By पं. नीलेश शर्मा
मेष संक्रांति सूर्य के मेष राशि प्रवेश और नए आरंभों के लिए शुभ अवसर है

हिंदू परंपरा में मेष संक्रांति को सौर नववर्ष का शुभ आरंभ माना जाता है। इस दिन सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करता है और सौर वर्ष की शुरुआत का संकेत देता है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह वह क्षण है जब सूर्य अग्नि तत्व वाली मेष में प्रवेश करके नई ऊर्जा, साहस और आरंभ का भाव जागृत करता है।
मेष संक्रांति सामान्यतः अप्रैल के मध्य के आसपास आती है। यदि संक्रांति सूर्यास्त से पहले होती है, तो उसी दिन को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, अन्यथा कई क्षेत्रों में अगले दिन पर्व मनाया जाता है। इस दिन को देश के विभिन्न भागों में अलग अलग नामों से नववर्ष या विशिष्ट त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।
मेष संक्रांति सौर गणना पर आधारित पर्व है। जब सूर्य का गोचर मीन से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है, वही समय मेष संक्रांति कहलाता है।
इस संक्रांति के संदर्भ में कुछ प्रमुख बिंदु इस सारणी से समझे जा सकते हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| आधार | सौर वर्ष का प्रारंभ, सूर्य का मीन से मेष में प्रवेश |
| संक्रांति की संख्या | वर्ष में कुल 12 संक्रांतियों में पहली मानी जाती है |
| पुण्यकाल | संक्रांति समय से पूर्व और बाद के लगभग दस घटिका अत्यंत शुभ माने जाते हैं |
| मुख्य देवता | सूर्य देव, साथ में क्षेत्र अनुसार शिव, विष्णु, हनुमान और देवी की पूजा |
| मुख्य भाव | नया वर्ष, नई ऊर्जा, दान, स्नान, जप, सत्स्वभाव और सेवा |
इस अवधि में किए गए स्नान, जप, होम, दान और देव पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि संक्रांति के पुण्यकाल में किया गया सेवा भाव और दान पूरे वर्ष के लिए शुभ फल देने वाला होता है।
मेष संक्रांति को हिंदू सौर नववर्ष के रूप में देखा जाता है, चाहे क्षेत्रीय नववर्ष चंद्र गणना से मनाया जाए या सौर से। इस दिन कई लोग नदियों में स्नान करते हैं, तीर्थों की यात्रा करते हैं और सूर्य देव के साथ अपने इष्टदेव की पूजा करते हैं।
इस दिन को अक्सर वैशाख संक्रांति या वैशाख संक्रांति पर्व भी कहा जाता है। बिहार के कुछ हिस्सों में इसे सतुआन के रूप में मनाया जाता है, जहां लोग पवित्र स्नान करके सत्तू और गुड़ का सेवन करते हैं, सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं और नए चक्र के लिए स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
मेष संक्रांति से जुड़े मुख्य आध्यात्मिक संकेत इस प्रकार समझे जा सकते हैं।
भारत के विभिन्न प्रांत मेष संक्रांति के आसपास अपने अपने नववर्ष या विशेष पर्व मनाते हैं। नाम भिन्न हैं, पर मूल भाव नये वर्ष, नई फसल और नये चक्र के आरंभ का ही है।
नीचे दी गई सारणी इस विविधता को सरल रूप में दिखाती है।
| क्षेत्र | पर्व का नाम | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| ओड़िशा | पना संक्रांति | नये वर्ष का दिन, ठंडी मीठी पना पेय से शुभकामना, दंड नाचा आदि |
| तमिलनाडु | पुथांडु | तमिल नववर्ष, घर की दहलीज सजाना, विशेष पूजन और पारिवारिक भोज |
