By पं. सुव्रत शर्मा
मोहिनी एकादशी व्रत से पाप निवारण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त होती है

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी भगवान विष्णु को विशेष रूप से समर्पित मानी जाती है और इसे मोह, पाप तथा दुखों के नाश का अत्यंत प्रभावी साधन बताया गया है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह समय मन की शुद्धि, चित्त की स्थिरता और जीवन के उलझे हुए कर्मों को सुलझाने के लिए शुभ माना जाता है। जो साधक विधि सहित मोहिनी एकादशी व्रत का पालन करता है, उसे पाप क्षय, दुखों से राहत और मोहजाल से मुक्ति की प्राप्ति का महत्व बताया गया है।
धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल एकादशी को ही मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह व्रत सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि तक की अवधि में रखा जाता है और विष्णु आराधना के लिए अत्यंत उत्तम माना जाता है।
मोहिनी एकादशी से जुड़े मुख्य बिंदु संक्षेप में इस प्रकार समझे जा सकते हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| तिथि | वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी |
| आराध्य | भगवान विष्णु |
| मुख्य फल | पापों का क्षय, दुखों से मुक्ति, मोहजाल से छुटकारा |
| पूजन भाव | नाम स्मरण, व्रत, कथा श्रवण और भगवान के प्रति समर्पण |
| विशेष महिमा | सुनने या पढ़ने से भी पुण्य, कथा श्रवण से गोदान के समान फल का वर्णन |
वैष्णव परंपरा में इस दिन प्रातः स्नान, स्वच्छ वस्त्र, विष्णु नाम जप और व्रत का संकल्प लेकर दिन को संयम, सजगता और भक्ति के साथ बिताना शुभ माना जाता है।
एक प्रसंग में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, उसकी कथा क्या है और उस व्रत की विधि क्या मानी गई है। उन्होंने विनम्र भाव से कहा कि इस एकादशी के संबंध में विस्तार से बताने की कृपा करें, ताकि लोग उसका सही अर्थ समझ सकें।
भगवान कृष्ण ने उत्तर देते हुए कहा कि यह कथा वही है जो महर्षि वशिष्ठ ने पूर्वकाल में श्रीराम को सुनाई थी। ऐसे प्रसंगों में भी देखा जा सकता है कि व्रत की महिमा केवल साधारण लोक के लिए ही नहीं बल्कि राजाओं और अवतारों के लिए भी मार्गदर्शक के रूप में रखी गई है।
एक समय भगवान श्रीराम ने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ से विनम्रतापूर्वक कहा कि वे ऐसा कोई व्रत बताएं जिससे समस्त पाप और दुखों का नाश हो जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सीताजी के वियोग में उन्हें अत्यंत दुःख सहने पड़े हैं, इसलिए वे ऐसा साधन जानना चाहते हैं जो चित्त को पवित्र और हल्का कर सके।
महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम की बात सुनकर कहा कि यह प्रश्न बहुत उत्तम है। उन्होंने श्रीराम की शुद्ध बुद्धि और पवित्रता की प्रशंसा करते हुए कहा कि आपका नाम मात्र स्मरण करने से भी मनुष्य शुद्ध हो जाता है, फिर भी लोक कल्याण के लिए इस विषय को समझना आवश्यक है। वशिष्ठ जी ने बताया कि वैशाख शुक्ल एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य पापों और दुखों से मुक्त होकर मोहजाल से छूट सकता है। तब उन्होंने मोहिनी एकादशी की कथा सुनाने की भूमिका बनाई और कहा कि ध्यानपूर्वक सुनो।
महर्षि वशिष्ठ द्वारा सुनाई गई कथा के अनुसार, कभी सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक सुंदर नगरी बसती थी। उस नगरी में चंद्रवंशी राजा द्युतिमान राज्य करते थे। इनके शासन में प्रजा सुखी और नगर समृद्ध था। उसी नगर में धनपाल नाम का एक वैश्य भी रहता था जो अत्यंत धार्मिक, पुण्यवान और विष्णु भक्त था।
