By पं. संजीव शर्मा
11वें मनु की स्मृति, पितरों का तर्पण और सनातन काल गणना का गूढ़ रहस्य

हर पूजा, हर यज्ञ और हर व्रत से पहले जब पुरोहित संकल्प पढ़ते हैं, तो उसमें कुछ शब्द बार बार आते हैं, "श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे"। बहुत कम लोग रुककर सोचते हैं कि इन शब्दों का अर्थ क्या है। ये शब्द बताते हैं कि हम ब्रह्मा जी के किस दिन में और किस मनु के काल में जी रहे हैं। सनातन परंपरा में समय को सीधी रेखा नहीं बल्कि एक विशाल चक्र माना गया है, जिसमें युग, मन्वंतर और कल्प बार बार आते हैं। इस चक्र के हर बड़े मोड़ की स्मृति में कुछ विशेष तिथियां निश्चित की गई हैं, जिन्हें मन्वादि तिथियां कहा जाता है।
धर्म सावर्णि मन्वादि ऐसी ही एक पवित्र तिथि है। वर्ष 2027 में यह सोमवार, 18 जनवरी को पौष शुक्ल एकादशी पर पड़ रही है। यह दिन 11वें मनु, धर्म सावर्णि के मन्वंतर के आरंभ से जुड़ा माना जाता है। शास्त्रों में इस दिन स्नान, दान, जप और विशेष रूप से पितरों के तर्पण का बहुत महत्व बताया गया है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | धर्म सावर्णि मन्वादि |
| तिथि | 18 जनवरी 2027 |
| वार | सोमवार |
| हिंदू मास | पौष |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | एकादशी |
| संबंधित मनु | 11वें मनु, धर्म सावर्णि |
| सूर्य की स्थिति | मकर राशि |
| दिल्ली में सूर्योदय | प्रातः लगभग 7:15 बजे |
| कुतुप मुहूर्त (दिल्ली) | दोपहर लगभग 12:10 से 12:50 बजे तक |
| अपराह्न काल (दिल्ली) | दोपहर लगभग 1:35 से 3:40 बजे तक |
| राहु काल (दिल्ली) | प्रातः लगभग 8:35 से 9:55 बजे तक |
| उसी दिन के अन्य पर्व | पौष पुत्रदा एकादशी, मासिक कार्तिगई |
शास्त्रों में पितृ कार्य के लिए कुतुप मुहूर्त और अपराह्न काल को श्रेष्ठ माना गया है। स्नान और दान का कार्य सुबह किया जा सकता है, जबकि तर्पण और श्राद्ध दोपहर में करना उत्तम है। सटीक समय के लिए अपने शहर का स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
"मन्वादि" शब्द दो शब्दों से बना है, मनु और आदि। इसका अर्थ है मनु का आरंभ। पुराणों के अनुसार सृष्टि के संचालन के लिए हर काल खंड में एक मनु नियुक्त होते हैं। वे उस काल के मानव समाज के आदि पुरुष, धर्म के व्यवस्थापक और नियमों के संस्थापक होते हैं। एक मनु के शासन काल को मन्वंतर कहा जाता है।
ब्रह्मा जी के एक दिन में 14 मनु होते हैं, यानी 14 मन्वंतर। हर मन्वंतर के आरंभ की स्मृति में वर्ष की एक निश्चित तिथि को मन्वादि तिथि माना गया है। इस प्रकार वर्ष में कुल 14 मन्वादि तिथियां होती हैं। इनमें से पौष शुक्ल एकादशी को 11वें मनु, धर्म सावर्णि के मन्वंतर के आरंभ की तिथि माना जाता है।
शास्त्रों में वर्ष भर के 96 श्राद्ध अवसरों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें षण्णवति श्राद्ध कहा जाता है। इनमें 12 अमावस्या, 12 संक्रांतियां, 4 युगादि तिथियां और 14 मन्वादि तिथियां भी शामिल हैं। इसका अर्थ है कि हर मन्वादि तिथि पितरों को स्मरण करने और उन्हें तृप्त करने का एक शास्त्र सम्मत अवसर है।
