By पं. अमिताभ शर्मा
माघ शुक्ल द्वादशी का शुभ मुहूर्त, भीष्म तर्पण विधि और ज्योतिषीय लाभ

माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का पावन पर्व 18 फरवरी 2027 बृहस्पतिवार के दिन श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। इस दिन भगवान लक्ष्मीनारायण की विधिवत पूजा और पितामह भीष्म के निमित्त तर्पण का शुभ अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से दोपहर 12 बजकर 58 मिनट तक रहेगा।
भीष्म द्वादशी माघ शुक्ल द्वादशी को मनाया जाने वाला एक अत्यंत पुण्यदायी वैदिक पर्व है जो पितृ ऋण से मुक्ति और भगवान विष्णु की परम कृपा प्रदान करता है।
हिंदू धर्म में माघ शुक्ल द्वादशी की तिथि को अत्यंत पवित्र माना गया है। महाभारत के महान चरित्र पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर माघ मास की अष्टमी तिथि को अपने प्राण त्यागे थे और द्वादशी तिथि के दिन उनके निमित्त धार्मिक श्राद्ध तथा शांति तर्पण संपन्न किया गया था। वर्ष 2027 में यह पावन संयोग बृहस्पतिवार के दिन पड़ रहा है। बृहस्पतिवार स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति का दिन होने से इस तिथि के आध्यात्मिक तथा ज्योतिषीय फल में कई गुना वृद्धि हो जाती है।
| पंचांग तत्व | शास्त्रोक्त विवरण |
|---|---|
| पावन व्रत पर्व | भीष्म द्वादशी (माघ शुक्ल द्वादशी) |
| निर्धारित दिनांक | 18 फरवरी 2027 बृहस्पतिवार |
| हिंदू पंचांग मास | माघ मास शुक्ल पक्ष |
| पंचांग तिथि | द्वादशी तिथि |
| मुख्य आराध्य देव | भगवान लक्ष्मीनारायण एवं पितामह भीष्म |
| शुभ पूजा काल | प्रातः 07 बजकर 15 मिनट से पूर्वाह्न 11 बजकर 30 मिनट तक |
| शुभ अभिजीत मुहूर्त | दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से दोपहर 12 बजकर 58 मिनट तक |
| भीष्म तर्पण समय | दोपहर 11 बजकर 45 मिनट से 12 बजकर 30 मिनट तक |
| पारण समय | 19 फरवरी 2027 प्रातः 07 बजकर 05 मिनट के उपरांत |
गृहस्थ साधक इस दिन प्रातःकाल गंगाजल युक्त जल से स्नान करके सूर्य नारायण और भगवान लक्ष्मीनारायण का पूजन करते हैं। इसके पश्चात तिल और कुश लेकर भीष्म पितामह के निमित्त तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है।
भीष्म द्वादशी का पावन व्रत आत्मा को निष्काम कर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की दिव्य प्रेरणा प्रदान करता है। इस दिन व्रत रखने और श्रद्धापूर्वक भगवान माधव की आराधना करने से मनुष्य के जाने अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और साधक को अंत समय में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सनातन धर्म ग्रंथों में भीष्म द्वादशी को समस्त सुखों और सतोगुण की वृद्धि करने वाली पावन तिथि कहा गया है। पितामह भीष्म आजीवन ब्रह्मचर्य और धर्मनिष्ठा के अप्रतिम प्रतीक रहे हैं। शास्त्रों में ऐसा नियम है कि भले ही किसी व्यक्ति के पिता जीवित हों अथवा न हों वह भीष्म पितामह के निमित्त तर्पण करने का पूर्ण अधिकारी होता है। इस दिन पितामह भीष्म को दिया गया जल तर्पण पितृदोष की कठोर छाया से साधक के कुल की रक्षा करता है।
मनुष्य जीवन में संचित कर्मों के कारण विभिन्न प्रकार की बाधाएं और मानसिक उद्वेग उत्पन्न होते रहते हैं। माघ मास के शीतल जल में स्नान करके जब कोई साधक भगवान विष्णु को पीले पुष्प और तुलसी दल अर्पित करता है तब उसके अंतःकरण में निर्मल विवेक जाग्रत होता है। यह पावन पर्व व्यक्ति को सिखाता है कि सत्य और निष्ठा की रक्षा करते हुए किस प्रकार समस्त सांसारिक दायित्वों का संपादन किया जाता है।
प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र जल से स्नान करके भगवान विष्णु और पितामह भीष्म की आराधना का व्रत संकल्प लिया जाता है। इसके उपरांत वेदी पर भगवान लक्ष्मीनारायण की स्थापना करके पंचामृत पूजन पीले वस्त्र सुगंधित पुष्प और तुलसी दल अर्पित करके विशेष तर्पण किया जाता है।
शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार अनुष्ठान करने से साधक को मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
इस पूजा में तिल और तुलसी दल का उपयोग अनिवार्य रूप से होना चाहिए। बिना तुलसी पत्र के भगवान विष्णु का पूजन अपूर्ण माना जाता है।
माघ शुक्ल द्वादशी का बृहस्पतिवार के दिन उपस्थित होना गुरु और सूर्य के दिव्य प्रभाव का अत्यंत शुभ ज्योतिषीय समन्वय निर्मित करता है। यह ग्रह योग जन्मकुंडली के गंभीर पितृदोष गुरु चांडाल दोष और ज्ञान तथा संतान संबंधी बाधाओं को तत्काल शांत करता है।
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को ज्ञान धर्म और कुल वृद्धि का कारक ग्रह माना गया है जबकि सूर्य आत्मा और पिता का प्रतिनिधि होता है। बृहस्पतिवार के दिन द्वादशी पड़ने से गुरु ग्रह की शुभ रश्मियां अत्यंत प्रभावी हो जाती हैं। जिन जातकों की कुंडली में गुरु ग्रह दुर्बल अथवा नीच राशि में स्थित है उनके लिए इस दिन का व्रत और दान संजीवनी के समान फल देता है।
| ग्रह एवं अशुभ दोष | जीवन पर ज्योतिषीय प्रभाव | शास्त्रोक्त निवारण उपाय |
|---|---|---|
| गुरु ग्रह दोष | विद्या में बाधा निर्णय क्षमता में कमी और आर्थिक तंगी | भगवान विष्णु को पीले पुष्प बेसन के लड्डू अर्पित करें और केसर का तिलक लगाएं |
| पितृदोष | संतान प्राप्ति में विलंब और परिवार में अशांति | कुश जल और तिल से पितामह भीष्म का तर्पण करें |
| सूर्य ग्रह दोष | आत्मबल की कमी मान सम्मान में बाधा और पिता से मतभेद | तांबे के लोटे में जल अक्षत और रोली डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें |
| राहु और केतु दोष | अज्ञात भय मानसिक अशांति और भ्रम की स्थिति | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का 108 बार तुलसी माला से जप करें |
| शनि की साढ़ेसाती | जीवन में अत्यधिक संघर्ष और कार्यों में अनावश्यक देरी | काले तिल और उड़द की दाल किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें |
जिन दंपतियों के जीवन में संतान प्राप्ति में अड़चनें आ रही हैं वे इस दिन विशेष रूप से भगवान लक्ष्मीनारायण की संयुक्त पूजा करें। इससे जन्मकुंडली का पंचम भाव दोषमुक्त होकर शुभ ऊर्जा से भर जाता है।
भीष्म द्वादशी के दिन साधक को तन और मन दोनों स्तरों पर पूर्ण शुद्धता और मर्यादा का पालन करना आवश्यक है। इस दिन दान पुण्य गौ सेवा और पवित्र मंत्रों का श्रवण करना उत्तम फलदायी होता है जबकि क्रोध कलह और तामसिक भोजन का स्पर्श भी पूर्णतः त्याज्य है।
शास्त्र सम्मत नियमों का निष्ठा से पालन करने पर ही व्रत की संपूर्ण ऊर्जा साधक को प्राप्त होती है।
इन आचार नियमों का पालन करने से साधक के घर में शांति समृद्धि और सकारात्मक शक्तियों का निरंतर वास होता है।
भीष्म द्वादशी केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं अपितु सत्य और प्रतिज्ञा पर अडिग रहने की जीवन शैली का दिव्य संदेश है। पितामह भीष्म का संपूर्ण जीवन कर्तव्य और आत्मसंयम की पराकाष्ठा का अनुपम दर्शन कराता है।
संसार में वही व्यक्ति अमर होता है जो अपने स्वार्थ को त्यागकर सत्य और धर्म के मार्ग पर निष्ठापूर्वक चलता है। जब कोई साधक माघ मास की इस पावन तिथि पर पितामह भीष्म की स्मृति में तर्पण करता है तब उसके भीतर का अहंकार और क्षुद्र स्वार्थ पिघल जाता है। यह पावन पर्व व्यक्ति को याद दिलाता है कि शरीर नश्वर है किंतु आत्मा द्वारा किए गए धर्ममय आचरण सदैव अमर रहते हैं।
सांसारिक मोह माया के बंधनों से मुक्त होकर जब प्राणी परमेश्वर की शरण में जाता है तभी उसे अखंड शांति मिलती है। माघ शुक्ल द्वादशी के इस पवित्र अवसर पर भगवान वासुदेव के चरणों में ध्यान लगाकर अपने जीवन को धन्य बनाएं और कुल का उद्धार करें।
भीष्म द्वादशी 2027 में किस तारीख को है?
भीष्म द्वादशी का पावन पर्व 18 फरवरी 2027 बृहस्पतिवार के दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा।
भीष्म द्वादशी पर किन मुख्य देवताओं की पूजा की जाती है?
इस दिन मुख्य रूप से भगवान लक्ष्मीनारायण की पूजा की जाती है और पितामह भीष्म के निमित्त जल तर्पण किया जाता है।
क्या जिनके पिता जीवित हैं वे भी भीष्म तर्पण कर सकते हैं?
शास्त्रों के अनुसार जिनके पिता जीवित हैं वे भी भीष्म पितामह के निमित्त श्रद्धापूर्वक जल तर्पण कर सकते हैं।
भीष्म द्वादशी के दिन किस मंत्र का जप करना सबसे कल्याणकारी है?
इस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय महामंत्र तथा भीष्म तर्पण मंत्र का जप करना सबसे शुभ माना गया है।
भीष्म द्वादशी व्रत का पारण कब करना चाहिए?
इस व्रत का पारण अगले दिन 19 फरवरी 2027 को प्रातः 07 बजकर 05 मिनट के पश्चात सूर्य देव को जल देकर करना चाहिए।
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