By पं. अभिषेक शर्मा
भगवान वासुपूज्य की उपासना, रानी रोहिणी की कथा और रोहिणी नक्षत्र का शुभ प्रभाव

जैन परंपरा में तप को केवल शरीर को कष्ट देने का साधन नहीं माना गया है। यह आत्मा पर जमे कर्मों की धूल को धीरे धीरे हटाने की प्रक्रिया है। इसी तप परंपरा का एक सुंदर और लोकप्रिय रूप है रोहिणी व्रत। यह व्रत हर महीने उस दिन किया जाता है जब सूर्योदय के बाद आकाश में रोहिणी नक्षत्र होता है। जैन परिवारों में, विशेषकर महिलाओं में, यह व्रत अत्यंत श्रद्धा से किया जाता है। मान्यता है कि यह व्रत परिवार में सुख, शांति, पति की दीर्घायु और जीवन से दुखों के निवारण का मार्ग खोलता है।
वर्ष 2027 में जनवरी का रोहिणी व्रत मंगलवार, 19 जनवरी को पड़ रहा है। यह व्रत जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य को समर्पित है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| व्रत का नाम | रोहिणी व्रत |
| तिथि | 19 जनवरी 2027 |
| वार | मंगलवार |
| आधार | जैन पंचांग, रोहिणी नक्षत्र |
| नक्षत्र | रोहिणी |
| चंद्रमा की राशि | वृषभ |
| हिंदू मास और पक्ष | पौष मास, शुक्ल पक्ष |
| आराध्य | भगवान वासुपूज्य, 12वें तीर्थंकर |
| दिल्ली में सूर्योदय | प्रातः लगभग 7:15 बजे |
| दिल्ली में सूर्यास्त | सायं लगभग 5:50 बजे |
| भोजन का नियम | सूर्यास्त से पहले, रात्रि भोजन वर्जित |
| पारण | अगले दिन सूर्योदय के बाद, जैन पंचांग के अनुसार |
| व्रत की अवधि | परंपरा अनुसार 3, 5 या 7 वर्ष, फिर उद्यापन |
रोहिणी व्रत का निर्धारण रोहिणी नक्षत्र के आधार पर होता है, इसलिए नक्षत्र के आरंभ और समाप्ति के समय को अपने क्षेत्र के जैन पंचांग या मंदिर से अवश्य मिला लें। जैन परंपरा में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं किया जाता, इसलिए जो लोग एकासन करते हैं, वे सूर्यास्त से पहले ही भोजन पूर्ण कर लें।
रोहिणी व्रत जैन धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक है। आकाश में 27 नक्षत्र हैं और चंद्रमा लगभग 27 दिनों में इन सबकी परिक्रमा पूरी करते हैं। इसलिए रोहिणी नक्षत्र लगभग हर 27 दिन में आता है और वर्ष में यह व्रत 12 या 13 बार किया जाता है।
यह व्रत मुख्य रूप से महिलाएं करती हैं। विवाहित महिलाएं इसे पति की लंबी आयु, परिवार की सुख शांति और घर की समृद्धि के लिए करती हैं। लेकिन यह व्रत केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। पुरुष भी आत्म शुद्धि, कर्म निर्जरा और जीवन के दुखों से मुक्ति की भावना से यह व्रत कर सकते हैं।
परंपरा के अनुसार रोहिणी व्रत एक निश्चित अवधि तक लगातार किया जाता है। कई परिवार इसे 3 वर्ष तक, कई 5 वर्ष तक और कई 7 वर्ष तक करते हैं। एक प्रचलित परंपरा 5 वर्ष 5 महीने तक व्रत करने की भी है। अवधि पूर्ण होने पर उद्यापन किया जाता है, जिसमें विशेष पूजा, दान और साधर्मी भोज का आयोजन होता है।
भगवान वासुपूज्य जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 12वें तीर्थंकर हैं। उनका जन्म चंपापुरी में हुआ था, जो आज बिहार के भागलपुर के पास स्थित है। उनके पिता राजा वासुपूज्य और माता रानी जया थीं, जिन्हें जयावती भी कहा जाता है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| क्रम | 12वें तीर्थंकर |
