By पं. संजीव शर्मा
वैशाखी पर्व खालसा पंथ की स्थापना और साहस, अनुशासन एवं धर्म के महत्व को दर्शाता है

वैसाखी केवल फसल और उत्सव का दिन नहीं बल्कि खालसा पंथ के अवतरण की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्मृति भी है। वैसाखी 1699 को गुरु गोबिंद राय ने आनंदपुर साहिब में ऐसी घटना घटित की, जिसने सिख इतिहास ही नहीं, धर्म के अर्थ को भी नए रूप में परिभाषित कर दिया। इस दिन साधारण मानव को संत सैनिक के रूप में जागृत कर, गुरु ने उसे निर्भय, अनुशासित और ईश्वरीय चेतना से जुड़ा जीवन जीने की राह दिखा दी।
सिख मत को ईश्वरीय मार्गदर्शन के रूप में सिख धर्म कहा जाता है, जो नानक के प्रकाश से दस गुरुओं की परंपरा में प्रवाहित हुआ। इस परंपरा ने मनुष्य को यह समझाया कि यह संसार कुछ समय के लिए मिला एक अवसर है, जिसमें आत्मा ज्ञान, सेवा और साहस के माध्यम से ईश्वर की महिमा प्रकट कर सकती है।
गुरु परंपरा को समझे बिना वैसाखी और खालसा की कथा अधूरी रहती है। क्रमशः
गुरुओं की यह श्रृंखला यह याद दिलाती है कि मनुष्य वास्तव में आत्मा है, जिसने मानव रूप लेकर ईश्वर की कृपा से इस धरती पर उच्चतम जीवन जीने का अवसर पाया है।
गुरु गोबिंद राय के समय में शासक वर्ग आम लोगों पर कठोरता और अन्याय कर रहा था। धार्मिक और राजनैतिक अत्याचार के कारण वातावरण में भय और अंधकार फैल गया। इसी दौर में गुरु तेग बहादुर जी ने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना शीश तक दे दिया।
इस पृष्ठभूमि में आवश्यकता थी ऐसे अडिग, निर्भय और सच्चे मनुष्यों की, जो न केवल स्वयं धर्म पर अडिग रहें बल्कि दूसरों की रक्षा के लिए भी खड़े हो सकें। वैसाखी 1699 में गुरु गोबिंद राय ने इन्हीं उद्देश्यों के लिए खालसा पंथ की स्थापना की।
वैसाखी का अर्थ ही वसंत से जुड़ा है। वसंत प्रकृति के नवजागरण का समय है। उसी वसंत की एक वैसाखी पर 1699 में आनंदपुर साहिब के निकट विशाल संगत को बुलाया गया। किसान, व्यापारी, योगी, गायक, सैनिक, स्त्री, पुरुष और बालक, सभी रंगों और समुदायों के लोग वहां एकत्र हुए।
उस दिन गुरु गोबिंद राय एक ऊंची जगह पर खड़े होकर संगत के सामने प्रकट हुए। उनका स्वरूप तेजस्वी और संतुलित था। उनके दर्शन मात्र से लोगों के मन में प्रसन्नता आती थी।
परंतु उस दिन गुरु ने अपनी प्रेममयी कोमलता के साथ साथ एक कठोर परीक्षा भी रखी। उन्होंने अपने स्वर में अद्भुत गंभीरता लाकर तलवार म्यान से निकाली और ऊंचे स्वर में पुकारा
"क्या कोई ऐसा सिख है जो अपने सिर का दान दे सके?"
पहली बार की पुकार से लोग चकित हो गए। दूसरी बार फिर गुरु ने पुकारा, "कौन है जो अपने सिर का उपहार देगा?" तीसरी बार भी गुरु की गर्जना गूंजी। यह स्वर संगत के मन तक ही नहीं, हड्डियों तक में कंपन पैदा कर रहा था।
भय और श्रद्धा के बीच डोलते मनों के बीच एक पुरुष खड़ा हुआ। उसका नाम दया था। भय उसकी आंखों पर शासन नहीं कर रहा था। आंखों में अद्भुत भक्ति चमक रही थी। वह folded hands के साथ आगे बढ़ा और बोला
"गुरु जी, मेरा सिर आपका है।"
गुरु गोबिंद राय ने उसे तंबू के भीतर ले जाकर उसका सिर अलग कर दिया। यह दृश्य बहुतों के लिए समझ से परे था। डर, आश्चर्य और श्रद्धा, सब मिलकर संगत के भीतर उठ रहे थे।
गुरु ने रक्त से भीगी तलवार दिखाते हुए पुनः पुकारा
"मुझे एक और सिर चाहिए!"
