By अपर्णा पाटनी
परंपरा से परे, होली स्वास्थ्य और प्रकृति का संदेश देती है

अक्सर यह सोचा भी नहीं जाता कि त्योहार केवल परंपरा नहीं बल्कि शरीर और मन के लिए एक प्रकार की प्राकृतिक चिकित्सा भी हो सकते हैं। होली इसका एक बहुत सुंदर उदाहरण है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन, जब शीत ऋतु विदा लेकर वसंत ऋतु का स्वागत कर रही होती है तब देश के अनेक भागों में होलिका दहन और अगले दिन रंगों की होली मनाई जाती है। बाहर से यह उत्सव रंगों और हँसी का लगता है, पर भीतर इसमें मौसम, स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ा एक गहरा विज्ञान छिपा है।
होली के समय सूर्य की दिशा, तापमान और वायु की आर्द्रता में परिवर्तन शुरू हो जाता है। यह वह चरण होता है जब शरीर का संतुलन ज़रा सा बिगड़ जाए तो थकान, त्वचा की समस्याएँ, संक्रमण और मन की सुस्ती बढ़ सकती है। इसी समय होलिका की अग्नि, प्राकृतिक रंगों का स्पर्श और गीत संगीत का उल्लास एक प्रकार से शरीर और मन को नए मौसम के लिए तैयार करते हैं।
होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को आती है, जब शीत का प्रभाव कम होकर वसंत की ऊर्जा बढ़ने लगती है। यह संक्रमण काल शरीर के लिए संवेदनशील होता है। ठंड के कारण बहुत से लोग सर्दियों में स्नान कम कर पाते हैं, धूप भी पूर्ण रूप से नहीं मिलती, साथ ही शरीर पर धूल, पसीना और अन्य अवांछित कण जमा हो जाते हैं।
इस समय वायुमंडल में रोग फैलाने वाले सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ सकती है। इसी मौसम में होलिका दहन के बड़े अलाव वातावरण की ठंडक को कुछ कम करते हैं और आसपास की हवा को गरम करके उसमें मौजूद बहुत से कीटाणुओं की संख्या घटाने में सहायक माने जाते हैं। अग्नि की गर्माहट केवल बाहर की नहीं, भीतर बैठे जड़त्व और सुस्ती पर भी हल्का प्रहार करती है।
धार्मिक दृष्टि से होलिका दहन को बुराई के दहन का प्रतीक माना जाता है, पर लोक परंपरा में इसे स्वास्थ्य से भी जोड़ा गया है।
होलिका की अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करने की परंपरा कई स्थानों पर आज भी जीवित है। अग्नि के निकट जाने से शरीर को हल्की गर्मी मिलती है। माना जाता है कि इससे त्वचा की ऊपरी सतह पर मौजूद कुछ कीटाणु नष्ट होते हैं और शरीर थोड़ी सक्रियता महसूस करता है।
कहीं कहीं होलिका शांत होने के बाद उसकी राख का थोड़ा भाग लोग माथे पर लगाते हैं। कुछ क्षेत्रों में इस राख में थोड़ी चंदन की लेप और आम की नयी पत्तियों के टुकड़े मिलाकर थोड़ा सा सेवन भी किया जाता है। यह विश्वास रहता है कि इससे पाचन शक्ति और प्रतिरोधक क्षमता को हल्का सहारा मिलता है और मौसम बदलने के समय शरीर संक्रमणों का सामना करने में थोड़ी मजबूती महसूस कर सकता है।
शीत से ग्रीष्म की ओर जाते समय शरीर के भीतर सामान्यतः एक प्रकार की सुस्ती और भारीपन अनुभव होता है। नींद ज़्यादा आने लगती है, काम में मन कम लगता है और शरीर थका थका सा महसूस होता है। यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, क्योंकि तापमान और दिन की अवधि दोनों बदल रहे होते हैं।
