By पं. अभिषेक शर्मा
प्रह्लाद-होलीका, कृष्ण-राधा और ऋतु परिवर्तन का त्योहार

हर वर्ष वसंत के आगमन पर जब आसमान में गुलाल के बादल उठते हैं तो अनजाने में मन पूछता है कि होली रंगों के साथ ही क्यों मनाई जाती है। यह उत्सव केवल मस्ती, पिचकारियों और चटकीले रंगों की बाहरी चमक तक सीमित नहीं रहता। इसके पीछे प्रह्लाद होलिका की कथा, कृष्ण और राधा की लीला, ऋतु परिवर्तन और भीतर की आध्यात्मिक शुद्धि तक का विस्तार मिलता है। यही कारण है कि होली को भारत में रंगों का प्रमुख पर्व माना जाता है और आज दुनिया के अनेक देशों में भी लोग इसे अपनाने लगे हैं।
होली का मुख्य समय फाल्गुन पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अगले दिन रंगों की होली तक चलता है। पहली रात होलिका दहन के रूप में नकारात्मकता को अग्नि के हवाले किया जाता है और अगला दिन रंगों वाली होली के रूप में आनंद, प्रेम और क्षमा का उत्सव बन जाता है। यह दो चरणों का क्रम इस बात का संकेत है कि पहले व्यक्ति अपने भीतर के अंधकार को छोड़े और फिर जीवन को नए रंगों से भर दे।
होली का मूल अर्थ केवल एक लोक उत्सव नहीं बल्कि नए आरंभ, क्षमा और भीतरी शुद्धि से जुड़ा हुआ है। यह त्योहार सर्दियों के अंत और वसंत की शुरुआत के बीच आता है, जब धरती पर नई फसल और नई कोपलें उभरने लगती हैं।
होली का विस्तृत स्वरूप दो भागों में समझा जाता है।
| चरण | क्या होता है | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|---|
| होलिका दहन | अलाव, परिक्रमा, प्रार्थना | अहंकार, नकारात्मक विचार और भय का दहन |
| रंगों की होली | रंग, पानी, हँसी, मिलन | प्रेम, क्षमा, मेलमिलाप और नए रिश्तों की शुरुआत |
जो व्यक्ति यह पूछता है कि होली क्यों मनाई जाती है, उसके लिए उत्तर केवल एक घटना नहीं बल्कि भक्ति, प्रेम और मन की शुद्धि का सम्मिलित भाव है।
होली के मुख्य आधार के रूप में सबसे पहले प्रह्लाद और होलिका की कथा सामने आती है। यह कथा दिखाती है कि जब अहंकार धर्म के ऊपर चढ़ने का प्रयास करता है तो अंततः पराजय उसी की होती है।
पुराने समय में हिरण्यकशिपु नाम का एक असुर राजा था जिसने कठोर तपस्या करके ऐसे वरदान प्राप्त किए कि सामान्य मृत्यु उसके लिए लगभग असंभव हो गई। शक्ति के साथ उसका अहंकार भी बढ़ता चला गया। उसने अपने राज्य में यह आदेश दे दिया कि सब लोग उसी को ईश्वर मानें और उसी की आराधना करें।
यही हिरण्यकशिपु का पुत्र था प्रह्लाद, जो भीतर से भगवान विष्णु का भक्त था। वह मानता था कि वास्तविक शक्ति भय में नहीं बल्कि सत्य और भक्ति में छिपी होती है। पिता की चेतावनी के बावजूद प्रह्लाद ने विष्णु का नाम जपना नहीं छोड़ा।
हिरण्यकशिपु ने कई बार उसे अलग अलग तरीकों से मारने की योजना बनाई, पर हर बार कोई न कोई अदृश्य संरक्षण प्रह्लाद को बचा लेता। अंत में उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसे अग्नि से बचाने वाला वरदान प्राप्त था या जिसके पास अग्नि से बचाने वाला दिव्य वस्त्र था। योजना बनी कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी।
