By पं. नीलेश शर्मा
होली के त्योहार की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक व्याख्या

भारतीय संस्कृति में होली वह त्योहार है जहाँ एक ही दिन में आग भी जलती है, रंग भी उड़ते हैं और दिल भी हल्के हो जाते हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को आने वाली यह तिथि शीत ऋतु के अंत और वसंत के स्वागत का संकेत देती है। पहले दिन संध्या के समय होलिका दहन किया जाता है और दूसरे दिन प्रातः से दोपहर तक रंगवाली होली खेली जाती है। बाहर से यह सब केवल उत्सव जैसा दिखता है, भीतर से यह आत्मा के लिए पुराने बोझ उतारने और नए सिरे से जीने का अवसर बन सकता है।
फाल्गुन पूर्णिमा की यह होली कई पौराणिक कथाओं, लोककथाओं और क्षेत्रीय परंपराओं से जुड़ी हुई है। कहीं यह प्रह्लाद की अटूट भक्ति की स्मृति है, कहीं राधा कृष्ण के प्रेम की, कहीं कामदेव के दहन से इच्छाओं के रूपांतरण की, कहीं राक्षसी धुंधी की कहानी के माध्यम से बच्चों की हँसी की शक्ति की। इन सबके बीच किसान अपने नई फसल के साथ अग्नि के पास खड़े होकर प्रकृति का आभार भी व्यक्त करते हैं।
ज्योतिषीय रूप से होली का समय फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा से जुड़ा है। इसी दिन दो मुख्य अनुष्ठान माने जाते हैं।
अधिकतर स्थानों पर होलिका दहन के लिए पंचांग देखकर शुभ मुहूर्त निकाला जाता है ताकि अग्नि प्रज्वलन पूर्णिमा के शुभ प्रभाव में हो। इस समय लोग स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनते हैं, परिवार के साथ होलिका स्थल पर पहुँचते हैं और अग्नि की परिक्रमा कर अपने मन की प्रार्थनाएँ शांत भाव से अर्पित करते हैं।
होली के इतिहास की मूल कथा प्रह्लाद, होलिका और हिरण्यकशिपु से शुरू होती है। असुरराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई साधारण शक्ति मार नहीं सके। यह अहंकार इतना बढ़ा कि उसने अपने राज्य में घोषणा कर दी कि सब उसे ही ईश्वर मानकर पूजें। उसका पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का नाम जपता था और पिता का आदेश मानने से स्पष्ट इनकार कर देता था।
क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को कई बार मरवाने की चेष्टा की। कभी ऊँचे पर्वत से गिरवाया, कभी विष दिया, कभी हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की। हर बार प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। अंत में उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया जिसे वर प्राप्त था कि अग्नि में बैठने पर भी वह नहीं जलेगी। योजना बनी कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि की ज्वाला पर बैठे और प्रह्लाद भस्म हो जाए।
होलिका जलती लकड़ियों के ढेर पर बैठ गई। प्रह्लाद की आँखें बंद थीं, होंठों पर केवल भगवान विष्णु का नाम था, मन में तनिक भी भय नहीं। अग्नि भड़कती गई, किंतु कुछ ही देर में दृश्य पलट गया। होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद अक्षुण्ण बाहर निकल आए। इस घटना के पीछे एक सूक्ष्म संकेत यह भी बताया जाता है कि होलिका का वरदान तब तक ही कार्य करता था जब वह स्वयं अकेले अग्नि में प्रवेश करे, किसी निर्दोष भक्त को लेकर नहीं।
यही प्रसंग होलिका दहन का मूल प्रतीक है। यहाँ अहंकार, अत्याचार और अधर्म अग्नि में जलकर नष्ट होते हैं और भक्ति, सत्य तथा निष्कपट विश्वास सुरक्षित बच जाते हैं। होली की रात जब अग्नि जलती है तो बहुत से साधक मन ही मन यही प्रार्थना करते हैं कि भीतर छिपा हुआ हिरण्यकशिपु जैसा अहंकार भी इस अग्नि के साथ थोड़ा थोड़ा जलता रहे।
