By पं. संजीव शर्मा
भाई-बहन के अटूट स्नेह, रक्षा और आशीर्वाद का पर्व

होली के रंगों और उत्सव के बीच एक ऐसा दिन भी आता है जो भाई बहन के पवित्र रिश्ते को और गहराई से जोड़ देता है। यह दिन है होली भाई दूज का, जिसे कई स्थानों पर भैया दूज या भातृ द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व चैत्र मास की द्वितीया तिथि को, अर्थात होली के अगले दिन मनाया जाता है और इसे भाई बहन के अटूट स्नेह, रक्षा वचन और दीर्घायु आशीर्वाद का विशेष अवसर माना जाता है।
चैत्र मास की शुक्ल द्वितीया को बहनें अपने भाई को घर बुलाती हैं, उसका तिलक करती हैं और प्रेमपूर्वक भोजन करवाती हैं। भाई बदले में बहन की रक्षा का संकल्प लेकर उसे उपहार, स्नेह और आशीर्वाद देता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन बहन के घर जाकर तिलक करवाने वाले भाई को यमराज के भय से मुक्ति मिलती है और उसे नरक की यातनाएँ नहीं सहनी पड़तीं।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भाई दूज वाले दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे। यमुना ने प्रेमपूर्वक उनका सत्कार किया, तिलक किया और भोजन कराया। इस आत्मीयता से प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना को वचन दिया कि जो भी भाई इस तिथि पर अपनी बहन के घर जाकर तिलक लगवाकर भोजन ग्रहण करेगा, उसे नरक की यातनाओं से मुक्ति प्राप्त होगी और उसे यम का भय नहीं सताएगा।
यहीं से होली भाई दूज की यह परंपरा आरंभ हुई मानी जाती है। इस दिन बहन का तिलक केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि दीर्घायु, सुरक्षा और पापों से मुक्ति का शुभ संकेत माना गया है। वहीं भाई का बहन की रक्षा का संकल्प भी केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं बल्कि जीवन भर सहयोग, सम्मान और भावनात्मक सहारा देने का वचन माना जाता है।
मान्यता है कि होली भाई दूज के दिन सबसे पहले विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। गणेश जी के बाद यमदेव तथा उनसे जुड़ी पौराणिक कथा का स्मरण किया जाता है।
इस दिन की पूजा की मुख्य बातें इस प्रकार मानी जाती हैं।
इस क्रम में एक ओर देवताओं की पूजा से धर्म और आशीर्वाद की भावना जागती है, दूसरी ओर तिलक और भोजन से भाई बहन का संबंध और भी मजबूत होता है।
होली भाई दूज पर एक विशेष व्रत कथा कही जाती है जो इस दिन के महत्व को सरल रूप में समझाती है। कथा सुनने से न केवल धर्मपालन की भावना जागती है बल्कि भाई बहन दोनों को यह भी समझ आता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी स्नेह, बुद्धिमानी और त्याग से संकट टाले जा सकते हैं।
कथा के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है, क्योंकि कथा ही इस पर्व की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करती है। इसी कथा से यह संकेत भी मिलता है कि केवल कर्मकांड नहीं बल्कि भाव और नीयत ही वास्तव में फल देने वाले होते हैं।
एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उसके दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। बेटी की शादी हो चुकी थी और वह ससुराल में रहती थी। होली का पर्व बीत गया था। कुछ दिन बाद अचानक बेटे के मन में बहन से मिलने की तीव्र इच्छा जागी। उसने अपनी मां से कहा कि वह बहन के घर जाकर उससे तिलक करवाना चाहता है और उसके हाथ का बनाया भोजन खाना चाहता है।
