कूर्म द्वादशी 2027 पर कच्छप पूजा क्यों?

By पं. सुव्रत शर्मा

समुद्र मंथन, शनि से जुड़े कूर्म अवतार और जीवन में स्थिरता का गूढ़ संदेश

कूर्म द्वादशी 2027: तिथि, पूजा विधि और महत्व

जब डूबते पर्वत को भगवान ने अपनी पीठ पर थाम लिया

सृष्टि के इतिहास में एक ऐसा क्षण आया था जब देवता और असुर मिलकर अमृत की खोज में समुद्र मंथन कर रहे थे। विशाल मंदराचल पर्वत मथानी बना था और नागराज वासुकि उसकी रस्सी। लेकिन जैसे ही मंथन शुरू हुआ, वह पर्वत क्षीरसागर की अथाह गहराई में डूबने लगा। सारा प्रयास व्यर्थ होने ही वाला था कि तभी भगवान विष्णु ने एक विशाल कच्छप यानी कछुए का रूप धारण किया, समुद्र के तल में जाकर पर्वत को अपनी पीठ पर थाम लिया। भगवान का यही रूप कूर्म अवतार कहलाता है और उनकी स्मृति में मनाया जाने वाला पर्व है कूर्म द्वादशी।

वर्ष 2027 में कूर्म द्वादशी मंगलवार, 19 जनवरी को पौष शुक्ल द्वादशी पर मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु के दूसरे अवतार की उपासना, स्थिरता की प्रार्थना और धैर्य के संकल्प का दिन है।

विवरण जानकारी
पर्व का नाम कूर्म द्वादशी
तिथि 19 जनवरी 2027
वार मंगलवार
हिंदू मास पौष
पक्ष शुक्ल पक्ष
तिथि द्वादशी
आराध्य देव भगवान विष्णु का कूर्म अवतार
सूर्य की स्थिति मकर राशि
दिल्ली में सूर्योदय प्रातः लगभग 7:15 बजे
अभिजीत मुहूर्त (दिल्ली) दोपहर लगभग 12:10 से 12:50 बजे तक
राहु काल (दिल्ली) दोपहर लगभग 3:10 से 4:30 बजे तक
उसी दिन के अन्य पर्व गौण पौष पुत्रदा एकादशी, तैलंग स्वामी जयंती, रोहिणी व्रत (जैन)

इस दिन सुबह के समय एकादशी तिथि भी कुछ समय तक रहेगी और उसके बाद द्वादशी आरंभ होगी। जिन लोगों ने 18 जनवरी को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा है, वे पंचांग में दिए गए पारण समय पर व्रत खोलें और फिर कूर्म द्वादशी की पूजा करें। द्वादशी तिथि के आरंभ का सटीक समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग से अवश्य देख लें।

एक नज़र में मुख्य अनुष्ठान

  • प्रातः स्नान और भगवान विष्णु के सामने संकल्प
  • जल से भरे कलश पर कूर्म रूप भगवान की प्रतिमा या चित्र की स्थापना
  • पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन और पंचामृत से पूजा
  • समुद्र मंथन की कथा का पाठ या श्रवण
  • "ॐ कूर्माय नमः" मंत्र का जप
  • दशावतार स्तोत्र का पाठ
  • ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान

कूर्म द्वादशी क्या है?

कूर्म द्वादशी भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को समर्पित व्रत है, जो पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को किया जाता है। वराह पुराण में भगवान विष्णु के अवतारों से जुड़े द्वादशी व्रतों की एक सुंदर परंपरा का वर्णन मिलता है, जिसमें अलग अलग मासों की शुक्ल द्वादशी को अलग अलग अवतारों की पूजा का विधान है। इस क्रम में मार्गशीर्ष की शुक्ल द्वादशी मत्स्य अवतार को, पौष की शुक्ल द्वादशी कूर्म अवतार को और माघ की शुक्ल द्वादशी वराह अवतार को समर्पित है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि कूर्म जयंती और कूर्म द्वादशी दो अलग पर्व हैं। कूर्म जयंती वैशाख पूर्णिमा को भगवान के कूर्म रूप में प्रकट होने की स्मृति में मनाई जाती है, जबकि कूर्म द्वादशी पौष मास में उनकी उपासना का व्रत है।

द्वादशी तिथि स्वयं भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी को होता है और शास्त्रों में द्वादशी पर विष्णु पूजा तथा दान का विशेष फल बताया गया है। जब इस तिथि पर विष्णु के किसी विशेष अवतार की उपासना जुड़ जाती है तब इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

समुद्र मंथन और कूर्म अवतार की कथा

विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में समुद्र मंथन की कथा विस्तार से मिलती है। कहा जाता है कि एक बार महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर देवराज इंद्र को एक दिव्य माला भेंट की। इंद्र ने अहंकार में वह माला अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर रख दी और ऐरावत ने उसे पैरों तले कुचल दिया। इस अपमान से क्रोधित होकर दुर्वासा ने श्राप दिया कि देवताओं का सारा वैभव नष्ट हो जाएगा।

श्राप के प्रभाव से देवी लक्ष्मी स्वर्ग छोड़कर क्षीरसागर में चली गईं। देवता शक्तिहीन हो गए और असुरों ने उन्हें युद्ध में हरा दिया। तब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान ने उन्हें सलाह दी कि वे असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करें, जिससे अमृत प्राप्त होगा और अमृत पीकर देवता फिर से शक्तिशाली हो जाएंगे।

मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और नागराज वासुकि को रस्सी। देवता वासुकि की पूंछ की ओर और असुर उसके मुख की ओर खड़े हुए। लेकिन मंथन शुरू होते ही भारी पर्वत समुद्र में धंसने लगा, क्योंकि उसके नीचे कोई आधार नहीं था। तब भगवान विष्णु ने एक लाख योजन विस्तार वाले विशाल कूर्म का रूप लिया और समुद्र की तलहटी में जाकर मंदराचल को अपनी पीठ पर उठा लिया। इसके बाद मंथन निर्विघ्न चलता रहा।

कवि जयदेव ने गीत गोविंद के दशावतार स्तोत्र में इस रूप की स्तुति करते हुए कहा है कि यह विशाल पृथ्वी आपकी पीठ पर टिकी है, हे केशव, कच्छप रूप धारण करने वाले जगदीश, आपकी जय हो।

समुद्र मंथन से निकले 14 रत्न

मंथन से एक एक करके 14 रत्न निकले। विभिन्न पुराणों में इनकी सूची थोड़ी अलग मिलती है, लेकिन सामान्य रूप से ये रत्न माने जाते हैं।

क्रम रत्न किसे मिला या क्या हुआ
1 हलाहल विष भगवान शिव ने पान किया और नीलकंठ कहलाए
2 कामधेनु ऋषियों को दी गई
3 उच्चैःश्रवा घोड़ा असुरराज बलि को मिला
4 ऐरावत हाथी इंद्र को मिला
5 कौस्तुभ मणि भगवान विष्णु ने धारण की
6 कल्पवृक्ष स्वर्ग में स्थापित हुआ
7 रंभा अप्सरा स्वर्ग को मिली
8 देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु का वरण किया
9 वारुणी असुरों ने ग्रहण की
10 चंद्रमा भगवान शिव ने मस्तक पर धारण किया
11 शारंग धनुष भगवान विष्णु को मिला
12 पांचजन्य शंख भगवान विष्णु को मिला
13 धन्वंतरि आयुर्वेद के देवता के रूप में प्रकट हुए
14 अमृत मोहिनी रूप में विष्णु ने देवताओं को पिलाया

कथा का गहरा अर्थ

समुद्र मंथन की कथा केवल देवताओं और असुरों की कहानी नहीं है। इसे मनुष्य के मन की कथा के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। मन ही क्षीरसागर है, जिसमें अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के विचार भरे हैं। साधना ही मंथन है। जब कोई व्यक्ति आत्म सुधार का प्रयास शुरू करता है, तो सबसे पहले विष निकलता है, यानी पुराने दुख, क्रोध और नकारात्मकता सामने आते हैं। इस विष को शिव जैसा धैर्य ही पचा सकता है। इसके बाद धीरे धीरे रत्न मिलते हैं और अंत में अमृत, यानी आत्मज्ञान।

