विषु और केरल का शुभ नववर्ष

By पं. सुव्रत शर्मा

विषु पर सूर्य के मेष राशि प्रवेश के साथ नए साल की शुरुआत और शुभ संकेतों का महत्व

विषु और केरल नववर्ष का महत्व

भारतीय परंपरा में हर शुभ कार्य की शुरुआत अत्यंत सावधानी से की जाती है। यह मान्यता है कि यदि पहला कदम सही हो तो आगे की यात्रा भी संतुलित और सफल बनती है। इसी भाव के साथ केरल में जब सूर्य सिडेरियल मेष राशि, अर्थात अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है तब विषु के रूप में नववर्ष का स्वागत किया जाता है। इस दिन को राशि आधारित नए वर्ष की शुरुआत माना जाता है और पूरे वर्ष की दिशा के लिए इसे अत्यंत शुभ क्षण समझा जाता है।

विषु पर यह माना जाता है कि प्रातःकाल आंख खुलते ही जो दृश्य सबसे पहले दिखाई देता है, वही पूरे वर्ष के अनुभव और भाव का संकेत देता है। इसलिए इस सुबह को विशेष रूप से पवित्र और मनन के योग्य समय माना जाता है। वर्ष भर के लिए मंगल, समृद्धि और प्रकाश का संकल्प इसी दिन के माध्यम से किया जाता है।

विषु और ज्योतिषीय नववर्ष का आधार

केरल में मनाया जाने वाला विषु राशि आधारित नववर्ष है, जिसे सूर्य के सिडेरियल मेष में प्रवेश से जोड़ा जाता है। यह सौर नववर्ष से अलग है, जहां सूर्य भूमध्य रेखा को पार करके उत्तर की दिशा की ओर बढ़ता है।

ज्योतिषीय और सौर नववर्ष के इस अंतर को समझने के लिए यह सारणी उपयोगी रहती है।

विषय विवरण
नववर्ष का प्रकार राशि आधारित ज्योतिषीय नववर्ष
सूर्य का गोचर सिडेरियल मेष राशि में, अश्विनी नक्षत्र क्षेत्र में प्रवेश
केरल में मान्यता विषु के रूप में नववर्ष का आरंभ
अन्य नाम अन्य प्रदेशों में समान भाव उगादि, गुड़ी पड़वा, बिहू, बैसाखी आदि से जुड़े
भ्रम की स्थिति अक्सर सौर नववर्ष समझ लिया जाता है, जबकि यह स्थिर राशि आधारित नववर्ष है

प्राचीन गणनाओं के समय सौर नववर्ष और राशि नववर्ष लगभग एक ही समय पर आते थे। बाद में खगोलीय कारणों से सौर नववर्ष की तिथि धीरे धीरे आगे खिसकती गई, जबकि राशि नववर्ष स्थिर रहा, जिससे आज यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

विषु और भारत के अन्य नववर्ष उत्सवों का संबंध

केवल केरल ही नहीं, पूरे भारत में इसी समय के आसपास नववर्ष जैसे पर्व मनाए जाते हैं। नाम भिन्न हैं, पर भाव एक समान है, कि नया वर्ष प्रकाश, समृद्धि और धर्मशीलता के साथ शुरू हो।

कुछ प्रमुख क्षेत्रीय पर्व इस प्रकार हैं।

  • आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादि
  • महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा
  • असम में बिहू
  • पंजाब में बैसाखी

इन सभी में वर्ष के आरंभ, फसल, नए संकल्प और ईश्वरीय कृपा के प्रति आभार का भाव प्रमुख रहता है। विषु इसी श्रेणी का केरल का प्रमुख नववर्ष पर्व है।

विषुका‍नी क्या है और इसे इतना शुभ क्यों माना जाता है

विषु पर्व का केंद्र बिंदु है विषुक्कनी। मलयालम शब्द कनि का अर्थ है “सबसे पहले दिखाई देने वाली वस्तु”। इस आधार पर विषुक्कनी का अर्थ हुआ “विषु की सुबह सबसे पहले देखे जाने वाला पवित्र दृश्य”।