धनपाल ने अपने धन का सदुपयोग करते हुए नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएं, सरोवर और धर्मशालाएं बनवाए थे। यात्रियों के लिए जल, भोजन और विश्राम की व्यवस्था की। सड़कों पर आम, जामुन, नीम आदि के वृक्ष लगवाकर लोगों के लिए छाया और फल की व्यवस्था भी कराई। इस प्रकार वह केवल धनवान ही नहीं बल्कि सेवा और दान से भी समृद्ध माना जाता था।
धनपाल के पांच पुत्र थे। उनके नाम थे सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि। नाम के अनुसार पहले चार पुत्र सद्गुणों से युक्त थे, पर पाँचवां पुत्र धृष्टबुद्धि अपने नाम की तरह ही विपरीत स्वभाव वाला था।
धृष्टबुद्धि महापापी और दुराचार में लिप्त था। वह पितरों आदि का सम्मान नहीं करता था, न किसी धार्मिक कर्तव्य का पालन। वह वेश्याओं और दुराचारी साथियों की संगति में रहता, जुआ खेलता, परस्त्री के साथ भोग विलास में पड़ता और मद्य तथा मांस का सेवन करता। इस प्रकार वह अपने पिता के परिश्रम से अर्जित धन को नष्ट करता रहता था। धनपाल, जो स्वयं धर्मशील और उदार थे, अपने पुत्र की इस दिशा से बहुत दुखी हुए।
जब स्थिति असहनीय हो गई तो धनपाल ने अंततः धृष्टबुद्धि को घर से निकाल दिया। घर से बाहर आने के बाद धृष्टबुद्धि ने अपने गहने और कपड़े बेचकर कुछ समय तक जीवनयापन किया। धन समाप्त होने पर, जब साधन साथ छोड़ने लगे तब उसके तथाकथित मित्र, वेश्याएं और दुराचारी साथी भी उससे दूर हो गए।
अब वह भूख प्यास से अत्यंत पीड़ित रहने लगा। कोई सहारा न दिखने पर उसने चोरी की राह पकड़ी। एक बार चोरी करते हुए पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर उसे केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। किंतु दूसरी बार चोरी में पकड़ में आने पर राजा द्युतिमान के आदेश से उसे कारागार में डाल दिया गया, जहां उसे बहुत यातनाएं सहनी पड़ीं। कई दिनों की सजा के बाद जब उसे जेल से बाहर निकाला गया तो राजा ने उसे नगरी से निकल जाने का भी आदेश दे दिया।
नगर से निष्कासित होकर धृष्टबुद्धि वन में चला गया। वहां उसने जंगली पशु पक्षियों को मारकर अपना पेट भरना शुरू किया। धीरे धीरे वह हिंसा में और गहरा उतरता गया और अंततः बहेलिया बन गया। धनुष बाण लेकर वह पशु पक्षियों को मार मारकर खाने लगा। इस प्रकार उसका जीवन पाप, हिंसा और अज्ञान से भरा हुआ चलता रहा।
फिर भी भीतर कहीं न कहीं कर्मों का परिणाम उसे बेचैन कर रहा था। भूख और प्यास तो दिखाई देते थे, पर मन की थकान और जीवन की निरर्थकता भी उसे भीतर से कमज़ोर कर रही थी।
एक दिन अत्यंत भूखा प्यासा होकर वह भोजन की तलाश में भटकते हुए कौडिन्य ऋषि के आश्रम के समीप पहुंचा। उस समय वैशाख मास चल रहा था और ऋषि स्नान करके गंगा से वापस आ रहे थे। उनके भीगे हुए वस्त्रों के छींटे धृष्टबुद्धि के शरीर पर पड़े। मान्यता है कि सत्संग और संत का स्पर्श मन में परिवर्तन की भूमिका बनाता है। उसी क्षण उसके भीतर थोड़ी सद्बुद्धि जाग्रत हुई।
वह कौडिन्य मुनि के पास गया, हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और दीन स्वर में बोला कि हे मुने, जीवन में असंख्य पाप किए हैं, अनेक प्रकार के पाप कर्मों में लिप्त रहा हूँ। अब इन पापों से मुक्ति का कोई ऐसा उपाय बताइए जिसमें धन खर्च न हो, जो साधारण मनुष्य भी कर सके। उसके विनम्र और पीड़ित वचन सुनकर कौडिन्य मुनि प्रसन्न हुए और उस पर करुणा की दृष्टि डाली।
