By पं. नरेंद्र शर्मा
रोहिणी व्रत स्वास्थ्य, परिवारिक सौहार्द और भविष्य के शुभ कर्मों के लिए अत्यंत लाभकारी है

जैन परंपरा में रोहिणी व्रत अत्यंत शुभ और कल्याणकारी व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से सौभाग्य, स्वास्थ्य, पारिवारिक सुख, पाप क्षय और जन्म जन्मांतर के दुखों से मुक्ति की भावना से रखा जाता है। श्रद्धा, संयम और अहिंसा भाव से किया गया रोहिणी व्रत साधक के जीवन में शांति और स्थिरता लाता है और आगे के जन्मों तक शुभ फल देने वाला माना जाता है। इस व्रत के साथ जुड़ी रोहिणी व्रत कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं बल्कि कर्म सिद्धांत और उसके दूरगामी परिणाम को समझाने वाली गहरी आध्यात्मिक शिक्षा भी है।
पौराणिक वर्णन के अनुसार प्राचीन काल में चंपापुरी नाम का एक नगर था। इस नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्मीपति के साथ राज करते थे। दोनों धर्मप्रिय, दयालु और प्रजा के हित में चिंतन करने वाले शासक थे। उनके घर कुल आठ संतानें थीं, जिनमें सात पुत्र और एक पुत्री थी। उस पुत्री का नाम रोहिणी रखा गया। रोहिणी गुणवान, सुशोभित और अपने माता पिता की प्रिय थी। जैसे जैसे वह युवावस्था की ओर बढ़ी, राजा के मन में उसकी विवाह सम्बन्धी चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ती गई। एक दिन राजा माधवा ने दरबार में उपस्थित एक निमित्तज्ञानी से प्रश्न किया कि उनकी पुत्री रोहिणी का भावी पति कौन होगा। निमित्तज्ञानी ने ध्यान और गणना के माध्यम से उत्तर दिया कि रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होने वाला है। यह सुनकर राजा और रानी दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए। कुछ समय बाद विधि विधान के साथ रोहिणी के स्वयंवर की तैयारी की गई।
स्वयंवर के अवसर पर अनेक राज्यों के राजकुमार और योद्धा चंपापुरी आए। सभा शालाएं सजाई गईं, नगर में उत्सव जैसा वातावरण बन गया। रोहिणी ने राजकुमारों के मध्य से अपने भाग्य में लिखे हुए वर को पहचानते हुए हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाल दी। इस प्रकार विधि, देवी देवताओं और उपस्थित जनसमूह की साक्षी में रोहिणी और अशोक का विवाह संपन्न हुआ। चंपापुरी और हस्तिनापुर दोनों ही इस संबंध से प्रसन्न हुए। नया दांपत्य जीवन सुखद रूप से आगे बढ़ने लगा। यहीं तक कथा केवल एक सामान्य राजकुमारी की कहानी लगती है, लेकिन आगे चलकर इसमें कर्म और पूर्वजन्म के रहस्यों को उजागर करने वाली घटनाएं जुड़ती हैं।
एक समय हस्तिनापुर के निकट स्थित वन में एक तेजस्वी मुनिराज का आगमन हुआ। उन्हें श्री चारण मुनिराज के नाम से जाना जाता है। उनके तप, त्याग और तेज की चर्चा सुनकर राजा अशोक और उनके परिजन, जिनमें रानी भी सम्मिलित थीं, उनके दर्शन के लिए वहां पहुंचे। सभी ने श्रद्धा से नमस्कार किया, धर्मोपदेश सुना और मन में अनेक प्रश्नों के समाधान पाए। मुनिराज की वाणी में गहराई और उनके भाव में अद्भुत शांति थी। इस शांति को देखकर राजा अशोक के मन में एक विचार उठा। उन्होंने मुनिराज से विनम्र स्वर में पूछा कि उनकी रानी इतनी शांतचित्त, संयमी और गहन क्यों दिखाई देती हैं, मानो उनके भीतर कोई पुराना वैराग्य या अनुभूतियां काम कर रही हों। राजा के इस सरल प्रश्न के उत्तर में मुनिराज ने एक गूढ़ कर्मकथा सुनानी शुरू की, जो उसी नगर से जुड़ी थी, बस काल और जन्म बदल चुके थे।