मन्वादि का महत्व समझने के लिए सनातन काल गणना को थोड़ा समझना आवश्यक है। यह गणना इतनी विशाल है कि आधुनिक मन भी इसके आकार पर चकित रह जाता है।
| काल इकाई | अवधि |
|---|---|
| कलियुग | 4,32,000 वर्ष |
| द्वापर युग | 8,64,000 वर्ष |
| त्रेता युग | 12,96,000 वर्ष |
| सत्य युग | 17,28,000 वर्ष |
| एक महायुग (चारों युग) | 43,20,000 वर्ष |
| एक मन्वंतर | लगभग 71 महायुग, यानी लगभग 30 करोड़ 67 लाख वर्ष |
| एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) | 14 मन्वंतर, यानी 1000 महायुग |
हम इस समय श्वेत वाराह कल्प में, सातवें मनु वैवस्वत के मन्वंतर में, 28वें महायुग के कलियुग में जी रहे हैं। इसी कारण हर संकल्प में "श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे" कहा जाता है। यह वाक्य मानो ब्रह्मांड के विशाल नक्शे पर हमारा पता बताता है।
यह गणना एक गहरी विनम्रता सिखाती है। मनुष्य का पूरा जीवन इस विशाल काल चक्र में एक पल से भी छोटा है। फिर भी शास्त्र कहते हैं कि इसी छोटे से जीवन में किया गया धर्म आने वाले युगों तक फल देता है।
पुराणों में 14 मनुओं के नाम दिए गए हैं। इनमें 6 मनु बीत चुके हैं, सातवें वर्तमान में हैं और 7 भविष्य में आएंगे।
| क्रम | मनु का नाम | काल |
|---|---|---|
| 1 | स्वायंभुव | बीत चुका |
| 2 | स्वारोचिष | बीत चुका |
| 3 | उत्तम | बीत चुका |
| 4 | तामस | बीत चुका |
| 5 | रैवत | बीत चुका |
| 6 | चाक्षुष | बीत चुका |
| 7 | वैवस्वत | वर्तमान |
| 8 | सावर्णि | भविष्य |
| 9 | दक्ष सावर्णि | भविष्य |
| 10 | ब्रह्म सावर्णि | भविष्य |
| 11 | धर्म सावर्णि | भविष्य |
| 12 | रुद्र सावर्णि | भविष्य |
| 13 | देव सावर्णि | भविष्य |
| 14 | इंद्र सावर्णि | भविष्य |
कुछ पुराणों में 13वें और 14वें मनु के नाम रौच्य और भौत्य भी मिलते हैं। आठवें से बारहवें तक के मनु "सावर्णि" कहलाते हैं, जो सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया से जुड़ी परंपरा का संकेत देता है। आठवें मनु सावर्णि को सूर्य और छाया का पुत्र माना गया है।
धर्म सावर्णि का नाम ही उनके मन्वंतर का स्वभाव बताता है। "धर्म" इस नाम का केंद्र है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार 11वें मन्वंतर में वैधृत नाम के इंद्र होंगे और भगवान विष्णु धर्मसेतु नाम से अवतार लेंगे। "धर्मसेतु" का अर्थ है धर्म का पुल, यानी वह शक्ति जो मनुष्य को अधर्म के किनारे से धर्म के किनारे तक पहुंचाती है। इस अवतार के द्वारा तीनों लोकों की रक्षा होगी।
यह विचार बहुत सुंदर है कि हम आज एक ऐसे मन्वंतर की स्मृति मना रहे हैं जो अभी आया ही नहीं है। मन्वादि तिथियां केवल अतीत को याद करने के लिए नहीं हैं। वे काल के पूरे चक्र को, अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ प्रणाम करने का अवसर हैं। धर्म सावर्णि मन्वादि मनुष्य को याद दिलाती है कि धर्म एक निरंतर धारा है, जो हर युग में बहती रहती है और हर युग में अपने रक्षक को जन्म देती है।