मान्यता यह है कि यदि वर्ष की पहली दृष्टि अत्यंत शुभ वस्तुओं और ईश्वरीय प्रतीकों पर पड़े, तो मन में वही भाव पूरे वर्ष तक बना रहता है। यह केवल शुभ संकेत नहीं बल्कि मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता, दोनों की दृष्टि से अत्यंत गहरा अभ्यास है।

आमतौर पर घर की माता या दादी रात में पूजाघर में यह विशिष्ट सजावट तैयार करती हैं। वे इसे सजाकर वहीं विश्राम करती हैं ताकि ब्रह्म मुहूर्त, लगभग भोर 4 से 6 बजे के बीच, सबसे पहले वही शुभ दृश्य देख सकें।

विषुक्कनी की तैयारी कैसे होती है

विषुक्कनी एक विस्तृत और आध्यात्मिक रूप से सजाई गई पवित्र झांकी की तरह होता है। इसमें हर वस्तु का अपना प्रतीकात्मक अर्थ होता है।

मुख्य तत्व इस प्रकार हैं।

  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र
  • पुष्प, फल और सब्जियां
  • धान या चावल और हल्दी से बना अक्षत
  • उरुलि नामक पात्र, प्रायः पंचधातु से बना
  • चमकदार किंडी, विशेष पीतल का जलपात्र
  • वल कन्नाड़ी, लंबा हैंडल वाला दर्पण
  • दो टुकड़ों में बंटे नारियल के खोल में बने दीपक
  • सोने के सिक्के और सोने के रंग वाले फल सब्जियां
  • कोई आध्यात्मिक ग्रंथ, जैसे भगवद्गीता

इन सबको इस प्रकार सजाया जाता है कि एक नजर में प्रकाश, समृद्धि, ज्ञान, धन और ईश्वरीय उपस्थिति का अनुभव हो।

अक्षत, उरुलि और पंचधातु का प्रतीकात्मक अर्थ

विषुक्कनी में एक विशेष पात्र उरुलि का बड़ा महत्व है। इसमें अक्षत रखा जाता है, जो चावल और हल्दी के मिश्रण से बनता है। यह दो भागों में होता है, छीले हुए और बिना छीले हुए चावल। इससे यह भाव व्यक्त होता है कि जीवन में स्थूल और सूक्ष्म, दोनों स्तरों पर समृद्धि और सुरक्षा की कामना की जा रही है।

उरुलि प्रायः पंचधातु से बना होता है। पंचधातु पांच धातुओं का समुच्चय है, जो पांच महाभूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार यह पात्र स्वयं पूरे ब्रह्मांड की रचना का छोटा प्रतीक बन जाता है।

उसी उरुलि के मध्य किंडी रखा जाता है। किंडी में सलीके से तह किया साफ कपड़ा पंखे की तरह खोंसा जाता है और उसी में वल कन्नाड़ी अर्थात विशेष दर्पण लगाया जाता है। यह पूरा संयोजन देवता, साधक और संसार के बीच एक गहरा आध्यात्मिक सेतु बनाता है।

विषु दीप और प्रकाश का आध्यात्मिक संदेश

उरुलि में दो विशेष दीप भी रखे जाते हैं। यह दीप नारियल के दो आधे टुकड़ों में बनाए जाते हैं। उनमें तेल भरकर कपड़े की बाती रखी जाती है। कपड़े को इस प्रकार मोड़ा जाता है कि उसका निचला भाग तेल में स्थिर रहे और ऊपरी भाग सीधा खड़ा होकर अच्छी तरह जले।

इन दीपों का जलना केवल सजावट नहीं बल्कि स्पष्ट संदेश है कि जीवन में अज्ञान रूपी अंधकार को दूर रखने के लिए ज्ञान रूपी प्रकाश आवश्यक है।

दीप जलाकर भगवान को घर में आमंत्रित किया जाता है। साथ ही यह संकल्प भी किया जाता है कि मन में भी प्रकाश बना रहे, ताकि निर्णय शुद्ध रहें और वर्ष भर के कर्म संतुलित रहें।