अब संगत में और भी खलबली मच गई। फिर भी एक और पुरुष आगे आया, जिसका नाम धर्म चंद था। उसने भी अपने सिर का दान देने की प्रार्थना की। गुरु ने उसे भी भीतर ले जाकर पहले की तरह उसका सिर अलग कर दिया।
कई लोग भयवश संगत से निकलने लगे। कुछ को लगा कि यह सब समझ से बाहर और भयानक है। जो केवल मन की तर्कों में फंसे थे, वे पीछे हटते गए। पर जिनके हृदय में गुरु के प्रति प्रेम अधिक गहरा था, वे इस घटना को ईश्वरीय परीक्षा के रूप में देख रहे थे।
तीन और पुरुष आगे आए। उनके नाम थे हिम्मत, मोकम और साहिब। इन तीनों ने भी कहा
"मेरा सिर आपका है और सदा से आपका ही रहा है।"
इस प्रकार कुल पाँच पुरुषों ने निडर होकर अपने सिर का दान देने की स्वीकृति दी। ये थे
इन पाँचों को आगे चलकर पंज प्यारे कहा गया। गुरु ने उनके सिर अलग करने के बाद उन्हें एक नए रूप में पुनर्जन्म देने की तैयारी की।
इसके बाद एक बड़ी लोहे की कड़ाही लाई गई। उसमें जल भरा गया। गुरु गोबिंद राय ने अपनी दो धार वाली तलवार को उसमें डालकर हिलाना शुरू किया। जैसे जैसे वे तलवार से जल को घोलते गए, उनके मुख से बाणी प्रवाहित होने लगी।
उन्होंने प्रेममय स्वर में "इक ओंकार सतनाम करतापुरख निरभउ निरवैर अकाल मूरत अजूनी सैभंग गुरप्रसाद जपु, आद सच जुगाद सच है भी सच नानक होसी भी सच..." के साथ जपुजी साहिब का पाठ किया। यह बाणी मानव को निराशा से दूर रखकर उच्च चेतना में स्थापित करने वाली मानी जाती है।
इसके बाद उन्होंने "चक्र चिह्न अरु बरन जाति अरु पत्र नहि जोति रूप हरि آپि" से आरंभ होने वाली जाप साहिब बाणी का पाठ किया, जो गरिमा, प्रतिष्ठा और ईश्वरीय गुणों के चिंतन की प्रेरणा देती है।
फिर "स्रवग सुद्ध समूह सिधन के देख फिरेओ घर जोग जती के" से प्रारंभ तव प्रसाद सवये पढ़े, जिससे मन का असंतोष, भ्रम और अहंकार कम हो और प्रेम व संतुलन बढ़े।
इसके बाद उन्होंने अपनी प्रार्थना "हमरी करो हाथ दे रच्छा पूर्ण होउ चित की इच्चा" से शुरू चौपई साहिब का पाठ किया, जो रक्षा, विजय और भय से मुक्ति की प्रबल प्रार्थना मानी जाती है।
अंत में गुरु ने आनंद की धारा बहाते हुए आनंद साहिब का पाठ किया, "आनंदु भइआ मेरी माए सतगुरू मै पाया"। यह बाणी मन को स्थिर आनंद और संतोष की अनुभूति कराती है।
इन सभी बाणियों के स्वर, तलवार की गति और संगत की श्रद्धा से वह जल अमृत में परिवर्तित हो गया।
गुरु की पत्नी, माता जी ने उस कड़ाही में मीठी सामग्री मिलाई, ताकि इस अमृत को ग्रहण करने वाले केवल शक्तिशाली ही नहीं बल्कि मृदु और कोमल भी बने रहें। शक्ति के साथ माधुर्य का यह संतुलन खालसा का मूल गुण है।
अब समय था उन पाँचों को नया जन्म देने का। सबसे पहले गुरु ने दया को आगे बुलाया। उन्होंने अमृत को उसके सिर की चोटी, जिसे दसवां द्वार कहा जाता है, पर छिड़का। उसके मुख, आंखों और शरीर पर अमृत का संचार किया और उसे पिलाया।
गुरु ने उचारण किया
"वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह"
दया का शरीर मानो नए जीवन से भर उठा। वह पूर्ण तेजस्वी भाव से खड़ा हुआ और जोर से उत्तर दिया
"वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह"
एक एक कर, गुरु ने सभी पाँचों को अमृत दिया। हर बार गुरु की वाणी और पाँचों के उत्तर से वातावरण गूंज उठा। इस प्रक्रिया के बाद वे पाँचों नए चेतन स्तर पर, खालसा रूप में जन्मे।
खालसा का अर्थ है खालिस, अर्थात शुद्ध। अब वे ऐसे मनुष्य बने जो मृत्यु के भय से परे, सत्य के प्रति अडिग और ईश्वर की रोशनी के प्रतीक थे।
गुरु गोबिंद राय ने उन्हें सुंदर बाना पहनाया। शस्त्र, कड़ा, कच्छेरा, कंघा और केश सहित सैनिक संत का बाह्य स्वरूप प्रदान किया। ये पाँच अब केवल शिष्य नहीं रहे बल्कि गुरु के प्रतिरूप बन गए।
इस घटना का सबसे गहरा संदेश तब सामने आया, जब गुरु गोबिंद राय स्वयं उन्हीं पाँचों के सामने आए। वे एक घुटने पर झुके और विनम्र भाव से प्रार्थना की कि अब वे उनके हाथों से अमृत ग्रहण करना चाहते हैं।
पंज प्यारे ने पूछा
"गुरु जी, आप अमृत लेने के लिए क्या अर्पित करते हैं?"
