By पं. नीलेश शर्मा
गजानन संकष्टी चतुर्थी गणेश की विशेष पूजा और संकट निवारण में शक्तिशाली है

सनातन धर्म की परंपरा में संकष्टी चतुर्थी अत्यंत पावन और फलदायी तिथि मानी जाती है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत रखा जाता है और भगवान श्रीगणेश की विशेष आराधना की जाती है। जब यही चतुर्थी मंगलवार के दिन आती है तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है और इसकी महिमा कई गुना बढ़ जाती है। इस विशेष दिन गजानन संकष्टी चतुर्थी के रूप में श्रीगणेश के गजानन स्वरूप की पूजा की जाती है, जो भक्तों के जीवन से विघ्न, कष्ट और मानसिक बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है।
चतुर्थी तिथि स्वयं गणेश जी की प्रिय मानी जाती है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह तिथि चंद्र और मंगल के प्रभाव से मन और साहस, दोनों को शुद्ध करने वाला योग बनाती है। संकष्टी चतुर्थी, विशेषकर अंगारकी योग में, संकट निवारण, न्याय प्राप्ति, ऋण मुक्ति और मानसिक शांति की कामना से किया गया व्रत अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
संकष्टी शब्द दो भागों से बना है। संकट अर्थात कष्ट या विघ्न और हरण की शक्ति का संकेत। संकष्टी चतुर्थी वह तिथि है जिस दिन गणेश जी को विशेष रूप से संकष्ट नाशक के रूप में पूजा जाता है। जब इस दिन गणेश जी के गजानन रूप की आराधना की जाती है तब साधक केवल बाहरी विघ्नों से ही नहीं बल्कि भीतर के भ्रम, भय और अज्ञान से भी मुक्ति की कामना करता है।
संक्षेप में इस तिथि के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| तिथि | हर माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, विशेष रूप से मंगलवार को पड़ने पर अंगारकी संकष्टी |
| आराध्य देव | भगवान श्रीगणेश, विशेष रूप से गजानन स्वरूप |
| मुख्य फल | विघ्न नाश, संकट मुक्ति, अपयश से रक्षा, बुद्धि और साहस की वृद्धि |
| अनुशंसित साधना | व्रत, चंद्र दर्शन के बाद पूजन, गणेश मंत्र जप, लड्डू या मोदक का नैवेद्य |
| विशेष नाम | संकष्टी चतुर्थी, अंगारकी संकष्टी (मंगलवार को), गजानन संकष्टी |
इस व्रत में दिन भर संयमित रहकर संध्या के समय चंद्र दर्शन के बाद गणेश पूजन किया जाता है। कई परंपराओं में इस दिन गणेश जी के विभिन्न नामों और रूपों का स्मरण कर विशेष ध्यान किया जाता है।
पुराणों में वर्णन है कि सृष्टि के प्रारंभ में जब जगत के संचालन के लिए अनेक देवताओं की भूमिका निश्चित की जा रही थी तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने मिलकर यह विचार किया कि एक ऐसे देव की आवश्यकता है जो बुद्धि, बल और विवेक का संयुक्त प्रतीक हो और जो हर शुभ कार्य में प्रथम पूज्य बन सके।
इसी भाव से माता पार्वती के तप से श्रीगणेश की उत्पत्ति का प्रसंग आता है। एक बार माता पार्वती स्नान करने से पहले अपने शरीर पर उबटन लगा रही थीं। उसी उबटन से उन्होंने स्नेहपूर्वक एक बालक की मूर्ति बनाई और अपने योगबल से उसमें प्राण प्रतिष्ठित कर दिए। उन्होंने उस बालक को आदेश दिया कि जब तक वे भीतर स्नान कर रही हैं, कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कोई भी हो, अंदर प्रवेश न करे। बालक ने माता की आज्ञा को सर्वोच्च मानकर द्वार की रखवाली शुरू कर दी।
कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और भीतर जाना चाहा। द्वार पर खड़े बालक ने माता की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए शिव को रोका और कहा कि जब तक माता स्नान से बाहर न आएं तब तक कोई भी अंदर नहीं जा सकता। भगवान शिव ने स्वयं को पहचान में न आने पर इसे अपना अपमान समझा। देवताओं और गणों ने भी बालक को समझाने का प्रयास किया, पर वह माता की आज्ञा के प्रति अडिग रहा।
आखिरकार शिव के क्रोध ने उग्र रूप ले लिया और युद्ध की स्थिति बन गई। इसी संघर्ष के बीच शिव ने अपने त्रिशूल से उस बालक का शीर्ष अलग कर दिया। बालक का निष्प्राण शरीर द्वार पर ही गिर पड़ा। थोड़ी ही देर में जब माता पार्वती बाहर निकलीं और उन्होंने अपने सृजित पुत्र को मृत अवस्था में देखा तो वे विलाप और क्रोध से भर उठीं। उनके दुख से संपूर्ण लोक कांपने लगे।
देवताओं ने स्थिति की गंभीरता देखकर भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। विष्णु ने कहा कि तुरंत किसी ऐसे जीव का सिर लाया जाए जो पहली दिशा में सोया हुआ मिले। देवताओं ने उत्तर दिशा की ओर खोज की और वहां उन्हें एक हाथी सोया हुआ दिखाई दिया। ब्रह्मांड व्यवस्था के लिए आवश्यक निर्णय मानकर उसका सिर लाया गया और उस बालक के धड़ से जोड़ा गया।
