By पं. नरेंद्र शर्मा
इष्टि यज्ञ से पहले पवित्र अग्नियों को प्रज्वलित करने की प्राचीन वैदिक परंपरा, उसकी विधि और आध्यात्मिक महत्व।

अन्वाधान 2027 शुक्रवार, 22 जनवरी को पौष शुक्ल चतुर्दशी पर है। यह वैदिक इष्टि यज्ञ से एक दिन पहले किया जाने वाला अनुष्ठान है, जिसमें पवित्र अग्नियों में नई समिधा डालकर उन्हें प्रज्वलित रखा जाता है। इससे जुड़ी इष्टि अगले दिन, 23 जनवरी 2027 को होगी।
अन्वाधान वह वैदिक अनुष्ठान है जिसमें इष्टि यज्ञ से एक दिन पहले यजमान अपनी पवित्र अग्नियों में ईंधन डालकर उन्हें पुनः प्रज्वलित करता है और व्रत का संकल्प लेता है।
"अन्वाधान" संस्कृत के "अनु" और "आधान" शब्दों से बना है। आधान का अर्थ है अग्नि में रखना या स्थापित करना और अनु का अर्थ है बाद में या पुनः। इस प्रकार अन्वाधान का अर्थ है अग्नि में फिर से समिधा रखकर उसे जाग्रत करना। यह अनुष्ठान हर पूर्णिमा और अमावस्या के आसपास, यानी महीने में दो बार किया जाता है।
| पंचांग तत्व | विवरण |
|---|---|
| अनुष्ठान का नाम | अन्वाधान |
| दिनांक | 22 जनवरी 2027, शुक्रवार |
| हिंदू मास | पौष मास, शुक्ल पक्ष |
| तिथि | चतुर्दशी, जिसके बाद पूर्णिमा आरंभ |
| संबंधित इष्टि | 23 जनवरी 2027, शनिवार |
| इष्टि का प्रकार | पौर्णमास इष्टि |
| दिल्ली में सूर्योदय | प्रातः लगभग 7:14 बजे |
| दिल्ली में सूर्यास्त | सायं लगभग 5:53 बजे |
| राहु काल (दिल्ली) | प्रातः लगभग 11:10 से दोपहर 12:30 बजे तक |
| चंद्रमा की स्थिति | कर्क राशि, पुष्य नक्षत्र |
| मुख्य आराध्य | अग्नि देव, सोम और अन्य वैदिक देवता |
| उसी दिन के अन्य पर्व | पौष पूर्णिमा, शाकम्भरी पूर्णिमा, थाईपूसम |
अन्वाधान और इष्टि की तिथि पर्व संधि, यानी पूर्णिमा या अमावस्या के आरंभ और समाप्ति के समय के आधार पर निश्चित की जाती है। इसलिए कभी अन्वाधान चतुर्दशी को और कभी पूर्णिमा को पड़ता है। वैदिक परिवार अपने कुल पुरोहित और श्रौत पंचांग के अनुसार सटीक समय का पालन करते हैं।
अन्वाधान और इष्टि एक ही वैदिक यज्ञ के दो चरण हैं। अन्वाधान तैयारी का दिन है, जिसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है और यजमान व्रत लेता है। अगले दिन इष्टि में देवताओं को पुरोडाश, घी और अन्य हवि की आहुतियां दी जाती हैं।
इष्टि वह वैदिक यज्ञ है जिसमें अग्नि के माध्यम से देवताओं को हवि यानी पवित्र आहुति अर्पित की जाती है।
वैदिक श्रौत परंपरा में पूर्णिमा और अमावस्या पर होने वाले यज्ञ को दर्श पौर्णमास इष्टि कहा जाता है। अमावस्या की इष्टि दर्श इष्टि और पूर्णिमा की इष्टि पौर्णमास इष्टि कहलाती है। श्रौत सूत्रों में इसे सभी इष्टियों का मूल आदर्श माना गया है, क्योंकि अन्य अनेक यज्ञों की विधि इसी के आधार पर रची गई है।
| चरण | दिन | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| अन्वाधान | 22 जनवरी 2027 | अग्नियों में समिधा, व्रत का संकल्प, उपवसथ के नियम |
| इष्टि | 23 जनवरी 2027 | देवताओं को पुरोडाश और घी की आहुति |
