By पं. सुव्रत शर्मा
असम के फसल उत्सव में छिपा अग्नि, अन्न और सूर्य का गूढ़ रहस्य

असम की धरती पर जब धान की आखिरी बालियां कट कर घरों के भंडार में पहुंच जाती हैं, जब खेतों में ठंडी धुंध के बीच पुआल की गंध फैल जाती है और जब पूरा गांव एक परिवार की तरह एक ही अलाव के चारों ओर इकट्ठा होता है तब माघ बिहू का आगमन होता है। यह केवल एक त्योहार नहीं है। यह उस परिश्रम का उत्सव है जो किसान ने पूरे वर्ष धूप, वर्षा और मिट्टी के साथ मिलकर किया है। वर्ष 2027 में माघ बिहू शुक्रवार, 15 जनवरी को मनाया जाएगा और इससे एक रात पहले, 14 जनवरी को उरुका की रात होगी।
नीचे दी गई तालिका में माघ बिहू 2027 से जुड़ी सभी मुख्य पंचांग जानकारी एक साथ दी गई है, ताकि पर्व की तैयारी करने वाला हर व्यक्ति सही समय और सही विधि को पहले ही समझ सके।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | माघ बिहू, जिसे भोगाली बिहू भी कहते हैं |
| मुख्य तिथि | 15 जनवरी 2027 |
| वार | शुक्रवार |
| उरुका की रात | 14 जनवरी 2027, गुरुवार |
| सूर्य का मकर राशि में प्रवेश | 14 जनवरी 2027 की रात्रि |
| पुण्य काल | 15 जनवरी को सूर्योदय से मध्याह्न तक |
| महा पुण्य काल | सूर्योदय के बाद के लगभग पहले 2 घंटे |
| चंद्र मास और पक्ष | पौष मास, शुक्ल पक्ष (अमांत गणना) |
| सूर्योदय के समय तिथि | शुक्ल अष्टमी के आसपास |
| सौर मास | असमिया पंचांग के माघ मास का पहला दिन |
| गुवाहाटी में सूर्योदय | प्रातः लगभग 6:15 बजे |
| गुवाहाटी में सूर्यास्त | सायं लगभग 4:50 बजे |
| पंचांग का आधार | सौर पंचांग |
सूर्य का राशि परिवर्तन रात्रि में होने के कारण शास्त्रीय नियम के अनुसार स्नान, दान और पूजा का पुण्य काल अगले दिन यानी 15 जनवरी की सुबह माना जाएगा। अलग अलग शहरों में सूर्योदय का समय कुछ मिनट आगे पीछे हो सकता है, इसलिए सटीक मुहूर्त के लिए अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग को देख लेना उचित रहता है।
माघ बिहू असम का फसल उत्सव है, जो धान की कटाई पूरी होने के बाद मनाया जाता है। असमिया समाज के जीवन में बिहू केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह उनकी पहचान, उनकी स्मृति और उनकी धरती के साथ उनके रिश्ते का प्रतीक है। माघ बिहू को भोगाली बिहू भी कहा जाता है। "भोग" शब्द का अर्थ है भोजन, आनंद और उपभोग। इस समय घरों के भंडार अनाज से भरे होते हैं, इसलिए यह पर्व खुलकर खाने, खिलाने और बांटने का पर्व बन जाता है।
बिहू शब्द की उत्पत्ति को लेकर कई मान्यताएं हैं। एक मत के अनुसार यह संस्कृत के "विषु" शब्द से जुड़ा है, जिसका संबंध सूर्य के राशि परिवर्तन और दिन रात के संतुलन से है। दूसरा मत इसे स्थानीय जनजातीय भाषाओं की परंपरा से जोड़ता है, जहां फसल, धरती और देवताओं से समृद्धि की कामना की जाती थी। दोनों ही मतों में एक बात समान है कि बिहू का मूल प्रकृति, ऋतु और कृषि जीवन में है।
यह भी समझना आवश्यक है कि माघ बिहू ठीक उसी समय आता है जब देश के अन्य भागों में मकर संक्रांति मनाई जाती है। सूर्य जब धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब असमिया सौर पंचांग में माघ मास शुरू होता है और उसी के पहले दिन माघ बिहू मनाया जाता है। इस तरह यह पर्व एक ओर लोक संस्कृति से गहराई से जुड़ा है और दूसरी ओर वैदिक ज्योतिष के सौर सिद्धांत पर भी पूरी तरह आधारित है।