| पश्चिम बंगाल | पोइला बैशाख | सौर नववर्ष, अगले दिन बैसाख संक्रांत के बाद, मेले, लोकगीत और व्यापारियों की हाला खाता पूजा |
| पंजाब | वैसाखी | वैशाखी पर्व, खेतों की फसल, मेले, भांगड़ा और गिद्धा |
| असम | बोहाग बिहू | असमिया नववर्ष, कृषि चक्र का नया आरंभ, नृत्य और गीतों के साथ उत्सव |
| केरल | विषु | प्रकाश और समृद्धि का पर्व, विषुक्कणी और विषु कैनीत्तम की परंपरा |
| उत्तराखंड | बिखोती पर्व | विशुवत संक्रांति, नदी स्नान, प्रतीकात्मक पत्थर को दैत्यों के रूप में मारने की परंपरा |
इन पर्वों के माध्यम से मेष संक्रांति पूरे भारत में सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक एकता का सुंदर संगम बन जाती है।
ओड़िशा में मेष संक्रांति को पना संक्रांति के रूप में नववर्ष की तरह मनाया जाता है। यहां पना नामक ठंडा पेय इस दिन का मुख्य प्रसाद माना जाता है। यह पेय सामान्यतः मिश्री, जल या बेल के शरबत के साथ तैयार किया जाता है।
लोग एक छोटे पात्र में पना भरकर घर के प्रवेश द्वार या तुलसी चौरा पर रखते हैं और उसे सूर्य देव और भगवान विष्णु को समर्पित करते हैं। कई स्थानों पर लोग कुलथ आटा, केले और दही का सेवन करते हैं।
ओड़िशा में इसी समय डंडा नाचा या डंडा नाट जैसी लोक परंपराएं भी प्रचलित हैं, जो नृत्य, अनुशासन और भक्ति का अद्भुत मिश्रण हैं। ये अनुष्ठान नववर्ष में शारीरिक सामर्थ्य, मानसिक अनुशासन और धार्मिक श्रद्धा को सुदृढ़ करने वाले माने जाते हैं।
केरल में मेष संक्रांति को विषु कहा जाता है। यह प्रकाश, समृद्धि और नये वर्ष की शुभ दृष्टि का पर्व है। विषु का केंद्र बिंदु होता है विषुक्कणी, जिसे सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले देखने का संकल्प लिया जाता है।
विषुक्कणी में सामान्यतः कुछ शुभ वस्तुएं सजाई जाती हैं, जैसे
विश्वास है कि वर्ष के पहले दर्शन में यदि समृद्धि और प्रकाश के ऐसे प्रतीक दिखें, तो पूरा वर्ष उसी भाव से व्यतीत हो। विषु पर नए वस्त्र पहनना, आतिशबाजी, विशेष विषु साद्या भोज और विषु कैनीत्तम के रूप में बड़ों द्वारा छोटों को उपहार देना भी प्रचलित है।
असम में मेष संक्रांति के आसपास बोहाग बिहू के रूप में नववर्ष मनाया जाता है। यह महीना वैशाख या बोहाग कहलाता है। बोहाग बिहू मुख्यतः रंगाली बिहू के नाम से भी जाना जाता है जो आनंद, नृत्य और उत्सव का पर्व है।
असम में परंपरा है कि
बोहाग बिहू, कोंगाली बिहू और भोगाली बिहू असम की कृषि आधारित जीवनशैली के तीन अलग अलग चरणों का उत्सवपूर्ण प्रतीक हैं।
पंजाब में मेष संक्रांति के आसपास वैसाखी का पर्व मनाया जाता है। यह रबी की फसल कटाई के समय आने वाला उत्सव है। खेतों में सुनहरी फसल के बीच किसानों का हर्ष और कृतज्ञता इस पर्व का मूल भाव है।
इस दिन
सिख परंपरा में वैसाखी का एक ऐतिहासिक संदर्भ भी जुड़ा है, पर मेष संक्रांति के परिप्रेक्ष्य में इसे नए कृषि वर्ष की शुरुआत और कृतज्ञता के पर्व के रूप में भी समझा जाता है।
तमिलनाडु में सौर नववर्ष को पुथांडु कहा जाता है। यह दिन परिवार के साथ नए पंचांग का शुभ दर्शन, घर के प्रवेश द्वार पर कोलम, देव पूजा और विशेष भोजन से जुड़ा होता है।
