By पं. अभिषेक शर्मा
जैन धर्म में नवपद ओली के दौरान आयंबिल तप और नौ पवित्र पदों की पूजा का महत्व

जैन परंपरा में नवपद ओली ऐसा विशेष अवसर माना जाता है, जब साधक नौ दिव्य पदों की आराधना के माध्यम से अपनी आत्मा को तप, संयम और भक्ति से तृप्त करने का प्रयास करता है। यह पर्व वर्ष में दो बार आता है और हर बार नौ दिनों तक चलने वाली गहन साधना का रूप लेता है। इन नौ दिनों के दौरान श्रद्धालु आयंबिल तप करते हैं और नवपद को प्रणाम करके अपने भीतर गुणों के जागरण का संकल्प लेते हैं।
जैन पंचांग के अनुसार प्रथम नवपद ओली आश्विन शुक्ल पक्ष में और दूसरी नवपद ओली चैत्र शुक्ल पक्ष में आती है। सामान्य रूप से आश्विन मास वाली ओली सितंबर या अक्तूबर के बीच तथा चैत्र मास वाली ओली मार्च या अप्रैल के बीच पड़ती है। दोनों ही अवसर शुक्ल सप्तमी से लेकर पूर्णिमा तक चलते हैं। विशेष बात यह भी है कि चैत्र मास की नवपद ओली प्रायः नवरात्रि के समय के आसपास ही आरंभ होती है, जिससे साधना और उत्सव का वातावरण मिलकर और अधिक पावन हो जाता है।
नवपद ओली को जैन परंपरा में शाश्वत अठाई की श्रेणी में रखा गया है। कुल पांच शाश्वत अठाई मानी जाती हैं, जिनमें दो नवपद ओली हैं और शेष तीन चातुर्मासिक अठाई के रूप में जानी जाती हैं। इस वर्गीकरण से स्पष्ट है कि नवपद ओली केवल किसी एक कालखंड तक सीमित नहीं बल्कि धर्म के शाश्वत स्वरूप का हिस्सा मानी जाती है।
नवपद ओली की तिथियां संक्षेप में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।
| काल | पक्ष और तिथि | मास |
|---|---|---|
| प्रथम नवपद ओली | शुक्ल सप्तमी से पूर्णिमा | आश्विन |
| द्वितीय नवपद ओली | शुक्ल सप्तमी से पूर्णिमा | चैत्र |
इन नौ दिनों के दौरान हर दिन नवपद के एक एक पद की विशेष आराधना की जाती है। साधक प्रातः कालीन प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और आयंबिल के माध्यम से शरीर और मन दोनों को साधना के लिए तैयार करते हैं।
नवपद को सिद्धचक्र भी कहा जाता है। यह एक विशेष यंत्र है जिसमें जैन दर्शन के नौ सर्वोच्च पदों की प्रतीकात्मक स्थापना की जाती है। इन नौ पदों के दो वर्ग बताए गए हैं। पहले पांच पद पंच परमेष्ठी कहलाते हैं और शेष चार पद धर्म तत्त्व के नाम से जाने जाते हैं। पंच परमेष्ठी वे हैं जिन्हें जैन धर्म में सर्वोच्च पूजनीय श्रेणी प्राप्त है, जबकि चार धर्म तत्त्व वे गुण हैं जिनका अभ्यास साधक को मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है।
नवपद के नौ पद इस प्रकार समझे जाते हैं।
| समूह | पद |
|---|---|
| पंच परमेष्ठी | अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु |
| धर्म तत्त्व | सम्यग दर्शन, सम्यग ज्ञान, सम्यग चरित्र, सम्यग तप |
इनमें से पहले पांच पद जीव के परमार्थिक उत्थान की स्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अरिहंत वे जिनकी घातिया कर्मों की क्षयोपशम अवस्था हो चुकी है। सिद्ध वे मुक्त आत्माएं जो कर्मबंधन से पूर्ण रूप से मुक्त हो चुकी हैं। आचार्य, उपाध्याय और साधु जैन संघ की अनुशासनात्मक और शिक्षात्मक व्यवस्था के स्तम्भ हैं। सम्यग दर्शन, सम्यग ज्ञान, सम्यग चरित्र और सम्यग तप साधक के भीतर विकसित होने वाले मूल गुण हैं, जिनसे आत्मा मोक्ष की ओर अग्रसर होती है।
नवपद ओली का प्रमुख अंग आयंबिल तप है। आयंबिल ऐसी तपस्या है जिसमें साधक दिन में केवल एक बार अत्यंत सरल और विरक्ति पूर्ण भोजन ग्रहण करता है। इस भोजन को उबला हुआ, बिना मसाले, बिना तेल, बिना घी, बिना दूध, बिना दही, बिना चीनी और बिना किसी स्वादवर्धक पदार्थ के तैयार किया जाता है। भोजन की मात्रा नियंत्रित होती है और इसे एक ही बैठक में लिया जाता है।
