By अपर्णा पाटनी
चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी, पापमोचन और मोक्ष प्राप्ति का महत्व

हिंदू धर्म की परंपराओं में एकादशी तिथि का अत्यंत विशेष स्थान है। चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी सभी एकादशियों में प्रमुख मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत सभी प्रकार के पापों को पूर्णतः नष्ट कर देता है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति और व्रत से व्यक्ति को पूर्व जन्मों के संचित पापों से मुक्ति मिलती है। मन से किए कलुष, वचन से हुए अपराध और कर्म से उत्पन्न दोष सब समाप्त हो जाते हैं। यह व्रत न केवल पापहरण करता। बल्कि मोक्ष प्राप्ति का सरल मार्ग भी प्रदान करता है। भक्तगण इसे जीवन की शुद्धि के लिए सर्वोत्तम उपाय मानते हैं। प्राचीन काल से यह व्रत लाखों लोगों के उद्धार का कारण बना है। नियमित पालन से जीवन में स्थायी शांति आती है।
पापमोचनी एकादशी व्रत की विधि शास्त्रोक्त और सरल है। व्रतधारी को एकादशी से एक दिन पूर्व दशमी को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। एकादशी को ब्रह्म मुहूर्त में जागें। शुद्ध जल और गंगा जल से स्नान करें। स्वच्छ पीतांबर वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गोबर से लेपें। गंगाजल छिड़कें। भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र को मंडप में स्थापित करें। चरणामृत से अभिषेक करें। तुलसी पत्र चढ़ाएं। कमल पुष्प अर्पित करें। चंदन का तिलक लगाएं। धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाएं। विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का भावपूर्ण पाठ करें। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्यायों का श्रवण कराएं। व्रत काल में फल, दूध या जल ही लें। नमक त्यागें। रात्रि जागरण के दौरान भजन गाएं। कीर्तन करें। पापमोचनी एकादशी कथा सुनें। द्वादशी प्रभाते ब्राह्मण भोजन कराएं। अनाज, वस्त्र, छत्र, दर्पण दान करें। फलाहार से पारण करें। यह विधि पूर्ण करने से व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है। महिलाएं और पुरुष दोनों लाभान्वित होते हैं। बच्चों के लिए हल्का फलाहार अनुमत।
पापमोचनी एकादशी की यह कथा महर्षि लोमश द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई। कथा प्राचीन काल की है। चित्ररथ वन नामक यह वन अत्यंत वैभवशाली था। स्वर्ग के समान शोभायमान। असंख्य वृक्षों से युक्त। आम्र, पक्व फल लदे। वसंत ऋतु सदैव विद्यमान। कोयल कूकती। भ्रमर गुंजायमान। सरिताओं का मधुर स्वर। झरने चमकते। गंधर्व युवराजों के भवन सोने के। किन्नरियां वीणा बजातीं। देवताओं के विमान उतरते। वनदेवी निवास करती। इसी वन के एकांत प्रदेश में मेधावी ऋषि आए। वे महर्षि च्यवन के ज्येष्ठ पुत्र। जन्म से तपस्वी। ज्ञान प्राप्ति हेतु वनागमन किया। कंदमूल भक्षण। वर्षा ऋतु में भी ध्यान। सूर्योदय सूर्यास्त का जाप। तप से शरीर क्षीण किंतु तेजस्वी। वन प्राणी उनके प्रति समर्पित। हिरण उनके चरण चाटते। मोर नृत्य करते। यह तपस्या दस वर्ष चली। ब्रह्मांड प्रभावित हुआ। ऋषि की ख्याति दूर दूर फैली।
ऋषि की तपस्या की ख्याति स्वर्ग पहुंची। देवराज इंद्र अत्यंत चिंतित हुए। सोचा तपोबल से सिंहासन डगमगा सकता। उन्होंने तुरंत अप्सरा सभा बुलाई। मनोरंजन के नाम पर ऋषि विचलन का उपाय सोचा। सर्वश्रेष्ठ अप्सराओं का चयन। मंजुघोषा को प्रधान बनाया। वह अप्सराओं की रानी। रूप सौंदर्य अद्वितीय। केश लंबे काले। नेत्र मोहक। ओष्ठ लालिमान। अंग शिथिल चालुक। वाणी मधुर। संगीत विद्या में निपुण। इंद्र ने आज्ञा दी कि ऋषि को मोहित करो। मंजुघोषा सहचरी अप्सराओं संग वन गमन की। वे आकाश मार्ग से उतरीं। वन में प्रवेश। नदी स्नान। दिव्य वस्त्राभूषण धारण। फिर ऋषि आश्रम की ओर। रास्ते में फूल चुनतीं।