ब्रज की गलियों में होली केवल त्योहार नहीं रहती, वह मानो राधा कृष्ण की जीवंत लीला बन जाती है। कथा है कि श्यामवर्ण कृष्ण अपने रंग को देखते हुए सोचते थे कि गौरे मुख वाली राधा उन्हें अपनाएगी या नहीं। यह बात उन्होंने लजाते हुए माता यशोदा के सामने रखी। यशोदा ने मुस्कराते हुए सरल उपाय बताया कि यदि कृष्ण चाहें तो राधा के गालों पर रंग लगा दें तब राधा भी उनके ही रंग जैसी दिखेंगी।
कृष्ण ने खेल खेल में राधा के मुख पर रंग लगा दिया और सakhियों पर भी अबीर उड़ाया। उस क्षण को ब्रज के लोगों ने प्रेम की स्वीकृति के रूप में देखा। धीरे धीरे यही खेल फाग गीतों, नाच, ठिठोली और रंगों की वर्षा में बदल गया। आज भी बरसाना, नंदगाँव, वृंदावन और मथुरा की होली में यह भाव महसूस होता है कि यहाँ रंग केवल मज़ाक के लिए नहीं बल्कि प्रेम, अपनापन और बराबरी का बोध कराते हैं। जब सब के चेहरे एक दूसरे के रंग में घुल जाते हैं तो जाति, पद और दिखावे की रेखाएँ थोड़ी धुँधली पड़ जाती हैं।
होली की एक व्याख्या भगवान शिव और कामदेव के प्रसंग से भी जुड़ी है। सती के देह त्याग के बाद शिव ने दुनिया से मानो अपना मुँह मोड़ लिया और गहन ध्यान और समाधि में चले गए। देवताओं को चिंता हुई कि यदि शिव इसी तरह विरक्त रहेंगे तो पार्वती के साथ उनका विवाह कैसे होगा और सृष्टि में संतुलन कैसे बनेगा।
देवताओं ने उपाय सोचा और कामदेव से प्रार्थना की कि वह अपने प्रेम बाण से शिव के ध्यान को थोड़ा जागृत करें। वसंत के सुहावने मौसम में कामदेव ने अवसर देखकर शिव पर काम बाण चलाया। शिव का ध्यान टूटा, वे अत्यंत क्रोधित हुए और तीसरा नेत्र खोल दिया। तीसरे नेत्र की ज्वाला से कामदेव भस्म हो गए। बाद में कामदेव की पत्नी रति की करुण प्रार्थना से शिव ने कामदेव को फिर से अस्तित्व दिया, पर अब वह निराकार और अदृश्य रूप में माने जाते हैं।
इस कथा को कई साधक इस रूप में समझते हैं कि जब इच्छा अनियंत्रित होकर कामना बन जाती है तो वह व्यक्ति को जला देती है, पर वही ऊर्जा यदि विवेक के साथ साधना में लगाई जाए तो आध्यात्मिक शक्ति बन सकती है। होलिका दहन की अग्नि के सामने बैठकर कई लोग मन ही मन यह संकल्प भी करते हैं कि काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी प्रवृत्तियों को धीरे धीरे छोड़कर उसी ऊर्जा को जप, ध्यान और सेवा में बदलना है।
कुछ प्रदेशों में होली की एक प्यारी सी लोककथा धुंधी राक्षसी से भी जुड़ी है। कहा जाता है कि धुंधी नाम की राक्षसी गाँव के बच्चों को बहुत सताती थी। उसे ऐसे वरदान मिले थे कि साधारण अस्त्र शस्त्र या बल प्रयोग से उसे मार पाना आसान नहीं था, पर एक कमजोरी थी कि उसे बच्चों की निर्भीक हँसी, जोरदार शोर और शरारत सहन नहीं होती थी।
जब गाँव के बुजुर्गों को यह बात समझ में आई तो उन्होंने बच्चों से कहा कि होली के दिन सब मिलकर जोर जोर से गाएँ, हँसें और शोर मचाएँ। बच्चे टोली बनाकर गलियों में घूमने लगे, थालियाँ पीटने लगे, गीत गाने लगे। धुंधी इस शोर और हँसी से घबरा कर उस गाँव से भाग गई। आज भी होली पर बच्चों की मस्ती, ढोलक की ताल और फाग के गीतों को नकारात्मक ऊर्जा और भय को दूर भगाने का प्रतीक माना जाता है।
होली का संबंध केवल कथाओं से नहीं, किसान के खेत और अनाज से भी है। फाल्गुन के अंत तक रबी की फसल पकने लगती है। खेतों में गेहूँ, जौ और चने की बालियाँ झूमती दिखाई देती हैं। किसान के लिए यह समय राहत, कृतज्ञता और नए आर्थिक वर्ष की शुरुआत का संकेत है।
कई गाँवों में परंपरा है कि होलिका दहन की शाम किसान अपने खेत से नई गेहूँ या जौ की कुछ बालियाँ तोड़कर लाता है। होलिका की अग्नि के पास इन्हें भूनकर घरवालों को प्रसाद के रूप में बाँटता है। कहीं चने या मक्का भी भूनकर खिलाए जाते हैं। यह छोटा सा अनुष्ठान यह कहता है कि पिछले वर्ष की कठिनाइयाँ, सूखा, चिंता और थकान अग्नि के साथ पीछे छोड़ दी जाएँ और नई फसल, नई आय और नई उम्मीदों का स्वागत किया जाए। होली इस तरह फसल के प्रति कृतज्ञता और समृद्धि की कामना का पर्व भी बन जाती है।
होलिका दहन केवल लकड़ियाँ जला देने की क्रिया नहीं है, यह एक सामूहिक संकल्प और मनोवैज्ञानिक शुद्धि भी है। मोहल्ले या गाँव में एक स्थान चुनकर वहाँ लकड़ियाँ, सूखा पेड़ पत्ते, गोबर के उपले आदि जमा किए जाते हैं। शुभ मुहूर्त आने पर अग्नि जलाई जाती है। लोग अग्नि के चारों ओर घुमते हैं, कुछ लोग अग्नि की ओर हाथ फैलाकर मन के बोझों को छोड़ने की कल्पना करते हैं।
होलिका दहन तीन प्रमुख बातों का संकेत देता है।
कई परिवारों में यह सरल रीति भी होती है कि थोड़े से अन्न के दाने या पुरानी सूखी टहनियाँ अग्नि में अर्पित कर मन ही मन कहा जाता है कि घर के रोग, झगड़े और भारीपन भी इसी के साथ थोड़े हल्के हो जाएँ।
जब रंग हवा में उड़ते हैं तो बाहर से यह केवल खेल जैसा लगता है, पर भीतर छिपा संदेश बहुत कोमल है। रंग मनुष्य की विविधता और एकता दोनों का चित्र बनाते हैं। अलग अलग जाति, उम्र और पृष्ठभूमि के लोग जब एक दूसरे के रंग में रंग जाते हैं तो बाहरी पहचान कम और आत्मिक निकटता अधिक महसूस होती है।
रंगों को इस प्रकार भी समझा जा सकता है। रंग आनंद, स्वीकृति और खुलापन दिखाते हैं। अग्नि दोषों के दहन और नए आरंभ की प्रेरणा देती है। वसंत ऋतु नई पत्तियों, फूलों और सुगंध के साथ जीवन में पुनर्जन्म और ताजगी का बोध कराती है। इन सबके बीच भक्ति और विश्वास वह धागा हैं जो हर कथा को जोड़ता है। जब कोई व्यक्ति होली के दिन हल्के मन से, संयमित और सम्मानपूर्वक रंग लगाता है तो वह अनजाने ही इस आध्यात्मिक संदेश को जी भी रहा होता है।
भारत के विभिन्न भागों में होली का रूप भले ही अलग दिखे, मूल भाव एक ही रहता है।
रूप भिन्न हैं पर हर जगह का संदेश यही है कि होली प्रेम, उत्साह और धर्म की विजय का पर्व है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| मनाने का समय | फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, पहली संध्या होलिका दहन, अगले दिन रंगवाली होली |
| मूल पौराणिक कथा | प्रह्लाद, होलिका, हिरण्यकशिपु, अग्नि में प्रह्लाद की रक्षा, होलिका का दहन |
| प्रेम और लीला का पक्ष | ब्रज की राधा कृष्ण लीला, रंगों के माध्यम से प्रेम और स्वीकृति |
| इच्छा से साधना की ओर | शिव और कामदेव प्रसंग, कामना के दहन और आध्यात्मिक ऊर्जा का बोध |
| लोककथा | धुंधी राक्षसी, बच्चों की हँसी और शोर से नकारात्मकता का निवारण |
| कृषि और फसल संबंध | रबी की नई फसल, बालियाँ भूनकर प्रसाद, पुराने वर्ष की थकान से मुक्ति |
| होलिका दहन का अर्थ | अहंकार, भय और अधर्म का दहन, विश्वास और भक्ति की विजय |
| रंगों का आध्यात्मिक अर्थ | विविधता में एकता, हृदय का खुलापन, संबंधों में मेल मिलाप और क्षमा |
| क्षेत्रीय रूप | लठमार होली, फूलों की होली, राजसी होली, डोल यात्रा आदि |
होली केवल कैलेंडर का एक त्योहार नहीं बल्कि जीवन के लिए एक कोमल सा संदेश है। यह कहती है कि हर वर्ष एक अवसर मिलता है जब मन थोड़ा रुककर देख सके कि पिछले बारह महीनों में कितनी कटुता, कितना डर और कितनी थकान भीतर जमा हो गई है। होलिका की अग्नि के सामने खड़े होकर यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से इन्हें पहचान ले और उन्हें मानसिक रूप से अग्नि को सौंप दे तो हलकापन महसूस होना स्वाभाविक है।
रंगों के माध्यम से रिश्तों में दूरी कम की जा सकती है। कई लोग होली के दिन पुराने मनमुटाव भूलकर गले मिलना पसंद करते हैं, एक दूसरे को रंग लगाकर यह कह जाते हैं कि अब आगे की बात नई होगी। प्रह्लाद की कथा विश्वास सिखाती है, राधा कृष्ण की लीला प्रेम की कोमलता, शिव और कामदेव का प्रसंग संयम और रूपांतरण की दिशा देता है। जो साधक इन कथाओं को केवल कहानी न मानकर जीवन के संकेत की तरह पढ़ता है उसके लिए होली नए संकल्प, नई दृष्टि और भीतर की सफाई का विशेष अवसर बन सकती है।
होलिका दहन के समय कौन सा भाव रखना सबसे उचित माना जा सकता है
होलिका दहन के समय यह भाव रखना उपयोगी है कि अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, बुरी आदतें, अनावश्यक भय और परिवार के झगड़े प्रतीकात्मक रूप से अग्नि को समर्पित हो रहे हैं। साथ ही यह प्रार्थना भी की जा सकती है कि आने वाले समय में घर परिवार में अधिक शांति, स्वास्थ्य और सद्भाव बढ़े।
रंगों से होली खेलते समय आध्यात्मिक भावना को कैसे बनाए रखा जाए
रंग लगाते समय ध्यान रहे कि सामने वाले की सहमति, उसकी सुविधा और स्वास्थ्य का सम्मान हो। जब रंग मजाक के लिए नहीं बल्कि प्रेम और स्वीकृति के संकेत के रूप में लगाए जाते हैं, जब किसी को चोट या अपमान न पहुँचे तब होली का खेल भी साधना का हिस्सा बन जाता है।
क्या होलिका दहन में अन्न या पुरानी वस्तुएँ डालना ठीक है
कई परिवार थोड़ी गेहूँ या जौ की बालियाँ, चने या सूखी टहनियाँ होलिका में डालते हैं। यह परंपरा तब तक ठीक है जब तक पर्यावरण को ज़्यादा हानि न पहुँच रही हो। इसका उद्देश्य यह है कि पुरानी थकान, अभाव और मानसिक बोझ को प्रतीकात्मक रूप से पीछे छोड़कर नए समय का स्वागत हल्के मन से किया जाए।
बच्चों को होली की कथाएँ किस तरह सरलता से समझाई जा सकती हैं
बच्चों को प्रह्लाद की कहानी सरल शब्दों में सुनाकर बताया जा सकता है कि भगवान से प्रेम, सच बोलना और अच्छे काम करना अंत में व्यक्ति को बचा लेते हैं। राधा कृष्ण की रंग भरी होली के माध्यम से उन्हें दोستی, मिलकर खेलने, किसी पर ज़बरदस्ती रंग न फेंकने और सबको शामिल करने की आदत सिखाई जा सकती है।
एक साधक के लिए होली का व्यावहारिक साधना रूप क्या हो सकता है
जो व्यक्ति होली को भीतर की साधना के रूप में जीना चाहता हो, वह होलिका दहन से पहले थोड़ा समय अकेले बैठकर अपने मन की कमजोरियों को लिख सकता है और उन्हें अग्नि के हवाले करने का संकल्प कर सकता है। फाल्गुन पूर्णिमा की सुबह स्नान, छोटा सा जप, जरूरतमंद को अन्न या वस्त्र दान और दिन में सीमित, संयमित और सम्मानपूर्ण रूप से रंग खेलना होली को बाहरी उत्सव से आगे बढ़ाकर भीतर की यात्रा का साधन बना सकता है।
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