By पं. सुव्रत शर्मा
जानिए देवउठनी ग्यारस की प्रेरक व्रत कथा, इसका आध्यात्मिक महत्व और जीवन में इसका गहरा संदेश

देवउठनी ग्यारस जिसे देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह दिन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का अवसर नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन को नई रोशनी देने वाला आध्यात्मिक पर्व है। भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और संसार में शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत होती है। इस दिन की कथा परंपराएं और संदेश साधक के भीतर नई चेतना जगाते हैं।
पुराणों के अनुसार एक धर्मनिष्ठ राजा की पूरी प्रजा एकादशी का व्रत करती थी। राज्य में नियम था कि एकादशी को कोई भी अन्न का सेवन नहीं करता था। यह संयम केवल नियम नहीं था बल्कि आस्था और अनुशासन का प्रतीक था। समस्त राज्य इस व्रत को श्रद्धापूर्वक निभाता था।
एक दिन एक साधारण व्यक्ति नौकरी की तलाश में राजा के पास आया। शर्त थी कि प्रतिदिन भोजन मिलेगा किंतु एकादशी को अन्न नहीं दिया जाएगा। वह व्यक्ति सहमत हो गया। पहली एकादशी आने पर उसे फलाहार दिया गया परंतु तीव्र भूख के कारण उसने अन्न की मांग की। राजा ने दया दिखाकर उसे भोजन दे दिया।
वह व्यक्ति नदी किनारे गया भोजन बनाया और सहज प्रेम से भगवान विष्णु को बुलाया। उसकी सच्ची पुकार और निर्मल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान साक्षात प्रकट हुए और उसके साथ भोजन करने बैठे।
राजा ने यह देखा और चकित रह गया कि वर्षों के यज्ञ हवन और अनुष्ठान करने पर भी भगवान साक्षात नहीं प्रकट हुए पर एक सामान्य व्यक्ति की सरल भक्ति पर वे तुरंत उपस्थित हो गए। यहां राजा ने जाना कि भगवान की कृपा आडंबर से नहीं बल्कि हृदय की शुद्धता से मिलती है।
श्रद्धा और शुद्धता: ईश्वर बाहरी दिखावे से नहीं बल्कि सच्चे मन से होने वाले प्रेम से प्रसन्न होते हैं।
भक्ति का सरल मार्ग: भक्ति कठिन साधना नहीं बल्कि निष्कपट भावना का मार्ग है।
आडंबर से दूरी: व्रत नियम और अनुष्ठान तभी फल देते हैं जब उनमें आत्मा की सच्ची लगन हो।
इस दिन भगवान विष्णु जागते हैं और विवाह गृहप्रवेश मुंडन जैसे शुभ कार्यों का आरंभ होता है।
तुलसी विवाह और शालिग्राम पूजन का विशेष महत्व है जो परिवार में सौभाग्य और समृद्धि लाता है।
इस दिन व्रत पूजा और तुलसी अर्पण करने से हजारों गौदान के समान पुण्य प्राप्त होता है।
यह दिन आध्यात्मिक जागरण सामाजिक नवचेतना और आंतरिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु का स्मरण करें।
तुलसी के गमले को गोबर या गेरू से लीपकर पूजा स्थल सजाएं।
गन्ने का मंडप बनाकर शालिग्राम की स्थापना करें।
फल गन्ना मौसमी फल सिंघाड़ा आदि का भोग लगाएं।
तुलसी को वस्त्र अलंकार दीप और तोरण से सजाएं।
दशाक्षरी मंत्र से आह्वान करें और तुलसी विवाह की रस्म निभाएं।
दिनभर व्रत रखें और रात में फलाहार करें।
देवउठनी ग्यारस का संदेश है कि सच्ची श्रद्धा समर्पण और हृदय की पवित्रता से ही जीवन में सुख शांति और समृद्धि आती है। यह पर्व साधक को आडंबर से दूर रहने और अपने भीतर की सरलता को जगाने की प्रेरणा देता है।
जब मन निर्मल हो भावनाएं सत्य हों और आस्था दृढ़ हो तब जीवन अपने आप सुंदर मार्ग पर चलने लगता है। यही इस पावन दिवस का सार है।
1. देवउठनी ग्यारस को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है
क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु जागते हैं और शुभ कार्य पुनः आरंभ होते हैं।
2. इस दिन तुलसी विवाह क्यों किया जाता है
तुलसी और शालिग्राम का विवाह सौभाग्य समृद्धि और पारिवारिक सुख का प्रतीक है।
3. क्या एकादशी का व्रत बिना फलाहार के रखा जा सकता है
हाँ साधक की क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या जलाहार से भी व्रत रखा जा सकता है।
4. भगवान के प्रकट होने वाली कथा हमें क्या सिखाती है
कि ईश्वर आडंबर से नहीं बल्कि सच्ची श्रद्धा और सरल हृदय से प्रसन्न होते हैं।
5. देवउठनी ग्यारस का असली आध्यात्मिक संदेश क्या है
मन की शुद्धता जागरण भक्ति और जीवन को नई दिशा देने की प्रेरणा।
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