अन्वाधान के दिन को उपवसथ भी कहा जाता है। उपवसथ का अर्थ है देवताओं के समीप वास करना। मान्यता है कि इस रात देवता यजमान के घर यज्ञ के लिए पधारते हैं, इसलिए यजमान संयम और पवित्रता से रहता है।
श्रौत परंपरा में अग्निहोत्री गृहस्थ तीन पवित्र अग्नियों को स्थायी रूप से प्रज्वलित रखता है। ये हैं गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि। अन्वाधान के दिन इन्हीं अग्नियों में नई समिधा डालकर उन्हें इष्टि के लिए तैयार किया जाता है।
अग्निहोत्री वह गृहस्थ है जिसने विधिपूर्वक पवित्र अग्नियों की स्थापना की है और जो प्रतिदिन सुबह शाम अग्निहोत्र करता है।
| अग्नि का नाम | आकार की वेदी | दिशा | भूमिका |
|---|---|---|---|
| गार्हपत्य | गोल | पश्चिम | गृहस्थ की मूल अग्नि, जिससे अन्य अग्नियां प्रज्वलित होती हैं |
| आहवनीय | चौकोर | पूर्व | देवताओं को आहुति देने की अग्नि |
| दक्षिणाग्नि | अर्धचंद्राकार | दक्षिण | पितरों और रक्षा से जुड़े कर्मों की अग्नि |
इन तीनों अग्नियों के आकार भी प्रतीकात्मक माने जाते हैं। गोल वेदी पृथ्वी का, चौकोर वेदी स्वर्ग की दिशाओं का और अर्धचंद्राकार वेदी अंतरिक्ष का प्रतीक मानी जाती है। इस प्रकार अग्नि वेदी अपने आप में संपूर्ण ब्रह्मांड का छोटा रूप है।
अन्वाधान के दिन यजमान स्नान करके तीनों पवित्र अग्नियों में समिधा डालता है, देवताओं का आवाहन करता है और इष्टि का संकल्प लेता है। इस दिन यजमान और उसकी पत्नी उपवास, संयम और सत्य का पालन करते हैं। श्रौत यज्ञ योग्य ऋत्विज ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में ही किया जाता है।
आज बहुत कम परिवार श्रौत अग्नियों को स्थायी रूप से रखते हैं। फिर भी कोई भी गृहस्थ इस दिन के भाव को सरल रूप में अपना सकता है।
"इदं अग्नये न मम" का अर्थ है कि यह आहुति अग्नि के लिए है, मेरी नहीं। यह छोटा सा वाक्य त्याग और अहंकार रहित कर्म की पूरी वैदिक शिक्षा को अपने भीतर समेटे हुए है।
अन्वाधान और इष्टि में ऋग्वेद, यजुर्वेद और श्रौत सूत्रों के अनेक मंत्रों का प्रयोग होता है। सामान्य साधक के लिए अग्नि देव से जुड़े कुछ सरल और प्रसिद्ध मंत्र नीचे दिए गए हैं।
| मंत्र | अर्थ | प्रयोग |
|---|---|---|
| अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्, होतारं रत्नधातमम् | मैं उस अग्नि की स्तुति करता हूं जो यज्ञ का पुरोहित, देवता, ऋत्विज, होता और रत्नों को धारण करने वाला है | ऋग्वेद का पहला मंत्र, अग्नि स्तुति |
| ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये न मम | यह आहुति अग्नि के लिए है, मेरी नहीं | घी की आहुति |
| ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् | हम उस सविता देव के श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे | गायत्री मंत्र, हवन में आहुति |
ऋग्वेद का पहला ही मंत्र अग्नि को समर्पित है। इससे पता चलता है कि वैदिक जीवन में अग्नि का स्थान कितना केंद्रीय था। अग्नि को मनुष्य और देवताओं के बीच का दूत माना गया है।