यहीं पर होली का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष सक्रिय हो जाता है। लोग समूह में मिलकर
फाग,
जोगीरा
जैसे लोकगीत गाते हैं, ढोल और मंजीरा की ताल पर नाचते हैं, आवाज़ें लगाते हैं और खूब हँसते हैं। यह सब मिलकर शरीर में रक्त प्रवाह को तेज करता है, श्वास की गति थोड़ी बढ़ती है और मांसपेशियाँ सक्रिय होती हैं। रंग खेलते समय इधर उधर दौड़ना, झुकना, उठना, हँसना और बचना यह सब व्यायाम जैसा प्रभाव देता है। इससे जड़ता कम होती है और मन पर छाया भारीपन धीरे धीरे हल्का होने लगता है।
बहुत पुराने समय में जब रंगों की होली शुरू हुई तब प्राकृतिक स्रोतों से बने रंगों का ही प्रयोग होता था। यह रंग पेड़ों, फलों, फूलों और औषधीय वनस्पतियों से तैयार किए जाते थे। ऐसे रंग केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि शरीर के लिए लाभकारी भी माने जाते थे।
कई परंपराओं में कहा गया कि यदि शरीर पर हल्की मात्रा में औषधीय पौधों का लेप या चूर्ण मल जाए, तो वह त्वचा की सुरक्षा और सफाई दोनों में सहायक होता है।
| रंग | संभावित प्राकृतिक स्रोत |
|---|---|
| हरा | मेहंदी पत्तियाँ, वसंत की नई पत्तियाँ, हरी सब्जियाँ |
| पीला | हल्दी, बेल, अमलतास, चने का आटा, पीले फूल |
| नारंगी और केसरिया | टेसू के फूल, केसर, हल्दी में चूना मिलाकर |
| लाल | गुलाब, गुड़हल, अनार के छिलके, चंदन की लाल जाति |
| नीला और बैंगनी | जामुन, जामुनी रंग के फल और फूल, कुछ बेल वृक्ष |
| भूरा | कत्था, सूखी चाय की पत्तियाँ |
| काला | आंवले का सूखा फल, कुछ गहरे अंगूर |
इनसे बने रंगों के चूर्ण और घोल का हल्का स्पर्श त्वचा पर कठोर रसायनों की तरह हानि नहीं पहुँचाता बल्कि कुछ हद तक सफाई और पोषण में भी सहायक हो सकता है।
रंग केवल आँखों को अच्छा लगने वाली वस्तु नहीं। हर रंग की तरंग लहरी लंबाई अलग होती है और वह मन तथा शरीर पर अलग प्रकार का प्रभाव डालती है। पारंपरिक मत के अनुसार यदि किसी रंग की ऊर्जा जीवन में कम हो जाए, तो उस रंग के प्रभाव को भोजन या बाहरी स्पर्श से बढ़ाकर संतुलन किया जा सकता है।
प्राकृतिक रंगों का हल्का चूर्ण जब शरीर पर गिरता है, तो उसके कण त्वचा से संपर्क बनाते हैं। इसके साथ साथ हँसी, आनंद और मित्रों की निकटता मन पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। शरीर और मन दोनों की ऊर्जा में वृद्धि महसूस होती है।
आज बाज़ार में मिलने वाले अधिकतर रंग प्राकृतिक नहीं बल्कि कृत्रिम रासायनिक पदार्थों से बने होते हैं। भले ही वे चमकीले और सस्ते हों, पर उनके साथ कई प्रकार की संभावित हानियाँ जुड़ी होती हैं।
इन रंगों में कभी कभी ऐसे तत्व मिल जाते हैं जो
त्वचा पर दाने और खुजली पैदा कर सकते हैं,
आँखों में जलन और लालिमा दे सकते हैं,
श्वास मार्ग में जाकर दम घुटने, खाँसी और एलर्जी जैसी स्थिति बना सकते हैं।
कुछ रंगों में भारी धातुओं या अत्यधिक कठोर रसायनों के उपयोग की संभावना भी रहती है। उनका बार बार और अधिक मात्रा में संपर्क त्वचा और बालों के लिए बहुत हानिकारक हो सकता है। बालों की जड़ों तक रंग पहुँच जाए तो बाल झड़ना, रूखापन और सिर की त्वचा में दर्द जैसा अनुभव भी संभव है।
