विकट संकष्टी और दस भुज वाला सिंह वाहन गणपति की कथा

By पं. अमिताभ शर्मा

विकट संकष्टी में गणपति की विशेष पूजा और संकट निवारण का महत्व

विकट संकष्टी और गणपति पूजा का महत्व

गणेश उपासना में संकष्टी चतुर्थी को विशेष रूप से बाधा निवारण और मनोकामना पूर्ति का दिवस माना जाता है। इन्हीं संकष्टी तिथियों में से एक अत्यंत प्रभावशाली तिथि है विकट संकष्टी, जो भगवान गणेश के विकट रूप की आराधना के लिए मानी जाती है। विकट संकष्टी चतुर्थी वैदिक दृष्टि से केवल व्रत का दिन नहीं बल्कि बुद्धि, साहस और आध्यात्मिक संकल्प को सुदृढ़ करने का अवसर भी समझी जाती है।

वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह विशेष संकष्टी मनाई जाती है। इस दिन भक्त गणेश जी के विकट महा गणपति रूप की पूजा करते हैं। यह रूप दस भुजाओं वाला और सिंहवाहन माना गया है। मान्यता है कि इस तिथि पर पूर्ण श्रद्धा से उपवास और पूजा करने पर जीवन के संकट, विशेष रूप से बुद्धि और संचार से जुड़े अवरोध, धीरे धीरे कम होते हैं।

विकट संकष्टी कब और क्यों मनाई जाती है

हिंदू पंचांग के अनुसार विकट संकष्टी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आती है। यह वही चतुर्थी है जिसे संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है, पर इस दिन पूजित गणेश रूप का नाम विकट होता है। शब्द विकट का अर्थ है कठिन परिस्थितियों को काटने वाला, संकटों को दूर करने वाला।

इस दिन व्रत रखने, चंद्र दर्शन के बाद चंद्र को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलने और विशेष गणेश मंत्र तथा कथा के श्रवण का विधान है। पारंपरिक रूप से इसे ऐसा दिन माना जाता है जिस पर गणेश जी की कृपा से मानसिक उलझन, आर्थिक बाधा और ग्रहदोष, विशेषकर बुध ग्रह से संबंधित कठिनाइयों में राहत मिल सकती है।

संक्षेप में तिथि और प्रमुख पहलुओं को इस सारणी से समझा जा सकता है।

विषय विवरण
उत्सव का नाम विकट संकष्टी चतुर्थी
मास और पक्ष वैशाख मास, कृष्ण पक्ष
तिथि चतुर्थी, चंद्र के क्षयमान पक्ष की चौथ
पूज्य देवता विकट महा गणपति, दस भुजाओं वाले सिंहवाहन गणेश
प्रमुख फल बाधा निवारण, बुधदोष शमन, मानसिक स्पष्टता, आध्यात्मिक संबल

विकट गणपति का स्वरूप क्या है

विकट गणपति, भगवान गणेश के बत्तीस विग्रहों में से एक अद्वितीय और कुछ हद तक उग्र माने जाने वाला रूप है। इस रूप में गणेश जी को दस भुजाओं के साथ, तेजस्वी सिंह पर विराजित बताया गया है।

दस भुजाएं इस बात का प्रतीक हैं कि गणेश जी जीवन के अनेक क्षेत्रों में एक साथ सुरक्षा, मार्गदर्शन और शक्ति प्रदान कर सकते हैं। सिंहवाहन निर्भयता, राजसत्ता पर नियंत्रण और अहंकार पर विजय के भाव का प्रतीक माना जाता है। विकट रूप की पूजा इस विश्वास के साथ की जाती है कि जीवन में छिपी हुई नकारात्मक शक्तियां, भय और दुर्बलता धीरे धीरे दूर होने लगें।

भक्तों की मान्यता है कि विकट गणपति की आराधना से

  • नकारात्मक प्रभावों और अदृश्य बाधाओं से सुरक्षा मिलती है
  • मन में साहस, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता बढ़ती है
  • बुद्धि, वाणी और संचार से जुड़े अवरोध कम होते हैं

विकट संकष्टी की पौराणिक पृष्ठभूमि

संकष्टी से जुड़ी कथाओं में चंद्रदेव और गणेश का प्रसंग विशेष रूप से प्रसिद्ध है। एक कथा के अनुसार एक बार चंद्रदेव ने गणेश जी के विघ्नहर्ता रूप के बाह्य स्वरूप पर उपहास कर दिया। इससे भगवान गणेश क्रुद्ध हुए और उन्होंने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि जो भी व्यक्ति उन्हें देखकर उस दिन कुछ अनुचित बोलेगा या झूठ बोलेगा, वह संकट में पड़ेगा।

