क्या है चंद्र दर्शन का वैदिक रहस्य और ज्योतिषीय महत्व?

By पं. नरेंद्र शर्मा

9 जनवरी 2027 को चंद्र दर्शन पर मानसिक शांति और शिव कृपा पाने के अचूक वैदिक उपाय।

चंद्र दर्शन 2027 पूजा विधि और वैदिक ज्योतिष रहस्य

वैदिक पंचांग और सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन ज्योतिष परंपरा में समय का प्रत्येक क्षण अपने भीतर एक विशिष्ट ब्रह्मांडीय ऊर्जा समेटे रहता है। आकाश मंडल में जब ग्रहों की गतियां एक विशेष कोण पर आती हैं तब पृथ्वी के वातावरण में सूक्ष्म प्राण ऊर्जा का प्रवाह अत्यंत तीव्र हो जाता है। पौष मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विघ्नेश्वर चतुर्थी के रूप में अत्यंत श्रद्धा और पूर्ण भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। यह पवित्र खगोलीय घटना केवल एक सामान्य कर्मकांड मात्र नहीं है बल्कि यह मानव चेतना को भौतिक जगत की भारी बाधाओं से मुक्त कर अंतरात्मा की अनंत गहराइयों में ले जाने वाला एक दुर्लभ आध्यात्मिक द्वार है। सांसारिक मोह और अनेक प्रकार की इच्छाओं के जटिल जाल में उलझा हुआ मनुष्य जब इस पवित्र दिन पर परब्रह्म स्वरूप भगवान श्री गणेश का निष्ठापूर्वक स्मरण करता है तो उसके जन्म जन्मांतर के संचित पाप और जीवन के समस्त विघ्न स्वतः ही नष्ट होने लगते हैं।

इस अत्यंत सिद्ध और पावन पर्व से जुड़ी मुख्य पंचांग जानकारी तथा शुभ अनुष्ठान का सटीक विवरण नीचे तालिका और बिंदुओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है

पंचांग के प्रमुख घटक विस्तृत ज्योतिषीय और वैदिक विवरण
पावन वैदिक पर्व का नाम विघ्नेश्वर चतुर्थी
अंग्रेजी दिनांक 11 जनवरी 2027
वार और स्वामी ग्रह सोमवार और चंद्र देव
वैदिक मास और पक्ष पौष मास और शुक्ल पक्ष
तिथि का नाम शुक्ल चतुर्थी
आराध्य देव और शक्तियां भगवान विघ्नेश्वर श्री गणेश माता पार्वती और शिव जी
प्रमुख वैदिक अनुष्ठान गणपति पूजन दूर्वा अर्पण मोदक भोग और चंद्र दर्शन निषेध

साधकों के लिए इस पावन दिन के प्राथमिक नियम और आवश्यक कर्तव्य अत्यंत कड़े और फलदायी होते हैं

  • सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में जागरण और पवित्र जल से स्नान करने का दृढ़ संकल्प लें।
  • संपूर्ण दिन मन वचन और कर्म से पूर्ण ब्रह्मचर्य तथा सत्य भाषण का कड़ाई से पालन करें।
  • तामसिक भोजन क्रोध भारी अहंकार और किसी भी प्राणी मात्र की निंदा से पूर्णतः दूर रहें।
  • घर के ईशान कोण में पवित्र वेदी बनाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें और शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • रात्रि के समय चंद्रमा के दर्शन भूलकर भी न करें क्योंकि चतुर्थी के चंद्रमा का दर्शन कलंक का कारण माना गया है।

पौष शुक्ल चतुर्थी का गूढ़ ज्योतिषीय रहस्य क्या है

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में चतुर्थी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान श्री गणेश माने गए हैं। यह तिथि रिक्ता तिथियों की श्रेणी में आती है जिसका अर्थ शून्यता या खालीपन होता है। भौतिक कार्यों के लिए भले ही इसे सामान्य माना जाए परंतु आध्यात्मिक साधना मंत्र सिद्धि और अहंकार के विसर्जन के लिए यह तिथि सर्वोत्तम होती है। जब मनुष्य अपने भीतर से सांसारिक इच्छाओं को रिक्त कर देता है तभी परमात्मा की असीम कृपा का अवतरण संभव हो पाता है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी वह अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है जब चंद्रमा सूर्य के प्रभाव से बाहर निकलकर अपनी कलाओं का विस्तार कर रहा होता है और प्रकृति में नई प्राण ऊर्जा का संचार होने लगता है।

