By अपर्णा पाटनी
परशुराम द्वादशी व्रत साहस, वैराग्य और धर्म की रक्षा के संकल्प को मजबूत करता है

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को परशुराम द्वादशी कहा जाता है। यह तिथि भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को समर्पित मानी जाती है। मोहिनी एकादशी के ठीक अगले दिन यह व्रत रखा जाता है। कई बार तिथियों के मेल के कारण मोहिनी एकादशी और परशुराम द्वादशी व्रत एक ही दिन पड़ जाते हैं, उस स्थिति में श्रद्धालु नियत नियमों के अनुसार संयुक्त संकल्प लेकर साधना करते हैं। जो साधक परशुराम द्वादशी व्रत को श्रद्धा और अनुशासन के साथ करते हैं, उनके लिए यह दिन पाप क्षय, शौर्य जागरण, धर्मसंरक्षण की भावना और मोक्ष की कामना को प्रबल करने वाला माना जाता है।
वैशाख शुक्ल द्वादशी स्वभाव से ही तेजस्वी और क्षत्रिय धर्म से जुड़ी ऊर्जा को बल देने वाली मानी गई है। परशुराम द्वादशी पर प्रभातकाल से अगले दिन सूर्योदय तक व्रत, जप और जागरण की परंपरा के माध्यम से साधक अपने भीतर वैराग्य, शौर्य और धर्मनिष्ठा को जाग्रत करने का प्रयास करता है।
धार्मिक विवरणों में परशुराम द्वादशी व्रत को परशुराम द्वादशी व्रत या जामदग्न्य परशुराम व्रत कहा जाता है। यह व्रत वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को रखा जाता है। यह वही परशुराम हैं जिन्हें विष्णु के छठे अवतार के रूप में जाना जाता है और जिनका जन्म ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के कुल में हुआ।
मुख्य बिंदु सरल रूप में इस सारणी से समझे जा सकते हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| तिथि | वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी |
| सम्बंधित व्रत | मोहिनी एकादशी के अगले दिन, कभी कभी दोनों व्रत एक ही दिन पड़ जाते हैं |
| आराध्य देव | भगवान परशुराम, विष्णु के छठे अवतार |
| मुख्य संकल्प | धर्म रक्षण, अधर्म का क्षय, शौर्य, संयम और मोक्ष की कामना |
| पालन की परंपरा | कड़े व्रत का पालन, रात्रि जागरण, विष्णु नाम जप और परशुराम पूजन |
जो साधक दीर्घकाल तक परशुराम व्रत करते हैं, वे कई वर्षों तक लगातार वैशाख शुक्ल द्वादशी का यह व्रत करते हुए अपने संकल्प को स्थिर रखने का प्रयास करते हैं।
भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। वे ऋषि जमदग्नि की संतान और माता रेणुका के पुत्र हैं, इसलिए उन्हें जामदग्न्य परशुराम भी कहा जाता है। उनका जीवन त्रेता युग और द्वापर युग दोनों से जुड़ा माना गया है। परशुराम को उन चिरंजीवी महापुरुषों में गिना जाता है जिनका अस्तित्व युग परिवर्तन के बाद भी बना रहता है।
कथा में वर्णन आता है कि भगवान परशुराम ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें परशु अर्थात दिव्य फरसा प्रदान किया, जिससे उनका नाम ही परशुराम के रूप में प्रसिद्ध हो गया। शिव ने उन्हें केवल अस्त्र ही नहीं बल्कि कलारिपयट्टु जैसे प्राचीन मार्शल आर्ट और युद्ध कौशल भी सिखाए। इस प्रकार परशुराम केवल क्षत्रियों के दंडदाता ही नहीं बल्कि युद्धशास्त्र के गुरु भी माने जाते हैं।
भगवान परशुराम दो महाकाव्यों महाभारत और रामायण दोनों के प्रसंगों में उल्लेखित हैं। रामायण में वे जनकपुरी में सीता स्वयंवर के समय प्रकट होते हैं, जब भगवान राम द्वारा शिव धनुष टूटने पर वे वहां आते हैं और राम के तेज तथा मर्यादा से प्रसन्न होकर अंततः उनका सम्मान स्वीकार करते हैं।