गुरु गोबिंद राय ने उत्तर दिया
"हे महान खालसा, तुम्हारे लिए अपने माता पिता और अपने बच्चों तक का बलिदान देने को तैयार हूँ।"
यह सुनकर पाँचों ने उन्हें अमृत देने की स्वीकृति दी। उन्होंने भी उसी प्रकार गुरु पर अमृत छिड़का और पिलाया। इस क्षण से गुरु गोबिंद राय का नाम गुरु गोबिंद सिंह के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
इस प्रकार गुरु ने खालसा को केवल अपना अनुयायी नहीं बल्कि अपना सहभागी और स्वरूप बनाया। गुरु ने कहा कि खालसा उनका खजाना है, खालसा ही उनकी जान है और उन्हीं के कारण उनका मान है।
उस दिन हजारों पुरुष और स्त्रियां अमृत ग्रहण करने के लिए आगे आए। पुरुष सिंह के रूप में और स्त्रियां कौर के रूप में नई पहचान प्राप्त कर, आत्मबल और अनुशासन से युक्त जीवन की दिशा में आगे बढ़े।
खालसा वह है जो
गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा को केवल अमृत ही नहीं दिया बल्कि एक अनुशासित जीवन पद्धति भी दी, ताकि यह कृपा स्थिर रह सके।
कहा गया कि
मनुष्य अपने विचारों और कर्मों को गुरु को समर्पित करके भी सिर का दान दे सकता है। हल्की, निर्मल और करुणा से भरी सोच और सेवा में लगे कर्म, यही खालसा का दैनिक साधन बन सकते हैं।
सामान्य प्रश्न
वैसाखी 1699 को खालसा पंथ की स्थापना कहां और कैसे हुई?
वैसाखी 1699 को आनंदपुर साहिब के निकट विशाल संगत के सामने गुरु गोबिंद राय ने पाँच निडर शिष्यों से सिर का दान लेकर अमृत तैयार किया, उन्हें खालसा रूप में दीक्षा दी और वही खालसा पंथ की औपचारिक स्थापना का दिन माना गया।
पंज प्यारे कौन थे और उनके नाम क्या हैं?
पंज प्यारे वे पाँच प्रेमी शिष्य थे जिन्होंने बिना भय के गुरु के बुलावे पर अपने सिर का दान देने की स्वीकृति दी। उनके नाम हैं भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई हिम्मत सिंह, भाई मोकम सिंह और भाई साहिब सिंह।
अमृत संचार के समय गुरु ने कौन सी प्रमुख बाणियों का पाठ किया?
अमृत तैयार करते समय गुरु गोबिंद राय ने जपुजी साहिब, जाप साहिब, तव प्रसाद सवए, चौपई साहिब और आनंद साहिब का पाठ किया। इन बाणियों से अमृत में शक्ति, संरक्षण, आनंद और संतुलन के गुण स्थापित किए गए।
गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह नाम क्यों हुआ?
जब गुरु ने स्वयं पंज प्यारे से अमृत ग्रहण किया तब वे उसी रीति से खालसा में दीक्षित हुए जिस प्रकार उन्होंने उन्हें दीक्षित किया था। इसी के बाद उन्हें गुरु गोबिंद सिंह के नाम से जाना जाने लगा।
आज के समय में खालसा की भावना को कैसे अपनाया जा सकता है?
खालसा की भावना को अपनाने का अर्थ है भय से ऊपर उठकर सत्य, न्याय और करुणा पर अडिग रहना। अनुशासित जीवन, ईमानदार कर्म, बाणी का अभ्यास, सेवा और गुरु के प्रति समर्पण के माध्यम से कोई भी व्यक्ति खालसा के आदर्शों के निकट जा सकता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, आध्यात्मिकता और कर्म
इनके क्लाइंट: दि., उ.प्र., म.हा.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें