By पं. नीलेश शर्मा
माघ कृष्ण अष्टमी पर काशी के कोतवाल काल भैरव की उपासना से भय, शत्रु और शनि दोष से मुक्ति के वैदिक उपाय।

कालाष्टमी जनवरी 2027 शुक्रवार, 29 जनवरी को माघ कृष्ण अष्टमी पर है। इस दिन भगवान शिव के उग्र स्वरूप काल भैरव की पूजा की जाती है। भैरव पूजा के लिए रात्रि का निशीथ काल सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, जो दिल्ली में रात लगभग 12:05 से 1:00 बजे तक रहेगा।
कालाष्टमी हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है, जिस दिन भगवान शिव के काल भैरव स्वरूप की विशेष उपासना की जाती है।
काल भैरव को काशी का कोतवाल और समय के स्वामी कहा जाता है। "काल" का अर्थ समय और मृत्यु दोनों है और काल भैरव वह शक्ति हैं जिनसे स्वयं काल भी भयभीत रहता है। इसलिए उनकी उपासना भय, शत्रु, अकाल मृत्यु और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए की जाती है।
| पंचांग तत्व | विवरण |
|---|---|
| व्रत का नाम | कालाष्टमी, मासिक कालाष्टमी |
| दिनांक | 29 जनवरी 2027, शुक्रवार |
| हिंदू मास | माघ मास, कृष्ण पक्ष (पूर्णिमांत) |
| तिथि | अष्टमी |
| निशीथ काल पूजा (दिल्ली) | रात लगभग 12:05 से 1:00 बजे तक |
| दिल्ली में सूर्योदय | प्रातः लगभग 7:10 बजे |
| दिल्ली में सूर्यास्त | सायं लगभग 5:58 बजे |
| राहु काल (दिल्ली) | प्रातः लगभग 11:10 से दोपहर 12:35 बजे तक |
| मुख्य आराध्य | भगवान काल भैरव |
| भैरव का वाहन | श्वान, यानी कुत्ता |
| उसी दिन का अन्य पर्व | मासिक कृष्ण जन्माष्टमी |
कालाष्टमी उसी दिन मनाई जाती है जिस दिन रात्रि में अष्टमी तिथि उपस्थित हो। निशीथ काल का सटीक समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग से अवश्य देख लें। जो रात्रि पूजा न कर सकें, वे संध्या के प्रदोष काल में भी भैरव पूजा कर सकते हैं।
काल भैरव भगवान शिव का उग्र और रक्षक स्वरूप हैं। शिव पुराण के अनुसार उनकी उत्पत्ति शिव के क्रोध से हुई थी। वे समय, न्याय और रक्षा के देवता हैं और काशी नगरी के कोतवाल माने जाते हैं, जिनकी अनुमति के बिना काशी में कोई नहीं रह सकता।
भैरव का अर्थ है वह जो भय का हरण करते हैं और भक्तों की रक्षा करते हैं।
काल भैरव का स्वरूप भयानक दिखाई देता है, लेकिन भक्तों के लिए वे अत्यंत कृपालु हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, खड्ग और कपाल होता है। उनका वाहन श्वान है, जो वफादारी और सजगता का प्रतीक है।
| स्वरूप | अर्थ |
|---|---|
| श्याम वर्ण | काल यानी समय की अनंतता |
| त्रिशूल | तीनों तापों का नाश |
| डमरू | सृष्टि की लय |
| खड्ग | अज्ञान और अहंकार का छेदन |
| कपाल | अहंकार के अंत की स्मृति |
| श्वान वाहन | वफादारी और सजगता |
शिव पुराण की कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी ने अहंकार में भगवान शिव का अपमान किया। तब शिव के क्रोध से काल भैरव प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट दिया। इसके बाद ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए भैरव ने काशी में आश्रय लिया।
कथा के अनुसार ब्रह्मा जी के पहले पांच सिर थे। जब उनके पांचवें सिर ने अहंकार में शिव की निंदा की, तब काल भैरव ने उस सिर को अपने नाखून से अलग कर दिया। वह कपाल उनके हाथ से चिपक गया और ब्रह्महत्या का पाप उनका पीछा करने लगा।
भैरव ने अनेक तीर्थों की यात्रा की, लेकिन मुक्ति नहीं मिली। अंत में काशी पहुंचते ही वह कपाल उनके हाथ से गिर गया। जिस स्थान पर कपाल गिरा, उसे कपाल मोचन तीर्थ कहा जाता है। तभी से भगवान शिव ने काल भैरव को काशी का कोतवाल नियुक्त किया।
यह कथा बताती है कि अहंकार, चाहे वह सृष्टिकर्ता का ही क्यों न हो, अंत में काटा जाता है। काल भैरव अहंकार के विनाशक हैं। कालाष्टमी पर उनकी उपासना इसलिए अपने भीतर के अहंकार, भय और नकारात्मकता को समाप्त करने का भी साधन है।
कालाष्टमी पर दिन में व्रत रखकर संध्या या रात्रि में काल भैरव की पूजा की जाती है। भैरव को सरसों के तेल का दीपक, काले तिल, उड़द, नारियल और इमरती अर्पित की जाती है। पूजा के बाद काले कुत्ते को भोजन कराना इस दिन का सबसे प्रमुख अनुष्ठान है।
| अर्पण | महत्व |
|---|---|
| सरसों के तेल का दीपक | शनि और राहु दोष की शांति |
| काले तिल | शनि शांति और पितृ कृपा |
| उड़द की दाल या वड़े | भैरव जी का प्रिय भोग |
| इमरती या जलेबी | भैरव जी का पारंपरिक मीठा भोग |
| नारियल | संपूर्ण समर्पण का प्रतीक |
| काले कुत्ते को भोजन | भैरव जी की सीधी कृपा का माध्यम |
कुछ तांत्रिक परंपराओं में भैरव जी को विशेष वस्तुएं अर्पित की जाती हैं, लेकिन गृहस्थों के लिए सात्विक पूजा ही श्रेष्ठ और सुरक्षित मानी गई है।
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ कालभैरवाय नमः | काल भैरव की कृपा और रक्षा | 108 बार |
| ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं | बटुक भैरव मंत्र, संकटों से मुक्ति | 108 बार |
| देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं, व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् | काल भैरव अष्टकम का आरंभ, भैरव स्तुति | पूरा अष्टकम 1 बार |
काल भैरव अष्टकम की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। इसमें 8 श्लोक हैं और हर श्लोक के अंत में "काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे" आता है, यानी काशी नगरी के स्वामी काल भैरव का मैं भजन करता हूं।
ज्योतिष में काल भैरव की उपासना शनि, राहु और केतु के कष्टों को शांत करने का सबसे प्रभावी उपाय मानी जाती है। काल भैरव समय के स्वामी हैं और शनि भी समय तथा कर्मफल के कारक हैं। इसलिए साढ़ेसाती, ढैया और राहु दशा में कालाष्टमी की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
मान्यता है कि शनि देव भैरव जी के भक्त हैं, इसलिए भैरव उपासना से शनि के कठोर प्रभाव में कमी आती है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर चंद्रमा का प्रकाश घटता है, जो अंधकार और भय का प्रतीक है। ऐसे समय में भय हरने वाले भैरव की पूजा मन को निडर बनाती है। 2027 में यह दिन शुक्रवार है, जो शुक्र का दिन है और भौतिक सुख की रक्षा से जुड़ा है।
| ग्रह | संभावित समस्या | कालाष्टमी पर उपाय |
|---|---|---|
| शनि | साढ़ेसाती, ढैया, कार्य में बाधा | भैरव जी को सरसों के तेल का दीपक और काले तिल अर्पित करें |
| राहु | अचानक संकट, भय, भ्रम | बटुक भैरव मंत्र का 108 बार जप करें |
| केतु | अदृश्य बाधाएं और नकारात्मक ऊर्जा | काले कुत्ते को भोजन कराएं |
| मंगल | शत्रु बाधा और विवाद | काल भैरव अष्टकम का पाठ करें |
| चंद्रमा | रात में भय और अनिद्रा | सोने से पहले "ॐ कालभैरवाय नमः" का 11 बार जप करें |
कालाष्टमी पर भैरव पूजा, सरसों के तेल का दीपक, काले कुत्ते को भोजन और अष्टकम पाठ शुभ हैं। इस दिन किसी कुत्ते या जीव को कष्ट देना, झूठ बोलना, किसी का अपमान करना और बड़ों का अनादर वर्जित माना गया है, क्योंकि भैरव न्याय के देवता हैं।
कालाष्टमी याद दिलाती है कि जीवन में सबसे बड़ा शत्रु भय और अहंकार है। काल भैरव उन दोनों का नाश करते हैं। उनका उग्र रूप बाहर से भयानक दिखता है, लेकिन भक्त के लिए वह सबसे सुरक्षित आश्रय है।
29 जनवरी 2027 की रात, जब कृष्ण पक्ष का अंधकार गहरा होगा, तब सरसों के तेल का एक दीपक और श्रद्धा से लिया गया भैरव का नाम जीवन के हर भय को दूर कर सकता है। जिसकी रक्षा काल भैरव करते हैं, उसे काल भी स्पर्श नहीं कर पाता।
कालाष्टमी जनवरी 2027 कब है?
कालाष्टमी शुक्रवार, 29 जनवरी 2027 को माघ कृष्ण अष्टमी पर है। इसी दिन मासिक कृष्ण जन्माष्टमी भी है।
कालाष्टमी पर पूजा का शुभ समय क्या है?
भैरव पूजा के लिए निशीथ काल सबसे श्रेष्ठ है, जो दिल्ली में रात लगभग 12:05 से 1:00 बजे तक रहेगा। संध्या के प्रदोष काल में भी पूजा की जा सकती है।
कालाष्टमी पर भैरव जी को क्या चढ़ाएं?
भैरव जी को सरसों के तेल का दीपक, काले तिल, उड़द, नारियल और इमरती अर्पित की जाती है। पूजा के बाद काले कुत्ते को भोजन कराना शुभ माना जाता है।
काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहते हैं?
ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के बाद भगवान शिव ने काल भैरव को काशी का कोतवाल नियुक्त किया। मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई काशी में नहीं रह सकता।
क्या कालाष्टमी पूजा से शनि दोष दूर होता है?
ज्योतिष में काल भैरव की उपासना शनि, राहु और केतु के कष्टों को शांत करने वाली मानी जाती है। साढ़ेसाती और ढैया में कालाष्टमी की पूजा विशेष फलदायी है।
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