पश्चिम बंगाल में सौर नववर्ष को पोइला बैशाख या नवो वर्ष कहा जाता है। यह दिन प्रायः मेष संक्रांति के अगले दिन मनाया जाता है। व्यापारी समुदाय इस दिन नए हिशाब किताब की पुस्तकें आरंभ करता है और हाला खाता पूजा करता है। मेले, लोकसंगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस दिन का विशेष आकर्षण होते हैं।
मेष संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा मुख्य रहती है। साथ ही क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार शिव, विष्णु, हनुमान और मां काली की उपासना भी शुभ मानी जाती है।
इस दिन प्रचलित मुख्य अनुष्ठान इस सारणी में देखे जा सकते हैं।
| अनुष्ठान | विवरण |
|---|---|
| पवित्र स्नान | गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी पवित्र नदियों या स्थानीय जलाशय में स्नान |
| सूर्य उपासना | सूर्य को जल अर्पण, आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्य मंत्रों का जप |
| देवपूजन | शिव, विष्णु, हनुमान, देवी की विधिवत पूजा, धूप दीप और नैवेद्य |
| विशेष पेय | कई क्षेत्रों में ठंडा पेय पना या अन्य शीतल पेय बनाकर प्रसाद रूप में ग्रहण |
| दान और सेवा | गरीबों, ब्राह्मणों, पशुओं और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, धन या वस्तु दान |
| सात्त्विक आहार | ताजा, स्वच्छ, शाकाहारी और सात्त्विक भोजन का सेवन, तामसिक वस्तुओं से परहेज |
पूरे दिन को यथासंभव पुण्यकाल के अनुरूप बिताने का प्रयास किया जाता है, जिससे वर्ष की शुरुआत शुद्धता, संयम और श्रद्धा के साथ हो।
मेष संक्रांति साधक को यह स्मरण कराती है कि
इस प्रकार मेष संक्रांति केवल कैलेंडर के बदलाव का दिन नहीं बल्कि नई शुरुआत, आत्मशुद्धि और सकारात्मक संकल्प का आध्यात्मिक उत्सव बनकर उभरती है।
सामान्य प्रश्न
मेष संक्रांति को सौर नववर्ष क्यों माना जाता है?
मेष संक्रांति उस समय होती है जब सूर्य मीन से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है। ज्योतिष में मेष राशि से सौर वर्ष की शुरुआत मानी जाती है, इसलिए यह दिन सौर नववर्ष का सूचक है।
इस दिन स्नान और दान को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?
संक्रांति के पुण्यकाल में किया गया स्नान और दान पाप क्षय और पुण्य वृद्धि का साधन माना जाता है। इसके माध्यम से साधक नया वर्ष शुद्ध मन, हल्के कर्मफल और सेवा भावना के साथ आरंभ कर सकता है।
क्या मेष संक्रांति पर ही सभी क्षेत्रों में नववर्ष मनाया जाता है?
कई क्षेत्रों में नववर्ष चंद्र मास के अनुसार होता है, पर सौर नववर्ष का संकेत मेष संक्रांति ही देती है। कुछ प्रदेश, जैसे ओड़िशा, तमिलनाडु, केरल और असम, इसी के आसपास अपने नववर्ष पर्व मनाते हैं।
पना संक्रांति, विषु और बोहाग बिहू का मेष संक्रांति से क्या संबंध है?
ये सभी पर्व मेष संक्रांति या उसके आसपास के दिनों में मनाए जाते हैं और सौर या कृषि नववर्ष के रूप में माने जाते हैं। नाम और रीति रिवाज भिन्न होने के बावजूद मूल भाव नया आरंभ और कृतज्ञता ही है।
मेष संक्रांति के दिन किस तरह का भोजन और जीवन शैली अपनानी चाहिए?
इस दिन ताजा, सात्त्विक, शाकाहारी भोजन लेना, नशा और तामसिक वस्तुओं से दूर रहना, क्रोध और कटु वाणी से बचना और यथासंभव जप, ध्यान और सेवा में समय बिताना शुभ माना जाता है।
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