By पं. संजीव शर्मा
राजस्थान में गंगौर उत्सव, वैवाहिक सौहार्द और पारंपरिक रीति-रिवाजों का महत्व

राजस्थान की लोक परंपराओं में गंगौर अत्यंत प्रिय और श्रद्धा से जुड़ा हुआ पर्व माना जाता है। यह पर्व खासकर शिव पार्वती की दांपत्य सौहार्द, सुहाग, समृद्धि और पारिवारिक सुख के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। झीलों के शहरों में गंगौर की शोभायात्राएं, सिंजारे की रस्में और सुहागिनों की पूजा विशेष आकर्षण का केंद्र होती हैं। इन्हीं परंपराओं के बीच एक अद्भुत इतिहास “कच्ची गंगौर” या “छोटी गंगौर” से भी जुड़ा हुआ है जिसे जानना अपने आप में बहुत रोचक अनुभव है।
ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार लगभग एक सवा सौ वर्ष पहले, सन 1889 के आसपास, मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह के संरक्षण काल में शीतला सप्तमी और अष्टमी के अवसर पर एक सामाजिक मेले का विचार रखा गया। यह आयोजन हिंदू पंचांग के अनुसार शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी की तिथियों पर रखा गया था। यही से कच्ची गंगौर की सार्वजनिक परंपरा ने ठोस रूप लेना शुरू किया और तब से अब तक यह उत्सव निरंतर भक्तिभाव से मनाया जा रहा है।
गंगौर पर्व सामान्यत: चैत्र मास में मनाया जाता है, किंतु कच्ची या छोटी गंगौर का विशेष संबंध शीतला सप्तमी और अष्टमी से जोड़ा जाता है। पुराने शहरों में यह परंपरा लोक उत्सव के रूप में विकसित हुई जहां महिलाएं और कन्याएं विशेष रूप से सजती संवरती हैं और गंगौर की प्रतिमाओं को जल में विसर्जित करने से पहले शोभायात्रा के रूप में घुमाती हैं।
कच्ची गंगौर का नाम उसके निर्माण की प्रकृति से भी जुड़ा है। इसे कोमल और महीन मिट्टी से तैयार किया जाता है। मिट्टी के कारण इसका स्वरूप नाजुक होता है, इसलिए इसे “कच्ची” कहा जाने लगा। इसके विपरीत, कहीं कहीं स्थायी रूप से लकड़ी या धातु की भी गंगौर बनाई जाती है, पर यहां वर्णित परंपरा विशेष रूप से मिट्टी की गंगौर से संबंधित है जिसे हर वर्ष नए सिरे से तैयार किया जाता है।
सन 1889 के समय मेवाड़ में महाराणा फतेह सिंह का शासन था। उस समय समाज में एक ऐसे आयोजन की कल्पना की गई जिसमें नगर के लोग शीतला सप्तमी और अष्टमी पर एक साथ मिलकर धार्मिक और सामाजिक उत्सव मना सकें। इसी विचार के अंतर्गत झीलों के शहर में एक सामाजिक मेला आयोजित किया गया जिसे आगे चलकर कच्ची गंगौर के उत्सव से जोड़ा गया।
इस प्रथम कच्ची गंगौर उत्सव के आयोजन का उत्तरदायित्व राजमहल के भीतर कार्यरत एक शिल्पकार पन्ना लाल गौड़ को सौंपा गया। वे शिल्पकला में अत्यंत निपुण थे और राजपरिवार के कई धार्मिक कार्यों में प्रमुख भूमिका निभाते थे। महल से निकली यह परंपरा धीरे धीरे नगरवासियों के बीच भी गहराई से स्थापित हो गई और आज यह पुराना शहर अपने इस विशिष्ट उत्सव के लिए पहचाना जाता है।
कच्ची गंगौर की शुरुआत के समय पन्ना लाल गौड़ को एक जोड़ी मूर्तियां बनाने की जिम्मेदारी दी गई। इस जोड़ी में एक पुरुष स्वरूप और एक स्त्री स्वरूप रखा गया। पुरुष पक्ष को भगवान शिव के नाम से और स्त्री पक्ष को मां पार्वती या गंगौर के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। यही जोड़ी आगे चलकर गंगौर की मुख्य प्रतिमा मानी जाने लगी।
इस अनूठी जोड़ी का उद्देश्य केवल सजावट नहीं बल्कि दांपत्य प्रेम, सामंजस्य और गृहस्थ जीवन की पवित्रता को प्रतीकात्मक रूप देना था। इस प्रथम प्रयास के बाद से ही यह परंपरा नगर के निवासियों द्वारा अत्यंत मान सम्मान के साथ निभाई जा रही है। गंगौर की प्रतिमाओं को महज मूर्ति नहीं बल्कि शिव पार्वती के सजीव रूप का प्रतीक माना जाता है।