असम में वर्ष भर में तीन बिहू मनाए जाते हैं और तीनों का संबंध खेती के अलग अलग चरणों से है। इन तीनों को एक साथ देखने पर समझ में आता है कि असमिया संस्कृति ने कृषि चक्र को कितनी सुंदरता से उत्सवों में ढाल दिया है।
| बिहू का नाम | दूसरा नाम | समय | कृषि चक्र का चरण | भाव |
|---|---|---|---|---|
| बोहाग बिहू | रंगाली बिहू | अप्रैल के मध्य | बुआई से पहले, नववर्ष | उल्लास और रंग |
| काती बिहू | कंगाली बिहू | अक्टूबर के मध्य | फसल खेत में खड़ी, भंडार खाली | संयम और प्रार्थना |
| माघ बिहू | भोगाली बिहू | जनवरी के मध्य | कटाई पूरी, भंडार भरे | भोज और कृतज्ञता |
काती बिहू में जब धान खेतों में पक रहा होता है और घरों में अनाज कम होता है तब लोग तुलसी के नीचे दीप जलाकर फसल की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। इसीलिए उसे कंगाली बिहू कहा जाता है। कुछ महीनों बाद वही प्रार्थना फल देती है और माघ बिहू के समय भंडार भर जाते हैं। इस दृष्टि से देखें तो काती बिहू की प्रार्थना और माघ बिहू का भोज एक ही कहानी के दो अध्याय हैं। पहले अध्याय में धैर्य है, दूसरे में पुरस्कार।
बोहाग बिहू नए वर्ष और नई बुआई का स्वागत करता है, जबकि माघ बिहू पुराने कृषि वर्ष के सफल समापन का उत्सव है। यही कारण है कि माघ बिहू में विदाई और संतोष का भाव भी छिपा रहता है, मानो धरती से कहा जा रहा हो कि इस वर्ष जो दिया, उसके लिए धन्यवाद।
माघ बिहू से एक दिन पहले की संध्या और रात को उरुका कहा जाता है। 2027 में उरुका 14 जनवरी, गुरुवार को होगा। यह रात पूरे पर्व की आत्मा मानी जाती है, क्योंकि इसी रात तैयारी, मेल मिलाप और सामूहिक आनंद अपने चरम पर पहुंचता है।
उरुका के दिन गांव के युवा और पुरुष दिन में ही खेतों में पहुंच जाते हैं। वहां बांस, सूखी पुआल, केले के पत्तों और लकड़ियों से दो तरह की संरचनाएं बनाई जाती हैं। पहली होती है मेजी, जो एक ऊंचा, शंकु जैसा ढांचा होता है और जिसे अगली सुबह अग्नि को समर्पित किया जाता है। दूसरी होती है भेलाघर, जो एक अस्थायी झोपड़ी होती है। भेलाघर में लोग रात भर बैठते हैं, बातें करते हैं, गीत गाते हैं और भोज करते हैं।
उरुका का भोज इस पर्व की सबसे जीवंत परंपराओं में से एक है। इस भोज में ताजा पकड़ी गई मछली, चावल, मौसमी सब्जियां और कई जगह मांस भी पकाया जाता है। शाकाहारी परिवार अपनी परंपरा के अनुसार दाल, सब्जी, पीठा और खीर जैसे व्यंजन बनाते हैं। भोजन किसी एक घर का नहीं होता। हर परिवार कुछ न कुछ योगदान देता है और सब मिलकर पकाते हैं।
उरुका की रात का एक सामाजिक अर्थ भी है। जिन लोगों के बीच वर्ष भर में कोई मनमुटाव हुआ हो, वे भी इस रात एक ही अलाव के पास बैठते हैं। गांव के बुजुर्ग पुरानी कथाएं सुनाते हैं, बच्चे मस्ती करते हैं और युवा अगली सुबह के अनुष्ठान की तैयारी करते हैं। एक तरह से उरुका की रात समाज के बिखरे धागों को फिर से जोड़ने का अवसर बन जाती है।
माघ बिहू की सुबह का सबसे पवित्र क्षण मेजी दहन होता है। यह केवल एक अलाव जलाना नहीं है। यह अग्नि देव को धन्यवाद देने और आने वाले वर्ष के लिए आशीर्वाद मांगने की एक प्राचीन विधि है। वैदिक परंपरा में अग्नि को देवताओं का मुख कहा गया है, यानी अग्नि में जो कुछ श्रद्धा से अर्पित किया जाता है, वह देवताओं तक पहुंचता है। मेजी दहन इसी भाव का लोक रूप है।
मेजी की राख को पेड़ों के पास रखने की परंपरा बहुत सुंदर अर्थ रखती है। लोक मान्यता है कि इससे पेड़ अधिक फल देते हैं। प्रतीकात्मक रूप से देखें तो जो अग्नि पुरानी फसल के लिए धन्यवाद बनकर जली, उसकी राख नई समृद्धि के बीज के रूप में धरती को लौटाई जाती है। जीवन का यही चक्र है, जिसमें कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
वैदिक ज्योतिष की दृष्टि से माघ बिहू का सबसे महत्वपूर्ण आधार है सूर्य का मकर राशि में प्रवेश। सूर्य वर्ष भर में 12 राशियों से होकर गुजरते हैं और हर राशि परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है। इन 12 संक्रांतियों में मकर संक्रांति को सबसे शुभ माना गया है, क्योंकि परंपरा में इसी समय से सूर्य के उत्तरायण होने की गणना की जाती है।
उत्तरायण को शास्त्रों में देवताओं का दिन कहा गया है। माना जाता है कि इस काल में किए गए दान, जप, तप और शुभ कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है। प्रकृति भी इस परिवर्तन की गवाही देती है। धीरे धीरे दिन लंबे होने लगते हैं, ठंड की कठोरता कम होने लगती है और जीवन में फिर से गति आने लगती है।
मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं और ज्योतिष में शनि को सूर्य का पुत्र माना गया है। पौराणिक कथाओं में पिता और पुत्र के बीच दूरी और मतभेद का उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति पर सूर्य स्वयं अपने पुत्र के घर जाते हैं। इसे संबंधों में जमी बर्फ के पिघलने और पुराने मतभेदों के समाप्त होने का प्रतीक माना जाता है।
इसी कारण इस दिन तिल का विशेष महत्व है। काले तिल शनि से जुड़े माने जाते हैं और गुड़ सूर्य की ऊर्जा का प्रतीक है। जब तिल और गुड़ एक साथ मिलते हैं, तो वह सूर्य और शनि के मिलन का प्रतीक बन जाता है। असम के तिल पीठा और तिल लारू इसी गहरे प्रतीक को लोक भोजन के रूप में जीवित रखते हैं, भले ही खाने वाला इस ज्योतिषीय अर्थ से परिचित हो या न हो।
भारत के अधिकतर व्रत और त्योहार चंद्र तिथियों पर आधारित होते हैं, इसलिए उनकी तारीख हर वर्ष बदलती रहती है। माघ बिहू इसका अपवाद है। यह सौर पंचांग पर आधारित है, इसलिए यह लगभग हर वर्ष 14 या 15 जनवरी को ही आता है। असमिया कैलेंडर भी सौर गणना पर चलता है, जिसमें सूर्य के राशि प्रवेश से ही नया महीना शुरू होता है।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि सौर पर्व सीधे ऋतु से जुड़े होते हैं। खेती का चक्र सूर्य की गति पर निर्भर करता है, चंद्रमा की कलाओं पर नहीं। इसीलिए किसानों के फसल उत्सव, जैसे माघ बिहू, पोंगल और लोहड़ी, सूर्य के मकर प्रवेश के आसपास ही मनाए जाते हैं।
वर्ष 2027 में माघ बिहू शुक्रवार को पड़ रहा है। ज्योतिष में शुक्रवार शुक्र ग्रह का दिन है और शुक्र को भोग, सौंदर्य, स्वादिष्ट भोजन, कला, संगीत और पारिवारिक सुख का कारक माना जाता है। भोगाली बिहू, जिसका मूल भाव ही भोग और आनंद है, जब शुक्र के दिन आता है, तो यह संयोग अपने आप में अर्थपूर्ण हो जाता है।
इस संयोग को इस रूप में समझा जा सकता है कि इस वर्ष पर्व पर पारिवारिक मेल मिलाप, लोकगीत, नृत्य और सामूहिक भोज का आनंद विशेष रूप से बढ़ा हुआ अनुभव हो सकता है। जो लोग शुक्र से जुड़े शुभ फल चाहते हैं, वे इस दिन सफेद वस्त्र, चावल, मिश्री या दूध से बनी मिठाई का दान कर सकते हैं। साथ ही उस दिन चंद्रमा शुक्ल पक्ष में बढ़ती कलाओं के साथ होंगे, जो मन की प्रसन्नता और नई शुरुआत के लिए अनुकूल माना जाता है।
मकर संक्रांति के पुण्य काल में दान का विशेष महत्व है। नीचे दी गई तालिका पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं के आधार पर हर राशि के लिए उपयुक्त दान बताती है। दान हमेशा अपनी सामर्थ्य के अनुसार और सच्चे मन से करना चाहिए, क्योंकि दान का फल वस्तु की मात्रा से नहीं, भाव से तय होता है।
| राशि | अनुशंसित दान | संबंधित भाव |
|---|---|---|
| मेष | गुड़, लाल वस्त्र, मूंगफली | साहस और ऊर्जा |
| वृषभ | सफेद तिल, चावल, मिश्री | स्थिरता और सुख |
| मिथुन | हरी मूंग, हरी सब्जियां | बुद्धि और संवाद |
| कर्क | चावल, दूध, सफेद वस्त्र | मानसिक शांति |
| सिंह | गुड़, गेहूं, तांबे का पात्र | आत्मविश्वास और मान |
| कन्या | मूंग की खिचड़ी, हरे फल | स्वास्थ्य और विवेक |
| तुला | सफेद वस्त्र, चावल, घी | संतुलन और सौंदर्य |
| वृश्चिक | गुड़, लाल मसूर, ऊनी वस्त्र | साहस और सुरक्षा |
| धनु | पीली दाल, हल्दी, केले | ज्ञान और भाग्य |
| मकर | काले तिल, कंबल, सरसों का तेल | कर्म और धैर्य |
| कुंभ | काले तिल, ऊनी वस्त्र, जूते | सेवा और न्याय |
| मीन | चने की दाल, पीले वस्त्र, केसर | भक्ति और करुणा |
मेजी दहन के समय और पुण्य काल में कुछ सरल मंत्रों का जप मन को स्थिर करता है और पर्व के आध्यात्मिक भाव को गहरा करता है। इन मंत्रों को किसी विशेष कर्मकांड के बिना, शुद्ध मन और स्पष्ट उच्चारण के साथ जपा जा सकता है।
| उद्देश्य | मंत्र | जप संख्या |
|---|---|---|
| सूर्य देव की कृपा | ॐ घृणि सूर्याय नमः | 108 बार |
| शनि दोष की शांति | ॐ शं शनैश्चराय नमः | 108 बार |
| अग्नि देव को आहुति | ॐ अग्नये स्वाहा | प्रत्येक आहुति के साथ |
| शुक्र की प्रसन्नता | ॐ शुं शुक्राय नमः | 108 बार |
जिन लोगों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती या ढैया चल रही हो, उनके लिए मकर संक्रांति का दिन विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। इस दिन काले तिल का दान और शनि मंत्र का जप शनि के कठोर प्रभाव को शांत करने में सहायक माना गया है। इसी प्रकार जिनकी कुंडली में सूर्य कमजोर हो, उन्हें इस दिन सूर्य को अर्घ्य अवश्य देना चाहिए।
भोगाली बिहू का नाम ही बताता है कि भोजन इस पर्व का केंद्र है। लेकिन यह भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं होता। हर व्यंजन नई फसल के चावल, तिल, गुड़ और नारियल से बनता है, यानी हर निवाले में धरती का धन्यवाद छिपा होता है। असमिया घरों में माघ बिहू से कई दिन पहले ही पीठा और लारू बनाने का काम शुरू हो जाता है और घर की महिलाएं मिलकर यह काम करती हैं।
| व्यंजन | मुख्य सामग्री | विशेषता |
|---|---|---|
| तिल पीठा | पिसा हुआ चावल, तिल, गुड़ | पतली परत में भरा तिल और गुड़, सबसे प्रसिद्ध पीठा |
| नारिकोल पीठा | चावल का आटा, नारियल, गुड़ | मीठा और सुगंधित |
| घिला पीठा | चावल का आटा, गुड़ | तल कर बनाया जाने वाला पीठा |