विषु में स्वर्ण, कनिक्कोन्ना और समृद्धि का संकेत

विषुक्कनी में स्वर्ण रंग प्रमुख रहता है। सोने के सिक्के, पीतल के बर्तन, हल्दी मिला अक्षत और स्वर्ण वर्ण फल सब्जियां, सब मिलकर समृद्धि और तेजस्विता का प्रतीक बनते हैं।

विशेष महत्व रखता है कनिक्कोन्ना नामक पीला पुष्प, जो श्रीकृष्ण से भी जुड़ा माना जाता है। यह फूल केवल उसी समय खिलता है जब सूर्य ज्योतिष में अपने सबसे ऊंचे बल वाले क्षेत्र में होता है। इस प्रकार यह सूर्य, प्रकाश और भगवान विष्णु के काल पुरुष रूप का प्रतीक बन जाता है।

उसी प्रकार केले, कटहल, सुनहरे खीरे जैसी वस्तुएं भी विषुक्कनी में सजाई जाती हैं। यह सब मिलकर यह संदेश देते हैं कि आने वाला वर्ष अन्न, धन, भाव और ज्ञान चारों स्तरों पर समृद्ध हो।

आध्यात्मिक ग्रंथ, दर्पण और आत्मचिंतन

विषुक्कनी में भगवद्गीता जैसे किसी आध्यात्मिक ग्रंथ को भी अवश्य रखा जाता है। यह ग्रंथ प्रमाण के रूप में माना जाता है, जिसके माध्यम से ऋषियों की शाश्वत बुद्धि तक पहुंच बनाई जा सकती है। यह संकेत है कि बाहरी समृद्धि के साथ साथ ज्ञान और साधना भी जीवन का केंद्र रहे।

वल कन्नाड़ी अथवा विशेष दर्पण दोहरी भूमिका निभाता है। एक ओर वह पूरे विषुक्कनी के प्रकाश और सौंदर्य को कई गुना बढ़ा देता है। दूसरी ओर वह देखने वाले का चेहरा दिखाकर यह याद दिलाता है कि भगवान केवल किसी दूर आसन पर बैठा देवता नहीं बल्कि वही चेतना है जो भीतर विद्यमान है।

दर्पण यह भी सिखाता है कि मन जितना निर्मल होगा, उतना ही सत्य स्वरूप स्पष्ट दिखाई देगा। इसलिए विषु के दिन मन को शुद्ध रखने, ईर्ष्या और नकारात्मकता से दूर रहने का संकल्प विशेष फल देता है।

विषु की सुबह की प्रक्रिया और ब्रह्म मुहूर्त

विषुक्कनी सजाने वाली मां या दादी पूजाघर में ही रात बिताती हैं। ब्रह्म मुहूर्त में जागकर वे पहले दीपक जलाती हैं, फिर स्वयं बैठकर उस पवित्र दृश्य का दर्शन करती हैं। यह दिन का पहला ध्यान और दर्शन होता है।

उसके बाद वे एक एक कर घर के बाकी सदस्यों को जगाती हैं। कई बार बच्चों और अन्य सदस्यों की आंखों को हाथ या कपड़े से हल्के से ढककर उन्हें पूजाघर तक ले जाया जाता है। वहां पहुंचकर आंखें खोलने पर सामने पूरे विषुक्कनी का दिव्य दृश्य होता है, जो मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।

यह अभ्यास बच्चों के मन में जीवन भर के लिए यह स्मृति बिठा देता है कि वर्ष की शुरुआत ईश्वर, प्रकाश और समृद्धि के दर्शन से हुई थी।

विषुक्कनी केवल घर तक सीमित क्यों नहीं रहता

विषुक्कनी केवल पूजाघर तक सीमित नहीं रहता। परिवार के बुजुर्ग, जो स्वयं वहां आने में असमर्थ हों, उनके पास यह दृश्य पहुंचाया जाता है। घर के बाहर, गायों के लिए भी विषुक्कनी ले जाया जाता है, ताकि पशु भी इस शुभता के सहभागी बन सकें।