रोचक बात यह है कि पिछले लगभग 125 वर्षों से गंगौर निर्माण की यह विशिष्ट कला और जिम्मेदारी उसी परिवार में निरंतर चलती आ रही है जिसे प्रारंभ में यह कार्य सौंपा गया था। पन्ना लाल गौड़ के बाद उनके पुत्र ने इस परंपरा को संभाला। फिर उनके बाद अगली पीढ़ियों ने इसे अपना कर्तव्य और सौभाग्य दोनों माना।
वर्तमान समय में यह परंपरा पन्ना लाल गौड़ के प्रपौत्र देवेंद्र कुमार गौड़ के माध्यम से आगे बढ़ रही है। देवेंद्र कुमार स्वयं स्वीकार करते हैं कि गंगौर निर्माण की यह कला केवल पेशा नहीं बल्कि एक वंशानुगत जिम्मेदारी और लोकधर्म का हिस्सा है। वे यह विश्वास भी रखते हैं कि आने वाले समय में उनका पुत्र भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाएगा ताकि गंगौर का यह सांस्कृतिक धरोहर स्वरूप भविष्य में भी सुरक्षित रह सके।
कच्ची या छोटी गंगौर का निर्माण अत्यंत सूक्ष्म और समय लेने वाली प्रक्रिया है। इसे बनाने के लिए बहुत महीन और उपयुक्त गुणों वाली मिट्टी चुननी पड़ती है। विशेष बात यह है कि गंगौर की तैयारी लगभग आधा वर्ष पहले दीवाली के बाद ही शुरू कर दी जाती है, क्योंकि मिट्टी की प्रतिमा को पूर्ण रूप से सूखने और नमी छोड़ने में लंबा समय लगता है।
पहले चरण में मिट्टी को गूंथकर गंगौर की मूल आकृति तैयार की जाती है। पुरुष और स्त्री दोनों प्रतिमाओं का संतुलन, भाव, चेहरे की रेखाएं और आभूषणों की जगह इसी चरण में तय की जाती है। इसके बाद इन प्रतिमाओं को छांव में धीरे धीरे सुखाया जाता है ताकि उनमें कोई दरार न पड़े और बनावट सुरक्षित रहे। जब प्रतिमाओं की नमी पूरी तरह समाप्त हो जाती है तब होली के बाद उन पर रंग लगाने का कार्य शुरू होता है।
रंगों का चयन भी परंपरा और सौंदर्यबोध दोनों के आधार पर होता है। प्रायः लाल, पीला, हरा और सुनहरा जैसे शुभ रंग गंगौर की पोशाक और आभूषणों में प्रयोग किए जाते हैं। चेहरे पर कोमल भाव, आंखों में श्रद्धा और मुख पर सौम्य मुस्कान उकेरी जाती है। इस संपूर्ण प्रक्रिया के बाद कच्ची गंगौर उत्सव के लिए तैयार हो जाती है।
देवेंद्र कुमार गौड़ को अपनी इस पारंपरिक कला और जिम्मेदारी पर गहरी गर्व की अनुभूति है। उनका मानना है कि गंगौर निर्माण केवल हाथ की तकनीक नहीं बल्कि मन की श्रद्धा और पीढ़ियों की साधना का परिणाम है। वे यह भी अनुभव करते हैं कि समय के साथ बीच के कुछ वर्षों में इस परंपरा के प्रति लोगों की रुचि और उमंग में कुछ कमी जरूर आई थी।
हालांकि पिछले लगभग एक दशक में कच्ची गंगौर के प्रति आकर्षण और उत्साह में पुनः वृद्धि देखी गई है। देवेंद्र कुमार के अनुसार इसमें प्रशासन के सहयोग, जन सामान्य के बीच सकारात्मक चर्चा और लोगों के भीतर बढ़ती भक्ति भावना की भी भूमिका है। आज फिर से पुराने शहर के निवासी गंगौर के दिनों में विशेष सजधज, शोभायात्रा और पूजा में पूरे मन से भाग लेते हैं।
कच्ची गंगौर के दिन नगर का वातावरण विशेष रूप से उल्लासपूर्ण और भक्तिमय हो जाता है। प्रातः से ही गंगौर की प्रतिमाओं को सुंदर वस्त्रों, घाघरा, ओढ़नी, पगड़ी, मुकुट और कृत्रिम आभूषणों से सजाया जाता है। प्रतिमाओं के साथ सुहाग की अन्य सामग्री जैसे चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी और मेहंदी का भी विशेष ध्यान रखा जाता है।
उस दिन सुहागिन महिलाएं और अविवाहित कन्याएं पारंपरिक परिधानों में स्वयं को सजाती हैं। वे सिर पर गंगौर की प्रतिमाओं को रखकर चलती हैं। यह दृश्य शहर की गलियों और घाटों पर अत्यंत सुंदर और आकर्षक दिखाई देता है। शोभायात्रा के रूप में गंगौर को नगर के प्रमुख मार्गों से होकर ले जाया जाता है। भजन, ढोल, नगाड़े और लोकगीतों की ध्वनि के साथ पूरा क्षेत्र उत्सव में डूबा रहता है।
