By अपर्णा पाटनी
देवी शाकम्भरी की करुणा, अन्न दान और शनिवार के दुर्लभ संयोग का आध्यात्मिक अर्थ

पौष मास की ठंडी सुबहों में जब खेतों में हरी सब्जियां लहलहाती हैं तब एक ऐसा पर्व आता है जो देवी को अन्न और वनस्पति की दात्री के रूप में पूजता है। यह पर्व बनदा अष्टमी है। वर्ष 2027 में बनदा अष्टमी शनिवार, 16 जनवरी को मनाई जाएगी। इसी दिन से शाकम्भरी नवरात्रि का आरंभ भी होता है, जो पौष पूर्णिमा तक चलती है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | बनदा अष्टमी |
| तिथि | 16 जनवरी 2027 |
| वार | शनिवार |
| हिंदू मास | पौष |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | अष्टमी |
| शाकम्भरी नवरात्रि | 16 जनवरी से 22 जनवरी 2027 तक |
| पूर्णाहुति | पौष पूर्णिमा, शाकम्भरी जयंती |
| अभिजीत मुहूर्त (दिल्ली) | दोपहर लगभग 12:10 से 12:50 बजे तक |
| राहु काल (दिल्ली) | प्रातः लगभग 9:50 से 11:10 बजे तक |
| आराध्य देवी | माता बनशंकरी, शाकम्भरी स्वरूप |
अष्टमी तिथि का प्रारंभ और समाप्ति का समय हर शहर में थोड़ा अलग हो सकता है, इसलिए पूजा का सटीक समय स्थानीय पंचांग से अवश्य मिला लें। राहु काल में पूजा आरंभ करने से बचना चाहिए।
बनदा अष्टमी देवी बनशंकरी को समर्पित पर्व है। "बन" शब्द संस्कृत के "वन" से आया है, यानी जंगल। बनशंकरी का अर्थ है वन में निवास करने वाली देवी शंकरी, जो माता पार्वती का ही एक रूप हैं। इन्हें शाकम्भरी भी कहा जाता है, क्योंकि इन्होंने शाक यानी साग सब्जियों से संसार का भरण पोषण किया था।
यह पर्व विशेष रूप से कर्नाटक, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। कर्नाटक के बादामी के पास स्थित बनशंकरी मंदिर इस पूजा का प्रमुख केंद्र है। यह देवी वहां के चालुक्य राजवंश की कुलदेवी मानी जाती रही हैं। आज भी हजारों परिवार उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। उत्तर भारत में राजस्थान के सांभर और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र में शाकम्भरी देवी के प्राचीन स्थान हैं, जहां इन दिनों विशेष भीड़ रहती है।
देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती में इस कथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में दुर्गम नाम के एक असुर ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से चारों वेद प्राप्त कर लिए। वेदों के लुप्त होने से यज्ञ बंद हो गए, देवताओं को आहुति मिलनी बंद हो गई और धरती पर वर्षा रुक गई। कई वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा। नदियां सूख गईं, खेत बंजर हो गए और जीव भूख से तड़पने लगे।
तब ऋषियों ने हिमालय पर जाकर देवी की आराधना की। देवी प्रकट हुईं और अपनी संतानों की पीड़ा देखकर उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। कहा जाता है कि देवी ने सैकड़ों नेत्रों से लगातार 9 दिनों तक आंसू बहाए, जिससे धरती पर फिर से वर्षा हुई। इसी कारण वे शताक्षी कहलाईं, यानी सौ नेत्रों वाली।
इसके बाद देवी ने अपने शरीर से शाक, फल, कंद मूल और अनाज उत्पन्न करके भूखे संसार का पेट भरा। इसी रूप में वे शाकम्भरी कहलाईं। अंत में देवी ने दुर्गम असुर का वध करके वेद वापस लौटाए और इसी विजय के कारण उनका एक नाम दुर्गा भी पड़ा।
यह कथा केवल पौराणिक घटना नहीं है। इसमें एक गहरा संदेश छिपा है कि जब मनुष्य ज्ञान और धर्म से कट जाता है तब प्रकृति भी साथ छोड़ने लगती है। और जब करुणा जागती है तब सूखी धरती पर भी हरियाली लौट आती है।