अलाव प्रज्वलित हुआ, होलिका प्रह्लाद को लेकर उसमें बैठ गई। कथा कहती है कि या तो वरदान की शर्त थी कि वह अकेली आग में बैठने पर ही सुरक्षित रहेगी, या दिव्य वस्त्र हवा से खिसककर प्रह्लाद के शरीर पर आ गया। परिणाम यह हुआ कि होलिका अग्नि में भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए।
यही घटना होलिका दहन की जड़ मानी जाती है। यह स्पष्ट संदेश देती है कि होली का उत्सव अच्छाई की बुराई पर विजय, भक्ति की रक्षा और अहंकार के दहन की स्मृति से जुड़ा हुआ है।
अक्सर यह प्रश्न उठता है कि होली का मुख्य रंगों वाला खेल होलिका दहन के अगले दिन ही क्यों होता है। इसका उत्तर होली की गहराई में छिपा है।
होलिका दहन उस क्षण का प्रतीक है जब व्यक्ति अपने भीतर के
अहंकार,
द्वेष,
कपट,
भय
जैसे बोझों को अग्नि के हवाले करने का संकल्प लेता है।
जब भीतर का यह दहन हो जाता है तो अगले दिन रंगों वाली होली के माध्यम से यह दिखाया जाता है कि अब मन हल्का हो चुका है। अब उस स्थान पर प्रेम, आनंद और अपनत्व को जगह दी जा सकती है। इसी क्रम के कारण कहा जाता है कि पहले नकारात्मकता का दहन और फिर रंगों में भीगी हुई सकारात्मकता का स्वागत, यही होली का क्रम है।
होली के रंगों से जुड़ी एक अत्यंत प्रिय परंपरा कृष्ण और राधा की लीला से भी आती है।
कथा यह बताती है कि बाल्यकाल में कृष्ण का वर्ण श्याम था और राधा का वर्ण गोरा। कृष्ण के मन में कभी कभी यह प्रश्न आता कि राधा जैसे गोरे रूप वाली सखियाँ क्या श्याम वर्ण वाले से उतना ही स्नेह रखेंगी। उनकी माता यशोदा ने प्यार से कहा कि यदि मन में संकोच हो तो राधा के चेहरे पर रंग लगा दो तब क्या अंतर रह जाएगा।
कृष्ण ने वही किया। खेल खेल में रंग लगा दिया और इसी के साथ रंगों की होली के एक मधुर रूप की शुरुआत मानी जाती है। इस कथा में संदेश यह है कि रंगों के माध्यम से गोरा काला, ऊँचा नीचा, जाति और पद जैसे भेद थोड़े समय के लिए पीछे छूट जाते हैं। राधा कृष्ण की होली प्रेम, समानता और स्नेह का प्रतीक बन जाती है।
यही कारण है कि लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि रंगों से होली क्यों खेली जाती है, तो उत्तर में केवल एक ही भाव बार बार उभरता है कि प्रेम को रंग की आवश्यकता नहीं, पर रंग प्रेम के उत्सव को और सहज बना देते हैं।
होली को रंगों का त्योहार इसलिए कहा जाता है, क्योंकि रंग स्वयं जीवन के प्रतीक हैं। हर रंग एक भाव, एक स्थिति और एक ऊर्जा को दर्शाता है।
कुछ प्रमुख रंगों का भाव इस प्रकार समझा जा सकता है।
| रंग | संकेत और भाव |
|---|---|
| लाल | प्रेम, उत्साह, जीवन शक्ति |
| पीला | हल्दी, सौभाग्य, स्वास्थ्य |
| हरा | नई शुरुआत, वृद्धि, आशा |
| नीला | ईश्वरीय ऊर्जा, गहराई और स्थिरता |
| गुलाबी | आनंद, मधुरता और सौहार्द |
जब इन रंगों को होली के दिन एक दूसरे पर डाला जाता है तो यह केवल बाहरी खेल नहीं रहता। यह इस बात का प्रतीक बन जाता है कि जीवन को इन सभी भावों की आवश्यकता है। होली के रंग मानो मन को याद दिलाते हैं कि भीतर भी प्रेम, स्वास्थ्य, आशा और आनंद के रंग बनाए रखना आवश्यक है।