आम शब्दों में समझें तो आयंबिल में भोजन केवल साधन भर है, आनंद या स्वाद का विषय नहीं। जैन परंपरा के अनुसार आयंबिल के दौरान सब्जियां, फल, तेलीय पदार्थ, शक्कर और यहां तक कि नमक का भी त्याग किया जाता है। कंद मूल और जड़ें तो सामान्य रूप से ही त्याज्य मानी जाती हैं। यह तप मन और इंद्रियों को संयमित करने के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
नवपद ओली के नौ दिन लगातार आयंबिल करना साधारण बात नहीं, इसलिए इसे विशेष तपस्या की श्रेणी में रखा जाता है। जो साधक इस तप को श्रद्धा से निभाते हैं, वे अपने भीतर शुद्धता, धैर्य, विनम्रता और त्याग जैसे गुणों का अनुभव करते हैं।
नवपद ओली के महत्व को समझाने के लिए जैन परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा बताई जाती है, जो बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रत स्वामी के समय की मानी जाती है। कथानुसार उस युग में राजा श्रीपाल कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। उनकी पत्नी मयना सुंदरी अत्यंत धार्मिका और पतिव्रता थीं। वे अपने पति के साथ साथ लगभग सात सौ अन्य कुष्ठ रोगियों के साथ किसी उपाय की खोज में निकलीं।
कुछ समय बाद वे एक महान तपस्वी मुनि मुनिचंद्र के पास पहुंचीं। मयना सुंदरी ने विनम्रता से प्रार्थना की कि उनके पति और अन्य रोगियों के कष्टों को दूर करने का कोई साधन बताएँ। मुनिचंद्र ने उन्हें सिद्धचक्र महापूजा की विधि समझाई। इस पूजा के साथ विशेष प्रकार के नौ दिवसीय तप, जिसे ओली कहा जाता है, का भी विधान बताया।
मुनिचंद्र ने समझाया कि यदि राजा श्रीपाल, मयना सुंदरी और उनके साथ आए अन्य रोगी श्रद्धा के साथ नवपद की पूजा करेंगे, सिद्धचक्र की आराधना करेंगे और निर्धारित नौ दिनों तक ओली रूपी तप का पालन करेंगे, तो उनके पाप कर्म क्षीण होंगे और रोग से मुक्ति की संभावनाएं बढ़ेंगी। नवपद या सिद्धचक्र में स्थित नौ पदों की स्तुति और आराधना से आत्मा के भीतर छिपी शक्ति जागृत होगी।
कथा के अनुसार राजा श्रीपाल और मयना सुंदरी ने मुनिचंद्र की बताई विधि से सिद्धचक्र महापूजा की। उन्होंने और अन्य रोगियों ने भी नौ दिनों तक ओली का तप किया। परिणामस्वरूप धीरे धीरे रोगों में कमी आने लगी और कई रोगियों को उल्लेखनीय लाभ हुआ। राजा श्रीपाल का स्वास्थ्य भी पूर्व की तुलना में अत्यंत सुधर गया। इस अनुभव से नवपद ओली की महिमा और अधिक प्रसिद्ध हुई और आज तक यह परंपरा जैन समाज में श्रद्धा से निभाई जा रही है।
सिद्धचक्र एक यंत्र मात्र नहीं बल्कि साधक के मार्ग का मानचित्र है। इसमें पंच परमेष्ठी के रूप में पांच पूर्णता प्राप्त अवस्थाएं और धर्म तत्त्व के रूप में चार आंतरिक गुण स्थापित हैं। जैन दर्शन यह बताता है कि जब साधक सम्यक दृष्टि, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और सम्यक तप को अपनाता है, तभी वह पंच परमेष्ठी के पथ पर आगे बढ़ने योग्य बनता है।
धर्म तत्त्व के चार गुणों का संक्षिप्त अर्थ इस प्रकार समझें।
| तत्त्व | संक्षिप्त अर्थ |
|---|---|
| सम्यग दर्शन | सत्य को सही भाव से देखना और स्वीकार करना |
| सम्यग ज्ञान | तत्त्वों के सही ज्ञान की प्राप्ति |
| सम्यग चरित्र | आचरण में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह |
| सम्यग तप | बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार की तपस्या |
नवपद ओली में इन नौ पदों की प्रतिदिन पूजा करके साधक यह संकल्प करता है कि केवल बाहरी अनुशासन ही नहीं बल्कि भीतर के दृष्टिकोण, ज्ञान, चरित्र और तप को भी शुद्ध और सम्यक बनाना है।