चंद्रदेव के क्षमायाचन करने पर भी श्राप पूरी तरह निरस्त नहीं हुआ बल्कि उसका प्रभाव कुछ कम किया गया। विकट संकष्टी जैसे दिनों को वही समय माना जाता है जब चंद्र पर पड़े दोष का कुछ शमन होता है और आकाशीय संतुलन पुनः स्थापित होने की प्रतीकात्मक स्मृति की जाती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी प्रकार के प्रसंगों के बाद भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं में अग्रपूज्य घोषित किया। तभी से किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ या देवी देवता की पूजा से पहले गणेश वंदना और गणेश पूजन की परंपरा आरंभ हुई। इस दृष्टि से विकट संकष्टी केवल उपवास का दिन नहीं बल्कि गणेश जी के सर्वोच्च आदर की स्मृति का भी पर्व है।

विकट संकष्टी की ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्ता

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार विकट संकष्टी विशेष रूप से बुध ग्रह से संबंधित कठिनाइयों के शमन के लिए प्रभावी मानी जाती है। बुध बुद्धि, वाणी, लेखन, संवाद, व्यापार और विश्लेषण शक्ति का ग्रह माना गया है। जिन लोगों को निर्णय में भ्रम, संवाद में रुकावट, पढ़ाई में एकाग्रता की कमी या व्यापारिक स्तर पर अस्थिर विचारों की समस्या हो, उनके लिए यह व्रत विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

माना जाता है कि

  • छात्र, शोधकर्ता और लेखक विकट संकष्टी के व्रत से विचारों की स्पष्टता और स्मरणशक्ति में वृद्धि की प्रार्थना कर सकते हैं
  • प्रोफेशनल जीवन में संवाद और प्रस्तुति कौशल से जुड़े अवरोध कम होने की साधना के लिए भी यह दिन उपयोगी है
  • जो लोग आंतरिक शांति और ऊर्जा संतुलन चाहते हैं, उनके लिए भी यह उपवास लाभकारी माना जाता है

चूंकि यह तिथि चंद्र के क्षयमान पक्ष की चतुर्थी है, इसलिए इसे मन और अहंकार के संकुचन तथा आत्मचिंतन के लिए भी अनुकूल माना जाता है। इस दिन की गई साधना धीरे धीरे भीतर के तनाव, अव्यवस्था और नकारात्मकता को पिघलाने में सहायक मानी जाती है।

विकट संकष्टी व्रत कथा की मुख्य धारा

व्रत कथा का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ा है। एक बार कैलाश पर शिव और पार्वती चौरस नामक पासे का खेल खेल रहे थे। खेल की निष्पक्षता के लिए शिव ने एक बालक की रचना की और उससे कहा कि वह न्यायपूर्ण निर्णायक बनकर खेल का परिणाम बताए।

खेल आरंभ हुआ। तीन बार लगातार पार्वती जी ने खेल में विजय प्राप्त की, पर बालक ने हर बार विजयी के रूप में शिव का नाम ही घोषित किया। यह देखकर पार्वती जी रुष्ट हो गईं और उन्हें लगा कि बालक पक्षपात कर रहा है। क्रोध में आकर उन्होंने उस बालक को श्राप दे दिया कि वह दलदल में रहकर कष्ट भरा जीवन जीए।

श्राप सुनते ही बालक दुख से व्याकुल हो गया। उसने पार्वती जी से क्षमा और मार्गदर्शन की प्रार्थना की। तब पार्वती जी का हृदय पिघला और उन्होंने उसे संकेत दिया कि भविष्य में नाग कन्याएं आएंगी, तुम उनके माध्यम से विकट संकष्टी व्रत की विधि सीखना और विधानपूर्वक इक्कीस दिन तक यह व्रत करना।

बालक ने निर्देशानुसार व्रत किया, विकट संकष्टी का अनुष्ठान पूर्ण श्रद्धा से निभाया और परिणामस्वरूप उस पर लगा श्राप हट गया। वह दलदल से मुक्त होकर शांत और संतुलित जीवन की ओर लौट सका। इस कथा का संकेत यह है कि

  • गलत निर्णय या पक्षपात से उत्पन्न संकट भी उचित व्रत, प्रायश्चित्त और साधना से हल हो सकते हैं
  • विकट संकष्टी व्रत कठिन परिस्थितियों के बीच भी धैर्य और विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देता है