पूजा और शोभायात्रा के बाद कच्ची गंगौर की प्रतिमाओं को निकटवर्ती झील या जलाशय के तट पर लाया जाता है। वहां अंतिम आरती, प्रार्थना और आशीर्वाद के साथ उन्हें जल में विसर्जित किया जाता है। प्रतिमाएं पूरे वर्ष के लिए नहीं, केवल उस एक साल की पूजा के लिए बनाई जाती हैं, इसलिए उनका विसर्जन गंगौर पर्व के चक्र का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है।
इस समय कई महिलाओं की आंखों में हल्का भावुकपन भी दिखाई देता है, क्योंकि गंगौर को वे केवल प्रतिमा नहीं बल्कि मां गौरी की सखी और अपने सुहाग की रक्षक के रूप में देखती हैं। विसर्जन के साथ ही वे अगले वर्ष पुनः गंगौर पर्व के आने की कामना और प्रतीक्षा भी मन में संजो लेती हैं।
कच्ची गंगौर की पूरी कथा और परंपरा यह बताती है कि किस प्रकार एक छोटी सी पहल समय के साथ एक सशक्त सांस्कृतिक पहचान बन सकती है। महाराणा फतेह सिंह के समय आरंभ हुई यह सामाजिक मेला परंपरा आज झीलों के शहर की आत्मा से जुड़ी हुई लगती है। पन्ना लाल गौड़ से लेकर देवेंद्र कुमार गौड़ तक इस धरोहर को संभालते हुए जो पीढ़ियां गुजरी हैं, वे यह प्रमाणित करती हैं कि जब धर्म और लोककला एक साथ जुड़ते हैं तो परंपराएं जीवंत बनी रहती हैं।
गंगौर पर्व दांपत्य जीवन, सुहाग, मातृत्व और गृहस्थ धर्म के सम्मान का पर्व है। कच्ची गंगौर की मिट्टी से बनी प्रतिमाएं हर वर्ष यह संदेश देती हैं कि जीवन में नये नए रूप आते जाते रहते हैं, पर आदर, प्रेम और श्रद्धा की जड़ें जितनी गहरी होंगी, संस्कृति उतनी ही स्थिर और समृद्ध बनेगी।
सामान्य प्रश्न
कच्ची गंगौर को कच्ची या छोटी गंगौर क्यों कहा जाता है?
कच्ची गंगौर को यह नाम मुख्य रूप से उसके निर्माण के कारण मिला है, क्योंकि यह बेहद महीन और नाजुक मिट्टी से तैयार की जाती है। हर वर्ष नई प्रतिमा बनाकर उसे उत्सव के बाद जल में विसर्जित कर दिया जाता है, इसलिए इसे स्थायी के बजाय कच्ची या छोटी गंगौर कहा जाता है।
पन्ना लाल गौड़ की क्या विशेष भूमिका रही और आज यह परंपरा कौन निभा रहा है?
पहली कच्ची गंगौर के लिए प्रतिमाओं का निर्माण और आयोजन की प्रमुख जिम्मेदारी राजमहल के शिल्पकार पन्ना लाल गौड़ को सौंपी गई थी। उन्होंने ही सबसे पहले शिव और पार्वती की जोड़ी के रूप में गंगौर प्रतिमा तैयार की। वर्तमान में यह वंशानुगत परंपरा उनके प्रपौत्र देवेंद्र कुमार गौड़ द्वारा निभाई जा रही है।
कच्ची गंगौर की प्रतिमा कब और कैसे तैयार की जाती है?
कच्ची गंगौर की तैयारी दीवाली के बाद ही शुरू हो जाती है, क्योंकि मिट्टी की प्रतिमा को पूरी तरह सूखने में कई महीने लगते हैं। पहले मिट्टी से आकृति बनाई जाती है, फिर उसे छांव में सुखाया जाता है। होली के बाद जब नमी समाप्त हो जाती है तब प्रतिमा पर रंग, वस्त्र और आभूषण का काम किया जाता है।
कच्ची गंगौर के दिन महिलाएं क्या विशेष करती हैं?
कच्ची गंगौर के दिन महिलाएं और कन्याएं पारंपरिक परिधानों में सजती हैं, श्रृंगार करती हैं और सिर पर गंगौर की प्रतिमाएं रखकर शोभायात्रा में भाग लेती हैं। पूजा, भजन और मंगल गीतों के बाद वे गंगौर को झील या जलाशय तक लेकर जाती हैं और वहां विधिपूर्वक विसर्जन करती हैं।
इस पूरी परंपरा से समाज को क्या संदेश मिलता है?
कच्ची गंगौर की परंपरा यह संदेश देती है कि दांपत्य सौहार्द, सुहाग, पारिवारिक प्रेम और सांस्कृतिक विरासत को संभालना समाज की साझा जिम्मेदारी है। पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार द्वारा प्रतिमा निर्माण करना और पूरे नगर का मिलकर उत्सव मनाना यह दिखाता है कि जब समाज और परंपरा साथ चलते हैं तो लोककला और आस्था दोनों सुरक्षित रहती हैं।
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