By पं. सुव्रत शर्मा
व्रत कथा, भक्ति और स्वच्छता के माध्यम से माँ की कृपा की यात्रा

शीतला माता की कथा केवल रोगों से बचने की लोक मान्यता नहीं बल्कि श्रद्धा, अनुशासन और सच्चे पश्चाताप की एक गहरी यात्रा है। गाँव की संयुक्त हवेलियों, मिट्टी की दीवारों और चूल्हे की आँच के बीच यह कथा पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही है। जहाँ माताएँ अपने बच्चों के माथे पर हाथ फेरते हुए माता शीतला से घर के हर प्राणी के स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हैं।
पुराने समय में जब दवाओं का इतना प्रसार नहीं था तब लोग शरीर की तपन, फोड़े फुंसियों और संक्रामक रोगों से बचने के लिए शीतला माता की शरण में आते थे। माना जाता रहा कि यदि मन में शुद्धता हो, घर में स्वच्छता हो और व्रत में निष्ठा हो, तो माता की कृपा से बड़े से बड़ा संकट भी टल सकता है। इस पृष्ठभूमि में ब्राह्मण परिवार की प्रसिद्ध बसौड़ा व्रत कथा सुनाई जाती है।
कहानी की शुरुआत एक ऐसे गांव से होती है जहाँ एक ब्राह्मण दंपति रहते थे। घर में दो बेटे थे और दोनों की शादियाँ हो चुकी थीं। बहुएँ भी घर की ज़िम्मेदारियों में हाथ बँटाती थीं, पर उनके जीवन में एक कमी थी। बहुत समय तक उन्हें संतान प्राप्त नहीं हुई। यह प्रतीक्षा केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी थी, क्योंकि हर बार कोई उत्सव आता तो घर में बच्चों की किलकारी न होने का खालीपन सबको महसूस होता।
आखिरकार समय ने करवट ली। लम्बे इंतजार के बाद दोनों बहुओं को पुत्र रत्न प्राप्त हुए। घर में मानो दीपावली का सा माहौल बन गया। दादा दादी के चेहरे पर चमक, पिता के मन में गर्व और माँओं के हृदय में अपार ममता भर गई। दोनों बहुएँ अपने शिशुओं को गोद में लेकर माँ होने के सुख में डूबी रहतीं और हर छोटी बात पर उनकी रक्षा के बारे में सोचती रहतीं।
इसी खुशनुमा वातावरण में शीतला माता का बसौड़ा व्रत आने वाला था। घर की बुजुर्ग स्त्रियाँ पहले से ही तैयारी कर रही थीं कि माता शीतला की पूजा होगी, ठंडा भोजन बनेगा, कथा होगी और पूरे परिवार के लिए आरोग्य की कामना की जाएगी।
बसौड़ा व्रत के नियम के अनुसार उस दिन चूल्हा नहीं जलाना होता और केवल पहले से बना हुआ ठंडा भोजन ही ग्रहण किया जाता है। ब्राह्मण की बहुओं ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में एक संशय जन्मा। उन्होंने सोचा कि अभी अभी बच्चे हुए हैं, उनका शरीर कमजोर है। यदि वे स्वयं ठंडा भोजन खाएँगी तो कहीं बीमार न पड़ जाएँ और शिशुओं पर भी प्रभाव न पड़ जाए।
बाहरी रूप से वे माता के व्रत को महत्व भी देती थीं, पर अंदर ही अंदर अपने भय से जूझ रही थीं। यही वह जगह थी जहाँ मन के द्वंद्व ने उन्हें गलत दिशा की ओर मोड़ दिया। उनकी चिंता वास्तविक थी, पर मार्ग उन्होंने उचित सलाह से नहीं, अपने मन से चुन लिया।