पौष मास को वैदिक परंपरा में अत्यंत पवित्र और भारी तपस्या का मास माना गया है। इस मास में सूर्य देव देव गुरु बृहस्पति की धनु राशि में गोचर करते हैं। धनु राशि अग्नि तत्व की राशि है जो आध्यात्मिक लक्ष्य धर्म और उच्च ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है। जब पौष मास की यह पावन शुक्ल चतुर्थी आती है तब नवोदित चंद्रमा और सूर्य का यह कोणीय अंतर पृथ्वी पर एक विशेष प्रकार की सात्विक ऊर्जा का प्रवाह करता है। विघ्नेश्वर स्वरूप में भगवान गणेश जी की उपासना इस दिन इसलिए की जाती है ताकि साधक के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में आ रही समस्त बाधाएं हमेशा के लिए शांत हो जाएं। यह खगोलीय संयोग साधक के अवचेतन मन में दबी हुई पुरानी पीड़ाओं और भयंकर नकारात्मक संस्कारों को शांत करने की अद्भुत क्षमता रखता है।

सोमवार के दिन विघ्नेश्वर चतुर्थी का विशेष ज्योतिषीय प्रभाव

वर्ष 2027 के जनवरी मास की 11 तारीख को पड़ने वाला यह विघ्नेश्वर चतुर्थी पर्व सोमवार के दिन आ रहा है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार जब चतुर्थी की पावन तिथि सोमवार के दिन पड़ती है तो यह एक अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी ब्रह्मांडीय संयोग का निर्माण करती है। सोमवार के स्वामी चंद्र देव हैं जो मन माता और भावनाओं के मुख्य कारक हैं और सोमवार का दिन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। भगवान गणेश माता पार्वती और भगवान शिव के प्रिय पुत्र हैं इसलिए सोमवार के दिन उनकी उपासना करने से शिव परिवार की संपूर्ण कृपा एक साथ प्राप्त होती है।

सामान्यतः चंद्रमा की चंचलता मानव मन में अनेक प्रकार के भ्रम और भटकाव उत्पन्न करती है। परंतु जब शुक्ल चतुर्थी का पवित्र संयोग सोमवार के दिन बनता है तो भगवान गणेश की स्थिर बुद्धि और कुशाग्र ज्ञान चंद्रमा की चंचलता को पूरी तरह नियंत्रित कर लेते हैं। जो व्यक्ति भारी मानसिक रोगों भयंकर अवसाद या जीवन में बार बार आने वाले अज्ञात संकटों से जूझ रहे हैं उनके लिए यह सोमवार की विघ्नेश्वर चतुर्थी किसी बड़े ईश्वरीय वरदान से कम नहीं है। इस दिन की गई गणपति उपासना से मन को असीम शांति मिलती है और केतु ग्रह जनित समस्त बाधाएं स्वतः ही दूर होने लगती हैं।

मूलाधार चक्र का जागरण और भगवान गणेश की चेतना

वैदिक दर्शन और योग शास्त्र के अनुसार मानव शरीर में सात प्रमुख ऊर्जा चक्र विद्यमान हैं। इनमें से सबसे प्रथम और आधारभूत चक्र मूलाधार चक्र है जो रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले भाग में स्थित होता है। मूलाधार चक्र का सीधा संबंध पृथ्वी तत्व भौतिक स्थिरता और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से होता है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण चक्र के अधिष्ठाता देव स्वयं भगवान श्री गणेश हैं। जब तक किसी साधक का मूलाधार चक्र जाग्रत और संतुलित नहीं होता तब तक वह आध्यात्मिक मार्ग पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता है।