इस वर्ष मन्वादि और पुत्रदा एकादशी एक ही दिन पड़ रही हैं। एकादशी पर अन्न ग्रहण वर्जित है, इसलिए कई परिवारों में इस दिन अन्न से बने पिंड के स्थान पर केवल तिल जल से तर्पण और कच्चे अन्न का दान किया जाता है। जो लोग एकादशी का व्रत रख रहे हैं, वे तर्पण, दान और जप करके इस दिन का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। पिंडदान या विस्तृत श्राद्ध के विषय में अपनी पारिवारिक परंपरा और कुल पुरोहित की सलाह के अनुसार निर्णय लें।
| सामग्री | उपयोग |
|---|---|
| काले तिल | तर्पण के लिए, पितरों को प्रिय |
| कुशा | तर्पण के समय हाथ में धारण करने के लिए |
| गंगाजल | शुद्धि और तर्पण के लिए |
| सफेद पुष्प | पितरों को अर्पण के लिए |
| कच्चा अन्न | दान के लिए |
| कंबल और ऊनी वस्त्र | शीत ऋतु में दान के लिए |
| गुड़ और तिल | दान और प्रसाद के लिए |
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः | पितरों की तृप्ति | तर्पण के समय |
| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | भगवान विष्णु की कृपा | 108 बार |
| ॐ धर्माय नमः | धर्म के प्रति निष्ठा और जीवन में संतुलन | 108 बार |
| ॐ नमः शिवाय | सोमवार होने के कारण शिव कृपा | 108 बार |
वैदिक ज्योतिष में कुंडली का नवम भाव धर्म भाव कहलाता है। यही भाव पिता, गुरु, पितरों के आशीर्वाद, भाग्य और तीर्थ का भी है। धर्म सावर्णि मन्वादि का संबंध धर्म और पितृ, दोनों से है, इसलिए यह दिन नवम भाव को शुभ बनाने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जा सकता है। जिनकी कुंडली में नवम भाव पीड़ित हो, भाग्य साथ न देता हो या पितृ दोष का योग हो, उनके लिए इस दिन का तर्पण और दान बहुत फलदायी माना जाता है।
सूर्य इस समय मकर राशि में हैं, जो शनि की राशि है। ज्योतिष में सूर्य पिता और पितरों के कारक हैं, जबकि शनि कर्म और कर्मफल के। सूर्य का शनि की राशि में होना पूर्वजों के कर्म और वंशजों के जीवन के संबंध का प्रतीक है। इस समय पितरों के लिए किया गया दान और तर्पण उस कर्म बंधन को हल्का करने वाला माना जाता है।
2027 में यह दिन सोमवार है और चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में अपनी उच्च स्थिति वृषभ राशि के निकट हैं। परंपरा में पितृलोक को चंद्रमा के ऊर्ध्व भाग में स्थित माना गया है और चंद्रमा को पितरों तक अर्पण पहुंचाने वाला माध्यम भी कहा गया है। बलवान चंद्रमा के दिन किया गया तर्पण इस दृष्टि से विशेष शुभ माना जा सकता है। साथ ही एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है, जो स्वयं हर मन्वंतर में धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।
| कुंडली की स्थिति | मन्वादि पर उपाय |
|---|---|
| पितृ दोष का योग | पितरों के नाम से तिल जल तर्पण और अन्न दान करें |
| नवम भाव पीड़ित हो | किसी गुरु या वृद्ध ब्राह्मण का सम्मान करें और उन्हें वस्त्र दें |
| सूर्य कमजोर हो | प्रातः तांबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य दें |
| शनि का कष्ट हो | काले तिल और कंबल का दान करें |
