क्या है इष्टि यज्ञ का वैदिक रहस्य?

By पं. अभिषेक शर्मा

8 जनवरी 2027 को पौष अमावस्या पर नवग्रह शांति और इष्टि यज्ञ की संपूर्ण वैदिक विधि।

इष्टि यज्ञ 2027 पूजा विधि और वैदिक ज्योतिष रहस्य

वैदिक पंचांग और सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन यज्ञ परंपरा में समय का प्रत्येक क्षण अपने भीतर एक विशिष्ट ब्रह्मांडीय ऊर्जा समेटे रहता है। ब्रह्मांड में जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि तथा समान अंश पर आकर मिलते हैं तब प्रकृति के भीतर एक असाधारण शांति और अत्यंत गहन मौन का वातावरण निर्मित होता है। यह विशेष खगोलीय घटना केवल दो ग्रहों का मिलन मात्र नहीं है बल्कि यह मानव चेतना को बाह्य जगत के भारी कोलाहल से खींचकर अंतरात्मा की अनंत गहराइयों में ले जाने वाला एक दुर्लभ आध्यात्मिक द्वार है। वैदिक ऋषियों ने इस आध्यात्मिक ऊर्जा को मानव कल्याण और आत्मिक उत्थान के लिए संचित करने हेतु अग्निहोत्र की दिव्य परंपरा स्थापित की थी। इसी महान परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत अनुष्ठान इष्टि पर्व है। यह पावन अवसर केवल एक कर्मकांड मात्र नहीं है बल्कि यह मनुष्य के भीतर प्रज्वलित होने वाली जठराग्नि और आत्मिक अग्नि को ब्रह्मांडीय अग्नि के साथ जोड़ने का एक पवित्र माध्यम है।

इस अत्यंत सिद्ध और पावन पर्व से जुड़ी मुख्य पंचांग जानकारी तथा शुभ अनुष्ठान का सटीक विवरण नीचे प्रस्तुत किया गया है

  • पावन वैदिक पर्व का नाम: इष्टि
  • अंग्रेजी दिनांक: 8 जनवरी 2027
  • वार और स्वामी ग्रह: शुक्रवार और शुक्र देव
  • वैदिक मास और पक्ष: पौष मास और कृष्ण पक्ष
  • तिथि का नाम: कृष्ण अमावस्या
  • आराध्य देव और शक्तियां: अग्नि देव भगवान विष्णु और प्रजापति
  • प्रमुख वैदिक अनुष्ठान: पवित्र अग्नि में आहुति दान और वैदिक मंत्र जाप

साधकों के लिए इस दिन के प्राथमिक नियम और आवश्यक कर्तव्य अत्यंत कड़े होते हैं। सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में जागरण और पवित्र जल से स्नान करने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। संपूर्ण दिन मन वचन और कर्म से पूर्ण ब्रह्मचर्य तथा सत्य भाषण का कड़ाई से पालन करना अत्यंत आवश्यक है। तामसिक भोजन क्रोध अहंकार और किसी भी प्राणी मात्र की निंदा से पूर्णतः दूर रहना चाहिए। घर के पूजा स्थल में पवित्र अग्नि प्रज्वलित कर देवताओं के निमित्त आहुतियां प्रदान करनी चाहिए। संध्या काल में पवित्र पीपल वृक्ष के नीचे और घर के मुख्य द्वार पर शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना एक श्रेष्ठ कर्म माना गया है।

इष्टि का शाब्दिक अर्थ और वैदिक यज्ञ विज्ञान क्या है?

संस्कृत व्याकरण और वैदिक संहिताओं के अनुसार इष्टि शब्द की उत्पत्ति इष् धातु से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ इच्छा करना कामना करना अथवा ईश्वरीय शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए आहुति प्रदान करना होता है। वैदिक काल से ही गृहस्थ आश्रम में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए पंच महायज्ञों और अग्निहोत्र का पालन करना अनिवार्य माना गया है। जिन घरों में नित्य अग्निहोत्र की अखंड अग्नि प्रज्वलित रहती है वहां प्रत्येक मास की अमावस्या और पूर्णिमा के अवसर पर विशेष यज्ञ करने का विधान है जिन्हें दर्शपूर्णमास इष्टि कहा जाता है।