गुलाल उछालना, रंगों से एक दूसरे को भिगोना और हल्के ठिठोले करना होली की पहचान बन चुकी है। इसके पीछे गहरा सामाजिक संकेत छिपा है।
होली के दिन सामान्यतः
उम्र का अंतर,
धन धान्य का भेद,
पद और प्रतिष्ठा का फर्क
सब कुछ कुछ देर के लिए हल्का पड़ जाता है।
जब कोई किसी के चेहरे पर रंग लगाता है तो वह भीतर ही भीतर यह संकेत देता है कि पुरानी कड़वाहट और मनमुटाव को पीछे छोड़कर अब क्षमा और अपनापन को जगह दें। रंगों के बीच चेहरा पहचानना भी कठिन हो जाता है, इसलिए व्यक्ति सामने वाले को केवल मन और व्यवहार से पहचानता है, न कि बाहरी रूप से। यही कारण है कि होली को सबसे अधिक समावेशी और खुले मन वाला उत्सव माना जाता है।
होली के रंग केवल हँसी के प्रतीक नहीं, वे भीतर की आध्यात्मिक यात्रा से भी जुड़े हैं।
होलिका दहन के समय संदेश मिलता है कि
अहंकार छोड़ो, भीतर जमे क्रोध और कटुता को अग्नि में समर्पित करो।
रंगों वाली होली के समय संदेश मिलता है कि
अब नए आरंभ को स्वीकार करो, आनंद में लौट आओ और जीवन को स्वीकार करो।
धार्मिक दर्शन के अनुसार रंगों को कई बार आंतरिक केंद्रों और भावनात्मक ऊर्जा से जोड़ा गया है। इस दृष्टि से देखा जाए तो होली मानो एक ऐसा अनुष्ठान बन जाती है जहाँ भीतर की नकारात्मकता को छोड़कर कृतज्ञता और प्रसन्नता को स्थान दिया जाता है।
भारत के अलग अलग क्षेत्रों में होली का स्वरूप भक्ति, लोकगीत और क्षेत्रीय परंपराओं के कारण थोड़ा अलग दिखता है।
प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में भी रंगों और वसंत उत्सव का उल्लेख मिलता है। पहले प्राकृतिक फूलों और औषधीय पौधों से ही रंग बनाए जाते थे, जो पर्यावरण और शरीर दोनों के लिए अनुकूल माने जाते थे।
होली का महत्व केवल एक सामाजिक पर्व तक सीमित नहीं। यह धर्म, नैतिकता और जीवन शैली तक फैला हुआ है।
इसी लिए होली का धार्मिक महत्व यह भी है कि व्यक्ति अपने जीवन में यह देखे कि वह किन बातों में अधर्म या अन्याय की ओर खिंच रहा है और कैसे वह पुनः धर्म, सत्य और करुणा की ओर लौट सकता है।
बहुत स्थानों पर होली केवल सूखे रंगों से नहीं बल्कि रंगीन जल के साथ भी मनाई जाती है। इसका एक सामाजिक और एक व्यावहारिक पक्ष है।
परंपरागत रूप से गर्मी की शुरुआत में शरीर को हल्की ठंडक की आवश्यकता होती है। हल्के रंगीन जल का स्पर्श और सूर्य की गर्मी के बीच शरीर को एक संतुलित अनुभूति मिलती है।
प्रतीक रूप में
जल शुद्धि और पवित्रता का प्रतीक है,
रंग भावों की अभिव्यक्ति का।
दोनों मिलकर एक ऐसा उत्सव रचते हैं जिसमें हँसी के साथ साथ मन के भीतर की दीवारें भी पिघलती हैं।
रंगों वाली होली, जिसे कई लोग मुख्य दिन मानते हैं, होलिका दहन के बाद मनाया जाने वाला वह चरण है जहाँ
यह दिन केवल मस्ती के लिए नहीं होता बल्कि यह संकेत देता है कि व्यक्ति अपनी आंतरिक यात्रा में एक सीढ़ी ऊपर उठ चुका है। अब उसके लिए क्षमा, संवाद और प्रेम को अपनाना थोड़ा सहज हो जाता है।
बच्चों और विद्यार्थियों को होली समझाने के लिए कथा को सरल रूप में भी रखा जाता है।
बहुत समय पहले प्रह्लाद नाम का एक बालक था जो हमेशा अच्छे काम करता था और भगवान पर विश्वास रखता था। उसके पिता हिरण्यकशिपु अत्याचारी थे और चाहते थे कि सब केवल उन्हें ही ईश्वर मानें। उन्होंने प्रह्लाद को कई बार मारने की कोशिश की, पर वह हर बार बच गया। उनकी बहन होलिका ने उसे गोद में लेकर अग्नि में बैठने का निश्चय किया ताकि वह जल जाए। आग में बैठने पर होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। इस घटना की स्मृति में लोग एक रात अलाव जलाते हैं और अगले दिन रंगों से होली खेलते हैं ताकि सबको याद रहे कि अंत में अच्छाई ही जीतती है।
आज के दौर में भी होली उतनी ही अर्थपूर्ण है जितनी कभी पहले थी।
अंत में जब कोई पूछता है कि होली रंगों के साथ क्यों मनाई जाती है, तो उत्तर में यह भाव उभरता है कि रंग जीवन, प्रेम, समानता और नए आरंभ का प्रतीक हैं। प्रह्लाद और होलिका की कथा से लेकर राधा कृष्ण की लीला तक, होली भक्ति, प्रेम और उत्सव को एक ही मंच पर जोड़ देती है।
होली रंगों के साथ ही क्यों मनाई जाती है
होली रंगों के साथ इसलिए मनाई जाती है क्योंकि रंग जीवन, प्रेम और नए आरंभ का प्रतीक हैं। प्रह्लाद होलिका की कथा बुराई के दहन का संदेश देती है और कृष्ण राधा की कथा रंगों को प्रेम और समानता से जोड़ती है। दोनों मिलकर यह दिखाते हैं कि नकारात्मकता के हटने के बाद जीवन को रंगों से भर देना ही होली का भाव है।
होली को रंगों का त्योहार क्यों कहा जाता है
होली को रंगों का त्योहार इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन गुलाल और रंगों के माध्यम से लोग प्रेम, क्षमा और अपनत्व व्यक्त करते हैं। लाल, पीला, हरा और अन्य रंग स्वास्थ्य, उत्साह और नई शुरुआत का संकेत देते हैं, इसलिए यह उत्सव रंगों की भाषा में जीवन के भावों को प्रकट करता है।
होलिका दहन का महत्व क्या है
होलिका दहन प्रह्लाद और होलिका की कथा की स्मृति में किया जाता है। यह अहंकार, क्रोध और अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों के दहन का प्रतीक है। आग में लकड़ियाँ और सूखी वस्तुएँ डालने के साथ व्यक्ति यह भाव भी रखता है कि उसके भीतर की नकारात्मक भावनाएँ भी अब समाप्त हों।
होली के रंग क्या प्रतीक करते हैं
होली के रंग अलग अलग भावों के प्रतीक हैं। लाल जीवन शक्ति और प्रेम, पीला हल्दी और सौभाग्य, हरा नई शुरुआत और आशा, नीला ईश्वरीय ऊर्जा और गहराई का संकेत देता है। इन रंगों को एक दूसरे पर लगाना यह संदेश देता है कि हम एक दूसरे के जीवन में सकारात्मक भाव भरना चाहते हैं।
भारत में होली क्यों मनाई जाती है
भारत में होली इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह प्रह्लाद जैसी भक्ति, होलिका जैसी नकारात्मकता के दहन, कृष्ण राधा के प्रेम और वसंत के आगमन से जुड़ी हुई है। यह उत्सव धर्म, संस्कृति, परिवार और समाज सबको एक सूत्र में पिरोकर लोगों को याद दिलाता है कि अंत में अच्छाई, प्रेम और सत्य ही स्थायी रहते हैं।
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