22 जनवरी 2027 को चंद्रमा कर्क राशि में पुष्य नक्षत्र में होंगे, जिसके देवता बृहस्पति हैं, जो देवताओं के पुरोहित माने जाते हैं। सूर्य मकर राशि में हैं और दिन शुक्रवार है। यज्ञ से जुड़े अनुष्ठान के लिए पुरोहित देवता के नक्षत्र का होना अत्यंत अर्थपूर्ण संयोग है।
ज्योतिष में अग्नि तत्व का संबंध सूर्य और मंगल से है और कृत्तिका नक्षत्र के अधिष्ठाता स्वयं अग्नि देव हैं। अग्नि उपासना से सूर्य का तेज बढ़ता है, आत्मविश्वास जागता है और मन की जड़ता दूर होती है। ऋग्वेद में भी अग्नि को पुरोहित कहा गया है और पुष्य नक्षत्र के देवता बृहस्पति भी देवताओं के पुरोहित हैं।
| ग्रह | संभावित समस्या | अन्वाधान पर उपाय |
|---|---|---|
| सूर्य | आत्मविश्वास की कमी और आलस्य | प्रातः सूर्य को अर्घ्य दें और घी का दीपक जलाएं |
| मंगल | ऊर्जा की कमी या अधिक क्रोध | हवन में गायत्री मंत्र से आहुति दें |
| बृहस्पति | ज्ञान और गुरु कृपा में बाधा | किसी वैदिक विद्वान का सम्मान करें और पीली वस्तुओं का दान करें |
| चंद्रमा | मानसिक अस्थिरता | रात्रि में पूर्णिमा के चंद्रमा को दूध मिला जल अर्पित करें |
| शनि | कर्म में रुकावट | काले तिल से हवन में आहुति दें और तिल का दान करें |
अन्वाधान के दिन संयम, सत्य और पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण हैं। इस दिन एक बार सात्विक भोजन, अग्नि उपासना, भूमि पर शयन और ब्रह्मचर्य का पालन शुभ है। तामसिक भोजन, कटु वचन, असत्य और अग्नि का अनादर इस दिन वर्जित माना गया है।
अन्वाधान याद दिलाता है कि वैदिक परंपरा केवल ग्रंथों में नहीं बल्कि उन घरों में आज भी जीवित है जहां पीढ़ियों से पवित्र अग्नि प्रज्वलित है। हर पूर्णिमा और अमावस्या पर अग्नि में डाली गई समिधा उस अखंड श्रद्धा का प्रतीक है।
22 जनवरी 2027 को घर में जलाया गया एक घी का दीपक और "इदं अग्नये न मम" के भाव से दी गई एक आहुति, किसी भी साधक को उस प्राचीन ज्ञान से जोड़ सकती है जो कहता है कि सच्चा यज्ञ त्याग में है।
अन्वाधान 2027 कब है?
अन्वाधान शुक्रवार, 22 जनवरी 2027 को पौष शुक्ल चतुर्दशी पर है। इससे जुड़ी पौर्णमास इष्टि अगले दिन, 23 जनवरी को होगी।
अन्वाधान का अर्थ क्या है?
अन्वाधान का अर्थ है पवित्र अग्नि में फिर से समिधा रखकर उसे प्रज्वलित करना। यह इष्टि यज्ञ से एक दिन पहले किया जाने वाला तैयारी का अनुष्ठान है।
अन्वाधान और इष्टि में क्या अंतर है?
अन्वाधान तैयारी का दिन है, जिसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है और व्रत लिया जाता है। इष्टि अगले दिन होती है, जिसमें देवताओं को पुरोडाश और घी की आहुतियां दी जाती हैं।
वैदिक यज्ञ की तीन पवित्र अग्नियां कौन सी हैं?
वैदिक यज्ञ की तीन पवित्र अग्नियां गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि हैं। अन्वाधान के दिन इन्हीं में नई समिधा डाली जाती है।
क्या सामान्य गृहस्थ अन्वाधान कर सकता है?
पूर्ण श्रौत अन्वाधान अग्निहोत्री परिवार ही योग्य ऋत्विजों के साथ करते हैं। सामान्य गृहस्थ इस दिन दीपक जलाकर, छोटा हवन करके और संयम रखकर इसका भाव अपना सकते हैं।
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