By पं. अमिताभ शर्मा
स्मार्त और वैष्णव परंपरा का अंतर, संन्यासियों की एकादशी और मोक्ष का मार्ग

पंचांग की गणना कभी कभी ऐसी स्थिति बनाती है जब कोई तिथि दो दिनों के सूर्योदय को स्पर्श कर लेती है। जब ऐसा एकादशी के साथ होता है तब भक्तों के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि व्रत किस दिन रखा जाए। शास्त्रों ने इस प्रश्न का बहुत सुंदर समाधान दिया है। पहले दिन की एकादशी गृहस्थों के लिए और दूसरे दिन की एकादशी संन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष की कामना करने वाले साधकों के लिए बताई गई है। दूसरे दिन की इसी एकादशी को गौण एकादशी कहा जाता है।
वर्ष 2027 में पौष पुत्रदा एकादशी के साथ ठीक यही स्थिति बन रही है। मुख्य यानी स्मार्त पुत्रदा एकादशी सोमवार, 18 जनवरी को है, जबकि गौण पौष पुत्रदा एकादशी मंगलवार, 19 जनवरी को मनाई जाएगी।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| व्रत का नाम | गौण पौष पुत्रदा एकादशी |
| तिथि | 19 जनवरी 2027 |
| वार | मंगलवार |
| हिंदू मास | पौष |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | एकादशी, जो सुबह कुछ समय बाद द्वादशी में बदलेगी |
| स्मार्त पुत्रदा एकादशी | 18 जनवरी 2027, सोमवार |
| गौण व्रत का पारण | 20 जनवरी को सूर्योदय के बाद |
| सूर्य की स्थिति | मकर राशि |
| चंद्रमा की स्थिति | वृषभ राशि, रोहिणी नक्षत्र |
| दिल्ली में सूर्योदय | प्रातः लगभग 7:15 बजे |
| राहु काल (दिल्ली) | दोपहर लगभग 3:10 से 4:30 बजे तक |
| आराध्य देव | भगवान विष्णु |
| उसी दिन के अन्य पर्व | कूर्म द्वादशी, तैलंग स्वामी जयंती, रोहिणी व्रत (जैन) |
गौण एकादशी के व्रत का पारण 20 जनवरी को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। पारण का सटीक समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग या अपनी संप्रदाय परंपरा के पंचांग से अवश्य देख लें।
| व्रत करने वाले | व्रत का दिन | पारण |
|---|---|---|
| गृहस्थ, विशेषकर संतान की कामना करने वाले दंपति | 18 जनवरी, सोमवार | 19 जनवरी |
| संन्यासी और साधु | 19 जनवरी, मंगलवार | 20 जनवरी |
| विधवाएं | 19 जनवरी, मंगलवार | 20 जनवरी |
| मोक्ष की कामना करने वाले साधक | 19 जनवरी, मंगलवार | 20 जनवरी |
| वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी | अपनी परंपरा के पंचांग के अनुसार | परंपरा के अनुसार |
| विष्णु के अनन्य भक्त जो दोनों दिन व्रत करना चाहें | 18 और 19 जनवरी | 20 जनवरी |
कुछ परंपराओं में भगवान विष्णु के प्रति विशेष प्रेम रखने वाले भक्त दोनों दिन व्रत करते हैं। लेकिन यह सामर्थ्य और गुरु की आज्ञा पर निर्भर है। सामान्य गृहस्थ के लिए एक दिन का व्रत पूरी तरह शास्त्र सम्मत है।
"गौण" शब्द का अर्थ है दूसरा या सहायक। जब एकादशी तिथि लंबी होकर दो सूर्योदयों तक फैल जाती है, तो पहले दिन की एकादशी को मुख्य या स्मार्त एकादशी कहा जाता है और दूसरे दिन की एकादशी को गौण एकादशी। इसका अर्थ यह नहीं है कि गौण एकादशी का महत्व कम है। इसका अर्थ केवल यह है कि यह अलग प्रकार के साधकों के लिए निर्धारित है।
हिंदू पंचांग में तिथि सूर्योदय के आधार पर मानी जाती है। जिस तिथि में सूर्योदय होता है, वही उस दिन की तिथि मानी जाती है। जब कोई तिथि एक सूर्योदय से पहले शुरू होकर अगले सूर्योदय के बाद तक चलती है, तो उसे वृद्धि तिथि कहा जाता है। ऐसी स्थिति में दोनों दिन सूर्योदय के समय एक ही तिथि रहती है। 2027 में पौष शुक्ल एकादशी ऐसी ही वृद्धि तिथि है।
