By पं. संजीव शर्मा
माघ शुक्ल षष्ठी का शुभ मुहूर्त, भगवान कार्तिकेय पूजा विधि, मंगल दोष शांति और ज्योतिषीय महत्व

माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर भगवान शिव और माता पार्वती के तेजस्वी पुत्र भगवान कार्तिकेय की आराधना का पावन पर्व स्कंद षष्ठी 12 फरवरी 2027 को शुक्रवार के दिन अत्यंत उल्लास के साथ मनाया जाएगा। दक्षिण भारत में इस पर्व को भगवान मुरुगन की पूजा के रूप में बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। शुक्रवार का दिन होने के कारण इस वर्ष शक्ति, साहस और भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए यह तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण बन गई है।
स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय के प्राकट्य और उनके शौर्य का वह परम कल्याणकारी पर्व है, जिस दिन उपवास रखने और उनकी आराधना करने से जीवन के सभी महान शत्रु और गंभीर रोग पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं में स्कंद षष्ठी को साहस, ऊर्जा और संकटों से मुक्ति का परम पवित्र अवसर माना गया है। वर्ष 2027 में 12 फरवरी को पड़ने वाले इस पर्व पर शुक्रवार का अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। भगवान कार्तिकेय नवग्रहों में मंगल ग्रह के अधिपति हैं। इस दिन पूर्ण निष्ठा के साथ भगवान स्कंद की पूजा करने और लाल पुष्प धारण करने से जन्म कुंडली का भारी मंगल दोष शांत हो जाता है तथा साधक को अपार पराक्रम प्राप्त होता है।
| पंचांग तत्व | शास्त्रोक्त विवरण |
|---|---|
| पावन पर्व | स्कंद षष्ठी (मुरुगन पूजा) |
| निर्धारित दिनांक | 12 फरवरी 2027 शुक्रवार |
| हिंदू पंचांग मास | माघ मास शुक्ल पक्ष |
| निर्धारित तिथि | षष्ठी तिथि |
| मुख्य आराध्य | भगवान कार्तिकेय (स्कंद कुमार) |
| विशेष योग | शुक्रवार और षष्ठी का शक्तिवर्धक संयोग |
| प्रमुख आध्यात्मिक कर्म | कार्तिकेय पूजा, उपवास और मयूर पंख अर्पण |
| उत्तम फल | शत्रु नाश, संतान सुख और साहस में वृद्धि |
गृहस्थ और आध्यात्मिक साधक इस दिन सूर्योदय के समय स्नान करके भगवान कार्तिकेय की उपासना का दृढ़ संकल्प लेते हैं। भगवान कार्तिकेय देवताओं के सेनापति हैं और उनका वाहन मयूर (मोर) है। इस दिन लाल चंदन और लाल पुष्प का भोग लगाने से साधक को उत्तम स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त होती है। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही है, उनके लिए स्कंद षष्ठी का व्रत अत्यंत फलदायी सिद्ध होता है।
स्कंद षष्ठी का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर सोई हुई ऊर्जा और अदम्य साहस को जाग्रत करना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब तारकासुर नामक भयंकर असुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था तब देवताओं की रक्षा के लिए भगवान शिव के तेज से स्कंद कुमार का प्राकट्य हुआ था। भगवान कार्तिकेय ने मात्र छह दिन की आयु में महापराक्रमी तारकासुर का वध करके तीनों लोकों को भय से मुक्त किया था।