मंजुघोषा ने ऋषि के समीप सरिता तट पर आसन ग्रहण किया। मधुर संगीत गाया। वीणा बजाई। नृत्य आरंभ। घुंघरू की झंकार। ऋषि ने दृष्टि उठाई। मोहित हुए। ध्यान भंग। मंजुघोषा ने बातें प्रारंभ। स्वर्ग कथाएं सुनाई। हास्य किया। ऋषि मुस्कुराए। धीरे धीरे निकट आई। फल अर्पित किए। ऋषि ग्रहण किया। समय व्यतीत। दिन रात्रि संग विहार। वन सौंदर्य परिक्रमा। गीत गायन। वर्ष बीते। ऋषि तपस्या भूले। वासना जागृत। मंजुघोषा संतुष्ट। इंद्र प्रसन्न। ऋषि आश्रम अब प्रेमालय।
दीर्घ काल पश्चात मंजुघोषा बोली। स्वर्ग वापसी आवश्यक। इंद्र क्रोधित हो रहे। ऋषि होश में आए। देखा केश धूसर। शरीर दुर्बल। तप व्यर्थ। प्रलय क्रोध। गरजे उठे। श्राप दिया त्वं पिशाचिनी भव। मंजुघोषा तत्काल परिवर्तित। रूप विकराल। नख दांत तीक्ष्ण। ग्रीवा वक्र। स्वर भयावह। वन कंपित। जीव भगदड़। मंजुघोषा रोई। पिता इंद्र को स्मरण। ऋषि से विनय। दया मांगी। ऋषि शांत। पापमोचनी एकादशी व्रत विधान बताया।
मंजुघोषा ने व्रत ग्रहण किया। ब्रह्म मुहूर्त पूजा। विष्णु आराधना। जप ध्यान। रात्रि भजन। द्वादशी दान पारण। आकस्मिक चमत्कार। स्वरूप पूर्ववत। आनंद विह्वल। स्वर्ग प्रस्थान। इंद्र अभिभूत। कथा प्रसार।
मेधावी अपराध बोध से व्याकुल। पिता च्यवन ऋषि की खोज। हिमालय पार। गुफा पहुंचे। दंडवत। संपूर्ण कथा वर्णन। च्यवन क्रुद्ध। तप नाश। तथापि मार्गदर्शन। पापमोचनी एकादशी व्रत आज्ञा। मेधावी अनुष्ठान। पापक्षय। चित्ररथ वापस। तप पुनः। शिष्य प्राप्त।
व्रत से सर्व पाप नाश। असीम पुण्य। मोक्ष प्राप्ति। मनःशुद्धि। आत्मशांति। विष्णु कृपा। गृह सौख्य। आरोग्य। कथा साक्ष्य। योनि उन्नति। सौभाग्य वृद्धि।
यह व्रत भक्ति साधन। पाप मिट। पूजा शुद्धि। जागरण बल। दान पुण्य। नवजीवन। कथा प्रकाश। भक्त गण लाभ।
सामान्य प्रश्न
पापमोचनी एकादशी व्रत की पूर्ण विधि क्या है?
दशमी तिथि पर सात्विक भोजन ग्रहण करें। एकादशी ब्रह्म मुहूर्त में शुद्ध स्नान करें। पीतांबर वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल गोबर लेप और गंगाजल से शुद्ध करें। भगवान विष्णु मूर्ति स्थापित कर अभिषेक करें। तुलसी, फूल, चंदन, धूप दीप नैवेद्य अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम और भगवद्गीता पाठ करें। फल दूध जल फलाहार लें। रात्रि जागरण भजन कथा। द्वादशी ब्राह्मण भोजन दान वस्त्र अनाज। पारण करें। यह विधि शास्त्रोक्त है। पूर्ण पालन से महान फल।
चित्ररथ वन की क्या विशेषताएं थीं?
चित्ररथ वन स्वर्ग समान था। हरे वृक्ष फल लदे। नदियां झरने। पक्षी भ्रमर संगीत। गंधर्व किन्नर देवता निवास। सोने भवन विमान। वनदेवी आशीष। एकांत तप स्थान। मेधावी ऋषि तपस्या स्थल। प्राणी समर्पित। यह वैभवशाली वन कथा का केंद्र।
मंजुघोषा ने ऋषि को कैसे मोहित किया?
इंद्र आज्ञा से अप्सरा मंजुघोषा नदी स्नान कर आश्रम गई। मधुर गीत वीणा नृत्य घुंघरू। स्वर्ग कथाएं हास्य। फल अर्पण निकटता। ऋषि ध्यान भंग। दिन रात्रि विहार परिक्रमा गायन। वर्ष बीते तप भूल वासना जागृत। मोहपाश पूर्ण।
श्राप का कारण क्या था और क्या हुआ?
मंजुघोषा स्वर्ग वापसी घोषणा पर ऋषि जागे। केश धूसर शरीर क्षीण तप व्यर्थ। प्रलय क्रोध श्राप पिशाचिनी भव। रूप विकराल नख दांत तीक्ष्ण नेत्र लाल स्वर भयावह। वन कंप भगदड़। मंजुघोषा विलाप।
मंजुघोषा को मुक्ति की विधि क्या बताई गई?
ऋषि दया से पापमोचनी एकादशी व्रत सुझाया। ब्रह्म पूजा विष्णु आराधना जप भजन जागरण। द्वादशी दान पारण। विधि पालन से चमत्कार स्वरूप पूर्ववत। स्वर्ग गमन। भक्ति शक्ति प्रदर्शित।
मेधावी ऋषि ने पिता च्यवन से क्या प्रार्थना की?
अपराध बोध से हिमालय गुफा पहुंचे। दंडवत कथा वर्णन। क्षमा याचना। च्यवन क्रुद्ध तप नाश। तथापि पापमोचनी एकादशी व्रत आज्ञा। अनुष्ठान से पापक्षय तप पुनरारंभ।
पापमोचनी एकादशी व्रत के मुख्य फल क्या हैं?
सर्व पाप नाश पूर्वजन्म संचित। असीम पुण्य प्राप्ति। मोक्ष मार्ग। मन शुद्धि आत्मशांति। विष्णु कृपा गृह सुख आरोग्य। योनि उन्नति सौभाग्य। कथा प्रमाणित स्थायी लाभ।
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