जब विषुक्कनी आंगन या गोशाला में पहुंचता है, तो स्वाभाविक रूप से पक्षी, पेड़ पौधे और वातावरण भी इस दृश्य के साक्षी बनते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि ईश्वर की कृपा और वर्ष की शुभ शुरुआत केवल मनुष्यों के लिए नहीं बल्कि समस्त प्रकृति के लिए है।

विषुक्कैनीत्तम और दान की परंपरा

विषु का एक महत्वपूर्ण पक्ष है विषुक्कैनीत्तम, अर्थात संपत्ति और धन का बांटना। परंपरा है कि घर के बड़े, बच्चों और कनिष्ठों को धन या उपहार देते हैं। यह केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि यह संकेत भी है कि जो भी धन, ज्ञान या प्रतिष्ठा मिली है, वह साझा करने के लिए है।

कई संपन्न परिवार इस दिन केवल परिवार तक नहीं, पड़ोसियों और जरूरतमंदों तक भी यह दान पहुंचाते हैं। इससे विषु केवल घर का उत्सव नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए शुभ भाव का पर्व बन जाता है।

विषु से मिलने वाला वर्ष भर का मार्गदर्शन

जब कोई विषुक्कनी का दर्शन करता है, तो यह केवल आंखों की प्रसन्नता नहीं होना चाहिए। यह दृश्य वर्ष भर के लिए एक आंतरिक संकल्प बन सकता है।

  • भोजन और फल प्रतीक हैं कि जीवन में किसी भी स्थिति में संतुलित और सात्त्विक आहार बना रहे
  • प्रकाश और दीप संकेत देते हैं कि ज्ञान और विवेक जागृत रखा जाए
  • धन और सिक्के याद दिलाते हैं कि समृद्धि मिले तो उसे बांटना भी सीखना है
  • ग्रंथ और दर्पण सिखाते हैं कि आत्मचिंतन और अध्ययन से ही वास्तविक प्रगति संभव है

इस प्रकार विषु का संदेश यह है कि वर्ष की शुभ शुरुआत केवल कुछ क्षणों की बात नहीं बल्कि पूरे वर्ष के विचार, व्यवहार और सेवा में दिखाई देनी चाहिए।

सामान्य प्रश्न

विषु किस प्रकार का नववर्ष माना जाता है?
विषु राशि आधारित ज्योतिषीय नववर्ष है, जब सूर्य सिडेरियल मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र क्षेत्र में प्रवेश करता है। यह सौर नववर्ष से भिन्न है, इसलिए तिथि खगोलीय गणना से तय होती है।

विषुक्कनी में कौन कौन सी चीजें अवश्य रखी जाती हैं?
विषुक्कनी में भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति, पुष्प, फल, स्वर्ण रंग की वस्तुएं, अक्षत से भरा उरुलि, किंडी, वल कन्नाड़ी, दीपक, सोने के सिक्के और भगवद्गीता जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ रखे जाते हैं।

विषु की सुबह आंखें ढककर पूजाघर तक क्यों ले जाया जाता है?
यह परंपरा इस भाव से है कि वर्ष की पहली दृष्टि सीधे विषुक्कनी के पवित्र दृश्य पर पड़े। इससे मन पर गहरा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति पूरे वर्ष के लिए शुभ, संतुलित और आध्यात्मिक दिशा को सहज रूप से स्वीकार करता है।

कनिक्कोन्ना पुष्प का विषु में इतना महत्व क्यों है?
कनिक्कोन्ना पीला पुष्प है जो सूर्य के सबसे ऊंचे बल वाले समय में खिलता है। यह सूर्य, प्रकाश और भगवान विष्णु के काल पुरुष रूप का प्रतीक माना जाता है, इसलिए विषुक्कनी में इसे विशेष स्थान दिया जाता है।

विषुक्कैनीत्तम का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
विषुक्कैनीत्तम के माध्यम से परिवार के बड़े अपनी संपत्ति और आशीर्वाद का हिस्सा बच्चों और समाज को देते हैं। इसका संदेश है कि धन, ज्ञान और सम्मान केवल अपने लिए नहीं बल्कि साझा करने और सेवा के लिए भी होता है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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