मन में चल रहे संशय के बीच दोनों बहुओं ने एक योजना बनाई। उन्होंने गुप्त रूप से अपने लिए गरम गरम बाटियाँ बनाईं और उन्हें पशुओं के दाना रखने वाले बड़े बर्तन में रखकर ढक दिया। बाहर से देखने पर वह साधारण चारा पात्र लगता था, पर बहुओं के लिए वही उनके मन की चाल का प्रतीक बन गया।
व्रत वाले दिन दोनों बहुएँ अपनी सास के साथ शीतला माता की पूजा के लिए निकल पड़ीं। रास्ते भर सास उन्हें माता की महिमा, व्रत के नियम और पुरानी कथाओं के बारे में बताती चल रही थी। मंदिर या पूजा स्थल पर पहुँचकर सबने श्रद्धा से माता शीतला की पूजा की, पुष्प चढ़ाए, भोग लगाया और फिर बैठकर माता की व्रत कथा सुनी। बहुओं ने भी हाथ जोड़कर अपने बच्चों की लंबी आयु और रोग रहित जीवन की प्रार्थना की।
पूजा समाप्त होने के बाद सास वहीं बैठकर माता के भजन गाने लगी। वातावरण शांत और भक्ति से भरा हुआ था, पर बहुओं के मन में छिपी योजना उन्हें वहाँ रुकने नहीं दे रही थी। उन्होंने बच्चों के रोने का बहाना बनाया और सास से अनुमति लेकर जल्दी से घर की ओर लौट पड़ीं।
घर पहुँचते ही दोनों बहुएँ सीधे उस स्थान पर गईं जहाँ उन्होंने बाटियाँ छिपाई थीं। बर्तन से गरम गरम बाटी निकाली, उन्हें सजाकर बैठ गईं और आराम से खाकर उठीं। इस क्षण उन्हें लगा कि उन्होंने अपने और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एक समझदारी भरा काम किया है। पर वास्तव में उसी पल उन्होंने व्रत के नियम और माता पर विश्वास दोनों से समझौता कर लिया।
कुछ समय बाद सास भी घर आ गई। उसने प्रेम से बहुओं को पुकारा और कहा कि अब सबको मिलकर भोजन कर लेना चाहिए। उसने व्रत के अनुसार ठंडा भोजन परोसा और स्वयं भी उसी का सेवन किया। बहुओं ने भी सास के साथ बैठकर वही ठंडा भोजन खाया ताकि किसी को उनके पहले किए व्यवहार पर शंका न हो। बाहर से वे नियम का पालन करती दिख रही थीं, पर भीतर से वे अपनी चालाकी को सुरक्षित मान रही थीं।
भोजन के बाद सास ने घर के काम सँभालने शुरू किए और कुछ देर बाद बहुओं से कहा कि बच्चे काफी देर से सो रहे हैं, उन्हें जगा कर दूध पिलाकर फिर सुला दें।
बहुएँ जैसे ही अपने अपने बच्चों के पास पहुँचीं, उन्होंने देखा कि बच्चे अजीब सी निस्तब्धता में पड़े हैं। उन्हें उठाने की कोशिश की, हिलाया, पुकारा, पर बच्चे निस्पंद थे। सच को समझते ही दोनों बहुएँ चीख पड़ीं। जिन बच्चों के लिए उन्होंने इतनी चाल चली थी, वे ही अब उनके सामने निर्जीव पड़े थे।
रोने की आवाज सुनकर सास भी दौड़ी दौड़ी आई। स्थिति देखकर उसका हृदय भी टूट गया, पर साथ ही उसे भीतर से यह भी समझ आ रहा था कि यह कोई सामान्य घटना नहीं। शीतला माता की व्रत संहिता, बहुओं की मनःस्थिति और अचानक आया यह दुख, सब मिलकर माता के प्रकोप की ओर संकेत कर रहे थे।
सास ने बहुओं से कठोर शब्दों में कहा कि उन्होंने अपने भय के कारण माता की अवहेलना की है। वे दिखावे के लिए व्रत में बैठीं, कथा सुनी, पर भीतर से नियम तोड़ने का निश्चय पहले ही कर चुकी थीं। सास ने उन्हें घर से बाहर जाने को कहा और कहा कि जब तक वे अपने बच्चों को जीवित और स्वस्थ करके नहीं लाएँगी तब तक उन्हें इस घर में प्रवेश नहीं मिलेगा।