सबसे बड़ी बात यह है कि कृत्रिम रंगों का कुछ हिस्सा नालियों और जलस्रोतों में घुलकर पर्यावरण के लिए भी चुनौती बन जाता है।
होली का आनंद लेते हुए शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है। कुछ सरल उपाय अपनाए जाएँ तो कृत्रिम रंगों की हानि काफी हद तक कम की जा सकती है।
होली खेलने से पहले खुले अंगों पर घनी क्रीम, तैलीय लेप या नारियल तेल लगाना लाभकारी माना जाता है। इससे त्वचा पर एक रक्षक परत बन जाती है और रंग सीधे त्वचा के भीतर तक नहीं घुस पाते। सूखने के बाद रंग साफ करना भी सरल हो जाता है।
होठों पर हल्का लेप, जैसे वसायुक्त मरहम, लगाने से रंगों के सीधे प्रभाव से बचाव होता है। आँखों के आसपास भी हल्की तैलीय परत नमी बनाए रखती है और त्वचा को सहज रखती है।
होली से पहले बालों और सिर की त्वचा पर सरसों, नारियल या किसी भी स्नेहयुक्त तेल का मसाज करना अत्यंत उपयोगी होता है। कुछ लोग इसमें थोड़ी नींबू की बूँदें मिलाकर लगाते हैं ताकि सिर की त्वचा पर पहले से मौजूद रूसी या सूक्ष्म जीवों की सक्रियता थोड़ी कम हो जाए।
तेल की परत बालों पर एक ढाल का काम करती है। इससे रंग बालों की गहराई तक कम पहुँच पाते हैं और बाद में अच्छी तरह धुलने पर बाल अपनी कोमलता काफी हद तक बनाए रखते हैं। लंबे बालों वाले लोग चोटी या जूड़ा बनाकर उन्हें और सुरक्षित रख सकते हैं।
होली खेलते समय आँखों की विशेष सुरक्षा आवश्यक है। आँखों में रंग चला जाए तो जलन, धुंधलापन और एलर्जी हो सकती है। इसीलिए बहुत से वैद्य और चिकित्सक आँखों पर चश्मा या साधारण चष्मा पहनने की सलाह देते हैं, विशेषकर तब जब आसपास पानी की धार या गुब्बारों का उपयोग हो रहा हो।
आँखों में किसी प्रकार की समस्या हो, लेंस का प्रयोग हो या एलर्जी की प्रवृत्ति हो, तो ऐसे लोगों के लिए रंगों से दूरी रखना या बहुत सीमित संपर्क रखना अधिक उचित होता है।
होली के लिए ऐसे वस्त्र चुनना बेहतर है जो शरीर को अधिकतम ढक सकें। पूरी बाँहों वाली, सूती और थोड़ी गाढ़े रंग की पोशाक अधिक उपयुक्त रहती है। सूती कपड़ा त्वचा को सांस लेने देता है और भीगने पर भी शरीर पर बहुत भारी नहीं लगता। अत्यधिक चिपकने वाले या बहुत मोटे कपड़ों के बजाय हल्के और ढीले वस्त्र अधिक सहज अनुभव देते हैं।
रंगों की होली खेलने से पहले और उसके दौरान पर्याप्त जल पीना भी एक महत्त्वपूर्ण सावधानी है। शरीर में पानी की उचित मात्रा रहने से त्वचा की नमी बनी रहती है, थकान कम महसूस होती है और रंगों तथा धूप के संयुक्त प्रभाव से शरीर जल्दी अशक्त नहीं होता। खेलते समय बीच बीच में थोड़ी मात्रा में जल ले लेने से सिर दर्द, चक्कर और अत्यधिक थकान जैसी समस्याओं से बचाव होता है।
यदि व्यक्ति सचेत होकर वनस्पतियों, फूलों और अनाजों से बने हल्के रंग अपनाए, तो होली का अनुभव शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए बहुत अधिक उत्तम बन सकता है। भले ही ऐसे रंग बाज़ार के कठोर रंगों की तुलना में थोड़े महँगे या कम चमकीले लगें, पर दीर्घकाल में वे त्वचा, बाल और प्रकृति के लिए कहीं अधिक हितकारी होते हैं।
