By पं. नरेंद्र शर्मा
माघ शुक्ल अष्टमी का शुभ मुहूर्त, तर्पण विधि, रविवार का संयोग और ज्योतिषीय महत्व

माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर भीष्म अष्टमी का पावन पर्व 14 फरवरी 2027 को रविवार के दिन अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। सनातन धर्म में यह दिन महाभारत के महान योद्धा और परम भक्त भीष्म पितामह के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। रविवार का दिन भगवान सूर्य को समर्पित है और इसी दिन सूर्य के उत्तरायण होने पर भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर अपने प्राण त्यागे थे।
भीष्म अष्टमी वह परम कल्याणकारी तिथि है जिस दिन इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्म पितामह ने सूर्य देव के उत्तरायण होने पर अपने भौतिक शरीर का त्याग किया था और इस दिन उनके निमित्त तर्पण करने से पितृ दोष पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
सनातन धर्म की प्राचीन वैदिक परंपराओं में भीष्म अष्टमी को आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय, पितरों की तृप्ति और आत्मिक शुद्धि का परम पवित्र अवसर माना गया है। वर्ष 2027 में 14 फरवरी को पड़ने वाले इस पर्व पर रविवार का दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस दिन पूर्ण निष्ठा के साथ पवित्र नदियों में स्नान करने और काले तिल से तर्पण देने से जन्म कुंडली के भारी दोष शांत हो जाते हैं तथा साधक को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।
| पंचांग तत्व | शास्त्रोक्त विवरण |
|---|---|
| पावन पर्व | भीष्म अष्टमी |
| निर्धारित दिनांक | 14 फरवरी 2027 रविवार |
| हिंदू पंचांग मास | माघ मास शुक्ल पक्ष |
| निर्धारित तिथि | अष्टमी तिथि |
| मुख्य आराध्य | भीष्म पितामह और भगवान विष्णु |
| विशेष योग | रविवार और माघ अष्टमी का दुर्लभ संयोग |
| प्रमुख आध्यात्मिक कर्म | तिल से तर्पण, गंगा स्नान और अन्न दान |
| उत्तम फल | योग्य संतान की प्राप्ति, पितृ दोष निवारण और पापों से मुक्ति |
गृहस्थ और आध्यात्मिक साधक इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों या तीर्थों में स्नान का दृढ़ संकल्प लेते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और भगवान सूर्य की उपासना करने से साधक को उत्तम जीवन शक्ति और असीम मानसिक शांति प्राप्त होती है।
भीष्म अष्टमी का मूल उद्देश्य पितृ भक्ति, दृढ़ संकल्प और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा को जाग्रत करना है। महाभारत के युद्ध में तीरों की शय्या पर लेटने के बावजूद भीष्म पितामह ने अपने प्राण तब तक नहीं त्यागे जब तक सूर्य देव पूर्ण रूप से उत्तरायण नहीं हो गए। उनका यह महान त्याग मनुष्य को धैर्य और ईश्वरीय विधान के प्रति समर्पण का परम संदेश देता है।
वैदिक शास्त्रों के अनुसार भीष्म पितामह बाल ब्रह्मचारी थे और उनका अपना कोई पुत्र नहीं था। महर्षि वेदव्यास जी ने सभी सनातन धर्मियों को यह निर्देश दिया था कि माघ शुक्ल अष्टमी के दिन जो भी व्यक्ति भीष्म पितामह के निमित्त जल और तिल से तर्पण करेगा, उसे सुयोग्य संतान, उत्तम बुद्धि और अपार यश की प्राप्ति होगी।
संसार में पितरों के प्रति कृतज्ञता ही सनातन धर्म का मूल आधार है। इस पावन दिन पवित्र नदियों में स्नान करने और काले तिल से तर्पण करने से दैहिक और मानसिक विकारों का समूल नाश होता है। यह पावन पर्व व्यक्ति को अपने नैतिक कर्तव्यों और आध्यात्मिक शक्तियों से गहराई से जोड़ने का एक अत्यंत दिव्य अवसर प्रदान करता है।
इस पावन दिन प्रातः काल जल्दी उठकर पवित्र नदी में अथवा घर पर जल में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करने के पश्चात व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके पश्चात दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भीष्म पितामह और अपने पितरों को जल तथा तिल से तर्पण दिया जाता है। दिनभर सात्विक आचरण रखते हुए ब्राह्मणों और निर्धनों को दान देना शास्त्र सम्मत विधान है।
शास्त्रोक्त विधि का शुद्ध अंतःकरण से पालन करने पर साधक को भगवान विष्णु का अखंड तेज और भीष्म पितामह का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजन और तर्पण क्रिया के समय मन में पूर्ण श्रद्धा, पवित्रता और नम्रता का भाव होना अनिवार्य है। बिना सच्ची एकाग्रता के दिया गया तर्पण और दान कभी स्वीकार नहीं किया जाता है।
वैदिक ज्योतिष में माघ शुक्ल अष्टमी तिथि अत्यंत उग्र और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण मानी जाती है। वर्ष 2027 में रविवार के दिन भीष्म अष्टमी का पड़ना भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत रहस्यमयी और शक्तिशाली खगोलीय योग का निर्माण करता है। रविवार के दिन तर्पण और पितरों की शांति के उपाय करने से जन्म कुंडली के सबसे भयंकर दोष शांत हो जाते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में सूर्य नीच अवस्था में हो या पितृ दोष बन रहा हो, तो व्यक्ति को समाज में अपमान, संतान प्राप्ति में बाधा और भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। भीष्म अष्टमी पर तर्पण करने से जन्मकुंडली का यह भारी दोष पूरी तरह शांत हो जाता है।
| ग्रह एवं दोष | ज्योतिषीय दुष्प्रभाव | निवारण का वैदिक उपाय |
|---|---|---|
| पितृ दोष | वंश वृद्धि में भारी बाधा, पारिवारिक कलह और धन की निरंतर हानि | दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तिल और जल से भीष्म पितामह को तर्पण दें |
| सूर्य दोष | आत्मविश्वास में भारी कमी, नेत्र रोग और समाज में मान सम्मान की हानि | तांबे के पात्र में लाल पुष्प और कुमकुम डालकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें |
| राहु दोष | अत्यधिक मानसिक भ्रम, गुप्त शत्रु और जीवन में अचानक रुकावट | विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और पक्षियों को अनाज खिलाएं |
| शनि दोष | कार्यों में अनावश्यक विलंब, पिता से विवाद और अत्यधिक शारीरिक कष्ट | भगवान सूर्य की पूजा के पश्चात निर्धनों को तिल, गुड़ और भोजन का दान करें |
जिन व्यक्तियों को विवाह और संतान प्राप्ति में बार बार असफलता मिल रही है अथवा जिनके जीवन में हमेशा पारिवारिक अशांति रहती है, उन्हें इस दिन पितृ तर्पण का यह विशेष उपाय अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और घर में सुख तथा शांति का स्थायी आगमन होता है।
भीष्म अष्टमी के दिन पूर्ण सात्विकता, ब्रह्मचर्य और मन की गहरी पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य है। इस पावन अवसर पर अन्न, जल, तिल और वस्त्रों का दान करना महापुण्य माना गया है। इस दिन तामसिक भोजन करना, दिन में सोना अथवा किसी भी निर्धन व्यक्ति का अपमान करना पूरी तरह वर्जित है।
नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से ही इस पावन दिन की आध्यात्मिक ऊर्जा का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।
इन आचार नियमों का पालन करने से साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है और परिवार पर पितरों तथा देव शक्तियों की कृपा सदैव बनी रहती है।
सनातन संस्कृति में पितरों और अपने गुरुजनों का सम्मान ही सबसे बड़ा धर्म माना गया है। भीष्म अष्टमी हमें यह याद दिलाती है कि मनुष्य का शरीर नश्वर है, परंतु उसके द्वारा किए गए सत्कर्म, प्रतिज्ञा और दान अमर रहते हैं। भीष्म पितामह का जीवन हमारे भीतर आध्यात्मिक जागरण और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा के कलश को भरने का दिव्य संदेश देता है।
कलियुग में दान और तर्पण के बिना किसी भी व्यक्ति की सर्वांगीण उन्नति संभव नहीं है। जब कोई साधक पूरी श्रद्धा और एकाग्रता के साथ पितरों को जल की एक अंजलि भी समर्पित करता है तब वे तृप्त होकर उसे अपार आयु, धन और यश का आशीर्वाद देते हैं। यह पावन पर्व केवल पंचांग की एक तिथि नहीं है बल्कि आत्मा को अनंत पुण्य के प्रकाश से जोड़ने का प्रत्यक्ष अनुभव है।
संसार के सभी भौतिक साधन यहीं नष्ट हो जाते हैं परंतु भीष्म अष्टमी के निमित्त किया गया तर्पण और निस्वार्थ दान अमर फल देता है। माघ मास के इस पुण्य पर्व पर भगवान विष्णु और भीष्म पितामह का स्मरण करें, शुद्ध सात्विक आचरण अपनाएं और अपने जीवन को असीम शांति से परिपूर्ण करें।
भीष्म अष्टमी 2027 में किस तारीख को मनाई जाएगी?
भीष्म अष्टमी का पावन पर्व 14 फरवरी 2027 को रविवार के दिन वैदिक पंचांग के अनुसार अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
भीष्म अष्टमी का मुख्य आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
यह वह पावन दिन है जब इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर बाणों की शय्या पर अपने प्राण त्यागे थे।
भीष्म पितामह को तर्पण देने का क्या महत्व है?
शास्त्रों के अनुसार भीष्म पितामह बाल ब्रह्मचारी थे। इस दिन उन्हें जल और तिल से तर्पण देने से व्यक्ति को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है और पितृ दोष शांत होता है।
रविवार को भीष्म अष्टमी पड़ने से क्या विशेष लाभ प्राप्त होता है?
रविवार भगवान सूर्य का दिन है। इस दिन भीष्म अष्टमी का संयोग बनने से सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और मान सम्मान में वृद्धि होती है।
क्या भीष्म अष्टमी के दिन महिलाएं भी व्रत और पूजा कर सकती हैं?
हां, सनातन धर्म के अनुसार पुरुष और महिलाएं दोनों ही उत्तम संतान, सौभाग्य और पारिवारिक सुख की कामना से यह व्रत और पूजा संपन्न कर सकते हैं।
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