| सुंगा पीठा | चावल, बांस की नली | बांस की नली में पकाया जाता है |
| नारिकोल लारू | नारियल, गुड़ या चीनी | गोल लड्डू जैसा मीठा |
| तिल लारू | तिल, गुड़ | सर्दी में शरीर को गर्मी देने वाला |
| जलपान | चिड़ा, मुड़ी, अखोई, दही, गुड़ | पारंपरिक नाश्ता |
| सुंगा चाउल | चिपचिपा चावल, बांस | बांस में पकाया जाने वाला चावल |
आयुर्वेद की दृष्टि से भी ये व्यंजन बहुत सोच समझकर बनाए गए लगते हैं। जनवरी की कड़ी ठंड में तिल और गुड़ शरीर को ऊष्मा देते हैं, पाचन को सक्रिय रखते हैं और ऊर्जा बनाए रखते हैं। दही और चिड़ा का मेल हल्का और पौष्टिक होता है। इस तरह माघ बिहू का भोजन ऋतु के अनुकूल भी है और परंपरा के अनुरूप भी।
माघ बिहू में खेलों की भी एक समृद्ध परंपरा रही है। गांवों में दिन भर तरह तरह की प्रतियोगिताएं होती हैं, जिनमें बच्चे, युवा और बड़े सब भाग लेते हैं। इन खेलों का उद्देश्य जीतना कम और मिलकर आनंद लेना अधिक होता है।
माघ बिहू का सबसे सुंदर पक्ष उसकी सामुदायिकता है। आज के समय में जब लोग शहरों में रहने लगे हैं और परिवार बिखर गए हैं तब भी असमिया लोग माघ बिहू पर अपने गांव लौटने का प्रयास करते हैं। शहरों में भी मोहल्ले स्तर पर मेजी बनाई जाती है और सामूहिक भोज होते हैं। यह दर्शाता है कि परंपरा केवल अतीत की वस्तु नहीं है बल्कि वह आज भी लोगों को जोड़ने की शक्ति रखती है।
सूर्य के मकर प्रवेश के समय पूरा भारत किसी न किसी रूप में फसल और सूर्य का उत्सव मनाता है। नाम अलग हैं, रीति रिवाज अलग हैं, लेकिन मूल भाव एक ही है, यानी प्रकृति के प्रति आभार और सूर्य की ऊर्जा का स्वागत।
| क्षेत्र | पर्व का नाम | प्रमुख परंपरा |
|---|---|---|
| असम | माघ बिहू | मेजी दहन, उरुका भोज, पीठा |
| पंजाब और हरियाणा | लोहड़ी | अलाव, रेवड़ी, मूंगफली, लोकगीत |
| तमिलनाडु | पोंगल | नए चावल का पोंगल, सूर्य पूजा |
| गुजरात | उत्तरायण | पतंग उत्सव, तिल चिक्की |
| उत्तर प्रदेश और बिहार | खिचड़ी | गंगा स्नान, खिचड़ी दान |
| महाराष्ट्र | मकर संक्रांति | तिलगुड़ का आदान प्रदान |
इस तालिका को देखकर एक बात स्पष्ट होती है। माघ बिहू और लोहड़ी दोनों में अग्नि का केंद्रीय स्थान है। पोंगल और माघ बिहू दोनों में नए चावल से बने व्यंजन मुख्य हैं। और लगभग हर क्षेत्र में तिल और गुड़ किसी न किसी रूप में उपस्थित हैं। यह भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रमाण है, जहां सूर्य के एक ही राशि परिवर्तन को देश के कोने कोने में अपने अपने ढंग से मनाया जाता है।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें | मेजी दहन से पहले भोजन न करें |
| सूर्य को अर्घ्य दें | अग्नि में प्लास्टिक या अशुद्ध वस्तु न डालें |
| पुण्य काल में तिल और गुड़ का दान करें | किसी का अपमान या कटु वचन न बोलें |
| बड़ों का आशीर्वाद लें | भोजन की बर्बादी न करें |
| उरुका का भोज सबके साथ बांटें | पशुओं को कष्ट न पहुंचाएं |
| मेजी की राख फलदार पेड़ों को दें | नशे में पर्व की मर्यादा न तोड़ें |
| जरूरतमंदों को गर्म कपड़े दें | पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले काम न करें |