| जन्म स्थान | चंपापुरी |
| पिता | राजा वासुपूज्य |
| माता | रानी जया |
| लांछन (चिह्न) | भैंसा (महिष) |
| वर्ण | लाल |
| निर्वाण स्थान | चंपापुरी |
भगवान वासुपूज्य की एक बड़ी विशेषता यह है कि उनके जन्म, दीक्षा, केवल ज्ञान और निर्वाण, चारों कल्याणक चंपापुरी में ही हुए माने जाते हैं। अधिकांश तीर्थंकरों का निर्वाण सम्मेद शिखर पर हुआ, लेकिन भगवान वासुपूज्य ने चंपापुरी से मोक्ष प्राप्त किया। इसी कारण चंपापुरी जैन समाज का एक अत्यंत पवित्र तीर्थ है।
परंपरा में उन्हें बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर माना गया है। उन्होंने राजसी सुख त्यागकर युवा अवस्था में ही दीक्षा ली और कठोर तप से केवल ज्ञान प्राप्त किया। उनका जीवन संयम, त्याग और आत्मबल का संदेश देता है, जो रोहिणी व्रत की मूल भावना से पूरी तरह मेल खाता है।
जैन परंपरा में रोहिणी व्रत से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है, जो कर्म सिद्धांत को बहुत सुंदर ढंग से समझाती है।
कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक रानी थीं, जिनका नाम सिंधुमती बताया जाता है। एक बार उनके घर एक मुनि महाराज आहार के लिए पधारे। रानी ने अहंकार और असावधानी में मुनि को कड़वी तुंबी का आहार दे दिया। उस आहार से मुनि महाराज को अत्यंत कष्ट हुआ और उनका देहांत हो गया। इस घोर पाप कर्म के कारण रानी को अनेक जन्मों तक दुख भोगना पड़ा।
कई कष्टमय जन्मों के बाद वह एक ऐसी कन्या के रूप में जन्मी जिसके शरीर से दुर्गंध आती थी। इसी कारण उसका नाम दुर्गंधा पड़ गया। कोई उसके पास नहीं आता था और उसका जीवन अकेलेपन और अपमान में बीतता था। एक दिन उसकी भेंट एक ज्ञानी मुनि से हुई। मुनि ने उसके पूर्व जन्म के कर्मों का रहस्य बताया और उसे रोहिणी व्रत करने की प्रेरणा दी।
दुर्गंधा ने पूरी श्रद्धा और नियम से रोहिणी व्रत किया। व्रत और तप के प्रभाव से उसके पाप कर्म नष्ट होते गए। अगले जन्म में वह चंपापुरी के राजा की पुत्री रोहिणी के रूप में जन्मी। रोहिणी अत्यंत सुंदर, गुणवान और सौभाग्यशाली थी। स्वयंवर में उसका विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक से हुआ।
कथा का सबसे मार्मिक प्रसंग यह है कि रोहिणी ने अपने पूरे जीवन में कभी दुख का अनुभव ही नहीं किया था। एक दिन महल के झरोखे से उसने एक स्त्री को अपने मृत पुत्र के लिए विलाप करते देखा। रोहिणी को समझ ही नहीं आया कि वह स्त्री क्या कर रही है और उसने पूछा कि यह कौन सा नृत्य है। राजा अशोक को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। कहा जाता है कि रोहिणी को दुख का अर्थ समझाने के लिए राजा ने अपने पुत्र को ऊपर से नीचे गिराने का प्रसंग रचा, लेकिन रोहिणी के पुण्य के प्रभाव से बालक को कोई हानि नहीं हुई।
बाद में एक ज्ञानी मुनि ने राजा और रानी को बताया कि यह सब रोहिणी के पूर्व जन्म में किए गए रोहिणी व्रत का फल है। इसके बाद राजा अशोक और रानी रोहिणी, दोनों ने इस व्रत को अपनाया और अंत में संयम के मार्ग पर चलकर आत्म कल्याण किया।
यह कथा जैन धर्म के कर्म सिद्धांत को स्पष्ट करती है। हर कर्म का फल अवश्य मिलता है, चाहे वह इस जन्म में मिले या आगे के जन्मों में। लेकिन यह कथा निराशा नहीं, आशा भी देती है। सच्चे पश्चाताप, तप और संयम से सबसे भारी कर्म भी नष्ट किए जा सकते हैं। दुर्गंधा से रोहिणी बनने की यात्रा यही बताती है कि आत्मा की शुद्धि हमेशा संभव है।
| व्रत का प्रकार | नियम | किसके लिए उपयुक्त |
|---|---|---|
| उपवास | पूरे दिन कोई भोजन नहीं, केवल प्रासुक जल या वह भी नहीं | स्वस्थ और अभ्यस्त साधक |
| एकासन | दिन में एक ही स्थान पर बैठकर एक बार भोजन | अधिकांश गृहस्थ |
| आयंबिल | एक बार बिना घी, तेल, दूध और मसाले का सादा भोजन | तप में रुचि रखने वाले साधक |
| बियासन | दिन में दो बार सीमित भोजन | वृद्ध, रोगी और कमजोर व्यक्ति |
जैन परंपरा में व्रत के दिन जमीकंद, जैसे आलू, प्याज, लहसुन, गाजर और मूली का सेवन नहीं किया जाता। भोजन सात्विक, ताजा और सूर्यास्त से पहले होना चाहिए। गर्भवती महिलाएं, रोगी और दवा लेने वाले लोग कठोर उपवास के स्थान पर बियासन या एकासन कर सकते हैं। जैन धर्म में तप की शक्ति का आधार भाव है, शरीर को अनावश्यक कष्ट देना नहीं।
| मंत्र | अर्थ | जप संख्या |
|---|---|---|
| णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं | अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और लोक के सभी साधुओं को नमस्कार | 108 बार |
| ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेन्द्राय नमः | भगवान वासुपूज्य को नमस्कार | 108 बार |
णमोकार मंत्र जैन धर्म का सबसे पवित्र और मूल मंत्र है। इसमें किसी व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि गुणों को नमस्कार किया गया है। यह मंत्र सिखाता है कि पूजा व्यक्ति की नहीं, उसके द्वारा प्राप्त की गई आत्म शुद्धि की होती है।
जब रोहिणी व्रत की निश्चित अवधि पूर्ण हो जाती है तब उद्यापन किया जाता है। उद्यापन व्रत की पूर्णता और कृतज्ञता का उत्सव है।
उद्यापन का विधान अलग अलग जैन संप्रदायों और क्षेत्रों में थोड़ा अलग हो सकता है, इसलिए अपने मंदिर के आचार्य या विद्वान से मार्गदर्शन लेना उचित रहता है।
भारतीय ज्योतिष की दृष्टि से रोहिणी नक्षत्र 27 नक्षत्रों में चौथा नक्षत्र है। यह पूरी तरह वृषभ राशि में स्थित है और इसके स्वामी चंद्रमा हैं। वृषभ राशि चंद्रमा की उच्च राशि है, इसलिए रोहिणी में चंद्रमा अत्यंत बलवान और शुभ माने जाते हैं। इस नक्षत्र को सृजन, पोषण, सौंदर्य, समृद्धि और स्थिरता का प्रतीक माना गया है।
चंद्रमा मन के कारक हैं। जब चंद्रमा बलवान स्थिति में होते हैं तब मन शांत, स्थिर और प्रसन्न रहता है। व्रत, ध्यान और संयम के लिए मन की स्थिरता सबसे आवश्यक है। इसलिए रोहिणी नक्षत्र में किया गया तप मन को साधने के लिए विशेष रूप से अनुकूल माना जा सकता है।
2027 में यह व्रत मंगलवार को पड़ रहा है। मंगल साहस, संकल्प और अनुशासन के ग्रह हैं। चंद्रमा की शीतलता और मंगल की दृढ़ता का यह मेल व्रत करने वाले को कोमल मन और दृढ़ संकल्प, दोनों प्रदान करने वाला माना जा सकता है। इसी समय सूर्य मकर राशि में हैं, जो संयम और तप की राशि मानी जाती है।