आँखों में आँसू और गोद में अपने मृत बच्चों को लेकर दोनों बहुएँ घर से निकल पड़ीं। रास्ते भर वे अपने कर्मों पर पछताती रहीं। कभी एक दूसरे को दोष देतीं, कभी स्वयं को कोसतीं और कभी माता शीतला को याद करके दया की भीख माँगतीं।
चलते चलते वे गाँव की सीमा पार कर एक सुनसान मार्ग पर आ गईं जहाँ हवा में एक अलग सी शांति थी। थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक पुराना खेजड़ी का वृक्ष दिखाई दिया। वृक्ष के नीचे दो स्त्रियाँ बैठी थीं। उनके चेहरे तेजस्वी थे पर उनके वस्त्र साधारण। कथा में उन्हें ओरी और शीतला नाम से बताया गया है।
बहुएँ थक चुकी थीं, पर बच्चों को हृदय से चिपकाए वे आगे बढ़ीं। उन्होंने देखा कि उन दोनों स्त्रियों के बालों में बहुत सी जुएँ थीं। यह दृश्य देखकर बहुओं के भीतर का सेवा भाव जाग उठा। वे अपना दुख कुछ देर के लिए भूल गईं और सहज भाव से उनके पास बैठकर बालों की जुएँ निकालने लगीं।
बहुत देर तक दोनों बहुएँ चुपचाप बैठकर ओरी और शीतला के सिर की जुएँ निकालती रहीं। जब जुएँ पूरी तरह निकल गईं तो दोनों देवियों के मस्तक में अद्भुत शीतलता और आराम का अनुभव हुआ। उन्होंने प्रेम से कहा कि तुम दोनों ने हमारे सिर को शीतल कर दिया, वैसे ही तुम्हें पेट की शांति और मन की शांति प्राप्त हो।
यह पहला आशीर्वाद था, पर बहुओं के मन में अभी भी अपना मूल प्रश्न था। वे बोलीं कि वे अपने भाग्य की मारी यहाँ वहाँ भटक रही हैं, पर अब तक शीतला माता के दर्शन नहीं हो सके। वे केवल इतना जानती हैं कि माता की कृपा से ही उनके बच्चों में प्राण वापस आ सकते हैं।
यह सुनकर उन स्त्रियों में से एक ने दृढ़ स्वर में कहा कि तुम दोनों ने जो किया है, वह दुष्कर्म है। जिस दिन सबको ठंडा भोजन करके व्रत निभाना था, उस दिन तुमने चुपचाप गरम भोजन खाया। तुमने नियम का अपमान किया, इसलिए तुम्हारा मुख देखना भी उचित नहीं।
इतना कहते ही बहुओं के मन में कौंधा कि यह कोई साधारण स्त्री नहीं, स्वयं माता शीतला हैं। वे तत्क्षण उनके चरणों में गिर पड़ीं, रोते हुए बोलीं कि उनसे अनजाने में भूल हो गई। उन्होंने माता की शक्ति, नियम और कृपा का महत्व गहराई से नहीं समझा।
उन्होंने स्वीकार किया कि भय से घबराकर उन्होंने गलत रास्ता चुन लिया। अब उन्हें अपनी भूल का पूरा अहसास है। उन्होंने वचन दिया कि वे भविष्य में कभी व्रत नियम की अवहेलना नहीं करेंगी। उनकी आँखों में सच्चा पश्चाताप और हृदय में पूर्ण समर्पण था।
बहुओं की विनम्रता और सच्चे पश्चाताप को देखकर माता शीतला का हृदय पिघल गया। उनका स्वर कठोरता से करुणा में बदल गया। उन्होंने मृत बालकों की ओर दृष्टि की और उनके शरीर में पुनः प्राण लौट आए। बच्चों ने आँखे खोलीं, मानो गहरी नींद से जागे हों।
बहुएँ अपने पुत्रों को सीने से लगा कर फूट फूट कर रोने लगीं, पर अब यह रोना दुख का नहीं, कृतज्ञता और राहत का था। उन्होंने माता शीतला का बार बार धन्यवाद किया, चरणों को छूकर प्रणाम किया और मन ही मन संकल्प लिया कि अब से वे व्रत को केवल औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन का अनुशासन मानकर निभाएँगी।
अपने बच्चों को साथ लेकर दोनों बहुएँ वापस गांव पहुँचीं। जब गाँव वालों ने देखा कि जिन बच्चों की मृत्यु की खबर फैली थी, वे अब जीवित और स्वस्थ हैं, तो सब आश्चर्यचकित रह गए। जब पूरी कथा लोगों के सामने आई कि कैसे माता शीतला ने उनके पश्चाताप से प्रसन्न होकर बालकों को जीवन दिया, तो गाँव में विश्वास और भक्ति दोनों कई गुना बढ़ गए।
गाँव के बुजुर्गों और परिवारों ने मिलकर निश्चय किया कि वे शीतला माता के लिए एक मंदिर बनवाएँगे, ताकि हर वर्ष बसौड़ा व्रत के अवसर पर माता की पूजा, ठंडे भोग और कथा का आयोजन हो सके। धीरे धीरे इस कथा ने आसपास के गाँवों में भी स्थान बनाया और लोग यह बात समझने लगे कि केवल आडंबर नहीं बल्कि सचेत नियम पालन और सच्ची आस्था ही माता की कृपा तक पहुँचने का मार्ग है।
कथा के अंत में यही प्रार्थना की जाती है कि जैसे शीतला माता ने उन बहुओं पर कृपा दृष्टि रखकर उनके सूने गोद को फिर से भर दिया, वैसे ही वे अपने सभी भक्तों के घर में स्वास्थ्य, शीतलता और सुख शांति बनाए रखें।
शीतला माता की यह कथा केवल रोग निवारण की नहीं बल्कि जीवन सुधार की प्रेरक धारा है।
क्या बहुओं का भय पूरी तरह गलत था
भय स्वाभाविक था, क्योंकि वे नए बच्चों की चिंता में थीं। गलती इस बात की थी कि उन्होंने बिना किसी बड़े से सलाह लिए, व्रत नियम को तोड़ने का रास्ता चुना और उसे छिपाने की कोशिश की।
ओरी और शीतला के बालों से जुएँ निकालने का क्या संकेत है
जुओं का नाश करना केवल सेवा भाव नहीं बल्कि यह संकेत भी है कि जब हम दूसरों के कष्ट को कम करने में लगते हैं, तो हमारा अपना कर्म बोझ हल्का होने लगता है और कृपा का मार्ग खुलता है।
शीतला माता के कठोर शब्दों का क्या अर्थ समझना चाहिए
कठोर शब्द हमें यह बताते हैं कि धर्म और अनुशासन के नियम केवल बाहरी दिखावे के लिए नहीं होते। यदि कोई नियम पूरे समाज के कल्याण के लिए बना हो, तो उसे हल्के में लेना अपने और दूसरों के लिए हानिकारक हो सकता है।
क्या केवल व्रत रखने से ही माता प्रसन्न हो जाती हैं
कथा यह स्पष्ट करती है कि केवल व्रत, पूजा या कथाएँ पर्याप्त नहीं, जब तक उनमें सच्ची नीयत, स्वच्छ व्यवहार और विनम्रता न हो। माता की प्रसन्नता का मूल आधार मन की शुद्धता और ईमानदारी है।
आज के समय में इस कथा को कैसे अपनाया जा सकता है
आज भी यह कथा याद दिलाती है कि स्वच्छता, संयमित भोजन, अनुशासित जीवन और नियमों का ईमानदार पालन, शरीर और समाज दोनों को स्वस्थ रखते हैं। यदि व्यक्ति मन से इन मूल्यों को अपनाए, तो शीतला माता की कृपा को वह अपने जीवन में संतुलन, स्वास्थ्य और शांति के रूप में अनुभव कर सकता है।
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