कौडिन्य मुनि ने उसे उपदेश दिया कि वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी नामक एकादशी का व्रत करो। उन्होंने कहा कि इस एकादशी का व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में निर्मलता आने लगती है। यह व्रत मोहजाल से मुक्त करने वाला और दुखों को हरने वाला माना गया है।
मुनि के वचन सुनकर धृष्टबुद्धि अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने उनके बताए हुए नियमों के अनुसार मोहिनी एकादशी का व्रत किया। उपवास, संयम, नाम स्मरण और प्रार्थना के सहारे उसने पूरे भाव से इस तिथि को साधना में लगा दिया। व्रत समाप्त होने पर उसके भीतर एक नई शांति और हल्कापन अनुभव किया गया।
महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि हे राम, मोहिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से धृष्टबुद्धि के सभी पाप नष्ट हो गए। पूर्वकृत हिंसा, व्यसन और अपमानजनक जीवन का बोझ उससे उतर गया। अंततः उस आत्मा को गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक जाने की प्राप्ति हुई।
इस प्रकार यह व्रत केवल एक दिन का संयम न रहकर संपूर्ण जीवन की दिशा बदलने वाला साधन सिद्ध हुआ। वशिष्ठ जी ने कहा कि इस व्रत से मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं और संसार में इससे श्रेष्ठ व्रत दूसरा नहीं है। इस व्रत की महिमा को जो श्रवण या पाठ करता है, उसे भी एक हजार गौदान के समान फल की प्राप्ति का वर्णन मिलता है।
मोहिनी एकादशी की कथा साधक को कई स्तरों पर जागरूक करती है। यह कथा बताती है कि
मोहिनी एकादशी इस बात की याद दिलाती है कि कोई भी मनुष्य इतना नहीं गिरता कि वह वापस उठ न सके। एक सच्ची तलाश, एक सच्चा प्रश्न और एक सच्चा व्रत, कर्मों के बोझ को हल्का करने की शुरुआत बन सकता है।
सामान्य प्रश्न
मोहिनी एकादशी किस तिथि को मानी जाती है और इसका मुख्य फल क्या बताया गया है?
मोहिनी एकादशी वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मानी जाती है। इसका मुख्य फल पापों के क्षय, दुखों से मुक्ति और मोहजाल से छुटकारे के रूप में बताया गया है।
धृष्टबुद्धि की कथा मोहिनी एकादशी से कैसे जुड़ती है?
धृष्टबुद्धि नामक वैश्य पुत्र अनेक पाप कर्म, व्यसन और हिंसा में डूब गया था। कौडिन्य मुनि के उपदेश से उसने मोहिनी एकादशी का व्रत किया, जिससे उसके पाप नष्ट हुए और अंत में उसे विष्णुलोक की प्राप्ति हुई।
कौडिन्य ऋषि ने धृष्टबुद्धि को कौन सा उपाय बताया था?
धृष्टबुद्धि के पश्चाताप को देखकर कौडिन्य ऋषि ने उसे वैशाख शुक्ल की मोहिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। उन्होंने बताया कि इस एकादशी का व्रत समस्त पापों को नष्ट करने वाला है और साधारण मनुष्य के लिए भी सरल उपाय है।
मोहिनी एकादशी की महिमा सुनने या पढ़ने से क्या फल मिलता है?
धार्मिक वर्णन के अनुसार मोहिनी एकादशी की कथा को श्रद्धा से सुनने या पढ़ने वाले को भी बहुत बड़ा पुण्य मिलता है। इसका फल एक हजार गायों के दान के बराबर माना गया है।
श्रीराम और युधिष्ठिर के प्रश्न से क्या संदेश मिलता है?
श्रीराम ने अपने दुख और पाप विमोचन के उपाय के लिए और युधिष्ठिर ने व्रत की विधि और कथा जानने के लिए प्रश्न किए। इससे यह संदेश मिलता है कि चाहे स्थिति कितनी भी ऊंची क्यों न हो, धर्म और व्रत के मार्ग को समझने के लिए सदैव विनम्र प्रश्न करना ही सच्चे ज्ञान की शुरुआत है।
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