इस पूरे मंथन में कूर्म की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यदि नीचे स्थिर आधार न हो, तो कोई भी साधना टिक नहीं सकती। कूर्म वही स्थिर आधार है, जो धैर्य, संयम और अडिग श्रद्धा का प्रतीक है। कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है। भगवद्गीता में भी कहा गया है कि जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को विषयों से समेट लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। इस प्रकार कूर्म इंद्रिय संयम और स्थिर बुद्धि का भी प्रतीक है।

कूर्म द्वादशी की पूजा विधि

  1. सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और पीले या स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. यदि एकादशी का व्रत रखा है, तो पंचांग के पारण समय पर व्रत खोलें।
  3. पूजा स्थान पर पीला वस्त्र बिछाकर जल से भरा कलश स्थापित करें।
  4. कलश के ऊपर या पास भगवान विष्णु के कूर्म रूप की प्रतिमा या चित्र रखें। प्रतिमा न हो तो भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने कच्छप का स्मरण करें।
  5. भगवान को पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराएं।
  6. चंदन, पीले पुष्प, अक्षत, तुलसी दल, धूप और घी का दीपक अर्पित करें।
  7. पीले फल, मिश्री, खीर या पंचामृत का भोग लगाएं।
  8. "ॐ कूर्माय नमः" मंत्र का 108 बार जप करें।
  9. समुद्र मंथन की कथा पढ़ें या सुनें और दशावतार स्तोत्र का पाठ करें।
  10. आरती के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र, पीली वस्तुएं और दक्षिणा का दान करें।
  11. कई परिवार इस दिन किसी नदी या तालाब में कछुओं और मछलियों के लिए आटे की गोलियां डालते हैं।

कूर्म द्वादशी के मंत्र

मंत्र उद्देश्य जप संख्या
ॐ कूर्माय नमः कूर्म भगवान की कृपा, स्थिरता और धैर्य 108 बार
ॐ नमो नारायणाय भगवान विष्णु की कृपा और मन की शांति 108 बार
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सभी कार्यों में सफलता 108 बार

वास्तु में कूर्म का स्थान

भारतीय वास्तु परंपरा में कूर्म का विशेष महत्व है। कई स्थानों पर भवन निर्माण से पहले भूमि पूजन के समय नींव में कूर्म शिला या चांदी अथवा तांबे का कछुआ रखने की परंपरा है। इसके पीछे भावना यह है कि जैसे कूर्म भगवान ने मंदराचल को स्थिर रखा, वैसे ही वे इस भवन को भी स्थिरता प्रदान करें।

घर में धातु का कछुआ रखने की परंपरा भी इसी विश्वास से जुड़ी है। लोक मान्यता में इसे उत्तर दिशा में रखना शुभ माना जाता है, क्योंकि उत्तर दिशा धन और अवसरों की दिशा मानी जाती है। कूर्म द्वादशी ऐसी किसी प्रतीकात्मक वस्तु को घर में स्थापित करने के लिए भी शुभ दिन माना जा सकता है।

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में स्थित श्रीकूर्मम मंदिर भगवान के कूर्म अवतार का प्रमुख मंदिर है। यह भारत के उन बहुत कम मंदिरों में से है जहां भगवान विष्णु की पूजा कच्छप रूप में होती है।

कूर्म द्वादशी का ज्योतिषीय महत्व

बृहत् पराशर होरा शास्त्र में भगवान विष्णु के अवतारों को नवग्रहों से जोड़ा गया है। इस परंपरा के अनुसार कूर्म अवतार का संबंध शनि ग्रह से है। यह संबंध बहुत अर्थपूर्ण है। शनि धैर्य, स्थिरता, धीमी गति, सहनशीलता और भार उठाने के कारक हैं। कछुआ भी धीमा, धैर्यवान और अपनी पीठ पर भार उठाने वाला जीव है।

अवतार संबंधित ग्रह
राम सूर्य
कृष्ण चंद्रमा
नृसिंह मंगल
बुद्ध बुध
वामन बृहस्पति
परशुराम शुक्र
कूर्म शनि
वराह राहु
मत्स्य केतु