भगवान शिव ने बालक को पुनः जीवन दिया और घोषणा की कि अब से यह बालक गणों का ईश अर्थात गणेश कहलाएगा। शिव ने यह वरदान भी दिया कि हर शुभ कार्य में सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाएगी। हाथी का मुख आने से वे गजानन नाम से भी विख्यात हुए। इसी घटना के स्मरण में गणेश को विघ्नहर्ता, संकष्टनाशक और शुभारंभ के अधिदेवता के रूप में पूजने की परंपरा स्थापित हुई।
जब यह संवाद और परिवर्तन हुआ तब देवताओं ने अनुभव किया कि एक बड़े संकट का निवारण हुआ है। पार्वती के क्रोध से विश्व विनाश की स्थिति बन चुकी थी, जिसे गणेश की पुनः प्राप्ति से शांत किया जा सका। इसीलिए उस तिथि को, जिस दिन गणेश जी को नया जीवन और विघ्नहर्ता की उपाधि मिली, संकष्टी अर्थ के साथ जोड़ा गया।
संकष्ट का नाश और चतुर्थी तिथि की विशेषता मिलकर इस दिन को संकष्टी चतुर्थी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। इस दिन गणेश जी के गजानन रूप का ध्यान कर व्रत और पूजन करने से जीवन के बड़े छोटे संकट धीरे धीरे शांत होने लगते हैं, यह मान्यता प्राचीन काल से चली आ रही है।
एक अन्य पौराणिक प्रसंग में संकष्टी चतुर्थी का महत्व श्रीकृष्ण से भी जुड़ा है। कथाओं में वर्णन है कि एक बार श्रीकृष्ण पर एक कीमती मणि की चोरी का झूठा आरोप लगाया गया। इससे उनका अपमान हुआ और मान को ठेस पहुंची। वे इस अपयश से दुखी होकर देवर्षि नारद के पास पहुंचे और उनसे उपाय पूछा।
नारद जी ने उन्हें संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि इस व्रत को विधि और श्रद्धा से करने पर दोष, कलंक और विघ्न शांत होते हैं और सत्य की प्रतिष्ठा होती है। श्रीकृष्ण ने नारद जी के निर्देशानुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। व्रत के फल से उन पर लगे सभी आरोप दूर हुए और वे दोषमुक्त माने गए। यह प्रसंग यह संकेत देता है कि संकष्टी व्रत केवल सांसारिक संकट ही नहीं बल्कि अपयश, गलत आरोप और कर्मजनित बाधाओं से भी मुक्ति देने वाला माना जाता है।
गणेश जी का गजानन रूप केवल पौराणिक घटना का परिणाम नहीं बल्कि गहरे प्रतीकवाद का भी संकेत है। हाथी का बड़ा मस्तिष्क विशाल बुद्धि और स्मरण शक्ति का प्रतीक है। उनके छोटे नेत्र एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि की ओर संकेत करते हैं, यह सिखाते हैं कि साधक को गहराई से देखना सीखना चाहिए। बड़े कान यह बताते हैं कि अधिक श्रवण करो और कम बोलो, ताकि विवेक जागृत रहे।
उनका बड़ा पेट यह शिक्षा देता है कि जीवन में आने वाली प्रसन्न तथा कठिन दोनों प्रकार की परिस्थितियों को पचा लेना भी एक साधना है। छोटे पैर और लंबा सूंड, दोनों मिलकर संतुलन और लचीलेपन की ओर संकेत करते हैं। इस प्रकार गजानन स्वरूप साधक को बताता है कि केवल बाहरी पूजा से अधिक आवश्यक है कि ये गुण भीतर भी जागें, ताकि वास्तविक संकष्ट नाश हो सके।
संकष्टी चतुर्थी व्रत, विशेषकर गजानन संकष्टी के दिन, साधक को बाहरी और भीतर दोनों स्तरों पर लाभ देता है।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि साधक का मन धीरे धीरे विघ्न पर नहीं, समाधान पर केंद्रित होने लगता है। जब मन में गणेश का स्मरण और गजानन स्वरूप का ध्यान बना रहे तब भीतर से साहस और स्पष्टता का भाव स्थिर होता है।
सामान्य प्रश्न
गजानन संकष्टी चतुर्थी किस तिथि को मानी जाती है?
हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। जब यह चतुर्थी मंगलवार के दिन आती है तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है और इस दिन गजानन स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।
श्रीगणेश को गजानन क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उनके शरीर पर मानव बालक का धड़ और सिर के स्थान पर हाथी का मुख लगाया गया। हाथी जैसा मुख उन्हें गजानन बनाता है, जो विशाल बुद्धि, धैर्य और बल का प्रतीक माना जाता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कैसे किया जाता है?
इस दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है, दिन भर संयमित भोजन या निर्जला व्रत रखा जाता है। संध्या के समय चंद्र दर्शन के बाद श्रीगणेश का पूजन, मंत्र जप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है तब व्रत पूर्ण माना जाता है।
श्रीकृष्ण और संकष्टी व्रत की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?
यह कथा बताती है कि जब भी गलत आरोप, अपयश या अन्याय का सामना करना पड़े तब संकष्टी चतुर्थी का व्रत साधक के आत्मबल को बढ़ाता है और ईश्वरीय कृपा से परिस्थितियां अनुकूल होने लगती हैं।
गजानन स्वरूप का ध्यान करने से साधक को क्या लाभ होता है?
गजानन का ध्यान मन को स्थिर करता है, बुद्धि को स्पष्टता देता है और बड़े संकटों के बीच भी धैर्य बनाए रखने की शक्ति देता है। इससे निर्णय क्षमता सुधरती है और साधक जीवन के विघ्नों को अवसर में बदलने की क्षमता विकसित कर सकता है।
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