By पं. अभिषेक शर्मा
सोमवार तृयोदशी प्रदोष व्रत, भगवान शिव की पूजा और जीवन में लाभ

हिंदू धर्म की व्रत परंपराओं में प्रदोष व्रत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सोमवार की त्रयोदशी तिथि पर होने वाला सोम प्रदोष व्रत भक्तों के लिए विशेष कल्याणकारी सिद्ध होता है। शास्त्रों में वर्णन है कि इस दिन भगवान शिव की आराधना से समस्त विपत्तियां नष्ट हो जाती हैं। प्रदोष काल में विधिवत पूजन और कथा श्रवण से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। सभी प्रदोष व्रतों में यह सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। शिव भक्त इसे पूर्ण निष्ठा से पालन करते हैं। प्राचीन काल से यह व्रत लाखों भक्तों के जीवन को संवार चुका है। नियमित अनुष्ठान से पारिवारिक सुख स्थायी रूप धारण कर लेता है।
सोम प्रदोष व्रत की विधि शास्त्रानुसार सरल परंतु अत्यंत प्रभावशाली है। त्रयोदशी तिथि की प्रभात में ब्रह्म मुहूर्त जागरण करें। शुद्ध जल से स्नान करें। पीत या श्वेत वस्त्र धारण करें। शिव मंदिर प्रस्थान करें या गृह में शिवलिंग प्रतिष्ठित करें। पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें। प्रदोष काल आरंभ होते ही रुद्राभिषेक प्रारंभ करें। दूध, दही, घी, शहद, शर्करा, गंगाजल से क्रमशः अभिषेक करें। पंचामृत से स्नान कराएं। बिल्व पत्र, धतूरा फल, भांग पत्र, अकड़, शमी पत्र अर्पित करें। चंदन लेप, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाएं। शिव सहस्रनाम, महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। रुद्राष्टकम, शिव तांडव स्तोत्र, शिव चालीसा पाठ करें। कथा श्रवण करें। संपूर्ण रात्रि जागरण रखें। भजन, कीर्तन, हर हर महादेव जयकारा लगाएं। अगली तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन दान करें। अनाज, वस्त्र, द्रव्य, फल दान दें। सात्विक भोजन से पारण करें। संध्या कालीन पूजन सर्वोत्तम फलदायी होता है। यह पूर्ण विधि भगवान शिव को तत्काल प्रसन्न कर देती है।
प्रदोष मुहूर्त में भगवान शिव कैलास के रजत मंदिर में तांडव नृत्य करते हैं। गण, देवता, माता पार्वती उनके परित्यागी गुणों का कीर्तन करते हैं। इस पावन काल में पूजन से भक्त शिव हृदय में विराजमान हो जाते हैं। सोम प्रदोष व्रत पालन करने वाले शिव को अत्यंत प्रिय होते हैं। उनके संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। वैवाहिक सुख, पुत्र प्राप्ति, धनागमन होता है। शास्त्रों का मत है कि सोमवार प्रदोष अन्यों से श्रेष्ठ है। भक्तों की समस्त विपदाएं भंग हो जाती हैं। विवाह बाधा, संतान हानि, आर्थिक संकट दूर होते हैं। यह व्रत भक्त जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर देता है।
सोम प्रदोष व्रत कथा हृदय विदारक लेकिन प्रेरक है। प्राचीन विदर्भ नगरी में एक ब्राह्मणी का निवास था। पति की असमय मृत्यु से विधवा हो गई। एक दूधपिता पुत्र ही सहारा बचा। कोई संपत्ति न थी। प्रातः सूर्योदय से पूर्व पुत्र हाथ थामे भिक्षा वृत्ति हेतु निकल पड़ती। नगर द्वार, बाजार, मंदिर प्रांगण भ्रमण। दयालु घरों से अन्न, सब्जी, फल संग्रह। कभी कभी दान मिलता। भूखे न रहें यही चिंता। थकान से चूर होकर संध्या में लौटती। फिर भी सोम प्रदोष व्रत का कठोर पालन। शिव पूजन उसका एकमात्र आधार।
एक प्रदोष कालीन संध्या भिक्षा लेकर लौट रही थी। वन मार्ग में एक किशोर पड़ा सिसक रहा। शरीर पर घाव। रक्त धारा बह रही। करुणा जागृत। पुत्र को बुलाया। कंधे पर उठाकर घर अनावरित। जड़ी बूटी पीसकर लेप किया। औषधि चटाई। भोजन कराया। प्रातः तक जागकर सेवा। किशोर स्वस्थ। विदर्भ राज्य का युवराज निकला। शत्रु दल ने आकस्मिक आक्रमण किया। राजा पिताजी कैद। राज्य अधीन। युवराज घोड़े से उतर भागा। जंगल पार विदर्भ पहुंचा। ब्राह्मणी पुत्र संग मित्रता। तीनों सहवास। घर आनंदमय। युवराज ब्राह्मणी को मां स्वीकारा।
वन प्रांगण में विहार के क्रम में अंशुमति नामक अप्सरा सी गंधर्व कन्या युवराज को दर्शन पाई। हृदय कांप उठा। रूप माधुर्य पर वशीभूत। पिता गंधर्वराज को प्रणय कथा सुनाई। वे युवराज से भेंट। शील, विद्या देख आकृष्ट। कुछ रात्रियों पश्चात शंकर स्वप्न दर्शन। युवराज अंशुमति विवाह विधि करो। गंधर्वराज ने वैवाहिक कार्य संपन्न। ब्राह्मणी सास पदवी। अंशुमति गृह कार्य निपुण। सभी सुखी किंतु राज्य चिंता व्याप्त।
ब्राह्मणी प्रत्येक सोम प्रदोष व्रत निष्ठापूर्वक। एक सोम प्रदोष पर विशेष रुद्राभिषेक। तत्काल चमत्कार। गंधर्वराज विशाल सेना प्रेषित। युवराज विदर्भ प्रस्थान। शत्रु सेना संग्राम। वीरता से विजय। पिता कैद मुक्ति। राज्य पुनः प्राप्त। राज्यारोहणोत्सव। ब्राह्मण पुत्र मंत्रिपद। ब्राह्मणी राजमाता सम्मान। असीम धनागमन। अंशुमति रानी। कथा प्रतिपादित करती शिव भक्ति विपत्ति नाशिनी। व्रत जीवनोद्धारक।
सोम प्रदोष व्रत विवाह निर्विघ्न। पुत्र सुख। रुद्राभिषेक इच्छापूर्ति। पंचगव्य पुत्र हेतु। दूध धन उन्नति। फूल माला आनंद। रोग नाश स्वास्थ्य।
सोम प्रदोष शिव अनुग्रह साधन। पूजन कलुष क्षय। सौख्य प्राप्ति। कथा श्रद्धा वृद्धि। कुटुंब मंगल। भक्त उन्नति पथ।
सामान्य प्रश्न
सोम प्रदोष व्रत की संपूर्ण विधि विस्तार से बताएं?
त्रयोदशी ब्रह्म मुहूर्त स्नान पीत वस्त्र। शिवलिंग गंगाजल पवित्र। प्रदोष रुद्राभिषेक दूध दही घी शहद पंचामृत। बिल्व धतूरा भांग अर्पण। चंदन धूप दीप नैवेद्य। सहस्रनाम महामृत्युंजय जप। रुद्राष्टक तांडव चालीसा। कथा जागरण भजन। पारण ब्राह्मण भोजन दान अनाज वस्त्र। संध्या पूजन प्रधान।
कथा में ब्राह्मणी के जीवन परिवर्तन कैसे हुआ?
विधवा भिक्षा जीवन। घायल युवराज सेवा। पुत्र मित्रता। अंशुमति विवाह। व्रत चमत्कार गंधर्व सेना। राज्य विजय पुत्र मंत्री धन राजमाता पद। शिव कृपा पूर्ण।
अंशुमति युवराज विवाह कैसे संपन्न?
वन विहार दर्शन प्रेम। गंधर्वराज भेंट स्वप्न शिव आज्ञा। भव्य विवाह।
सोम प्रदोष पूजन में कौन से अर्पण विशेष फलदायी?
रुद्राभिषेक पंचगव्य संतान। दूध अभिषेक धन करियर। बिल्व धतूरा भांग फूल माला प्रसन्नता।
सोम प्रदोष व्रत के प्रमुख फल क्या हैं?
पाप संचय नाश। मनोकामना सिद्धि। विवाह बाधा निवारण। पुत्र सुख धन लाभ। विपत्ति हरन स्वास्थ्य आरोग्य। कथा प्रमाणित स्थायी कल्याण।
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