2027 में कूर्म द्वादशी के समय सूर्य मकर राशि में हैं, जो स्वयं शनि की राशि है। यानी शनि से जुड़े अवतार की उपासना शनि की राशि में सूर्य के रहते हो रही है। जिन लोगों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैया या शनि महादशा चल रही हो, उनके लिए कूर्म भगवान की पूजा शनि के कठोर प्रभाव को शांत करने का एक सौम्य उपाय मानी जा सकती है।

इस वर्ष यह दिन मंगलवार को है। मंगल ऊर्जा, साहस और भूमि के कारक हैं। मंगल की तेज ऊर्जा और कूर्म की स्थिरता का यह मेल संतुलन का संदेश देता है, यानी साहस के साथ धैर्य और गति के साथ स्थिरता। भूमि, भवन और संपत्ति से जुड़े कार्यों के लिए यह संयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि मंगल भूमि के कारक हैं और कूर्म भवन की नींव के रक्षक।

इसी दिन चंद्रमा वृषभ राशि में रोहिणी नक्षत्र में होंगे, जिसके कारण जैन परंपरा का रोहिणी व्रत भी इसी दिन है। वृषभ चंद्रमा की उच्च राशि है और रोहिणी चंद्रमा का सबसे प्रिय नक्षत्र माना जाता है। बलवान चंद्रमा मन को स्थिर रखता है, जो कूर्म उपासना के भाव के बिल्कुल अनुरूप है।

कूर्म द्वादशी पर ज्योतिषीय उपाय

स्थिति उपाय
शनि की साढ़ेसाती या ढैया "ॐ कूर्माय नमः" का 108 बार जप और काले तिल का दान
जीवन में अस्थिरता या बार बार बदलाव घर की उत्तर दिशा में धातु का कछुआ स्थापित करें
भूमि या भवन संबंधी विवाद मंगलवार होने के कारण भगवान विष्णु और हनुमान जी की पूजा करें
धैर्य की कमी और अधिक क्रोध समुद्र मंथन की कथा पढ़ें और दशावतार स्तोत्र का पाठ करें
मन की अशांति जलाशय में कछुओं और मछलियों को आटे की गोलियां डालें

कूर्म द्वादशी के लाभ

  • जीवन, परिवार और कार्यक्षेत्र में स्थिरता
  • धैर्य और सहनशीलता का विकास
  • शनि से जुड़े कष्टों में राहत
  • भूमि, भवन और संपत्ति से जुड़े कार्यों में सफलता की मान्यता
  • इंद्रिय संयम और स्थिर बुद्धि
  • भगवान विष्णु की कृपा और लक्ष्मी का आगमन

कूर्म अवतार का आज के जीवन में संदेश

आज का जीवन तेज गति से भागता है। हर व्यक्ति जल्दी सफलता चाहता है, जल्दी परिणाम चाहता है। ऐसे समय में कूर्म अवतार एक बिल्कुल अलग सीख देता है। समुद्र मंथन में सबसे अधिक भार कूर्म ने उठाया, लेकिन वे दिखाई नहीं दिए। वे समुद्र की गहराई में चुपचाप टिके रहे, ताकि ऊपर मंथन चलता रहे और अमृत निकल सके।

जीवन में भी ऐसे लोग होते हैं जो परिवार, संस्था या समाज का भार चुपचाप उठाते हैं। माता पिता, जो बच्चों के भविष्य के लिए अपना सुख छोड़ देते हैं। शिक्षक, जो पीढ़ियों को गढ़ते हैं। सैनिक, जो सीमा पर खड़े रहते हैं। कूर्म द्वादशी ऐसे सभी मौन आधारों को प्रणाम करने का भी दिन है।

कूर्म यह भी सिखाते हैं कि बड़े लक्ष्य धैर्य से मिलते हैं। अमृत एक दिन में नहीं निकला। पहले विष निकला, फिर एक एक करके रत्न निकले और सबसे अंत में अमृत। जो व्यक्ति कठिनाइयों के बीच भी स्थिर रहता है, उसे अंत में अमृत अवश्य मिलता है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
सूर्योदय से पहले स्नान करके पूजा करें राहु काल में पूजा का आरंभ न करें
एकादशी व्रत का पारण सही समय पर करें हरि वासर में पारण न करें
भगवान को तुलसी दल अर्पित करें किसी जीव, विशेषकर कछुए को कष्ट न पहुंचाएं
अन्न और वस्त्र का दान करें मांस, मदिरा और तामसिक भोजन न लें
जलाशयों की स्वच्छता का ध्यान रखें नदियों और तालाबों में कचरा न डालें