महाभारत में भगवान परशुराम को भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महान योद्धाओं के आचार्य के रूप में याद किया जाता है। युद्ध की सूक्ष्म भंगिमाएं, दिव्यास्त्रों के प्रयोग और धर्म युद्ध की मर्यादाएं परशुराम की शिक्षा से जुड़ी मानी जाती हैं। उनके पास जो भार्गवास्त्र था, वह भी भगवान शिव की कृपा से प्राप्त दिव्य अस्त्र माना जाता है। इस दृष्टि से परशुराम द्वादशी केवल एक व्रत का दिन नहीं बल्कि गुरु रूप में परशुराम की स्मृति और उनके द्वारा दी गई युद्ध तथा धर्म शिक्षा का स्मरण भी है।
परशुराम द्वादशी का व्रत प्रातःकाल सूर्योदय के साथ आरंभ माना जाता है। व्रती प्रातः स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करता है, फिर भगवान विष्णु और परशुराम का स्मरण करके व्रत का संकल्प लेता है। दिन भर साधक उपवास या कठोर व्रत का पालन करता है। कई भक्त केवल जल या फलाहार लेकर यह दिन बिताते हैं।
इस व्रत में भगवान परशुराम की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप, धूप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। कई स्थानों पर परशुराम की प्रतिमा को जल से भरे कलश या पात्र के भीतर स्थापित कर पूजन करने की परंपरा भी है, जो शांति, स्थिरता और भावनात्मक शुद्धि का संकेत माना जाता है। रात्रि में जागरण की भी परंपरा है। व्रती यथाशक्ति पूरी रात विष्णु नाम जप, परशुराम स्तुति और कथा श्रवण में लगा रहता है।
परशुराम द्वादशी के दिन विष्णु और परशुराम, दोनों की स्मृति में मंत्र जप करना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ की परंपरा का उल्लेख मिलता है। जो साधक इस दिन सहस्रनाम का पाठ करते हैं, वे अपने भीतर वैराग्य, श्रद्धा और दृढ़ता का अनुभव कर सकते हैं।
परशुराम का स्मरण करते समय साधक उनके तेज, संयम और धर्म की रक्षा के संकल्प को ध्यान में रखकर प्रार्थना करता है। व्रत की अवधि प्रायः अगले दिन सूर्योदय के बाद या नियत समय पर पारण करने से पूरी मानी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परशुराम द्वादशी व्रत को करने से
यह भी माना जाता है कि जो भक्त परशुराम द्वादशी व्रत को दीर्घकाल तक करते हैं, उनकी मनोकामनाएं धीरे धीरे पूर्ण होती जाती हैं और वे अपने जीवन के निर्णय अधिक दृढ़ता और स्पष्टता से लेने लगते हैं।
सामान्य प्रश्न
परशुराम द्वादशी किस मास और तिथि को मनाई जाती है?
परशुराम द्वादशी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है। यह मोहिनी एकादशी के अगले दिन पड़ती है और कभी कभी तिथियों के संयोग से दोनों व्रत एक ही दिन भी हो जाते हैं।
इस व्रत को जामदग्न्य परशुराम व्रत क्यों कहा जाता है?
क्योंकि भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र हैं, इसलिए उन्हें जामदग्न्य परशुराम कहा जाता है। इसी कारण इस व्रत का एक प्रचलित नाम जामदग्न्य परशुराम व्रत भी है।
परशुराम द्वादशी के दिन व्रती को क्या प्रमुख कार्य करने चाहिए?
व्रती को प्रातः स्नान कर संकल्प लेना, दिन भर व्रत रखना, भगवान परशुराम और विष्णु की पूजा करना, संभव हो तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना और रात्रि में जागरण तथा नाम जप करना उत्तम माना जाता है।
परशुराम का महाभारत और रामायण से क्या संबंध बताया गया है?
रामायण में वे सीता स्वयंवर के समय प्रकट होकर राम के तेज से प्रसन्न होते हैं। महाभारत में उन्हें भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे योद्धाओं का गुरु माना जाता है और युद्ध कौशल तथा दिव्यास्त्र विद्या उनसे जुड़ी मानी गई है।
परशुराम द्वादशी व्रत साधक को आध्यात्मिक रूप से क्या सिखाता है?
यह व्रत सिखाता है कि केवल अहिंसा ही नहीं बल्कि धर्म की रक्षा के लिए उचित स्थान पर साहस और संकल्प भी आवश्यक हैं। परशुराम की आराधना से साधक अपने भीतर संयम, कर्तव्यबोध और अन्याय के विरोध का संतुलित भाव विकसित करने की प्रेरणा पाता है।
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