विघ्नेश्वर चतुर्थी के इस पावन अवसर पर ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह सीधा पृथ्वी तत्व की ओर होता है। जब कोई निष्ठावान साधक इस दिन पूर्ण एकाग्रता के साथ ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का निरंतर मानसिक जाप करता है तो ध्वनि की वे सूक्ष्म तरंगें सीधे उसके मूलाधार चक्र पर प्रहार करती हैं। इस वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया से सुप्त पड़ी हुई कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होने लगती है। साधक के भीतर से भय असुरक्षा की भावना और भौतिक लालसा का समूल नाश हो जाता है। भगवान गणेश की यह दिव्य चेतना मनुष्य को अज्ञानता के भारी अंधकार से निकालकर प्रज्ञा और विवेक के शाश्वत प्रकाश की ओर ले जाती है।

विघ्नासुर का वध और विघ्नेश्वर नाम की उत्पत्ति की पौराणिक कथा

पुराणों और प्राचीन वैदिक ग्रंथों में भगवान गणेश के विघ्नेश्वर अवतार की अत्यंत गूढ़ और मर्मस्पर्शी कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में अभिनंद नामक एक अत्यंत अभिमानी राजा था जिसने स्वयं को देवताओं से भी श्रेष्ठ मान लिया था। उसने देवराज इंद्र को यज्ञ का भाग देना पूरी तरह बंद कर दिया। इस अपमान से क्रोधित होकर इंद्र ने काल पुरुष की सहायता से एक भयंकर राक्षस को उत्पन्न किया जिसका नाम विघ्नासुर था। विघ्नासुर का मुख्य कार्य ब्रह्मांड में होने वाले समस्त शुभ कार्यों यज्ञों और दान धर्म के कार्यों में भारी बाधाएं उत्पन्न करना था।

विघ्नासुर के भयंकर आतंक से संपूर्ण पृथ्वी और स्वर्ग लोक में भारी हाहाकार मच गया। मुनियों के यज्ञ नष्ट होने लगे और धर्म का पतन होने लगा। अत्यंत भयभीत होकर समस्त देवता और ऋषि मुनि भगवान ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान श्री गणेश की घोर तपस्या करने का परम उपदेश दिया। देवताओं की अत्यंत कठोर तपस्या और करुण पुकार से प्रसन्न होकर भगवान गणेश प्रकट हुए। उन्होंने देवताओं को अभय दान दिया और विघ्नासुर के साथ एक अत्यंत भयंकर युद्ध किया।

भगवान गणेश के असीम तेज और शक्ति के सामने विघ्नासुर पूरी तरह परास्त हो गया। मृत्यु के भय से कांपते हुए उसने भगवान गणेश के चरण पकड़ लिए और प्राण दान की भीख मांगने लगा। भगवान गणेश ने अत्यंत दयालु होकर उसे क्षमा कर दिया परंतु एक कड़ी शर्त रखी कि जहां भी भगवान गणेश का स्मरण और पूजन होगा वहां विघ्नासुर कभी भी प्रवेश नहीं कर सकेगा। विघ्नासुर ने यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली और भगवान गणेश को विघ्नेश्वर नाम से पुकार कर उनकी स्तुति की। इसी महान घटना के बाद से भगवान गणेश को विघ्नों का नाश करने वाले विघ्नेश्वर के रूप में पूजा जाने लगा।

नवग्रहों की शांति और गणपति उपासना के अमोघ वैदिक उपाय

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य के जीवन में आने वाले समस्त सुख और दुख उसकी जन्म कुंडली में स्थित नौ ग्रहों के गोचर तथा दशाओं का सीधा परिणाम होते हैं। ग्रहों के अशुभ प्रभाव को शांत करने के लिए भगवान गणेश की उपासना को सबसे श्रेष्ठ और त्वरित फलदायी उपाय माना गया है। वेदों में भगवान गणेश को साक्षात परब्रह्म कहा गया है जो समस्त ग्रहों के नियंत्रक हैं। विशेष रूप से बुध और केतु ग्रह का सीधा संबंध भगवान गणेश से होता है।

विघ्नेश्वर चतुर्थी के दिन जब विशेष मंत्रों और औषधीय द्रव्यों से भगवान की पूजा की जाती है तो वातावरण में एक विशेष प्रकार की रासायनिक और आध्यात्मिक ऊर्जा फैलती है। यह अमोघ ऊर्जा साधक के आभामंडल में चिपके हुए अत्यंत नकारात्मक ग्रह दोषों को तुरंत साफ कर देती है। यदि कुंडली में बुध ग्रह नीच का हो या राहु केतु के भयंकर प्रभाव से पीड़ित हो तो व्यक्ति की बुद्धि और वाणी पूरी तरह भ्रमित हो जाती है। इस पवित्र दिन भगवान गणेश को 108 अत्यंत ताजी दूर्वा घास की पत्तियां अर्पित करने से बुध ग्रह का भारी दोष हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। दूर्वा घास में अमृत का वास माना गया है जो मानसिक शांति और शारीरिक आरोग्य प्रदान करती है।

केतु ग्रह को मोक्ष और वैराग्य का कारक माना गया है परंतु जब यह अशुभ होता है तो जीवन में अचानक आने वाली बड़ी दुर्घटनाओं और अज्ञात बीमारियों का कारण बनता है। केतु के अधिपति देव स्वयं भगवान गणेश हैं। सोमवार के दिन पड़ने वाली इस चतुर्थी पर जब साधक भगवान गणेश को बेसन के लड्डू और लाल पुष्प अर्पित करता है तो केतु जनित समस्त भारी कष्ट शांत हो जाते हैं और जीवन में अचानक धन प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। यह अति पवित्र समय साधक को उसके प्रारब्ध के अत्यंत कठोर दंड से बचाता है और अचूक नवग्रह शांति सुनिश्चित करता है।

विघ्नेश्वर चतुर्थी की संपूर्ण और प्रामाणिक वैदिक पूजा विधि

इस पवित्र पर्व का पूर्ण आध्यात्मिक और भारी ज्योतिषीय लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को प्रातः काल से लेकर रात्रि तक एक अत्यंत अनुशासित दिनचर्या का कड़ाई से पालन करना चाहिए। शास्त्रीय विधि से की गई पूजा वातावरण में भारी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और साधक के आभामंडल को पूरी तरह शुद्ध करती है।

प्रातः काल से संध्या तक किए जाने वाले चरणबद्ध अनुष्ठान अत्यंत सरल किंतु बहुत प्रभावशाली हैं

1 ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले अपने दोनों हाथों की हथेलियों का दर्शन करें क्योंकि हाथों के अग्र भाग में माता लक्ष्मी मध्य में सरस्वती और मूल में भगवान गोविंद का वास होता है। इसके पश्चात स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल डालकर पवित्र स्नान संपन्न करें। 2 अत्यंत स्वच्छ और लाल या पीले रंग के धुले हुए वस्त्र धारण करें। घर के ईशान कोण या पूर्व दिशा में स्थित पूजा स्थान को स्वच्छ जल से साफ करें। 3 एक लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की अत्यंत सुंदर प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दाहिने हाथ में शुद्ध जल अक्षत पीले पुष्प और सुपारी लेकर पौष मास के विघ्नेश्वर चतुर्थी व्रत का दृढ़ संकल्प लें। 4 भगवान गणेश का पंचामृत से अभिषेक करें और उन्हें लाल वस्त्र जनेऊ लाल चंदन और सिंदूर का तिलक अत्यंत श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। 5 भगवान को 21 ताजी दूर्वा की पत्तियां ॐ गणाधीशाय नमः मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्पित करें। दूर्वा हमेशा जोड़े में चढ़ानी चाहिए। 6 गाय के शुद्ध घी का एक बड़ा दीपक प्रज्वलित करें और भगवान को मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। इसके अतिरिक्त ऋतु फल और पान का पत्ता भी अवश्य चढ़ाएं। 7 इस दिन श्री गणपति अथर्वशीर्ष और संकटनाशन गणेश स्तोत्र का कम से कम तीन बार अत्यंत एकाग्रता से पाठ करें। अंत में भगवान की कर्पूर से आरती करें और अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करें।

विघ्नेश्वर चतुर्थी के पावन दिन क्या करें और क्या न करें

वैदिक व्रतों में बाहरी कर्मकांड और पूजा से अधिक महत्व मानसिक और शारीरिक अनुशासन को दिया गया है। इस दिन के प्रमुख करणीय और वर्जित कार्यों का पालन करना प्रत्येक साधक के लिए अत्यंत अनिवार्य और फलदायी है।

मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त में जागरण और कुछ समय मौन रहने का कड़ा अभ्यास करना चाहिए। भोजन में केवल सात्विक अन्न फल या गाय के दूध का ही प्रयोग करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों गायों और निर्धनों को अन्न तथा वस्त्र का दान अवश्य देना चाहिए। पूर्ण ब्रह्मचर्य और शुद्ध सात्विक विचारों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।

रात्रि के समय चंद्रमा के दर्शन भूलकर भी नहीं करने चाहिए क्योंकि चतुर्थी के चंद्रमा को देखना कलंक और झूठे आरोपों का कारण बन सकता है। यदि भूलवश चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए। देर तक सोना और व्यर्थ के वाद विवाद या किसी भी व्यक्ति की निंदा में अपना बहुमूल्य समय कभी नहीं गंवाना चाहिए। तामसिक भोजन लहसुन प्याज मांस और मदिरा का भूलकर भी स्पर्श नहीं करना चाहिए। किसी भी याचक पशु या पक्षी को अपने द्वार से अपमानित कर नहीं भगाना चाहिए। क्रोध भारी अहंकार लोभ और अनैतिक विचारों को मन में बिल्कुल नहीं लाना चाहिए।

बारह राशियों के लिए विघ्नेश्वर चतुर्थी पर्व के कल्याणकारी उपाय

11 जनवरी 2027 को सोमवार और पौष शुक्ल चतुर्थी के इस अत्यंत महान संयोग पर यदि जातक अपनी चंद्र राशि के अनुसार विशेष वैदिक उपाय करता है तो उसे ग्रहों की पूर्ण अनुकूलता और मनोवांछित फलों की सहज प्राप्ति होती है।

  • मेष राशि इस राशि के जातकों को भगवान गणेश को लाल पुष्प और गुड़ का भोग लगाना चाहिए जिससे उनके कार्यक्षेत्र में आने वाली भारी बाधाएं दूर होंगी।
  • वृषभ राशि शुक्र ग्रह की अनुकूलता और अपार धन प्राप्ति के लिए भगवान विघ्नेश्वर को मिश्री और सफेद चंदन अर्पित करें तथा कपूर से आरती करें।
  • मिथुन राशि अपने बौद्धिक विकास और व्यापार में भारी उन्नति के लिए 108 दूर्वा की पत्तियों की माला बनाकर भगवान को अत्यंत श्रद्धा से पहनाएं।
  • कर्क राशि भारी मानसिक तनाव से हमेशा के लिए मुक्ति पाने के लिए भगवान गणेश को दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं और शिव जी का भी ध्यान करें।
  • सिंह राशि समाज में मान सम्मान और उच्च पद की प्राप्ति के लिए लाल रंग के फल और तांबे के पात्र में जल भरकर भगवान को अर्पित करें।
  • कन्या राशि उत्तम स्वास्थ्य लाभ और पारिवारिक शांति के लिए साबुत मूंग की दाल का दान करें और भगवान को पान का पत्ता अत्यंत प्रेम से चढ़ाएं।
  • तुला राशि दांपत्य जीवन में अपार सुख शांति के लिए भगवान गणेश को इत्र और सफेद वस्त्र भेंट करें तथा श्री सूक्त का पाठ करें।
  • वृश्चिक राशि अपने गुप्त शत्रुओं पर विजय और भारी कर्ज से मुक्ति के लिए भगवान को सिंदूर का चोला चढ़ाएं और लाल मसूर का दान करें।
  • धनु राशि आपके लिए यह अत्यंत शुभ समय है। ज्ञान और शिक्षा में भारी वृद्धि के लिए पीले आसन पर बैठकर पूजा करें और बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
  • मकर राशि शनि देव के कष्टों को पूरी तरह शांत करने के लिए काले तिल से बनी मिठाई का भोग लगाएं और किसी असहाय व्यक्ति को कंबल भेंट करें।
  • कुंभ राशि आजीविका में आ रही समस्त बाधाओं को दूर करने के लिए भगवान के समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाएं और पक्षियों के लिए अनाज डालें।
  • मीन राशि आध्यात्मिक सिद्धि और उत्तम स्वास्थ्य के लिए जल में थोड़ा सा केसर मिलाकर भगवान का अभिषेक करें और हल्दी की गांठ अर्पित करें।

आत्मिक शांति और शाश्वत सफलता का वैदिक मार्ग

पौष मास की इस पवित्र शुक्ल चतुर्थी पर मनाया जाने वाला यह विघ्नेश्वर पर्व हमें अपनी गहरी जड़ों और महान ऋषियों की प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा से जोड़ने का एक अत्यंत पावन सेतु है। जब हम पूर्ण समर्पण के साथ भगवान गणेश के समक्ष नतमस्तक होते हैं तो वास्तव में हम अपने भीतर के भारी अहंकार को मिटाने का अत्यंत सच्चा प्रयास कर रहे होते हैं। यह पावन दिन हमें रुकने आत्मनिरीक्षण करने और अपने भीतर सत्य तथा ज्ञान का शाश्वत प्रकाश भरने की महान शिक्षा देता है। जो भी मनुष्य इस पवित्र दिन कठोर नियम पूर्ण संयम और सच्ची श्रद्धा के साथ अपनी संपूर्ण जीवन ऊर्जा को भगवान विघ्नेश्वर के श्री चरणों में समर्पित कर देता है उसके लिए इस संसार की कोई भी बाधा अजेय नहीं रह जाती है और उसे जीवन के हर क्षेत्र में शाश्वत सफलता प्राप्त होती है।

FAQ

प्रश्न 1 वर्ष 2027 में पौष मास की विघ्नेश्वर चतुर्थी कब मनाई जाएगी
उत्तर वैदिक पंचांग की अत्यंत सटीक गणना के अनुसार यह महान पावन पर्व 11 जनवरी 2027 को सोमवार के दिन पूरे उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाएगा।

प्रश्न 2 विघ्नेश्वर चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन क्यों वर्जित माने गए हैं
उत्तर पौराणिक शास्त्रों के अनुसार चतुर्थी के दिन चंद्रमा ने भगवान गणेश के स्वरूप का उपहास किया था जिसके कारण उन्हें कलंकित होने का भयंकर श्राप मिला था इसलिए इस दिन चंद्र दर्शन वर्जित हैं।

प्रश्न 3 सोमवार के दिन चतुर्थी पड़ने से क्या विशेष ज्योतिषीय लाभ मिलता है
उत्तर सोमवार भगवान शिव और चंद्र देव का दिन है इसलिए इस दिन गणेश जी की उपासना करने से मानसिक शांति मिलती है और परिवार में असीम सुख समृद्धि का वास होता है।

प्रश्न 4 नवग्रहों में भगवान गणेश मुख्य रूप से किन ग्रहों के दोष शांत करते हैं
उत्तर भगवान गणेश को मुख्य रूप से बुध और केतु ग्रह का नियंत्रक माना गया है इसलिए उनकी उपासना से बुद्धि भ्रम दूर होता है और जीवन की अचानक आने वाली भारी बाधाएं समाप्त होती हैं।

प्रश्न 5 विघ्नेश्वर चतुर्थी की पूजा में भगवान को सबसे प्रिय वस्तु क्या अर्पित करनी चाहिए
उत्तर भगवान विघ्नेश्वर को ताजी दूर्वा घास की पत्तियां सिंदूर और मोदक अत्यंत प्रिय हैं इसलिए पूजा में इन पवित्र सामग्री का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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