मां ने पहले तो थोड़ी देर सोचा, फिर बेटे के बार बार आग्रह करने पर उसे बहन के घर जाने की अनुमति दे दी। आशीर्वाद देकर बुढ़िया ने बेटे को विदा किया। बेटा प्रसन्न मन से अपनी बहन से मिलने के लिए चल पड़ा।
रास्ते में चलते चलते वह एक नदी के किनारे पहुँचा। नदी ने मानो मुखर होकर कहा कि वह उसका काल है। जैसे ही वह अंदर कदम रखेगा, वह डूब जाएगा और प्राण दे देगा। यह सुनकर लड़का घबरा गया, पर उसका मन बहन से मिलने के लिए अडिग था। उसने नदी से निवेदन किया कि पहले उसे अपनी बहन से मिल लेने दे, तिलक करवा लेने दे, फिर लौटते समय यदि यह उसका भाग्य है तो वह अपने प्राण दे देगा।
नदी ने उसकी बात सुनकर उसे आगे जाने दिया। यह दृश्य दिखाता है कि कभी कभी मृत्यु का संकेत सामने होते हुए भी स्नेह और कर्तव्य व्यक्ति को आगे बढ़ने का साहस दे देता है।
थोड़ा आगे बढ़ने पर घने जंगल में उसे एक खूंखार शेर दिखाई दिया। शेर ने उसकी राह रोक ली। लड़के ने शेर से भी वही निवेदन किया जो नदी से किया था। उसने कहा कि वह अपनी बहन से मिलकर लौटते समय जो भी हो सहन करने को तैयार है। शेर ने भी उसे फिलहाल जाने दिया।
कुछ दूर और चलकर उसने देखा कि एक सांप ने उसके पैर को जकड़ लिया है। भयभीत होकर भी उसने सांप से वही बात दोहराई कि वह पहले बहन से मिलना चाहता है, फिर जो नियति हो वह स्वीकार करेगा। सांप ने भी उसे छोड़ दिया।
इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि जीवन में कभी कभी मृत्यु, संकट और भय तीनों एक के बाद एक सामने आते हैं, फिर भी सच्चा उद्देश्य यदि पवित्र हो तो राह अपने आप बनती चली जाती है।
आखिरकार वह लड़का अपनी बहन के घर पहुँच गया। बहन ने जैसे ही भाई को दरवाजे पर देखा, खुशी से भर उठी, उसे गले से लगा लिया और सम्मानपूर्वक अंदर ले गई। उसने विधि अनुसार भाई को तिलक लगाया, आरती की और प्रेम से बैठाकर भोजन परोसा।
भोजन करते समय बहन ने देखा कि उसका भाई उदास है। चेहरे पर चिंता और मन में कोई भारीपन साफ दिखाई दे रहा था। बहन उससे बार बार पूछने लगी कि वह दुखी क्यों है। पहले तो भाई चुप रहा, फिर बार बार आग्रह करने पर उसने रास्ते की सारी घटनाएँ बता दीं। नदी, शेर और सांप के बारे में सुनकर बहन बहुत घबरा गई और अपने भाई के भविष्य को लेकर चिंतित हो उठी।
भाई की बात सुनकर बहन ने निश्चय किया कि वह अपने भाई को अकेला वापस नहीं भेजेगी। वह उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गई। रास्ते में वे एक तालाब के पास पहुँचे जहाँ उन्हें एक बुढ़िया बैठी मिली। बहन ने चिंतित मन से उस बुढ़िया को सारी बात बता दी और पूछा कि भाई के जीवन पर यह संकट क्यों आया है और इसे कैसे टाला जा सकता है।
बुढ़िया ने शांत मन से कहा कि यह सब उसके पिछले जन्मों के कर्म हैं, जिनका परिणाम अब सामने आ रहा है और उसका भाई उन्हें भोगने जा रहा है। लेकिन उसने यह भी बताया कि यदि बहन सच्चे मन से प्रयास करे तो वह अपने भाई पर आने वाली हर विपत्ति को स्वयं झेलकर या बुद्धिमानी से टालकर भाई का जीवन बचा सकती है।
यह सुनकर बहन के मन में एक नई आशा जागी। वह अपने भाई को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार हो गई।
बुढ़िया की बात मानकर बहन ने लौटने से पहले तैयारी की। उसने
जब वे जंगल में पहुँचे तो शेर सामने आ गया। बहन ने तुरंत शेर के सामने मांस रख दिया। शेर का ध्यान मांस पर लग गया और वह शांत हो गया। इस तरह शेर से पहला संकट टल गया।