बनदा अष्टमी की पूजा सरल है, लेकिन इसमें भाव का बहुत महत्व है। देवी अन्न और वनस्पति की स्वामिनी हैं, इसलिए उनकी पूजा में हरियाली और ताजगी का होना आवश्यक माना जाता है।
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ शाकम्भरी देव्यै नमः | अन्न, स्वास्थ्य और समृद्धि | 108 बार |
| ॐ दुं दुर्गायै नमः | रक्षा और बाधा निवारण | 108 बार |
जो लोग व्रत रखना चाहते हैं, वे इस दिन फलाहार कर सकते हैं। कई परिवार शाकम्भरी नवरात्रि के पूरे 7 दिन सात्विक भोजन करते हैं और पौष पूर्णिमा को व्रत का पारण करते हैं।
पौष मास में सूर्य धनु और फिर मकर राशि में रहते हैं। 2027 में बनदा अष्टमी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के ठीक बाद आ रही है, जब परंपरा के अनुसार उत्तरायण आरंभ हो चुका होगा। उत्तरायण में की गई देवी उपासना को विशेष फलदायी माना जाता है।
इस वर्ष यह पर्व शनिवार को पड़ रहा है, जो शनि देव का दिन है। शनि कर्म, सेवा और गरीबों के कारक ग्रह हैं। देवी शाकम्भरी का पूरा स्वरूप भूखों को भोजन देने से जुड़ा है। इसलिए शनिवार को अन्न दान करना इस वर्ष दोहरा पुण्य देने वाला माना जा सकता है। जिनकी कुंडली में शनि की साढ़ेसाती या ढैया चल रही हो, उनके लिए यह दिन भोजन दान और सेवा के लिए बहुत अनुकूल है।
शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर चंद्रमा आधे प्रकाशित होते हैं। यह संतुलन का प्रतीक है, यानी अंधकार और प्रकाश के बीच का बिंदु। ज्योतिष में चंद्रमा मन और पोषण के कारक हैं। देवी का अन्नदात्री रूप और चंद्रमा का पोषण वाला गुण, दोनों मिलकर यह दिन मन की शांति और घर की समृद्धि के लिए शुभ बनाते हैं।
इसी दिन मासिक दुर्गाष्टमी भी है, इसलिए दुर्गा उपासक इस दिन दोनों पर्वों का फल एक साथ प्राप्त कर सकते हैं।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| ताजी सब्जियों और फलों से पूजा करें | बासी या खराब वस्तुएं अर्पित न करें |
| भूखे व्यक्ति को भोजन कराएं | भोजन की बर्बादी न करें |
| सात्विक आहार लें | तामसिक भोजन और नशे से दूर रहें |
| पेड़ पौधों को जल दें | हरे पेड़ों को अनावश्यक न काटें |
| बड़ों और स्त्रियों का सम्मान करें | किसी से कटु वचन न बोलें |
बनदा अष्टमी याद दिलाती है कि हर थाली का अन्न किसी दैवी कृपा का फल है। जो देवी अकाल में आंसू बहाकर धरती को हरा कर सकती हैं, वे अपने भक्तों के जीवन के सूखे को भी दूर कर सकती हैं। 16 जनवरी 2027 को सच्चे मन से की गई पूजा, अन्न दान और प्रकृति के प्रति सम्मान, यही इस पर्व का सार है। जिस घर में भूखे को भोजन मिलता है, वहां माता शाकम्भरी स्वयं निवास करती हैं।
बनदा अष्टमी 2027 कब है?
बनदा अष्टमी 2027 शनिवार, 16 जनवरी को पौष शुक्ल अष्टमी पर मनाई जाएगी।
बनदा अष्टमी पर किसकी पूजा होती है?
इस दिन देवी बनशंकरी की पूजा होती है, जिन्हें शाकम्भरी भी कहते हैं। वे माता पार्वती का अन्न और वनस्पति देने वाला स्वरूप हैं।
शाकम्भरी नवरात्रि 2027 कब तक है?
शाकम्भरी नवरात्रि 16 जनवरी से शुरू होकर पौष पूर्णिमा, 22 जनवरी 2027 को शाकम्भरी जयंती के साथ पूर्ण होगी।
बनदा अष्टमी पर क्या दान करें?
इस दिन अन्न, हरी सब्जियां, फल और भोजन का दान सबसे शुभ माना जाता है। शनिवार होने के कारण गरीबों को भोजन कराना विशेष फलदायी है।
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