अमावस्या और पूर्णिमा के दिन संपन्न होने वाले इस मुख्य यज्ञ को ही इष्टि कहा जाता है। इससे ठीक एक दिन पूर्व अन्वाधान की प्रक्रिया संपन्न होती है जिसमे अग्नि को समिधा देकर जाग्रत किया जाता है। अगले दिन उसी जाग्रत पवित्र अग्नि में देवताओं को हविष्य अर्थात शुद्ध अन्न और घृत की आहुति दी जाती है। यह वास्तव में मुख्य यज्ञ का वह दिन है जब यजमान अपनी समस्त लौकिक और अलौकिक कामनाओं को भगवान अग्नि देव के माध्यम से परब्रह्म तक पहुंचाता है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह महान पर्व हमें सिखाता है कि किसी भी लक्ष्य या ईश्वरीय साधना में सफलता प्राप्त करने के लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है। जब साधक इस दिन पवित्र अग्नि में आहुति अर्पित करता है तो वह प्रतीकात्मक रूप से अपने भीतर के काम क्रोध लोभ और अहंकार को अग्नि के हवाले करने का संकल्प लेता है। बाहरी हवन कुंड में जलने वाली यह अग्नि साधक के मूलाधार और मणिपूर चक्र में स्थित सुप्त आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत करने का एक वैज्ञानिक उपकरण बन जाती है।

पौष अमावस्या और शुक्रवार के संयोग का ज्योतिषीय प्रभाव

वर्ष 2027 में 8 जनवरी को पड़ने वाला यह इष्टि पर्व पौष मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि और शुक्रवार के दिन आ रहा है। वैदिक ज्योतिष में तिथि वार और मास के इस त्रिगुणात्मक संयोग को अत्यंत दुर्लभ तथा आध्यात्मिक सिद्धि प्रदान करने वाला माना गया है। पौष मास में सूर्य देव देव गुरु बृहस्पति की धनु राशि में भ्रमण करते हैं। धनु राशि अग्नि तत्व की राशि है जिसका सीधा संबंध यज्ञ धर्म उच्च दर्शन और आध्यात्मिक लक्ष्य से है। जब सूर्य धनु राशि में होते हैं तब ब्रह्मांड में सात्विक अग्नि का प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है जो किसी भी प्रकार के वैदिक अनुष्ठान को तुरंत सफल बनाने में सहायक होता है।

शुक्रवार का दिन इस पर्व की शुभता को कई गुना बढ़ा देता है। ज्योतिष शास्त्र में शुक्र ग्रह को भौतिक सुख समृद्धि कला और संजीवनी विद्या का कारक कहा गया है। यज्ञ और हवन कर्मकांड का सीधा फल देवताओं को पुष्ट करता है और शुक्र देव दैत्यों के गुरु होने के साथ साथ परम ज्ञानी और शिव भक्त हैं। शुक्रवार के दिन की गई अग्नि उपासना से कुंडली का शुक्र ग्रह अत्यंत बलवान होता है। जब अग्नि तत्व के इस महान पर्व का मिलन जल तत्व के स्वामी शुक्र के वार से होता है तो साधक के जीवन में भौतिक सुख और आध्यात्मिक शांति दोनों का अद्भुत संतुलन स्थापित होता है।

पवित्र अग्नियों का रहस्य और मानव चेतना से उनका संबंध

वैदिक शास्त्रों में जिस अग्नि की उपासना का विधान इष्टि के दिन बताया गया है वह केवल भौतिक लकड़ी से जलने वाली आग नहीं है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने ब्रह्मांड और मानव शरीर के भीतर कार्य करने वाली अग्नि ऊर्जा को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया है जिनका सीधा संबंध इस दिन के अनुष्ठान से है।

1 गार्हपत्य अग्नि यह अग्नि गोलाकार वेदी में प्रज्वलित की जाती है और यह पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। इसका संबंध मानव शरीर के मूलाधार चक्र और जठराग्नि से होता है। इस अग्नि की उपासना से उत्तम स्वास्थ्य वंश वृद्धि और अखंड भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। 2 आहवनीय अग्नि यह चौकोर वेदी में स्थापित होती है और आकाश तत्व का पूर्ण प्रतीक मानी जाती है। मानव शरीर में इसका संबंध अनाहत तथा सहस्रार चक्र और प्राण अग्नि से है। इस अग्नि में दी गई आहुति सीधे देवताओं तक पहुंचती है जिससे ईश्वरीय कृपा और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। 3 दक्षिणाग्नि यह अर्धचंद्राकार वेदी में प्रज्वलित होती है और वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करती है। इसका संबंध स्वाधिष्ठान चक्र और हमारी मानसिक भावनाओं से होता है। इस अग्नि में आहुति देने से भयंकर पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और समस्त नकारात्मक ऊर्जा का समूल नाश होता है।