भारत में एकादशी के व्रत की गणना के लिए मुख्य रूप से दो परंपराएं प्रचलित हैं।
स्मार्त परंपरा धर्मशास्त्रों और स्मृति ग्रंथों का पालन करती है। इस परंपरा में सूर्योदय के समय एकादशी होने पर उसी दिन व्रत रखा जाता है। अधिकांश गृहस्थ इसी परंपरा का पालन करते हैं।
वैष्णव परंपरा में एकादशी के नियम और भी सूक्ष्म हैं। इस परंपरा में अरुणोदय काल का विशेष ध्यान रखा जाता है, जो सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पहले का समय है। यदि अरुणोदय के समय दशमी तिथि का अंश भी हो, तो उस एकादशी को दशमी से विद्ध यानी दूषित माना जाता है और व्रत अगले दिन रखा जाता है। इसलिए कई बार वैष्णव समाज की एकादशी स्मार्त एकादशी से एक दिन बाद पड़ती है।
| आधार | स्मार्त परंपरा | वैष्णव परंपरा |
|---|---|---|
| तिथि का निर्धारण | सूर्योदय के समय की तिथि | अरुणोदय काल की शुद्धता |
| दशमी विद्ध एकादशी | स्वीकार्य | त्याज्य, अगले दिन व्रत |
| मुख्य अनुयायी | अधिकांश गृहस्थ | वैष्णव संप्रदाय, संन्यासी |
| वृद्धि एकादशी पर व्रत | पहले दिन | प्रायः दूसरे दिन |
भक्त को अपनी पारिवारिक परंपरा या गुरु परंपरा के अनुसार ही दिन चुनना चाहिए। दोनों परंपराएं शास्त्र सम्मत हैं और दोनों में भक्ति का भाव ही सबसे महत्वपूर्ण है।
शास्त्रों में गृहस्थ और संन्यासी के धर्म अलग अलग बताए गए हैं। गृहस्थ का जीवन परिवार, समाज और सांसारिक कर्तव्यों से जुड़ा है। उसकी प्रार्थनाओं में संतान, सुख, समृद्धि और परिवार की रक्षा जैसी कामनाएं स्वाभाविक हैं। इसलिए पहले दिन की एकादशी, जो पूरी तरह सूर्योदय पर आधारित है, उसके लिए उपयुक्त मानी गई।
संन्यासी और मोक्ष का साधक संसार की कामनाओं से ऊपर उठना चाहता है। उसके लिए व्रत का उद्देश्य कोई सांसारिक फल नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धि और भगवान में पूर्ण समर्पण है। ऐसे साधक के लिए वह एकादशी चुनी गई जो पूरी तरह शुद्ध हो और जिसके बाद द्वादशी का पवित्र स्पर्श हो। दूसरे दिन की एकादशी द्वादशी से जुड़ी होती है और द्वादशी को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय तिथि माना गया है।
विधवाओं को भी इसी श्रेणी में रखा गया, क्योंकि पारंपरिक रूप से उनके जीवन को संयम, तप और ईश्वर भक्ति के मार्ग से जोड़ा गया था। आज के समय में यह व्यवस्था किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए खुली मानी जा सकती है जो सांसारिक फल की कामना के बिना केवल भगवान की प्रसन्नता और आत्म कल्याण के लिए व्रत रखना चाहता है।
पद्म पुराण में एकादशी के प्राकट्य की एक सुंदर कथा मिलती है। सत्य युग में मुर नाम का एक भयंकर असुर था, जिसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने मुर से लंबा युद्ध किया। युद्ध के बीच विश्राम के लिए भगवान बदरिकाश्रम की एक गुफा में योगनिद्रा में चले गए।
मुर ने इस अवसर का लाभ उठाकर सोते हुए भगवान पर आक्रमण करने का प्रयास किया। उसी क्षण भगवान के शरीर से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर का वध कर दिया। जब भगवान जागे, तो वे देवी से अत्यंत प्रसन्न हुए। वह दिन एकादशी तिथि थी, इसलिए भगवान ने उन देवी का नाम एकादशी रखा और वरदान दिया कि जो व्यक्ति एकादशी का व्रत करेगा, उसके पाप नष्ट होंगे और उसे भगवान की कृपा प्राप्त होगी।