गणेश जन्म प्रसंग और विकट संकष्टी से संबंध

संकष्टी की कथाओं में गणेश जन्म का प्रसंग भी अक्सर सुनाया जाता है। एक व्रत कथा के रूप में यह भी विकट संकष्टी से जोड़ी जाती है।

कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगे हल्दी के उबटन से एक बालक की रचना की और उसका नाम विनायक रखा। उन्होंने उसे आदेश दिया कि जब तक वे स्नान कर रही हों, कोई भी अंदर न आए।

इसी बीच भगवान शिव वहां पहुंचे और भीतर जाना चाहा। विनायक ने माता के आदेशानुसार शिव को भी रोक दिया। स्थिति टकराव तक पहुंची और क्रोधावेश में शिव ने विनायक का सिर अलग कर दिया। जब पार्वती जी को यह ज्ञात हुआ तो वे शोक और क्रोध से भर गईं और उन्होंने समस्त सृष्टि का संहार करने का संकल्प व्यक्त किया।

स्थिति को शांत करने के लिए शिव ने अपने गणों को भेजा कि वे वन में मिले प्रथम जीव के सिर को लाकर विनायक के शरीर पर स्थापित करें। गणों को एक हाथी का शिशु मिला। उसका सिर लाकर विनायक के धड़ पर स्थापित किया गया। इस प्रकार बालक को गणेश के रूप में नवीन जन्म मिला।

कथा में यह भी आता है कि इस संकट को शांत करने और पार्वती जी के क्रोध को शमन करने के लिए स्वयं शिव ने भी गणेश व्रत और संकष्टी जैसे उपवासों का पालन किया। इसी परंपरा के विस्तार के रूप में विकट संकष्टी व्रत की महिमा कही जाती है, जो पारिवारिक सौहार्द और मातृ सुख की प्राप्ति से भी जुड़ी मानी जाती है।

विकट संकष्टी व्रत करने के लाभ

ग्रंथों और परंपराओं में विकट संकष्टी व्रत को अनेक प्रकार के कल्याणकारी फल देने वाला माना गया है। संक्षेप में कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार बताए जाते हैं।

  • जीवन से नकारात्मक प्रभावों और अदृश्य बाधाओं का धीरे धीरे क्षय
  • पिछले और वर्तमान जीवन के कर्म ऋणों के शमन की प्रार्थना का सशक्त माध्यम
  • स्त्रियों के लिए मातृ सुख, संतान प्राप्ति और गर्भस्थ शिशु की रक्षा की कामना
  • विद्यार्थियों, लेखकों, वक्ताओं और पेशेवरों के लिए बुद्धि, स्मरणशक्ति और वाणी में स्थिरता
  • दांपत्य जीवन में सौहार्द, विश्वास और आपसी सम्मान की वृद्धि
  • आर्थिक कठिनाइयों और अस्थिरता से बाहर आने के लिए संकल्प शक्ति और व्यावहारिक सूझबूझ में वृद्धि

इन सबके मूल में यह भाव रहता है कि गणेश जी विघ्नहर्ता हैं और विकट रूप में वे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी साधक को सही मार्ग दिखा सकते हैं।

विकट संकष्टी व्रत पूजन विधि कैसे करें

विकट संकष्टी के दिन व्रत और पूजा की विधि अपेक्षाकृत सरल पर अनुशासित मानी जाती है। इसे कुछ चरणों में समझा जा सकता है।

  1. ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठकर घर की शुद्धि और स्नान।
  2. स्वच्छ और संभव हो तो लाल या पीत वर्ण के वस्त्र धारण करना।
  3. दिन भर उपवास का संकल्प लेना। जिनके लिए कठिन हो, वे फल, दूध, नारियल जल और लघु सात्त्विक आहार से व्रत निभा सकते हैं।
  4. पूजा स्थान या एक स्वच्छ चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करना।
  5. पंचामृत से गणेश विग्रह का अभिषेक करना, फिर स्वच्छ जल से स्नान कराकर वस्त्र और चंदन, कुंकुम, अक्षत, दुर्वा, फूल चढ़ाना।
  6. तिल, गुड़, केले, मोदक, बूंदी लड्डू और विशेष रूप से लाल या जाफरी रंग के पुष्प अर्पित करना।
  7. घी का दीपक और धूप, अगरबत्ती प्रज्वलित करके गणेश आरती करना।
  8. श्रद्धा से विकट संकष्टी व्रत कथा का पाठ या श्रवण करना।
  9. गणेश मंत्रों का जप, विशेष रूप से
    • “ॐ गं गणपतये नमो नमः” का 108 बार जप
    • “ॐ वक्रतुण्डाय नमः” का 11 बार जप
    • चाहें तो वक्रतुण्ड महाकाय स्तुति और गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ भी किया जा सकता है।
  10. दिन भर ब्रह्मचर्य, संयम और संभव हो तो मौन या मितभाषी रहने का प्रयास।
  11. सायंकाल चंद्र दर्शन के समय चंद्रदेव को जल से अर्घ्य अर्पित करके, गणेश जी की प्रार्थना के साथ व्रत का पारण करना।
  12. दान धर्म के रूप में गाय को चारा, भूखे को भोजन, ब्राह्मण या जरूरतमंद को दक्षिणा, वस्त्र या अन्न देना।