श्री चारण मुनिराज ने बताया कि पूर्वकाल में इसी नगर में वस्तुपाल नामक राजा का शासन था। वह न्यायप्रिय और सामर्थ्यवान राजा था। उसका एक घनिष्ठ मित्र था, जिसका नाम धनमित्र था। धनमित्र के घर एक कन्या का जन्म हुआ। विशेष परिस्थितियों के कारण उसके शरीर से दुर्गंध आती थी, इसलिए उसका नाम दुर्गंधा रखा गया। यह स्थिति केवल शारीरिक तकलीफ ही नहीं थी बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी उसके लिए कठिनाई का कारण बनी। धनमित्र हमेशा चिंता में रहता कि उसकी पुत्री का भविष्य क्या होगा, उसे कौन स्वीकार करेगा और वह किस प्रकार सम्मानजनक जीवन जी सकेगी। समाज की दृष्टि, अपने पिता के मन का दर्द और स्वयं की स्थिति, ये सब मिलकर दुर्गंधा के जीवन को भारी बनाते रहे। इसी चिंता और दबाव के बीच धनमित्र ने एक निर्णय लिया। उसने अपनी पुत्री दुर्गंधा का विवाह अपने मित्र राजा वस्तुपाल के पुत्र श्रीषेण के साथ कर दिया। विवाह के लिए उसने धन और वैभव का लालच भी रखा, ताकि रिश्ते को स्वीकार कर लिया जाए। विवाह हो तो गया, लेकिन शरीर से निकलने वाली दुर्गंध के कारण श्रीषेण दांपत्य जीवन में सुख और सहजता का अनुभव नहीं कर पाए। केवल एक महीने के भीतर ही उन्होंने दुर्गंधा को छोड़ दिया और उससे अलग हो गए। यह घटना दुर्गंधा के लिए गहरा आघात थी। इसके पीछे केवल वर्तमान जन्म की परिस्थितियां नहीं बल्कि पुराने जन्म के कर्म भी कार्य कर रहे थे, जिनका खुलासा आगे होता है।
एक समय नगर में अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए पहुंचे। उनकी कीर्ति सुनकर धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ उनकी वंदना करने आया। दोनों ने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और धनमित्र ने अपनी पुत्री की स्थिति के बारे में बताते हुए मुनिराज से मार्गदर्शन की प्रार्थना की। उसने पूछा कि उसकी पुत्री के जीवन में इतना कष्ट और अपमान क्यों है, क्या इसका कोई आध्यात्मिक कारण और उपाय है। अमृतसेन मुनिराज ने ध्यानस्थ होकर दुर्गंधा के पूर्वजन्मों का दर्शन किया और फिर एक और कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि पुराने काल में गिरनार पर्वत के निकट एक नगर था, जहां राजा भूपाल राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम सिंधुमती था। एक दिन राजा भूपाल अपनी रानी के साथ वनक्रीड़ा के लिए निकले। वन में विहार करते हुए उन्हें मार्ग में एक महान मुनिराज के दर्शन हुए। राजा ने रानी से कहा कि वे घर लौटकर उस मुनिराज के लिए शुद्ध और सात्त्विक भोजन की व्यवस्था करे, क्योंकि साधु सेवा और आहार दान अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। रानी सिंधुमती ने बाहर से तो राजा की आज्ञा स्वीकार कर ली, पर भीतर से वह प्रसन्न नहीं थीं। क्रोध, असंतोष और अहंकार से प्रेरित होकर उन्होंने मुनिराज के लिए उचित आहार की व्यवस्था न करके उन्हें कड़वी तुम्बी यानी कड़वे फल या कद्दू जैसा आहार दे दिया। यह आहार मुनिराज के लिए अत्यंत कष्टदायक सिद्ध हुआ। शरीर पर उसका बुरा प्रभाव पड़ा, उन्हें तीव्र वेदना हुई और इसी पीड़ा के परिणामस्वरूप उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
जब राजा भूपाल को यह ज्ञात हुआ कि रानी सिंधुमती के क्रोध और अवमानना के कारण मुनिराज को ऐसा कष्टदायक आहार मिला, जिससे उन्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ा, तो वे भीतर तक व्यथित हो गए। धर्म की दृष्टि से यह बड़ा पाप था। राजा ने धर्म और न्याय की रक्षा करते हुए रानी को राज्य से निष्कासित कर दिया। रानी के शरीर में धीरे धीरे कोढ़ जैसी गंभीर व्याधि प्रकट हुई। समाज से दूर, रोग से ग्रस्त और पश्चाताप से भरे जीवन के साथ जब उनके प्राण निकले तब उन्हें नरक की वेदनाओं में जाना पड़ा। वहां भी अनेक कष्ट भोगने के बाद वे आगे की जन्म यात्रा में पशु योनि