प्राकृतिक रंगों की माँग बढ़ेगी तो समय के साथ उनकी उपलब्धता और मूल्य दोनों संतुलित हो जाएँगे। घर पर भी हल्दी, चंदन, फूलों और आटे से सरल रंग तैयार किए जा सकते हैं। यह प्रक्रिया परिवार को होली के सांस्कृतिक और स्वास्थ्य पक्ष से जोड़ती है और अगली पीढ़ी तक सही परंपरा पहुँचा सकती है।
जब होली के धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक पक्ष को एक साथ देखा जाता है तो यह स्पष्ट होता है कि इस उत्सव का उद्देश्य केवल धूल और पानी में भीग जाना नहीं बल्कि शरीर और मन दोनों के लिए एक संतुलित शुद्धि का अवसर देना भी है।
होलिका दहन संकेत देता है कि पुराने, सूखे और अनुपयोगी बोझ को अब जला देना चाहिए। प्राकृतिक रंगों और मधुर गीतों के साथ मनाया जाने वाला अगला दिन यह बताता है कि जीवन को नए उत्साह, नए संबंध और नए दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाना चाहिए। यदि थोड़ी सावधानी और सजगता के साथ होली मनाई जाए, तो यह त्योहार केवल रंग नहीं बल्कि स्वास्थ्य, समरसता और आंतरिक संतुलन के रंग भी हमारे जीवन में भर सकता है।
होली के समय शरीर में सुस्ती क्यों बढ़ जाती है
शीत ऋतु से वसंत और आगे ग्रीष्म की ओर जाते समय तापमान और वातावरण की आर्द्रता में परिवर्तन होता है। इस बदलाव के कारण शरीर को नए संतुलन की आवश्यकता होती है, जिससे कुछ दिनों के लिए थकान और आलस्य स्वाभाविक रूप से बढ़ सकते हैं। गीत, नृत्य और खेलकूद इस सुस्ती को कम करने में सहायक होते हैं।
होलिका दहन को स्वास्थ्य के लिए कैसे उपयोगी माना जाता है
होलिका दहन के अलाव से आसपास की हवा थोड़ी गरम हो जाती है और कई प्रकार के सामान्य कीटाणुओं की सक्रियता कम मानी जाती है। अग्नि के निकट जाने से शरीर को हल्की ऊष्मा मिलती है, जिससे रक्त प्रवाह तेज होता है और मौसम परिवर्तन के समय शरीर थोड़ी सजगता महसूस करता है।
प्राकृतिक रंगों के उपयोग का मुख्य लाभ क्या है
प्राकृतिक रंग सामान्यतः पेड़ पौधों, फूलों और औषधीय वनस्पतियों से बनते हैं, जो त्वचा पर कठोर रसायनों की तुलना में अधिक कोमल प्रभाव डालते हैं। ऐसे रंग अक्सर त्वचा की सफाई, हल्के पोषण और सुगंध के माध्यम से आनंद का अनुभव कराते हैं, जबकि कृत्रिम रंगों के दुष्प्रभाव की संभावना अधिक रहती है।
कृत्रिम रंगों से बचने के लिए किन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए
बहुत तेज, चुभने वाला रंग, तीखी गंध, अत्यधिक चमकदार या चिकना पाउडर अक्सर कृत्रिम तत्वों की ओर संकेत कर सकता है। ऐसे रंगों से दूरी रखना, केवल विश्वसनीय स्रोतों से रंग लेना और संभव हो तो घर पर साधारण प्राकृतिक रंग तैयार करना अधिक सुरक्षित विकल्प होता है।
होली से पहले और बाद में त्वचा और बालों की देखभाल कैसे करें
होली से पहले त्वचा पर तैलीय लेप और बालों में तेल लगाने से रंग कम चिपकता है। होली के बाद गुनगुने जल से स्नान, हल्के साबुन या बेसन के लेप से शरीर की सफाई और बालों पर कोमल शैम्पू का प्रयोग कर रंगों को धीरे धीरे हटाना उचित होता है। अधिक रगड़ने से त्वचा को हानि पहुँच सकती है, इसलिए धैर्य और कोमलता दोनों आवश्यक हैं।
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