देता है।
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