जब साधक इष्टि के दिन अपनी गृहस्थ अग्नि के समक्ष बैठकर प्राणायाम और वैदिक मंत्रों का जाप करता है तो उसके शरीर की तीनों मुख्य नाड़ियों इड़ा पिंगला और सुषुम्ना में ऊर्जा का परम संतुलन स्थापित होता है। जठराग्नि के पूर्ण रूप से शुद्ध होने से शरीर के समस्त असाध्य रोग नष्ट होते हैं और मानसिक अग्नि के प्रबल होने से स्मरण शक्ति तथा बौद्धिक एकाग्रता में अत्यंत अद्भुत वृद्धि होती है।

नवग्रह शांति और इष्टि यज्ञ से कर्म शुद्धि का मार्ग

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य के जीवन में आने वाले समस्त सुख और दुख उसकी जन्म कुंडली में स्थित नौ ग्रहों के गोचर तथा दशाओं का परिणाम होते हैं। ग्रहों के अशुभ प्रभाव को शांत करने के लिए हवन अर्थात अग्नि उपासना को सबसे श्रेष्ठ और त्वरित फलदायी उपाय माना गया है। वेदों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अग्नि देव समस्त देवताओं और ग्रहों के मुख हैं। पवित्र अग्नि में डाली गई कोई भी सात्विक आहुति सूक्ष्म भाप और सुगंधित वायु के रूप में परिवर्तित होकर सीधे संबंधित ग्रह देवता तक तुरंत पहुंचती है।

इष्टि के दिन जब विशेष मंत्रों और औषधीय द्रव्यों से अग्नि में आहुति प्रदान की जाती है तो वातावरण में एक विशेष प्रकार की रासायनिक और आध्यात्मिक ऊर्जा फैलती है। यह अमोघ ऊर्जा साधक के आभामंडल में चिपके हुए अत्यंत नकारात्मक ग्रह दोषों को तुरंत साफ कर देती है। सूर्य और मंगल दोनों ही अग्नि तत्व के शक्तिशाली ग्रह हैं। इस दिन अग्नि की उपासना करने और लाल चंदन मिश्रित आहुति अर्पित करने से कुंडली का अत्यंत कमजोर सूर्य बलवान होता है। इससे व्यक्ति के आत्मविश्वास में भारी वृद्धि होती है तथा मंगल दोष के कारण उत्पन्न होने वाले क्रोध और वैवाहिक बाधाओं का पूर्ण स्थायी समाधान होता है।

जब कुंडली में राहु या केतु की बुरी दृष्टि चंद्रमा या सूर्य पर पड़ती है तो व्यक्ति की निर्णय क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। शुक्रवार के दिन पड़ने वाले इस पौष इष्टि पर्व पर काले तिल और दूर्वा की आहुति देने से राहु का भयंकर भ्रम जाल टूटता है तथा मन में शुद्ध सात्विक ऊर्जा पुनः सक्रिय हो जाती है। यह अति पवित्र समय साधक को उसके प्रारब्ध के अत्यंत कठोर दंड से बचाता है और अचूक नवग्रह शांति सुनिश्चित करता है।

इष्टि यज्ञ से जुड़ी अत्यंत प्राचीन पौराणिक कथा

शतपथ ब्राह्मण और वैदिक साहित्य में इष्टि यज्ञ की असीम महिमा को दर्शाने वाली एक अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायक कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में प्रजापति ने सृष्टि की रचना का विचार किया परंतु उनके पास वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा नहीं थी जिससे संपूर्ण चराचर जगत का निर्माण और भरण पोषण किया जा सके। वे अत्यंत चिंतित होकर परमपिता ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि बिना यज्ञ और अग्नि की सहायता के सृष्टि का सुचारु संचालन पूरी तरह असंभव है।

ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रजापति ने कठोर तपस्या की और फाल्गुन मास में अग्नि देव का विधिवत आवाहन किया। उन्होंने दर्शपूर्णमास इष्टि का अत्यंत कठोर व्रत धारण किया। अमावस्या के पावन दिन प्रजापति ने स्वयं को यजमान मानकर अपने भीतर की समस्त इच्छाओं को हविष्य रूप में पवित्र अग्नि को समर्पित कर दिया। उन्होंने पूर्ण श्रद्धा से घी और पुरोडाश की आहुतियां प्रदान कीं।

इष्टि यज्ञ के इस अत्यंत पवित्र अनुष्ठान से अग्नि देव अत्यधिक प्रसन्न हुए। अग्नि के तेज से ब्रह्मांड में व्याप्त अंधकार और जड़ता का समूल नाश हो गया। यज्ञ से उत्पन्न हुई दिव्य धुएं की तरंगों ने बादलों का निर्माण किया जिससे पृथ्वी पर अमृत के समान वर्षा हुई। वर्षा से वनस्पतियां और अन्न उत्पन्न हुए जिससे संपूर्ण प्राणी जगत को जीवन प्राप्त हुआ।

इस महान कथा का गहरा मनोवैज्ञानिक अर्थ यह है कि जब तक मनुष्य अपने भीतर इष्टि अर्थात त्याग और यज्ञ की भावना को जाग्रत नहीं करता तब तक उसके जीवन में सुख समृद्धि और ज्ञान का उदय नहीं हो सकता। जो मनुष्य अपने कर्मों को यज्ञ मानकर परमात्मा को समर्पित कर देता है उसका जीवन प्रजापति के समान ही महान और सृजनशील बन जाता है।

गृहस्थ जीवन में इष्टि पर्व की प्रामाणिक पूजा विधि

वर्तमान समय में प्रत्येक गृहस्थ के पास तीन वैदिक अग्नियों को नित्य प्रज्वलित रखने की व्यवस्था नहीं होती है। परंतु प्राचीन शास्त्रों में यह विधान दिया गया है कि सामान्य साधक भी अपने घर के मंदिर में दीपक प्रज्वलित करके या छोटे हवन कुंड के माध्यम से इष्टि के कड़े नियमों का पालन कर सकता है और पूर्ण आध्यात्मिक लाभ उठा सकता है।

प्रातः काल से रात्रि तक की जाने वाली चरणबद्ध पूजा विधि अत्यंत सरल किंतु बहुत प्रभावशाली है

1 सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल और कुशा डालकर पवित्र स्नान करें। इसके पश्चात शुद्ध सूती या रेशमी धुले हुए वस्त्र धारण करें। 2 घर के ईशान कोण या पूर्व दिशा में स्थित पूजा स्थान को स्वच्छ जल से साफ करें। एक तांबे या मिट्टी के छोटे हवन कुंड को स्थापित करें और उस पर रोली तथा चंदन से स्वस्तिक का मंगल चिह्न बनाएं। 3 कुशा के आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। दाहिने हाथ में शुद्ध जल अक्षत पीले पुष्प और सुपारी लेकर पौष मास के इष्टि व्रत और अग्नि उपासना का दृढ़ संकल्प लें। 4 भगवान लक्ष्मी नारायण की सुंदर प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक करें और उन्हें पीले वस्त्र तुलसी दल तथा केसर का तिलक अत्यंत श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। 5 गाय के गोबर के उपले और शुद्ध कपूर की सहायता से हवन कुंड में पवित्र अग्नि प्रज्वलित करें। यदि आप हवन नहीं कर सकते हैं तो एक बड़े पीतल के दीपक में गाय का शुद्ध घी भरकर अखंड ज्योति प्रज्वलित करें। 6 इस दिन ॐ अग्नये स्वाहा और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का कम से कम एक सौ आठ बार जाप करें। गाय के शुद्ध घी काले तिल जौ और अत्यंत पवित्र हवन सामग्री से कम से कम इक्कीस या एक सौ आठ आहुतियां प्रदान करें। 7 इष्टि के दिन ब्राह्मणों निर्धनों और गौ माता को अन्न का दान करना अत्यंत फलदायी माना गया है। भोजन का कुछ भाग देवताओं और पितरों के निमित्त अवश्य निकालें।

इष्टि के पावन दिन क्या करें और क्या न करें

वैदिक व्रतों में बाहरी कर्मकांड और पूजा से अधिक महत्व मानसिक और शारीरिक अनुशासन को दिया गया है। इस दिन के प्रमुख करणीय और वर्जित कार्यों का पालन करना प्रत्येक साधक के लिए अत्यंत अनिवार्य है।

मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त में जागरण और मौन रहने का कड़ा अभ्यास करना चाहिए। भोजन में केवल सात्विक अन्न फल या गाय के दूध का ही प्रयोग करना चाहिए। अग्नि जल और अन्न का पूर्ण सम्मान तथा संरक्षण करना सबसे बड़ा धर्म है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों गायों और निर्धनों को दान अवश्य देना चाहिए। पूर्ण ब्रह्मचर्य और शुद्ध सात्विक विचारों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।

देर तक सोना और व्यर्थ के वाद विवाद या निंदा में अपना बहुमूल्य समय कभी नहीं गंवाना चाहिए। तामसिक भोजन लहसुन प्याज मांस और मदिरा का भूलकर भी स्पर्श नहीं करना चाहिए। पैर से अग्नि को कभी नहीं बुझाना चाहिए और जूठे हाथों से पूजा की किसी भी सामग्री को नहीं छूना चाहिए। किसी भी याचक पशु या पक्षी को अपने द्वार से अपमानित कर नहीं भगाना चाहिए। क्रोध अहंकार लोभ और अनैतिक विचारों को मन में बिल्कुल नहीं लाना चाहिए।

बारह राशियों के लिए इष्टि पर्व के कल्याणकारी उपाय

8 जनवरी 2027 को शुक्रवार और पौष कृष्ण अमावस्या के इस अत्यंत महान संयोग पर यदि जातक अपनी चंद्र राशि के अनुसार विशेष वैदिक उपाय करता है तो उसे ग्रहों की पूर्ण अनुकूलता और मनोवांछित फलों की सहज प्राप्ति होती है।

  • मेष राशि इस राशि के जातकों को पवित्र अग्नि में लाल चंदन और गुड़ की आहुति देनी चाहिए तथा निर्धनों को मसूर की दाल दान करनी चाहिए।
  • वृषभ राशि शुक्र ग्रह की अनुकूलता और अपार धन प्राप्ति के लिए गाय के शुद्ध घी तथा खीर से अग्नि में आहुति दें और किसी मंदिर में कपूर भेंट करें।
  • मिथुन राशि अपने बौद्धिक विकास और व्यापार में भारी उन्नति के लिए दूर्वा की समिधा से हवन करें तथा गौशाला में गायों को हरी घास खिलाएं।
  • कर्क राशि भारी मानसिक तनाव से हमेशा के लिए मुक्ति पाने के लिए पलाश की समिधा और कच्चे दूध से मिश्रित चावलों की आहुति दें।
  • सिंह राशि समाज में मान सम्मान और उच्च पद की प्राप्ति के लिए मदार की समिधा से अग्नि को पुष्ट करें और तांबे के पात्र में गेहूं भरकर दान करें।
  • कन्या राशि उत्तम स्वास्थ्य लाभ और पारिवारिक शांति के लिए साबुत मूंग और घी से हवन करें तथा छोटी कन्याओं को भरपेट भोजन कराएं।
  • तुला राशि दांपत्य जीवन में अपार सुख शांति के लिए गूलर की समिधा और मिश्री से आहुति दें तथा मंदिर में शुद्ध घी का बड़ा दीपक जलाएं।
  • वृश्चिक राशि अपने शत्रुओं पर विजय और भारी कर्ज से मुक्ति के लिए खैर की समिधा का प्रयोग करें और बजरंगबली के समक्ष चमेली के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
  • धनु राशि आपके लिए यह अत्यंत शुभ समय है। पीपल की समिधा और पीली सरसों से हवन करें तथा अपने गुरु या योग्य ब्राह्मण को पीले वस्त्र दान करें।
  • मकर राशि शनि देव के कष्टों को पूरी तरह शांत करने के लिए शमी की समिधा और काले तिल से अग्नि में आहुति दें तथा किसी असहाय व्यक्ति को कंबल भेंट करें।
  • कुंभ राशि आजीविका में आ रही समस्त बाधाओं को दूर करने के लिए पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और पक्षियों के लिए सात प्रकार के अनाज डालें।
  • मीन राशि आध्यात्मिक सिद्धि और उत्तम स्वास्थ्य के लिए केसर तथा हल्दी मिश्रित घी से हवन करें और श्री विष्णु सहस्रनाम का श्रद्धापूर्वक निरंतर पाठ करें।

आत्मिक शांति और यज्ञीय जीवन का शाश्वत मार्ग

पौष मास की इस पवित्र अमावस्या पर मनाया जाने वाला यह इष्टि पर्व हमें अपनी गहरी जड़ों और महान ऋषियों की प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा से जोड़ने का एक अत्यंत पावन सेतु है। जब हम बाहरी अग्नि में समिधा और घृत रखते हैं तो वास्तव में हम अपने भीतर सोई हुई असीम चेतना को जगाने का अत्यंत सच्चा प्रयास कर रहे होते हैं। यह पावन दिन हमें रुकने आत्मनिरीक्षण करने और अपने भीतर सत्य तथा ज्ञान का शाश्वत प्रकाश भरने की शिक्षा देता है। जो भी मनुष्य इस पवित्र दिन कठोर नियम पूर्ण संयम और सच्ची श्रद्धा के साथ अपनी संपूर्ण जीवन ऊर्जा को परब्रह्म परमात्मा के श्री चरणों में समर्पित कर देता है उसके लिए इस संसार की कोई भी बाधा अजेय नहीं रह जाती है।