हर साधक के लिए नौ दिन का पूर्ण आयंबिल करना संभव हो यह आवश्यक नहीं। इसलिए जैनाचार्यों ने कुछ विकल्प भी बताए हैं, ताकि सीमित क्षमता वाला व्यक्ति भी नवपद ओली की भावना से जुड़ सके।
जो साधक पूर्ण आयंबिल न कर सकें, वे इन बातों का पालन करने का प्रयास कर सकते हैं।
कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं।
| प्रयोग | अर्थ |
|---|---|
| मूल कंद से परहेज | नौ दिनों तक जड़ वाली सब्जियों का त्याग |
| चौवीहार का अभ्यास | जितने दिन संभव हो, शाम के बाद जल या भोजन न लेना |
| लोग्गस खमासण और नवकारवली | प्रार्थना, विनय और नमस्कार के स्तोत्रों का पाठ |
| सात्विक भोजन | तामसिक और अत्यधिक मसालेदार भोजन से दूरी |
| स्वाध्याय और जप | प्रतिदिन कुछ समय शास्त्र और मंत्र के लिए निर्धारित करना |
इस प्रकार नवपद ओली केवल कठोर तप का नाम नहीं बल्कि जीवन में संयम, साधना और आत्म चिंतन की निरंतर याद दिलाने वाला उत्सव बन जाता है।
जो साधक श्रद्धा के साथ नवपद ओली में सम्मिलित होते हैं, वे अनुभव करते हैं कि केवल शरीर नहीं बल्कि मन और भाव भी धीरे धीरे हल्के होते जाते हैं। स्वाद, भोग और सुविधा के प्रति आसक्ति कुछ कम होती है। कष्ट सहने की क्षमता बढ़ती है और मन में कृतज्ञता तथा विनम्रता का भाव प्रबल होता है।
नवपद की प्रतिदिन पूजा से साधक के भीतर परमेष्ठियों के प्रति गहरा आदर और धर्म तत्त्वों के प्रति सजगता बढ़ती है। धीरे धीरे यह समझ पनपती है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल सुख सुविधाओं का संग्रह नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धि और उत्थान है। इसी समझ के कारण नवपद ओली को जैन समाज में अत्यंत आदरणीय साधना माना गया है।
सामान्य प्रश्न
नवपद ओली को शाश्वत अठाई क्यों कहा जाता है?
नवपद ओली उन पांच अठाई में से है जिन्हें जैन परंपरा में शाश्वत यानी हर काल में रहने वाला माना गया है। इसका अर्थ यह है कि नवपद और सिद्धचक्र की साधना केवल किसी युग विशेष तक सीमित नहीं बल्कि भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में मान्य और फलदायी है।
आयंबिल तप इतना कठिन क्यों माना जाता है?
आयंबिल में स्वाद, मसाला, तेल, घी, दूध, दही, चीनी और कई प्रकार के पदार्थों का त्याग किया जाता है। दिन भर में केवल एक बार अत्यंत साधारण उबला भोजन लिया जाता है। इस प्रकार शरीर और रसना दोनों पर गहरा संयम रखना पड़ता है, इसलिए इसे कठिन तप की श्रेणी में रखा जाता है।
सिद्धचक्र महापूजा में नवपद की क्या भूमिका रहती है?
सिद्धचक्र महापूजा में यंत्र के केंद्र और अन्य स्थानों पर नवपद की प्रतीकात्मक स्थापना की जाती है। पूजा के दौरान साधक अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु तथा सम्यग दर्शन, ज्ञान, चरित्र और तप की स्तुति करता है। इससे वह अपने भीतर उन गुणों को जगाने का संकल्प करता है जिन्हें नवपद दर्शाता है।
जो व्यक्ति पूर्ण नौ दिन आयंबिल न कर सके, क्या वह भी नवपद ओली में भाग ले सकता है?
हाँ, ऐसे साधक मूल कंद का त्याग, चौवीहार, लोग्गस खमासण, नवकारवली और सात्विक भोजन जैसे विकल्प अपनाकर नवपद ओली से जुड़ सकते हैं। मुख्य बात यह है कि इन दिनों आत्म अनुशासन, अहिंसा, संयम और स्वाध्याय की भावना मजबूत हो।
नवपद ओली का संबंध मोक्ष मार्ग से कैसे समझा जाए?
नवपद में पंच परमेष्ठी और धर्म तत्त्व दोनों समाहित हैं। ये नव पद मिलकर उस मार्ग को दर्शाते हैं जिस पर चलकर आत्मा बंधन से मुक्त हो सकती है। जब साधक सम्यग दर्शन, ज्ञान, चरित्र और तप को अपनाता है और परमेष्ठी गुणों का आदर करता है, तो वह धीरे धीरे मोक्षमार्ग के योग्य बनता है। नवपद ओली इसी प्रक्रिया को सुदृढ़ करने वाली साधना है।
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