| ज्योतिषीय तत्व | रोहिणी व्रत 2027 में स्थिति | संकेत |
|---|---|---|
| नक्षत्र | रोहिणी | सृजन, पोषण और सौंदर्य |
| चंद्रमा | वृषभ राशि में, उच्च | मन की स्थिरता और शांति |
| वार | मंगलवार | दृढ़ संकल्प और अनुशासन |
| सूर्य | मकर राशि | संयम और तपस्या |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष | बढ़ता प्रकाश, आत्मिक उन्नति |
आज का जीवन भागदौड़, तनाव और असंतोष से भरा है। हर व्यक्ति अधिक पाने की दौड़ में है, लेकिन मन की शांति कम होती जा रही है। रोहिणी व्रत एक बिल्कुल अलग मार्ग दिखाता है। यह सिखाता है कि सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, भीतर के संयम में है।
महीने में एक दिन भोजन को सीमित करना, कुछ समय मौन और ध्यान में बिताना, दूसरों के लिए दान करना और अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगना, ये छोटे छोटे अभ्यास धीरे धीरे पूरे जीवन को बदल देते हैं। रानी रोहिणी की कथा बताती है कि जो व्यक्ति तप और करुणा के बीज बोता है, उसके जीवन में दुख की छाया भी नहीं पड़ती।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जिनालय जाएं | सूर्यास्त के बाद भोजन न करें |
| प्रासुक जल का ही सेवन करें | जमीकंद का सेवन न करें |
| णमोकार मंत्र का जप करें | किसी जीव को कष्ट न पहुंचाएं |
| सामायिक और प्रतिक्रमण करें | क्रोध, निंदा और कटु वचन से बचें |
| जरूरतमंदों को दान दें | व्रत के बीच में बिना कारण नियम न तोड़ें |
| अवधि पूर्ण होने पर उद्यापन करें | दिखावे के लिए तप न करें |
रोहिणी व्रत केवल एक दिन का उपवास नहीं बल्कि वर्षों तक चलने वाली एक आत्मिक यात्रा है। दुर्गंधा से रोहिणी बनने की कथा हर उस व्यक्ति को आशा देती है जो अपने जीवन के कष्टों से थक चुका है। यह व्रत सिखाता है कि हर आत्मा में अनंत शुद्धि की संभावना छिपी है, बस उसे संयम, तप और करुणा से जगाना है। 19 जनवरी 2027 को, जब चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रोहिणी नक्षत्र को प्रकाशित करेंगे तब भगवान वासुपूज्य के चरणों में किया गया यह संकल्प परिवार के लिए सुख और आत्मा के लिए शांति का द्वार खोल सकता है। जहां संयम है, वहां दुख ठहर नहीं पाता।
रोहिणी व्रत जनवरी 2027 कब है?
जनवरी 2027 का रोहिणी व्रत मंगलवार, 19 जनवरी को है, जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र रहेगा।
रोहिणी व्रत किस भगवान को समर्पित है?
रोहिणी व्रत जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य को समर्पित है, जिनका जन्म और निर्वाण चंपापुरी में हुआ।
रोहिणी व्रत कितने वर्ष तक किया जाता है?
परंपरा के अनुसार यह व्रत 3, 5 या 7 वर्ष तक किया जाता है। कई परिवार इसे 5 वर्ष 5 महीने तक करते हैं और फिर उद्यापन करते हैं।
रोहिणी व्रत में क्या खाना चाहिए?
व्रत में उपवास, एकासन या आयंबिल किया जाता है। भोजन सात्विक, बिना जमीकंद और सूर्यास्त से पहले होना चाहिए।
रोहिणी व्रत का पारण कब करें?
रोहिणी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, पूजा करके जैन पंचांग के अनुसार किया जाता है।
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