FAQ

प्रश्न 1 इष्टि पर्व मुख्य रूप से किस महान उद्देश्य के लिए किया जाता है?
उत्तर इष्टि पर्व का मुख्य उद्देश्य पवित्र अग्नि के माध्यम से ईश्वरीय शक्तियों को अपनी श्रद्धा और हविष्य समर्पित करना है जिससे जीवन में अपार सुख शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 2 वर्ष 2027 में पौष मास का इष्टि पर्व किस दिन मनाया जाएगा?
उत्तर वैदिक पंचांग की अत्यंत सटीक गणना के अनुसार यह महान पावन पर्व 8 जनवरी 2027 को शुक्रवार के दिन पौष मास की कृष्ण अमावस्या तिथि को मनाया जाएगा।

प्रश्न 3 क्या बिना बड़े हवन कुंड के भी गृहस्थ लोग इष्टि का अनुष्ठान कर सकते हैं?
उत्तर हां जिन घरों में बड़े हवन कुंड की व्यवस्था नहीं है वहां साधक अपने पूजा घर में गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाकर और भगवान विष्णु के मंत्रों का पूर्ण श्रद्धा से जाप करके इस महान पर्व का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 4 शुक्रवार के दिन इष्टि पर्व पड़ने से क्या विशेष ज्योतिषीय लाभ मिलता है?
उत्तर शुक्रवार के स्वामी शुक्र देव हैं जो भौतिक सुख और संजीवनी विद्या के कारक हैं इसलिए इस दिन इष्टि की महान साधना करने से कुंडली का शुक्र ग्रह बलवान होता है और व्यक्ति को अपार धन संपदा प्राप्त होती है।

प्रश्न 5 इष्टि के पवित्र दिन किस विशेष प्रकार का भोजन ग्रहण करना शास्त्र सम्मत माना गया है?
उत्तर इस पावन दिन पूर्ण उपवास रखना सर्वोत्तम है किंतु अशक्त होने पर दिन में केवल एक बार अत्यंत सात्विक आहार जैसे दूध ताजे फल या गाय के दूध में पकी हुई बिना नमक की खीर ग्रहण की जा सकती है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

ZODIAQ के बारे में

ज़ोडियाक (ZODIAQ) एक ऑनलाइन वैदिक ज्योतिष प्लेटफॉर्म है। जिन यूज़र्स को ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता है उन्हें ये अनुभवी ज्योतिषियों से जोड़ता है। हमारे यूज़र्स निशुल्क कुंडली भी बनाते हैं और कुंडली मिलान करते हैं। साथ ही ज़ोडियाक (ZODIAQ) ज्योतिषियों को भी कई उपयोगी सेवाएँ प्रदान करता है। ज्योतिषी ज़ोडियाक (ZODIAQ) की विभिन्न सुविधाओं का उपयोग कर अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करते हैं।

यदि आप एक उपयोगकर्ता हैं

अनुभवी ज्योतिषियों से सलाह लें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें। आप हमारे प्लेटफॉर्म से अनुभवी ज्योतिषियों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित जन्म पत्रिका और जीवन भविष्यवाणी रिपोर्ट भी मंगवा सकते हैं। सटीक कुंडली बनाएं, कुंडली मिलान करें और राशिफल व मुहूर्त की जानकारी प्राप्त करें। हमारी ऑनलाइन लाइब्रेरी का उपयोग करें जहां आपको सभी जरूरी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक जानकारी एक जगह मिलेगी।

यदि आप एक ज्योतिषी हैं

अपने ग्राहकों के लिए सटीक कुंडली बनाएं और एक बार में 5 लोगों तक का कुंडली मिलान करें। ज़ोडियाक (ZODIAQ) की मदद से अपने ग्राहकों के लिए विस्तृत जन्म पत्रिका रिपोर्ट तैयार करें। क्लाइंट डायरेक्टरी में ग्राहकों का विवरण सेव करके किसी भी समय उन्हें एक्सेस करें। हर दिन आपने कितने लोगों को परामर्श दिया यह ट्रैक कर के अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाएं।

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