माघ बिहू का सबसे गहरा संदेश है कृतज्ञता। जो मिला है, उसके लिए धन्यवाद देना मनुष्य को विनम्र बनाता है। किसान जानता है कि उसकी मेहनत के साथ साथ धूप, वर्षा, मिट्टी और समय ने भी साथ दिया, तभी फसल घर आई। मेजी की अग्नि में आहुति देना इसी स्वीकार का प्रतीक है कि मनुष्य अकेले कुछ नहीं करता।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह पर्व एक प्रकार का समापन संस्कार भी है। पूरे वर्ष का श्रम, चिंता और प्रतीक्षा एक रात के उत्सव में बदल जाती है। उरुका की रात लोग अपने तनाव को पीछे छोड़कर गीत गाते हैं, हंसते हैं और साथ बैठते हैं। फिर सुबह की अग्नि में मानो पुराना सब कुछ जलकर समाप्त हो जाता है और मन हल्का होकर नए वर्ष के कृषि कार्य के लिए तैयार होता है।
वैदिक दृष्टि में अग्नि शुद्धि का प्रतीक है। अग्नि जो भी छूती है, उसे बदल देती है। मेजी दहन के समय यदि व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, आलस्य और नकारात्मक विचारों को भी मानसिक रूप से उस अग्नि को समर्पित कर दे, तो यह पर्व केवल बाहरी उत्सव नहीं बल्कि भीतर की यात्रा बन जाता है। सूर्य का उत्तरायण होना भी इसी भीतरी यात्रा का संकेत है, यानी अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से गति की ओर।
सबसे सुंदर बात यह है कि माघ बिहू आनंद को पाप नहीं मानता। यह कहता है कि मेहनत के बाद मिला सुख भोगना भी जीवन का धर्म है, बशर्ते वह सुख बांटा जाए। भोगाली बिहू का "भोग" स्वार्थी भोग नहीं है, यह सामूहिक भोग है, जिसमें हर पड़ोसी, हर अतिथि और हर जरूरतमंद का हिस्सा होता है।
माघ बिहू 2027 एक ऐसे दिन आ रहा है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर चुके होंगे, चंद्रमा शुक्ल पक्ष में बढ़ती कलाओं के साथ होंगे और शुक्रवार का दिन भोग और आनंद की ऊर्जा लेकर आएगा। 14 जनवरी की उरुका की रात से लेकर 15 जनवरी की भोर के मेजी दहन तक, यह पर्व मनुष्य को याद दिलाता है कि जीवन का हर अन्न कण धरती, सूर्य और परिश्रम के मिलन से जन्म लेता है।
जो व्यक्ति इस दिन स्नान, सूर्य अर्घ्य, दान और अग्नि पूजन को सच्चे मन से करता है, वह केवल एक परंपरा नहीं निभाता बल्कि उस प्राचीन ज्ञान से जुड़ता है जो कहता है कि प्रकृति के साथ संतुलन ही सच्ची समृद्धि है। मेजी की लौ बुझ जाती है, लेकिन उसकी गर्माहट पूरे वर्ष मन में बनी रहती है। यही माघ बिहू का असली उपहार है।
माघ बिहू 2027 में कब है?
माघ बिहू 2027 शुक्रवार, 15 जनवरी को मनाया जाएगा। इससे एक दिन पहले, 14 जनवरी गुरुवार की रात उरुका मनाया जाएगा।
माघ बिहू को भोगाली बिहू क्यों कहते हैं?
"भोग" का अर्थ है भोजन और आनंद। कटाई के बाद भंडार अनाज से भरे होते हैं, इसलिए यह पर्व सामूहिक भोज, पीठा, लारू और आनंद का उत्सव बन जाता है।
उरुका की रात क्या होता है?
उरुका की रात लोग खेतों में मेजी और भेलाघर बनाते हैं, सामूहिक भोज करते हैं, लोकगीत गाते हैं और रात भर भेलाघर में साथ रहते हैं।
माघ बिहू का ज्योतिषीय महत्व क्या है?
यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर आधारित है। मकर शनि की राशि है, इसलिए इस दिन सूर्य पूजा, तिल दान और शनि मंत्र का जप शुभ माना जाता है।
मेजी दहन कैसे किया जाता है?
भोर में स्नान के बाद सूर्य को जल अर्पित करें, मेजी में अग्नि जलाएं, परिक्रमा करें और पीठा, तिल, सुपारी तथा चावल की आहुति देकर अग्नि देव से प्रार्थना करें।
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