में उत्पन्न हुईं। फिर अगले जन्म में वही आत्मा धनमित्र के घर दुर्गंधा नामक कन्या के रूप में पैदा हुई। इस प्रकार दुर्गंधा की दुर्गंध और अपमानित जीवन वास्तव में उसी रानी सिंधुमती के कर्मों का परिणाम था, जिसने पहले जन्म में एक मुनिराज को क्रोध में आकर कड़वा और कष्टदायक आहार दिया था। अमृतसेन मुनिराज ने यह कथा सुना कर धनमित्र को समझाया कि दुर्गंधा के दुख का मूल कारण यही पुराना कर्म है और इसे कम करने के लिए व्रत, प्रायश्चित्त, संयम और साधु सेवा का मार्ग अपनाना आवश्यक है।
श्री चारण मुनिराज ने राजा अशोक से यह कथा सुनाने के बाद संकेत दिया कि वर्तमान जन्म की रानी का शांतचित्त स्वभाव और गहराई भी इसी कर्म यात्रा से जुड़ा है। जब आत्मा जन्म जन्मांतर के दुखों और परिणामों से गुजरती है तब उसके भीतर कहीं न कहीं वैराग्य, गंभीरता और संयम की भावना प्रकट होने लगती है। रोहिणी व्रत कथा के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि इस जीवन में जो भी अनुभव, सम्मान, अपमान, स्वास्थ्य या रोग दिखाई देते हैं, वे केवल वर्तमान परिस्थितियों का परिणाम नहीं बल्कि पुराने कर्मों की लंबी श्रृंखला से जुड़े होते हैं। यही समझ जैन दर्शन के कर्म सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करती है और रोहिणी व्रत के महत्व को गहराई से स्थापित करती है।
रोहिणी व्रत कथा साधक को यह सिखाती है कि
रोहिणी व्रत का पालन करते समय जब यह कथा स्मरण की जाती है तो साधक के भीतर यह जागरूकता मजबूत होती है कि हर कर्म की प्रतिक्रिया है। इसलिए वाणी, विचार और आचरण में सजगता ही वास्तविक सुरक्षा कवच बनती है।
सामान्य प्रश्न
रोहिणी व्रत किस धर्म से संबंधित है और इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?
रोहिणी व्रत जैन परंपरा से संबंधित माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पाप क्षय, सौभाग्य वृद्धि, परिवार के लिए शुभफल और जन्म जन्मांतर के दुखों से क्रमिक मुक्ति की भावना के साथ संयम और श्रद्धा को मजबूत करना है।
चंपापुरी के राजा माधवा और रोहिणी का इस कथा से क्या संबंध है?
चंपापुरी के राजा माधवा की पुत्री रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक से होता है। बाद में अशोक द्वारा मुनिराज से पूछे गए प्रश्न के माध्यम से ही दुर्गंधा, सिंधुमती और कर्मफल की गहरी कथा सामने आती है। इससे रोहिणी व्रत कथा का प्रसंग जुड़ता है।
दुर्गंधा के जीवन में इतना दुख क्यों दिखता है?
दुर्गंधा वास्तव में पूर्वजन्म की रानी सिंधुमती की आत्मा है, जिसने साधु को कड़वा आहार देकर भारी कष्ट दिया था। उसी कर्म के परिणामस्वरूप उसे कई जन्मों तक कोढ़, नरक यंत्रणा, पशु योनि और दुर्गंधा के रूप में अपमानित जीवन जैसे दुखों से गुजरना पड़ा।
कथा में साधु को कड़वी तुम्बी का आहार देने से इतना बड़ा पाप क्यों माना गया?
क्योंकि यह कार्य क्रोध, अहंकार और साधु सेवा के अपमान से जुड़ा था। मुनिराज को कष्टदायक आहार देकर उनके प्राणों का नाश कर देना गंभीर अहिंसा थी, जिसका परिणाम जन्म जन्मांतर तक कठोर कर्मफल के रूप में प्रकट हुआ। जैन दृष्टि में साधु की अहिंसा और आदर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
रोहिणी व्रत करते समय इस कथा को याद रखना क्यों आवश्यक माना जाता है?
कथा को याद रखने से साधक को कर्मफल, संयम, अहिंसा और साधु सम्मान की गहरी समझ मिलती है। इससे व्रत केवल औपचारिक न रहकर भीतर से परिवर्तित करने वाली साधना बनता है और व्यक्ति अपने विचारों और व्यवहार में अधिक सजग और विनम्र बनने की प्रेरणा पाता है।
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