कुछ आगे बढ़ने पर वही सांप फिर सामने आया और फुंफकारने लगा। बहन ने उसके सामने दूध रख दिया। दूध पीकर उसका विष शांत हुआ और उसने उन्हें जाने दिया।
अब वे नदी के किनारे पहुँचे। नदी ने लड़के को देखते ही अपना वेग बढ़ा दिया, जैसे उसे डुबो देना चाहती हो। बहन ने तुरंत अपनी ओढ़नी नदी के हवाले कर दी, मानो उसे सम्मान से ढँक दिया। नदी का प्रवाह शांत पड़ गया और वह दोनों सुरक्षित पार निकल गए।
इस प्रकार बहन ने अपने स्नेह, सूझबूझ और त्याग से भाई पर आने वाली हर विपत्ति को टाल दिया। भाई का काल माने जाने वाले तीनों संकट शांत हो गए।
कथा के अनुसार, यही वह दिन था जब बहन ने अपने भाई को मृत्यु के मुँह से वापस खींच लिया। कहा जाता है कि इस घटना के बाद से ही हर वर्ष चैत्र मास की शुक्ल द्वितीया, अर्थात होली के अगले दिन, भाई दूज का पर्व मनाया जाने लगा।
इस दिन भाई बहन के घर जाकर तिलक करवाता है, बहन उसके दीर्घायु की कामना करती है और भाई बदले में उसकी रक्षा का वचन देता है। इस प्रकार होली के रंगों के बाद भाई दूज का यह दिन रिश्तों में सुरक्षा, विश्वास और प्रेम की नई परत जोड़ देता है।
होली भाई दूज व्रत कथा केवल एक पौराणिक कथा नहीं बल्कि जीवन के लिए गहरा मार्गदर्शन भी है।
इस दिन का व्रत और कथा दोनों मिलकर व्यक्ति को यह समझाते हैं कि परिवार और रिश्तों का संरक्षण भी धर्म पालन का ही एक रूप है।
होली भाई दूज कब और कैसे मनाई जाती है
होली भाई दूज हर वर्ष चैत्र शुक्ल द्वितीया तिथि को, होली के अगले दिन मनाई जाती है। इस दिन बहन अपने भाई को तिलक करती है, आरती उतारती है और भोजन कराकर उसके दीर्घायु, सुख और निरोगी जीवन की कामना करती है।
इस दिन यमराज और यमुना की कथा क्यों याद की जाती है
यमराज और यमुना की कथा इस दिन इसलिए याद की जाती है क्योंकि यमराज ने यमुना को वचन दिया था कि भाई दूज के दिन बहन के घर जाकर तिलक और भोजन करने वाले भाई को नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलेगी। इसी से इस पर्व को पापों से राहत और सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है।
होली भाई दूज की बुढ़िया और उसके बेटे वाली कथा क्या सिखाती है
यह कथा सिखाती है कि पिछले जन्मों के कर्म अपना फल अवश्य देते हैं, लेकिन सच्चे प्रेम, त्याग और सूझबूझ से उन संकटों का प्रभाव बदला जा सकता है। बहन का त्याग दिखाता है कि वह अपने भाई के लिए हर खतरा अपने ऊपर लेने को भी तैयार रहती है।
इस दिन गणेश जी और यमदेव की पूजा क्यों की जाती है
गणेश जी की पूजा विघ्नों को दूर करने के लिए की जाती है, ताकि व्रत और पूजा में कोई बाधा न आए। यमदेव की पूजा इस भाव से की जाती है कि वे अपने वरदान के अनुसार भाई को आयु और सुरक्षा दें और उसे कष्टकारी कर्मफलों से राहत प्रदान करें।
भाई बहन इस पर्व को अधिक अर्थपूर्ण कैसे बना सकते हैं
भाई बहन यदि इस दिन केवल औपचारिक तिलक तक सीमित न रहकर मन से शिकायतें दूर करें, खुलकर संवाद करें और जीवन भर एक दूसरे के साथ खड़े रहने का संकल्प लें, तो होली भाई दूज उनके रिश्ते के लिए बहुत शुभ और जीवनदायी हो सकता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, आध्यात्मिकता और कर्म
इनके क्लाइंट: दि., उ.प्र., म.हा.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें