By पं. संजीव शर्मा
केवल रंगों का त्यौहार नहीं, होली अच्छाई की जीत और भक्ति की शक्ति का प्रतीक

भारतीय परंपरा में होली को केवल रंगों का त्योहार नहीं माना जाता, यह अच्छाई की जीत, भक्ति की शक्ति और अहंकार के दहन का प्रतीक है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को जहाँ एक ओर होलिका दहन होता है, वहीं अगले दिन रंगों की होली मनाई जाती है। होलिका दहन की ज्वाला में लोग केवल लकड़ी नहीं जलाते बल्कि प्रतीकात्मक रूप से अपने भीतर छिपे हुए भय, क्रोध और अहंकार को भी अर्पित करने की भावना रखते हैं।
होली के पीछे जो सबसे लोकप्रिय और प्रेरक कथा सुनाई जाती है, वह है होलिका और प्रह्लाद की कहानी। यह कथा किसी दूर देश की कल्पना नहीं बल्कि इस बात की याद दिलाती है कि सत्ता, शक्ति और ज़ुल्म चाहे जितने बड़े क्यों न दिखें, अंत में टिकती केवल भक्ति, सत्य और करुणा ही है।
बहुत समय पहले भारत भूमि पर एक शक्तिशाली राजा का राज्य था। वह बाहरी रूप से पराक्रमी था, पर भीतर से अहंकारी, स्वार्थी और क्रूर। उसने अपनी प्रजा से यह कहलवाना शुरू कर दिया कि वही ईश्वर है और उसी की पूजा की जाए। जो उसकी आज्ञा माने, वही प्रिय, जो विरोध करे, वह शत्रु।
इसी राजा के घर जन्म हुआ एक ऐसे पुत्र का जिसका हृदय पिता से बिल्कुल भिन्न था। इस पुत्र का नाम था प्रह्लाद। जहाँ राजा में क्रूरता थी, वहीं प्रह्लाद के भीतर सहज दयालुता और कोमलता थी। प्रारंभ में वह भी पिता को देवतुल्य मानता था, क्योंकि बचपन में वही सिखाया गया था। पर एक दिन एक छोटी सी घटना ने उसके जीवन की दिशा बदल दी।
एक दिन प्रह्लाद राजमहल से बाहर निकले और गाँव के पास के खेतों और कच्ची पगडंडियों पर घूमते हुए जा रहे थे। दूर उन्हें एक स्त्री दिखाई दी जो घुटनों के बल बैठकर हाथ जोड़कर किसी अदृश्य शक्ति से प्रार्थना कर रही थी। उसके होंठों पर शब्द थे,
“हे भगवान विष्णु, जो भय हर लेते हैं, आपके चरणों में शरण है।”
प्रह्लाद को यह देखकर क्रोध आ गया। उन्हें बचपन से सिखाया गया था कि उनके पिता ही ईश्वर हैं। उन्होंने कठोर स्वर में पूछा, यह क्या कर रही हो, जब तुम्हारा राजा ही देवता है तो तुम किसी विष्णु नाम के देव की प्रार्थना क्यों करती हो।
स्त्री ने अपना चेहरा उठाया। उसकी आँखों में आँसू चमक रहे थे, पर उनमें विश्वास भी था। उसने कहा कि उसके छोटे बिलौटे कुएँ में गिर गए हैं और वह असहाय होकर भगवान विष्णु को पुकार रही है कि वे उसके बच्चों की रक्षा करें।
उसी समय कुएँ के भीतर से हल्की सी म्याऊँ की आवाज़ आई। प्रह्लाद ने देखा कि कुएँ के किनारे पर एक छोटा सा पंजा ऊपर की ओर उठा हुआ है। स्त्री धीरे से कुएँ के पास गई, झुककर उसने उस बिलौटे को पकड़कर बाहर निकाल लिया। थोड़ी देर में एक और म्याऊँ सुनाई दी, फिर एक और। एक एक कर सभी बिलौटे स्वयं कुएँ से बाहर आ गए और सुरक्षित जमीन पर आकर माँ के पास सिमट गए।
स्त्री खुशी से झुककर भूमि पर गिर गई और बोली, आज मेरे भगवान ने मेरी सुन ली। प्रह्लाद वहाँ से लौटते समय गहरे विचार में डूब गए। उन्हें लगा कि यदि पिता ही ईश्वर होते तो यह प्रार्थना किसी और तक क्यों पहुँचती। धीरे धीरे उनके भीतर विचार जन्मा कि सच्चा ईश्वर वही है जो प्रार्थना सुनता है, जो भय हर लेता है। उसी क्षण से प्रह्लाद का हृदय भगवान विष्णु की ओर मुड़ गया।
जब राजा को यह समाचार मिला कि उसका पुत्र अब उसे ईश्वर मानने के बजाय भगवान विष्णु की भक्ति करने लगा है, तो वह क्रोध से काँप उठा। उसके लिए यह केवल अवज्ञा नहीं, उसके अहंकार पर सीधा प्रहार था। उसने घोषणा की कि प्रह्लाद को तुरंत दंड दिया जाएगा ताकि कोई और बच्चे के मन में भी यह साहस न आए कि राजा की आज्ञा के विरुद्ध जाए।
उसने सिपाहियों को आदेश दिया कि प्रह्लाद को पकड़कर देश की सबसे ऊँची पहाड़ी चोटी से नीचे फेंक दिया जाए। सिपाही आदेश के दास थे, उन्होंने प्रह्लाद को ऊँचे पहाड़ पर ले जाकर नीचे धकेल दिया। प्रह्लाद गिरते हुए सिर्फ एक ही नाम लेते रहे, भगवान विष्णु। गिरते गिरते जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उनका सहारा लिया। उनका गिरना हल्का हो गया और वे सुरक्षित नीचे धरती पर आकर खड़े हो गए। तन पर खरोंच भी नहीं।
समाचार जब राजा तक पहुँचा तो उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने दूसरा उपाय सोचा। इस बार उसे आदेश दिया गया कि प्रह्लाद को सर्पों के गड्ढे में डाल दिया जाए, जहाँ सैकड़ों सर्प फुँफकारते थे।
सिपाहियों ने प्रह्लाद को एक गहरे साँपों के गड्ढे के पास लाकर खड़ा कर दिया। भीतर झाँकने पर सैकड़ों सर्प दिखते थे जिनके शरीर मोटे और बलवान थे। किसी सामान्य मनुष्य के लिए यह दृश्य ही भय से धराशायी कर देने वाला था, पर प्रह्लाद के भीतर केवल एक ही सहारा था, भगवान विष्णु का नाम। उन्हें गड्ढे में धक्का दे दिया गया।
सर्प उनके शरीर के पास आए, चारों ओर से लिपटे, उनके ऊपर घूमते रहे, पर किसी ने उन्हें डसा नहीं। जैसे किसी अदृश्य आदेश से उन्हें रोका गया हो। कुछ ही देर बाद प्रह्लाद वहाँ से सुरक्षित बाहर निकाले गए।
राजा का क्रोध अब और बढ़ गया। उसने तीसरा उपाय सोचा। इस बार आदेश दिया गया कि प्रह्लाद को क्रोधित हाथियों के झुंड के सामने छोड़ दिया जाए। हाथियों को पहले भड़काया जाए, उकसाया जाए, फिर उनके बीच प्रह्लाद को खड़ा कर दिया जाए ताकि वे उन्हें पैरों तले रौंद दें।
हाथियों ने प्रह्लाद को देखते ही चिंघाड़ना शुरू किया, उनके पाँव ज़मीन पर पड़ते तो धरती काँपती। प्रह्लाद ने फिर से भीतर ही भीतर विष्णु का स्मरण किया। जब हाथी उनके पास पहुँचे तो आश्चर्यजनक रूप से रुक गए। उनकी चिंघाड़ शांत हो गई, वे अपनी सूंड झुकाकर मानो प्रह्लाद को स्पर्श करने लगे, जैसे किसी प्रिय बालक के पास आकर उसे आशीर्वाद दे रहे हों।
तीनों बार प्रह्लाद सुरक्षित लौट आए। राजा के लिए यह अब केवल क्रोध नहीं, एक प्रकार की हार थी।
रात को राजा अपनी बहन होलिका के साथ यह चर्चा कर रहा था कि अब और क्या उपाय बचा है। होलिका के मन में भी प्रह्लाद के प्रति क्रोध था। वह चाहती थी कि भतीजे की भक्ति का अंत हो, ताकि भाई की सत्ता सुरक्षित रहे। उसने कहा, चिंता मत करो, एक उपाय है।
होलिका के पास एक विशेष दैवी वरदान था। कथानक के एक रूप में कहा जाता है कि उसे अग्नि से न जलने का वर मिला था। कहीं यह भी कहा जाता है कि उसके पास एक जादुई वस्त्र या चादर थी, जिसे ओढ़ लेने पर आग उसे जला नहीं सकती थी। होलिका ने कहा कि सुबह वह महल के सामने एक विशाल चिता तैयार करवाएगी, स्वयं उसमें प्रवेश करेगी और प्रह्लाद को भी साथ चलने की चुनौती देगी।
राजा पहले तो चौंका, फिर जब होलिका ने अपने वरदान की बात समझाई, तो उसे लगा कि यह योजना सचमुच सफल हो सकती है। उसे विश्वास हो गया कि इस बार प्रह्लाद बच नहीं पाएगा।
सुबह महल के सामने विशाल मैदान में लोगों को बुलाया गया। होलिका ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि ढेर सारी सूखी लकड़ियाँ, घास और उपले जमा किए जाएँ। देखते ही देखते एक विशाल अलाव तैयार हो गया। एक मशाल से आग लगाई गई। लकड़ियाँ सूखी थीं, अग्नि ने उन्हें तुरंत पकड़ा और लपटें आसमान की ओर उठने लगीं। इतनी गर्मी थी कि साधारण लोग पास खड़े भी नहीं हो पा रहे थे।
होलिका ने प्रह्लाद को बुलाकर कहा, आओ मेरे साथ। आज देखे जाए कि किसका साहस अधिक है। उसने प्रह्लाद को अपने साथ अग्नि में चलने का निमंत्रण दिया। प्रह्लाद के लिए यह केवल साहस की परीक्षा नहीं थी, यह उसकी भक्ति की कसौटी थी।
होलिका ने अपने वरदान पर भरोसा करते हुए या जादुई वस्त्र ओढ़कर अग्नि में प्रवेश किया। प्रह्लाद ने भी विष्णु स्मरण करते हुए उसके पीछे कदम रखा। भीड़ की साँसें थम सी गईं।
कथा कहती है कि जैसे जैसे अग्नि की लपटें ऊँची होती गईं, वैसे वैसे भगवान विष्णु ने परिस्थिति को बदलना शुरू कर दिया। अगर होलिका के पास वस्त्र था तो हवा के झोंके से वह वस्त्र उसके शरीर से खिसककर प्रह्लाद के शरीर पर आ गया। यदि अग्नि से न जलने का वरदान था तो वह वरदान उसके छल के कारण निष्क्रिय हो गया और उसकी रक्षा शक्ति प्रह्लाद को प्राप्त हो गई। अग्नि की तेज लपटों में होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद अग्नि के बीच खड़े रहे, सुरक्षित, शांत और अडिग।
लोगों ने आश्चर्य के साथ यह दृश्य देखा। अग्नि शांत होने के बाद जहाँ होलिका का केवल राख बची, वहीं प्रह्लाद जैसे विश्वास के दीपक की तरह खड़े थे। यह वही क्षण है जिसकी स्मृति में आज भी फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है।
आज जब होली से एक दिन पहले मोहल्लों और गाँवों में अलाव जलाया जाता है, लोग केवल लकड़ियाँ जलाने नहीं जाते। वे मन ही मन यह स्मरण करते हैं कि हिरण्यकशिपु, होलिका और प्रह्लाद केवल पात्र नहीं, हमारे भीतर बैठी तीन अवस्थाएँ हैं।
होलिका दहन की अग्नि में लोग सूखी टहनियाँ, उपले और कभी कभी कुछ अन्न के दाने भी अर्पित करते हैं, यह सोचकर कि जैसे ये वस्तुएँ आग में भस्म हो रही हैं वैसे ही भीतर के अहंकार, क्रोध, कटुता और भय भी थोड़ा थोड़ा पिघल जाएँ। अगले दिन जब रंगों की होली खेली जाती है तो वह प्रह्लाद जैसी भीतरी जीत का उत्सव बन सकती है।
| प्रसंग | विवरण |
|---|---|
| राजा का स्वभाव | घमंडी, क्रूर, स्वयं को देवता मानने वाला |
| प्रह्लाद का परिवर्तन | बिलौटों को कुंए से बचते देखकर विष्णु में विश्वास जागना |
| पहली परीक्षा | ऊँचे पहाड़ से गिराया गया, विष्णु की कृपा से सुरक्षित |
| दूसरी परीक्षा | सर्पों के गड्ढे में डाला गया, सर्प डसे बिना लिपटे रहे |
| तीसरी परीक्षा | क्रोधित हाथियों के बीच छोड़ा गया, हाथियों ने स्नेह दिखाया |
| होलिका का वरदान | अग्नि से रक्षा, या अग्नि से बचाने वाला जादुई वस्त्र |
| अलाव में प्रवेश | होलिका पहले, प्रह्लाद बाद में अग्नि में गए |
| परिणाम | होलिका राख में बदली, प्रह्लाद अग्नि में भी सुरक्षित |
| प्रतीकात्मक अर्थ | अहंकार और छल का दहन, भक्ति और सत्य की रक्षा |
यदि इस पूरी कथा को ध्यान से देखा जाए तो यह केवल बच्चों की कहानी नहीं बल्कि जीवन के लिए एक सूक्ष्म मार्गदर्शन है। जब कभी परिस्थितियाँ कठिन हों, जब बाहर से अन्याय या दबाव बहुत बढ़ जाए तब प्रह्लाद की तरह भीतर के विश्वास को थामे रखना इस कथा का पहला संदेश है।
दूसरा संदेश यह कि किसी भी प्रकार का अहंकार, अत्याचार और छल चाहे जितना समय के लिए सफल दिखे, अंत में उसका परिणाम होलिका जैसा ही होता है। तीसरा संकेत यह कि ईश्वर या उच्च शक्ति पर भरोसा केवल शब्दों से नहीं बल्कि कर्म और निर्णयों में भी दिखना चाहिए।
आज भी यदि कोई व्यक्ति होली के समय कुछ क्षण शांत बैठकर यह विचार करे कि उसके भीतर का हिरण्यकशिपु कौन है, होलिका कौन सी प्रवृत्ति है और प्रह्लाद जैसा कोमल भरोसा कहाँ छिपा है, तो होली केवल रंगों का उत्सव न रहकर आत्मचिंतन और नई शुरुआत का सुंदर अवसर बन सकती है।
इस कहानी में होलिका दहन का मुख्य संदेश क्या माना जाता है
इस कथा में होलिका दहन का मुख्य संदेश यह है कि अहंकार, अत्याचार और छल अंततः नष्ट होते हैं और सच्ची भक्ति, सत्य और निर्दोषता की रक्षा होती है। अलाव की अग्नि इसे प्रतीकात्मक रूप से दिखाती है कि बुराई भले कुछ समय के लिए प्रबल दिखे, पर टिकती नहीं।
प्रह्लाद की भक्ति को व्यवहारिक जीवन से कैसे जोड़ा जा सकता है
प्रह्लाद की भक्ति का अर्थ है कि व्यक्ति परिस्थिति कितनी ही कठिन क्यों न हो, सही बात, सत्य और ईश्वर में विश्वास छोड़ने के बजाय उसे शांत मन से थामे रहे। व्यवहार में इसका अर्थ है अन्याय के साथ समझौता न करना और अंदर से सही को सही मानते रहना।
होलिका के वरदान के पीछे क्या संदेश है
होलिका को मिला वरदान यह याद दिलाता है कि शक्ति या वरदान अपने आप में बुरे नहीं होते, उनकी दिशा महत्वपूर्ण होती है। जब शक्ति का उपयोग किसी निर्दोष को जलाने में किया गया तो वही वरदान निष्फल हो गया और रक्षा शक्ति भक्त के पक्ष में चली गई।
आज होलिका दहन करते समय साधारण गृहस्थ क्या भावना रख सकता है
एक साधारण गृहस्थ होलिका दहन के समय मन में यह संकल्प रख सकता है कि पिछले वर्ष के झगड़े, कटु वचन, बुरी आदतें और हर वह प्रवृत्ति जो प्रगति में बाधा बनी, अग्नि को सौंप दी जाए। साथ ही यह प्रार्थना भी की जा सकती है कि आने वाला वर्ष प्रह्लाद की भक्ति की तरह सरल और सत्य के मार्ग पर टिके।
क्या होली के रंगों को भी इस कहानी से जोड़ा जा सकता है
हाँ, जब होलिका दहन के बाद अग्नि शांत होती है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है, तो इसे प्रह्लाद की जीत का उत्सव माना जा सकता है। रंग इस बात का प्रतीक हो सकते हैं कि जो जीवन कल तक भय और अत्याचार के साये में था, वह अब भक्ति, आनंद और अपनत्व के रंगों से भर सकता है।
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