जब धैर्य स्वयं भगवान का रूप ले लेता है

कूर्म द्वादशी याद दिलाती है कि भगवान केवल शक्ति और वैभव के रूप में ही प्रकट नहीं होते, वे धैर्य और स्थिरता के रूप में भी आते हैं। जिस कच्छप ने अपनी पीठ पर पूरा पर्वत थामा, उसी ने अमृत का मार्ग खोला। 19 जनवरी 2027 को, मंगलवार के दिन, जब सूर्य शनि की राशि में होंगे और चंद्रमा अपने प्रिय नक्षत्र रोहिणी में तब कूर्म भगवान का सच्चे मन से किया गया स्मरण जीवन के डगमगाते पर्वतों को भी स्थिर कर सकता है। जिसकी नींव में श्रद्धा है, उसका भवन कभी नहीं डूबता।

FAQ

कूर्म द्वादशी 2027 कब है?

कूर्म द्वादशी 2027 मंगलवार, 19 जनवरी को पौष शुक्ल द्वादशी पर मनाई जाएगी।

कूर्म द्वादशी पर किसकी पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु के दूसरे अवतार, कूर्म यानी कच्छप रूप की पूजा होती है, जिन्होंने समुद्र मंथन में मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर थामा था।

कूर्म जयंती और कूर्म द्वादशी में क्या अंतर है?

कूर्म जयंती वैशाख पूर्णिमा को मनाई जाती है, जबकि कूर्म द्वादशी पौष शुक्ल द्वादशी को कूर्म भगवान की उपासना का व्रत है।

कूर्म अवतार का संबंध किस ग्रह से है?

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार कूर्म अवतार का संबंध शनि ग्रह से है। इसलिए शनि के कष्ट में कूर्म पूजा शुभ मानी जाती है।

कूर्म द्वादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

"ॐ कूर्माय नमः" मंत्र का 108 बार जप करें। साथ में "ॐ नमो नारायणाय" का जप और दशावतार स्तोत्र का पाठ भी शुभ है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

ZODIAQ के बारे में

ज़ोडियाक (ZODIAQ) एक ऑनलाइन वैदिक ज्योतिष प्लेटफॉर्म है। जिन यूज़र्स को ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता है उन्हें ये अनुभवी ज्योतिषियों से जोड़ता है। हमारे यूज़र्स निशुल्क कुंडली भी बनाते हैं और कुंडली मिलान करते हैं। साथ ही ज़ोडियाक (ZODIAQ) ज्योतिषियों को भी कई उपयोगी सेवाएँ प्रदान करता है। ज्योतिषी ज़ोडियाक (ZODIAQ) की विभिन्न सुविधाओं का उपयोग कर अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करते हैं।

यदि आप एक उपयोगकर्ता हैं

अनुभवी ज्योतिषियों से सलाह लें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें। आप हमारे प्लेटफॉर्म से अनुभवी ज्योतिषियों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित जन्म पत्रिका और जीवन भविष्यवाणी रिपोर्ट भी मंगवा सकते हैं। सटीक कुंडली बनाएं, कुंडली मिलान करें और राशिफल व मुहूर्त की जानकारी प्राप्त करें। हमारी ऑनलाइन लाइब्रेरी का उपयोग करें जहां आपको सभी जरूरी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक जानकारी एक जगह मिलेगी।

यदि आप एक ज्योतिषी हैं

अपने ग्राहकों के लिए सटीक कुंडली बनाएं और एक बार में 5 लोगों तक का कुंडली मिलान करें। ज़ोडियाक (ZODIAQ) की मदद से अपने ग्राहकों के लिए विस्तृत जन्म पत्रिका रिपोर्ट तैयार करें। क्लाइंट डायरेक्टरी में ग्राहकों का विवरण सेव करके किसी भी समय उन्हें एक्सेस करें। हर दिन आपने कितने लोगों को परामर्श दिया यह ट्रैक कर के अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाएं।

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