| चंद्रमा कमजोर हो | शिवलिंग पर दूध और जल चढ़ाएं |
| भाग्य बाधित हो | विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें |
आधुनिक जीवन में समय को घंटों, दिनों और महीनों में बांटकर देखा जाता है। हर व्यक्ति अगले हफ्ते, अगले महीने या अगले वर्ष की योजना में उलझा रहता है। ऐसे में मन्वादि तिथि एक बिल्कुल अलग दृष्टि देती है। यह बताती है कि समय करोड़ों वर्षों में फैला हुआ है और हर व्यक्ति इस विशाल धारा का एक छोटा सा हिस्सा है।
यह दृष्टि मन को दो तरह से मुक्त करती है। पहली, यह अहंकार को कम करती है, क्योंकि इतने विशाल काल में किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि बहुत छोटी है। दूसरी, यह जिम्मेदारी का भाव जगाती है, क्योंकि हर व्यक्ति अपने पूर्वजों से जो पाता है, उसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना उसका धर्म है। पितरों का तर्पण अतीत के प्रति कृतज्ञता है और धर्म का पालन भविष्य के प्रति जिम्मेदारी। धर्म सावर्णि मन्वादि इन दोनों को एक साथ जोड़ती है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| सूर्योदय से पहले स्नान करें | तर्पण में लोहे के पात्र का उपयोग न करें |
| दोपहर में दक्षिण मुख होकर तर्पण करें | राहु काल में पितृ कार्य आरंभ न करें |
| काले तिल और कुशा का प्रयोग करें | एकादशी होने के कारण अन्न ग्रहण न करें |
| कच्चा अन्न, कंबल और वस्त्र दान करें | पितरों या बड़ों के प्रति अपशब्द न कहें |
| पशु पक्षियों के लिए भोजन निकालें | मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहें |
धर्म सावर्णि मन्वादि मनुष्य को समय के उस विशाल रूप के सामने खड़ा करती है, जहां युग पलक झपकने जैसे लगते हैं और मनु आते जाते रहते हैं। फिर भी इस विशाल चक्र में एक चीज स्थिर रहती है और वह है धर्म। 18 जनवरी 2027 को, सोमवार के दिन, जब पुत्रदा एकादशी का पवित्र व्रत और उत्तरायण का पुण्य काल साथ चल रहे होंगे तब पितरों के लिए अर्पित तिल जल की हर बूंद अतीत के प्रति आभार बनेगी और विष्णु के नाम का हर जप भविष्य के लिए आशीर्वाद। जो अपनी जड़ों को सींचता है, उसकी शाखाएं हर युग में हरी रहती हैं।
धर्म सावर्णि मन्वादि 2027 कब है?
धर्म सावर्णि मन्वादि 2027 सोमवार, 18 जनवरी को पौष शुक्ल एकादशी पर है। इसी दिन पौष पुत्रदा एकादशी भी है।
मन्वादि तिथि क्या होती है?
मन्वादि तिथि वह दिन है जिसे किसी मनु के मन्वंतर के आरंभ से जोड़ा जाता है। वर्ष में ऐसी 14 तिथियां होती हैं।
धर्म सावर्णि कौन हैं?
धर्म सावर्णि 11वें मनु हैं, जो भविष्य में आएंगे। भागवत पुराण के अनुसार उनके मन्वंतर में भगवान विष्णु धर्मसेतु नाम से अवतार लेंगे।
मन्वादि पर तर्पण कैसे करें?
दोपहर में कुतुप मुहूर्त के आसपास दक्षिण मुख होकर काले तिल, कुशा और जल से पितरों का नाम लेकर तर्पण करें।
मन्वादि और एकादशी एक साथ हों तो क्या करें?
ऐसे में अन्न के पिंड के स्थान पर तिल जल से तर्पण और कच्चे अन्न का दान करें तथा भगवान विष्णु की पूजा करें।
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