इस कथा का गहरा अर्थ यह है कि मुर अज्ञान, आलस्य और पाप का प्रतीक है। जब भगवान की शक्ति भक्त के भीतर जागती है, तो वह इन असुरों का नाश कर देती है। एकादशी का व्रत उसी दिव्य शक्ति को अपने भीतर जगाने का साधन है।
पद्म पुराण में यह भी कहा गया है कि एकादशी के दिन संसार के सभी पाप अन्न में आश्रय लेते हैं। इसलिए इस दिन अन्न, विशेषकर चावल, का सेवन वर्जित माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से अन्न का त्याग शरीर को हल्का करता है, आलस्य घटाता है और मन को भगवान के स्मरण में लगाने में सहायता करता है।
एकादशी का अर्थ है 11वीं तिथि। आध्यात्मिक परंपरा में इस संख्या को मनुष्य की 11 इंद्रियों से जोड़ा जाता है, यानी 5 ज्ञानेंद्रियां, 5 कर्मेंद्रियां और मन। एकादशी का व्रत इन ग्यारह को संयम में लाने का अभ्यास है। मोक्ष के साधक के लिए गौण एकादशी का यही सबसे बड़ा अर्थ है। यह इंद्रियों को भीतर समेटकर आत्मा की ओर लौटने का दिन है।
पौष पुत्रदा एकादशी की कथा भविष्य पुराण में आती है। भद्रावती के राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या संतानहीन थे। दुख से व्याकुल राजा वन में भटकते हुए एक सरोवर तक पहुंचे, जहां विश्वेदेव स्नान कर रहे थे। उन्होंने राजा को पुत्रदा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने व्रत किया और उन्हें तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई।
गौण एकादशी का व्रत रखने वाले संन्यासी और साधक भी इस कथा को सुनते हैं। उनके लिए इसका अर्थ आध्यात्मिक संतान से जुड़ जाता है, यानी ज्ञान, भक्ति और वैराग्य को जन्म देना। जो साधक सांसारिक संतान की कामना नहीं रखता, वह इस दिन भगवान से अपने भीतर शुद्ध भक्ति के जन्म की प्रार्थना करता है।
| नियम | उद्देश्य |
|---|---|
| अन्न और चावल का पूर्ण त्याग | शरीर की शुद्धि और आलस्य का नाश |
| अधिक से अधिक मौन | वाणी का संयम और मन की एकाग्रता |
| दिन में शयन से बचना | जागरूकता और साधना में स्थिरता |
| रात्रि जागरण | भगवान के नाम में डूबना |
| इंद्रिय संयम | 11 इंद्रियों को भीतर समेटना |
| निष्काम भाव | किसी सांसारिक फल की इच्छा के बिना व्रत |
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | भगवान विष्णु की कृपा और मोक्ष की कामना | 108 बार |
| ॐ नमो नारायणाय | मन की शांति और भक्ति का विकास | 108 बार |
| ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते, देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः | संतान गोपाल मंत्र, गृहस्थों के लिए | 108 बार |
संन्यासी और मोक्ष के साधक "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" द्वादशाक्षर मंत्र को प्राथमिकता दें। यह 12 अक्षरों का मंत्र भगवान वासुदेव को पूर्ण समर्पण का मंत्र माना जाता है। श्रीमद्भागवत में ध्रुव ने इसी मंत्र का जप करके भगवान के दर्शन प्राप्त किए थे।
19 जनवरी 2027 को चंद्रमा वृषभ राशि के रोहिणी नक्षत्र में होंगे। वृषभ चंद्रमा की उच्च राशि है और रोहिणी उनका सबसे प्रिय नक्षत्र माना जाता है। चंद्रमा मन के कारक हैं, इसलिए इस दिन मन स्वाभाविक रूप से अधिक स्थिर और शांत रहने की संभावना मानी जा सकती है। मौन, जप और ध्यान पर आधारित गौण एकादशी के लिए यह अत्यंत अनुकूल स्थिति है।
सूर्य इस समय मकर राशि में हैं, जो शनि की राशि है। शनि तप, त्याग और वैराग्य के कारक हैं। आत्मा के कारक सूर्य का वैराग्य के ग्रह की राशि में होना संन्यास और मोक्ष के मार्ग पर चलने वाले साधकों के लिए विशेष रूप से अर्थपूर्ण संकेत है।
यह दिन मंगलवार है। मंगल संकल्प, साहस और अनुशासन के ग्रह हैं। कठोर व्रत और रात्रि जागरण के लिए जिस दृढ़ता की आवश्यकता होती है, मंगल उसका प्रतीक हैं। ज्योतिष में केतु को मोक्ष कारक और 12वें भाव को मोक्ष भाव माना जाता है। जिनकी कुंडली में केतु या 12वां भाव प्रबल हो, उनकी स्वाभाविक रुचि ऐसे निष्काम व्रतों में अधिक देखी जाती है।
इसी दिन तैलंग स्वामी जयंती और कूर्म द्वादशी भी है। एक महान संन्यासी की जयंती और संन्यासियों की एकादशी का एक साथ आना इस दिन को साधना के लिए और भी पवित्र बना देता है।
| कुंडली या जीवन की स्थिति | उपाय |
|---|---|
| केतु के कारण भ्रम या अशांति | दिन भर मौन रखें और विष्णु सहस्रनाम पढ़ें |
| 12वें भाव से जुड़े कष्ट | किसी संन्यासी या साधु को भोजन और वस्त्र दें |
| बृहस्पति कमजोर हो | पीली वस्तुएं और चने की दाल का दान करें |
| शनि की साढ़ेसाती | काले तिल का दान करें और रात्रि जागरण करें |
| मन अस्थिर रहता हो | द्वादशाक्षर मंत्र का 108 बार जप करें |
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का दिन चुनें | दोनों परंपराओं को लेकर विवाद न करें |
| तुलसी दल एक दिन पहले तोड़ें | एकादशी पर तुलसी न तोड़ें |
| अधिक से अधिक मौन और जप करें | व्यर्थ बातचीत और निंदा से बचें |
| रात्रि जागरण करें | दिन में शयन न करें |
| 20 जनवरी को सही समय पर पारण करें | हरि वासर में पारण न करें |
| संन्यासियों और साधुओं की सेवा करें | अन्न, मांस और तामसिक भोजन न लें |
गौण पुत्रदा एकादशी हमें व्रत के उस रूप से परिचित कराती है जहां मांगना समाप्त हो जाता है और केवल समर्पण शेष रहता है। पहले दिन का व्रत संसार की सुंदर कामनाओं को भगवान के चरणों में रखता है, तो दूसरे दिन का व्रत स्वयं को ही भगवान को सौंप देता है। 19 जनवरी 2027 को, जब चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रोहिणी को प्रकाशित करेंगे और एक महान संन्यासी की जयंती का पवित्र स्मरण होगा तब मौन, जप और जागरण के साथ किया गया यह व्रत मन को उस शांति तक ले जा सकता है जिसे शास्त्र मोक्ष का द्वार कहते हैं। जहां कामना समाप्त होती है, वहीं से भक्ति का अमृत आरंभ होता है।
गौण पौष पुत्रदा एकादशी 2027 कब है?
गौण पौष पुत्रदा एकादशी 2027 मंगलवार, 19 जनवरी को है। मुख्य स्मार्त पुत्रदा एकादशी 18 जनवरी को है।
गौण एकादशी किसे करनी चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार गौण एकादशी संन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष की कामना करने वाले साधकों के लिए है। गृहस्थ पहले दिन का व्रत करते हैं।
गौण एकादशी का पारण कब करें?
गौण पुत्रदा एकादशी का पारण 20 जनवरी को सूर्योदय के बाद करें। सटीक समय स्थानीय पंचांग से देखें।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?
स्मार्त परंपरा सूर्योदय की तिथि मानती है, जबकि वैष्णव परंपरा अरुणोदय काल में दशमी का स्पर्श होने पर व्रत अगले दिन रखती है।
एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?
पद्म पुराण के अनुसार एकादशी पर पाप अन्न में आश्रय लेते हैं। इसलिए इस दिन अन्न, विशेषकर चावल, का त्याग किया जाता है।
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