व्रत के दौरान अनावश्यक क्रोध, कटु वचन, छल कपट और अपवित्रता से बचना भी व्रत का हिस्सा माना जाता है।

विकट संकष्टी पर विशेष गणपति मंत्र और साधना

जिन साधकों को गणेश मंत्र साधना में विशेष रुचि हो, वे विकट संकष्टी के दिन कुछ विशिष्ट मंत्रों का जप कर सकते हैं। उदाहरण के लिए

  • “ॐ गं गणपतये नमो नमः”
  • “ॐ वक्रतुण्डाय नमः”
  • “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा”

ऐसे मंत्र जप के समय ध्यान रखा जाता है कि उद्देश्य केवल किसी पर अधिकार प्राप्त करना नहीं बल्कि अपने भीतर की उलझन, भय और अस्थिरता को शांत करके विवेक और संतुलन को बढ़ाना है।

साधक के जीवन में विकट संकष्टी का मार्गदर्शन

विकट संकष्टी व्रत साधक को यह याद दिलाता है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां केवल बाहरी परिस्थितियां नहीं बल्कि अक्सर भीतर की असावधानी, भ्रम और अधूरी समझ से भी जुड़ी होती हैं। गणेश जी के विकट रूप की उपासना के माध्यम से भक्त यह संकल्प ले सकता है कि

  • निर्णय से पहले सोच विचार और संयम को महत्व देगा
  • संवाद में स्पष्टता, ईमानदारी और विनम्रता अपनाने का प्रयास करेगा
  • पुराने कर्मों और आदतों को पहचानकर उन्हें सुधारने की दिशा में बढ़ेगा

इस प्रकार यह व्रत केवल एक दिन का उपवास न रहकर, आत्म अनुशासन, मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक प्रगति की सतत साधना की ओर पहला कदम बन सकता है।

सामान्य प्रश्न

विकट संकष्टी किस मास और तिथि को आती है?
विकट संकष्टी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मानी जाती है। यह संकष्टी चतुर्थी का ही एक विशेष रूप है, जिसमें भगवान गणेश के विकट महा गणपति स्वरूप की पूजा की जाती है।

विकट गणपति का स्वरूप अन्य गणेश रूपों से कैसे भिन्न है?
विकट गणपति दस भुजाओं वाले और सिंहवाहन रूप में वर्णित हैं। यह रूप उग्रता, निर्भयता और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जाता है, जबकि अन्य रूपों में वाहन और भुजाओं की संख्या भिन्न हो सकती है।

क्या विकट संकष्टी व्रत विशेष रूप से बुध ग्रह से संबंधित समस्याओं के लिए किया जाता है?
परंपरा में यह माना जाता है कि विकट संकष्टी खासतौर पर बुध से जुड़े अवरोध जैसे विचारों की उलझन, संवाद की रुकावट और अध्ययन में बाधा के शमन के लिए उपयोगी है। हालांकि व्रत का मूल उद्देश्य गणेश कृपा से समग्र बाधा निवारण और बुद्धि की शुद्धि है।

क्या यह व्रत केवल पुरुषों के लिए है या महिलाएं भी रख सकती हैं?
यह व्रत स्त्री पुरुष दोनों के लिए समान रूप से उपयुक्त माना जाता है। विशेष रूप से मातृत्व सुख, संतान सुरक्षा और दांपत्य सौहार्द की कामना करने वाली महिलाएं भी श्रद्धा से यह व्रत रखती हैं।

विकट संकष्टी व्रत में किन चीजों से परहेज करना चाहिए?
व्रत के दौरान अनाज, तामसिक भोजन, नशा और अधिक बोलने से बचने की सलाह दी जाती है। क्रोध, कटु भाषा, झूठ और किसी भी प्रकार के छल से परहेज करना चाहिए। फल, दूध, नारियल जल और सात्त्विक आहार के साथ संयमपूर्वक दिन बिताना व्रत की भावना के अनुरूप माना जाता है।

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पं. अमिताभ शर्मा

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