By पं. नरेंद्र शर्मा
वरुथिनी एकादशी व्रत से भय मुक्ति, पाप क्षय और जीवन में सहायता प्राप्त होती है

वैदिक परंपरा में एकादशी तिथियों को अत्यंत पवित्र माना जाता है। हर एकादशी का अपना नाम, व्रत विधान और आध्यात्मिक फल बताया गया है। इन्हीं में वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विशेष रूप से वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। यह तिथि भय, पाप और जीवन की कठिन परिस्थितियों से उबारने वाली एक शक्तिशाली व्रत तिथि मानी गई है।
चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी के बाद जब वैशाख कृष्ण पक्ष आता है, तो उस पक्ष की एकादशी वरुथिनी नाम से जानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के विशेष उपासना स्वरूप के रूप में वराह अवतार की पूजा और व्रत करने का विधान है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से भय से पीड़ित व्यक्ति को साहस मिलता है और पूर्व जन्मों के दोषों का भी शमन होने लगता है।
धर्मराज युधिष्ठिर ने जब भगवान श्रीकृष्ण से वैशाख कृष्ण एकादशी के नाम और महत्व के बारे में पूछा तब श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी का नाम वरुथिनी है। वरुथिनी शब्द का अर्थ सुरक्षा देने वाली, रक्षा प्रदान करने वाली और जीवन के दु:खों से आच्छादन करने वाली शक्ति के रूप में समझा जा सकता है।
यह एकादशी
संक्षेप में इस एकादशी से जुड़े प्रमुख बिंदु इस सारणी से स्पष्ट हो सकते हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| तिथि | वैशाख मास, कृष्ण पक्ष की एकादशी |
| नाम | वरुथिनी एकादशी |
| उपास्य देव | भगवान विष्णु, विशेष रूप से वराह अवतार की मूर्ति |
| मुख्य फल | पाप शमन, भय से मुक्ति, अंग और भाग्य की पुनःस्थापना, मोक्ष का मार्ग |
| अनुशंसा | भय, पीड़ा और पूर्व जन्म के दोषों से ग्रस्त साधकों के लिए विशेष रूप से लाभकारी |
महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने अनेक एकादशियों के विषय में भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किए। उन्होंने पहले चैत्र शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी के बारे में श्रवण किया। उसके बाद उन्होंने निवेदन किया कि अब वैशाख कृष्ण एकादशी का नाम, उसकी विधि और उसके महात्म्य के बारे में विस्तार से बताने की कृपा की जाए।
भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक उत्तर देते हुए कहा कि वैशाख कृष्ण एकादशी को वरुथिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह एकादशी सौभाग्य प्रदान करने वाली, सभी पापों को नष्ट करने वाली और अंत समय में मोक्ष देने वाली है। इसके बाद उन्होंने इस व्रत से जुड़ी पावन कथा सुनाई, जो राजा मान्धाता के प्रसंग से संबंधित है।
बहुत प्राचीन समय में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक पराक्रमी राजा राज्य करते थे। वे दानशील, तपस्वी और धर्मपरायण थे। राजसत्ता के बीच भी उनका मन तप और साधना में सुरक्षित रहता था।
एक बार राजा मान्धाता वन में एकांत स्थान पर बैठकर तपस्या कर रहे थे। ध्यान में लीन होकर वे अपने शरीर की पीड़ा या बाहरी वातावरण की हलचल की परवाह किए बिना केवल ईश्वर चिंतन में तल्लीन थे। ठीक उसी समय जंगल की ओर से एक जंगली भालू वहां आ पहुंचा।
जंगली भालू ने अचानक राजा पर हमला कर दिया और उनके पैर को चबाने लगा। सामान्य दृष्टि से देखें तो यह अत्यंत भयानक और कष्टदायक स्थिति थी। फिर भी राजा मान्धाता ने अपने तापस धर्म का पालन करते हुए क्रोध, हिंसा और प्रतिशोध की भावना को नहीं अपनाया।
भालू राजा का पैर चबाता रहा और धीरे धीरे उन्हें घसीटते हुए पास के घने जंगल की ओर ले गया। राजा के लिए यह अत्यंत कठिन परीक्षा का समय था। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने मन को यथासंभव स्थिर रखा और हिंसा के स्थान पर भगवान विष्णु के स्मरण को ही अपना सहारा बनाया। जब पीड़ा असहनीय होने लगी तब उन्होंने अत्यंत करुण भाव से भगवान श्रीहरि विष्णु का आह्वान किया।
राजा के हृदय से निकली यह पीड़ा मिश्रित प्रार्थना निष्फल नहीं गई। भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने सुदर्शन चक्र से उस भालू का संहार कर दिया, जिसने राजा के शरीर को चोट पहुंचाई थी। भालू का वध हो गया, परंतु राजा का पैर पहले ही भालू खा चुका था।
अपना पैर खो देने के कारण राजा अत्यंत शोकाकुल हो गए। वे सोचने लगे कि अब अपूर्ण अंगों के साथ राजकर्म, सेवा और तपस्या कैसे हो सकेगी। भगवान विष्णु ने राजा की यह पीड़ा देखी और करुणा से भर उठे।
भगवान विष्णु ने राजा मान्धाता से मधुर वचनों में कहा
हे वत्स, शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और श्रद्धापूर्वक वरुथिनी एकादशी का व्रत करो। उस दिन मेरी वराह अवतार मूर्ति की विशेष पूजा करना। इस व्रत और पूजा के प्रभाव से तुम्हारे अंग पुनः सुदृढ़ और सुंदर हो जाएंगे।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भालू के द्वारा किए गए इस आक्रमण की जड़ राजा के पूर्व जन्म के अपराध में छिपी हुई थी। वर्तमान जीवन में भले वे धर्मपरायण और तपस्वी हों, परंतु पूर्व जन्म के कुछ अशुभ कर्म अभी भी शेष थे, जिनका परिणाम यह दुखद प्रसंग बनकर सामने आया।
भगवान के इस सलाह से राजा को समझ आया कि केवल वर्तमान के सत्कर्म ही नहीं बल्कि पूर्व जन्म के कर्म भी जीवन में फलस्वरूप आते हैं और उचित साधना द्वारा उनका शमन संभव है।
भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता मथुरा पहुंचे। वहां उन्होंने भावपूर्वक वरुथिनी एकादशी का व्रत करने का संकल्प लिया। एकादशी के दिन उन्होंने विधिवत उपवास रखा, भगवान विष्णु के वराह रूप की मूर्ति की पूजा की और भगवान का ध्यान करते हुए दिन व्यतीत किया।
व्रत पूर्ण होने पर कुछ ही समय में राजा के शरीर पर आश्चर्यजनक परिवर्तन दिखाई देने लगे। जो पैर भालू द्वारा खाया जा चुका था, वह पुनः सुदृढ़, सुंदर और पूर्ववत हो गया। राजा का शरीर फिर से पूर्ण अंगों वाला हो उठा। इस अनोखे अनुभव के बाद राजा मान्धाता के मन में वरुथिनी एकादशी के प्रति गहरा श्रद्धाभाव और दृढ़ विश्वास स्थापित हो गया।
शास्त्रार्थों में यह भी कहा गया है कि इसी वरुथिनी एकादशी के प्रभाव से राजा मान्धाता को अंत समय में स्वर्ग की प्राप्ति हुई।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो भी व्यक्ति भय से पीड़ित हो या जीवन में किसी प्रकार की दुरवस्था, अपराधबोध या पाप फल से ग्रस्त हो, उसे वरुथिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
इस व्रत के माध्यम से
यह व्रत केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं बल्कि भीतर से आत्मशुद्धि, प्रायश्चित्त और ईश्वरीय शरणागति की साधना भी है।
राजा मान्धाता की कथा यह समझाती है कि
इस प्रकार वरुथिनी एकादशी व्रत साधक को यह प्रेरणा देता है कि भय, कर्मफल और शारीरिक या मानसिक पीड़ा के बीच भी ईश्वर पर भरोसा रखकर, अपनी ओर से जो संभव साधना हो, वह पूरी निष्ठा से करनी चाहिए।
सामान्य प्रश्न
वरुथिनी एकादशी किस महीने और पक्ष की एकादशी है?
वरुथिनी एकादशी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। इसे सौभाग्य, पाप शमन और मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी के रूप में वर्णित किया गया है।
इस एकादशी का नाम वरुथिनी क्यों रखा गया है?
वरुथिनी का अर्थ है रक्षा और आवरण देने वाली। यह एकादशी भय, पाप और कठिन परिस्थितियों से साधक की रक्षा करने वाली मानी जाती है, इसलिए इसे वरुथिनी कहा जाता है।
राजा मान्धाता को भालू द्वारा काटे जाने की घटना किस बात का प्रतीक है?
यह प्रसंग दिखाता है कि पूर्व जन्म के अपराध वर्तमान जीवन में भी फलित हो सकते हैं। साथ ही यह भी कि तपस्वी होने के बाद भी मनुष्य को कर्मफल से सीख लेकर आगे की साधना को और गहरा करना होता है।
भगवान विष्णु ने राजा मान्धाता को कौन सा उपाय बताया?
भगवान विष्णु ने राजा को मथुरा जाकर वरुथिनी एकादशी का व्रत करने और अपने वराह अवतार की मूर्ति की पूजा करने का निर्देश दिया। इसी व्रत के प्रभाव से राजा के कटे हुए अंग पुनः सुदृढ़ हो गए।
भय और पाप से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह व्रत कैसे सहायक है?
जो व्यक्ति भयग्रस्त हो या अपने पापों से अत्यधिक दुखी हो, वह वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु का स्मरण करे, तो शास्त्रों के अनुसार उसके पापों का क्षय होकर उसे मोक्ष मार्ग की दिशा में शांति और संबल प्राप्त होता है।
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