वैदिक शास्त्रों के अनुसार स्कंद षष्ठी के दिन लाल रंग के उपयोग का सबसे अधिक महत्व है। लाल रंग रक्त, जीवन ऊर्जा, पराक्रम और मंगल ग्रह का साक्षात प्रतीक है। इस दिन जल में लाल पुष्प मिलाकर स्नान करने, लाल वस्त्र पहनने और भगवान को लाल चंदन अर्पित करने से साधक के अंतर्मन का भय मिट जाता है। जो श्रद्धालु इस पावन अवसर पर भक्ति भाव से भगवान कार्तिकेय के मयूर वाहन की पूजा करते हैं, उनके बच्चों को लंबी आयु और उत्तम बुद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
संसार में धर्म की रक्षा और सत्य के प्रति निष्ठा ही सनातन धर्म का मूल आधार है। इस पावन दिन घर में भगवान कार्तिकेय की सुंदर प्रतिमा स्थापित करने और षडाक्षरी मंत्र का जप करने से दैहिक और मानसिक विकारों का समूल नाश होता है। यह पावन पर्व व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्तियों से गहराई से जोड़ने का एक अत्यंत दिव्य अवसर प्रदान करता है।
इस पावन दिन प्रातः काल जल्दी उठकर जल में थोड़ा सा लाल चंदन मिलाकर स्नान करने के पश्चात स्कंद षष्ठी पूजा का संकल्प लिया जाता है। इसके पश्चात पूजा स्थल पर एक लाल वस्त्र बिछाकर भगवान कार्तिकेय और शिव परिवार की प्रतिमा स्थापित की जाती है। दिनभर सात्विक आचरण रखते हुए भगवान को लाल पुष्प, कुमकुम और नैवेद्य का भोग लगाना शास्त्र सम्मत विधान है।
शास्त्रोक्त विधि का शुद्ध अंतःकरण से पालन करने पर साधक को अपार साहस और विजय का अखंड आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजन क्रिया के समय मन में पूर्ण श्रद्धा, शौर्य और नम्रता का भाव होना अनिवार्य है। बिना सच्ची एकाग्रता के अर्पित की गई प्रार्थना भगवान द्वारा कभी स्वीकार नहीं की जाती है।
वैदिक ज्योतिष में षष्ठी तिथि का विशेष महत्व है और भगवान कार्तिकेय साक्षात मंगल (पराक्रम) के अधिपति हैं। वर्ष 2027 में शुक्रवार के दिन स्कंद षष्ठी का पड़ना शुक्र ग्रह और मंगल ग्रह की शांति के लिए अत्यंत शक्तिशाली योग का निर्माण करता है। मंगल ग्रह ऊर्जा, भूमि और साहस का कारक है, जबकि शुक्र ग्रह भौतिक सुख और प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में मंगल नीच अवस्था में हो या मांगलिक दोष बन रहा हो, तो व्यक्ति को विवाह में भारी बाधाओं का सामना करना पड़ता है और उसका स्वभाव अत्यधिक क्रोधी हो जाता है। स्कंद षष्ठी पर भगवान कार्तिकेय को लाल पुष्प और मयूर पंख अर्पित करने से जन्मकुंडली का यह भारी दोष पूरी तरह शांत हो जाता है।
| ग्रह एवं दोष | ज्योतिषीय दुष्प्रभाव | निवारण का वैदिक उपाय |
|---|---|---|
| मंगल दोष | अत्यधिक क्रोध, कर्ज, दुर्घटना का भय और विवाह में निरंतर विलंब | भगवान कार्तिकेय को लाल चंदन का लेप लगाएं और लाल पुष्प चढ़ाएं |
| शुक्र दोष | वैवाहिक जीवन में निरंतर कलह और भौतिक सुखों का अभाव | शुक्रवार होने के कारण भगवान को श्वेत मिष्ठान और इत्र अर्पित करें |
| राहु दोष | अत्यधिक मानसिक भ्रम, गुप्त शत्रु और अचानक आने वाले संकट | भगवान के समीप मयूर पंख रखें और ॐ शरवणभवाय नमः का जप करें |
| शनि दोष | कार्यों में अनावश्यक विलंब और अत्यधिक शारीरिक कष्ट | निर्धनों को भोजन कराएं और लाल वस्त्रों का दान करें |
जिन व्यक्तियों को भूमि विवाद का सामना करना पड़ रहा है अथवा जो लोग सेना, पुलिस या खेल के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इस दिन भगवान कार्तिकेय की विशेष आराधना अवश्य करनी चाहिए। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और असीम पराक्रम का स्थायी आगमन होता है।
स्कंद षष्ठी के दिन पूर्ण सात्विकता, ब्रह्मचर्य और मन की गहरी पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य है। इस पावन अवसर पर तांबे के बर्तन या लाल वस्त्रों का दान करना महापुण्य माना गया है। किसी भी प्रकार का तामसिक आहार ग्रहण करना, अपशब्द बोलना अथवा क्रोध करना इस दिन पूरी तरह वर्जित है।
नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से ही इस पावन दिन की आध्यात्मिक ऊर्जा का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।
इन आचार नियमों का पालन करने से साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है और परिवार पर भगवान कार्तिकेय की कृपा सदैव बनी रहती है।
सनातन संस्कृति में शौर्य और धर्म की रक्षा को ही सबसे बड़ा कर्तव्य माना गया है। स्कंद षष्ठी हमें यह याद दिलाती है कि बुराई कितनी भी विशाल क्यों न हो, साहस, बुद्धि और ईश्वर की कृपा से उसका वध अवश्य किया जा सकता है। भगवान कार्तिकेय के हाथ में स्थित भाला (वेला) हमें यह दिव्य संदेश देता है कि जीवन में लक्ष्य के प्रति एकाग्रता और बुराई का नाश करने का संकल्प अत्यंत आवश्यक है।
कलियुग में ऊर्जा और साहस के बिना किसी भी व्यक्ति की सर्वांगीण और स्थायी उन्नति संभव नहीं है। जब कोई साधक पूरी श्रद्धा और एकाग्रता के साथ भगवान को लाल पुष्प का एक छोटा सा अंश भी समर्पित करता है तब भगवान तृप्त होकर उसे अपार विजय और यश का आशीर्वाद देते हैं। यह पावन पर्व केवल एक पारंपरिक कर्मकांड नहीं है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने का प्रत्यक्ष अनुभव है।
संसार के सभी भौतिक साधन और धन संपदा यहीं छूट जाते हैं परंतु भगवान के निमित्त किया गया जप और निस्वार्थ कर्म अमर फल देता है। माघ मास की इस पुण्य षष्ठी पर भगवान कार्तिकेय का स्मरण करें, शुद्ध सात्विक आचरण अपनाएं और अपने जीवन को अदम्य साहस और मंगल से परिपूर्ण करें।
स्कंद षष्ठी 2027 में किस तारीख को मनाई जाएगी?
स्कंद षष्ठी का पावन पर्व 12 फरवरी 2027 को शुक्रवार के दिन वैदिक पंचांग के अनुसार अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
स्कंद षष्ठी का मुख्य उद्देश्य क्या है?
यह पर्व भगवान कार्तिकेय (स्कंद कुमार) के प्राकट्य और उनके द्वारा तारकासुर के वध की पावन स्मृति में अदम्य साहस और विजय प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है।
स्कंद षष्ठी पर लाल रंग का क्या महत्व है?
लाल रंग ऊर्जा, रक्त, पराक्रम और मंगल ग्रह का प्रतीक है। लाल रंग का प्रयोग करने से भगवान कार्तिकेय तुरंत प्रसन्न होते हैं और साधक में साहस का संचार होता है।
शुक्रवार को स्कंद षष्ठी पड़ने से क्या विशेष लाभ प्राप्त होता है?
शुक्रवार भौतिक सुखों के कारक शुक्र देव का दिन है। इस दिन स्कंद षष्ठी का संयोग बनने से मंगल और शुक्र का संतुलन स्थापित होता है जिससे वैवाहिक जीवन और करियर में अपार सफलता मिलती है।
संतान प्राप्ति के लिए स्कंद षष्ठी का क्या महत्व है?
भगवान कार्तिकेय देवताओं के अत्यंत प्रिय बाल रूप हैं। इस दिन पूर्ण निष्ठा से उपवास रखकर उनकी और स्कंद माता की पूजा करने से योग्य और स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है।
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