मासिक दुर्गाष्टमी जनवरी 2027 कैसे करें?

By पं. अमिताभ शर्मा

शाकम्भरी नवरात्रि के आरंभ पर शनिवार की अष्टमी और महागौरी उपासना का दुर्लभ संयोग

मासिक दुर्गाष्टमी जनवरी 2027: तिथि, विधि और मंत्र

जब हर महीने शक्ति का द्वार खुलता है

बहुत से लोग मानते हैं कि माता दुर्गा की विशेष उपासना केवल नवरात्रि में होती है। लेकिन सनातन परंपरा में शक्ति की आराधना का अवसर हर महीने आता है। हर मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गाष्टमी मनाई जाती है, जिसे मास दुर्गाष्टमी भी कहा जाता है। यह वह दिन है जब साधक बिना किसी बड़े आयोजन के, सरल व्रत और सच्चे मन से माता का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है।

वर्ष 2027 की पहली मासिक दुर्गाष्टमी शनिवार, 16 जनवरी को पड़ रही है। यह दिन इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसी दिन बनदा अष्टमी है, शाकम्भरी नवरात्रि का आरंभ है और दक्षिण भारत में मट्टू पोंगल भी मनाया जा रहा है।

विवरण जानकारी
पर्व का नाम मासिक दुर्गाष्टमी
तिथि 16 जनवरी 2027
वार शनिवार
हिंदू मास पौष
पक्ष शुक्ल पक्ष
तिथि अष्टमी
सूर्य की स्थिति मकर राशि
दिल्ली में सूर्योदय प्रातः लगभग 7:15 बजे
दिल्ली में सूर्यास्त सायं लगभग 5:45 बजे
अभिजीत मुहूर्त (दिल्ली) दोपहर लगभग 12:10 से 12:50 बजे तक
राहु काल (दिल्ली) प्रातः लगभग 9:50 से 11:10 बजे तक
उसी दिन के अन्य पर्व बनदा अष्टमी, शाकम्भरी नवरात्रि आरंभ, मट्टू पोंगल

अष्टमी तिथि के आरंभ और समाप्ति का समय स्थान के अनुसार बदलता है। व्रत और पूजा उसी दिन की जाती है जब सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि हो। अपने शहर के लिए सटीक समय स्थानीय पंचांग से अवश्य देख लें और राहु काल में पूजा का आरंभ न करें।

एक नज़र में मुख्य अनुष्ठान

  • प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प
  • माता दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने कलश और अखंड दीप
  • लाल चुनरी, सिंदूर, लाल पुष्प और अक्षत से पूजन
  • दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या देवी कवच का पाठ
  • नवार्ण मंत्र या दुर्गा मंत्र का जप
  • संध्या आरती और भोग
  • सामर्थ्य हो तो कन्या पूजन और दान

मासिक दुर्गाष्टमी क्या है?

हिंदू पंचांग में हर महीने दो अष्टमी आती हैं, एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। शुक्ल पक्ष की अष्टमी को माता दुर्गा की उपासना के लिए विशेष माना गया है। इसी कारण इसे मासिक दुर्गाष्टमी कहा जाता है। वर्ष भर में ऐसी 12 अष्टमी आती हैं और अधिक मास वाले वर्ष में 13।

इन सबमें आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि की अष्टमी, जिसे महाअष्टमी कहते हैं, सबसे बड़ी मानी जाती है। लेकिन शास्त्रों की दृष्टि में हर मासिक दुर्गाष्टमी का अपना महत्व है। जो साधक हर महीने इस व्रत को नियम से करता है, उसके लिए यह एक निरंतर साधना बन जाती है। नवरात्रि वर्ष में दो बार आने वाला महोत्सव है, जबकि मासिक दुर्गाष्टमी हर महीने मन को फिर से शक्ति से जोड़ने का अवसर है।

नवरात्रि के नौ दिनों में अष्टमी के दिन माता के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा होती है। महागौरी अत्यंत उज्ज्वल, शांत और करुणामयी रूप हैं। कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया, जिससे उनका शरीर काला पड़ गया। शिव ने प्रसन्न होकर गंगा जल से उन्हें स्नान कराया और उनका रूप गौर वर्ण का हो गया। इसलिए अष्टमी का दिन शुद्धि, तपस्या के फल और जीवन के अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है।

पौष मास की दुर्गाष्टमी क्यों है विशेष?

जनवरी 2027 की दुर्गाष्टमी पौष शुक्ल अष्टमी को है। यही तिथि बनदा अष्टमी के रूप में भी मनाई जाती है और इसी दिन से शाकम्भरी नवरात्रि शुरू होती है, जो पौष पूर्णिमा तक चलती है। देवी शाकम्भरी माता दुर्गा का ही वह रूप हैं जिन्होंने अकाल के समय संसार को अन्न और वनस्पति देकर बचाया।

दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में स्वयं देवी ने भविष्यवाणी की है कि जब धरती पर लंबे समय तक वर्षा नहीं होगी तब वे शताक्षी रूप में प्रकट होंगी और अपने शरीर से उत्पन्न शाक से संसार का पालन करेंगी, जिससे वे शाकम्भरी कहलाएंगी। उसी अध्याय में यह भी कहा गया है कि दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण उनका नाम दुर्गा प्रसिद्ध होगा। इस प्रकार पौष की दुर्गाष्टमी पर दुर्गा और शाकम्भरी, दोनों रूपों की उपासना एक साथ होती है।

इसी दिन तमिलनाडु में मट्टू पोंगल पर गाय और बैलों की पूजा हो रही होगी। एक ओर अन्न देने वाली देवी, दूसरी ओर अन्न उगाने वाले पशु। 16 जनवरी 2027 का पूरा दिन पोषण, कृतज्ञता और शक्ति के भाव से भरा हुआ है।

माता दुर्गा के प्राकट्य की कथा क्या है?

दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र में माता दुर्गा के प्राकट्य की कथा आती है। महिषासुर नाम के असुर ने कठोर तप करके यह वरदान पाया था कि कोई पुरुष उसे मार नहीं सकेगा। इस वरदान के अहंकार में उसने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। सभी देवता ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुंचे।

देवताओं की पीड़ा सुनकर त्रिदेवों को क्रोध आया और उनके मुख से एक दिव्य तेज निकला। फिर सभी देवताओं के शरीर से भी तेज निकला। यह सारा तेज एक स्थान पर मिलकर एक दिव्य नारी के रूप में प्रकट हुआ। शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया, विष्णु ने चक्र, इंद्र ने वज्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति और हिमालय ने उन्हें सिंह वाहन दिया। इसी देवी ने 9 दिनों तक युद्ध करके महिषासुर का वध किया।

यह कथा बताती है कि दुर्गा किसी एक देवता की शक्ति नहीं बल्कि सभी दैवी शक्तियों का सम्मिलित रूप हैं। जब अच्छाई की सारी शक्तियां एक साथ आती हैं तब कोई भी बुराई टिक नहीं पाती। मासिक दुर्गाष्टमी पर माता की पूजा करना अपने भीतर की बिखरी हुई शक्तियों को एक करने का भी प्रतीक है।

दुर्गा सप्तशती की संरचना

दुर्गा सप्तशती मार्कण्डेय पुराण का अंश है और इसमें 700 श्लोक तथा 13 अध्याय हैं। इसे तीन चरित्रों में बांटा गया है।

चरित्र अध्याय अधिष्ठात्री देवी मुख्य कथा
प्रथम चरित्र अध्याय 1 महाकाली मधु और कैटभ का वध
मध्यम चरित्र अध्याय 2 से 4 महालक्ष्मी महिषासुर का वध
उत्तम चरित्र अध्याय 5 से 13 महासरस्वती शुम्भ और निशुम्भ का वध

जिनके पास पूरा पाठ करने का समय न हो, वे केवल मध्यम चरित्र या 11वें अध्याय का पाठ कर सकते हैं। सप्तशती से पहले कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करने की परंपरा है।

मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा विधि

  1. सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प करें।
  3. पूजा स्थान पर लाल वस्त्र बिछाकर माता दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  4. जल से भरा कलश रखें और उस पर आम के पत्ते तथा नारियल रखें।
  5. सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें।
  6. माता को गंगाजल से स्नान कराएं, फिर लाल चुनरी, सिंदूर, कुमकुम, अक्षत और लाल पुष्प अर्पित करें। गुड़हल का फूल माता को विशेष प्रिय माना जाता है।
  7. घी का दीपक और धूप जलाएं।
  8. दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या देवी कवच का पाठ करें।
  9. नीचे दिए गए किसी मंत्र का 108 बार जप करें।
  10. माता को खीर, हलवा, चना, फल या नारियल का भोग लगाएं।
  11. संध्या के समय आरती करें और प्रसाद बांटें।

व्रत के नियम

  • व्रत निर्जल, फलाहार या एक समय सात्विक भोजन के रूप में अपनी क्षमता के अनुसार रखें
  • अन्न, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से दूर रहें
  • दिन भर मन में माता का स्मरण करें और क्रोध से बचें
  • व्रत का पारण संध्या पूजा के बाद या अगले दिन सूर्योदय के बाद पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें
  • स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो तो कठोर उपवास के स्थान पर फलाहार करें

कन्या पूजन

मासिक दुर्गाष्टमी पर कन्या पूजन अनिवार्य नहीं है, लेकिन सामर्थ्य हो तो यह बहुत शुभ माना जाता है। 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को माता का स्वरूप मानकर घर बुलाया जाता है। उनके पैर धोकर, तिलक लगाकर, भोजन कराकर और उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। यह परंपरा सिखाती है कि शक्ति की पूजा मंदिर तक सीमित नहीं है बल्कि हर स्त्री और हर कन्या के सम्मान में ही उसका सच्चा रूप है।

दुर्गाष्टमी के प्रमुख मंत्र

मंत्र उद्देश्य जप संख्या
ॐ दुं दुर्गायै नमः रक्षा, साहस और बाधा निवारण 108 बार
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नवार्ण मंत्र, सर्वांगीण कल्याण 108 बार
ॐ देवी महागौर्यै नमः शुद्धि, शांति और सौभाग्य 108 बार
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते सभी कार्यों में मंगल 11 बार

नवार्ण मंत्र को दुर्गा उपासना का मूल मंत्र माना जाता है। इसमें "ऐं" महासरस्वती का, "ह्रीं" महालक्ष्मी का और "क्लीं" महाकाली का बीज है। इस प्रकार यह एक मंत्र तीनों महाशक्तियों की उपासना है।

मासिक दुर्गाष्टमी का ज्योतिषीय महत्व

शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर चंद्रमा आधे प्रकाशित होते हैं। यह वह बिंदु है जहां प्रकाश अंधकार पर विजय पाने लगता है और आगे पूर्णिमा तक बढ़ता ही जाता है। ज्योतिष में चंद्रमा मन के कारक हैं। इसलिए इस तिथि पर की गई साधना मन को स्थिर करने, भय दूर करने और आत्मबल बढ़ाने में सहायक मानी जाती है।

जनवरी 2027 में यह अष्टमी शनिवार को है और सूर्य मकर राशि में हैं, जो शनि की राशि है। कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में नवदुर्गा के नौ रूपों को नौ ग्रहों से जोड़ा जाता है, जिसमें माता कालरात्रि को शनि से संबंधित माना गया है। शनि के कठोर प्रभाव, साढ़ेसाती या ढैया से गुजर रहे लोगों के लिए इस दिन माता दुर्गा और विशेष रूप से कालरात्रि स्वरूप की उपासना शांति देने वाली मानी जा सकती है।

नवदुर्गा स्वरूप संबंधित ग्रह (परंपरागत मान्यता)
शैलपुत्री चंद्रमा
ब्रह्मचारिणी मंगल
चंद्रघंटा शुक्र
कूष्माण्डा सूर्य
स्कंदमाता बुध
कात्यायनी बृहस्पति
कालरात्रि शनि
महागौरी राहु
सिद्धिदात्री केतु

इस तालिका के अनुसार अष्टमी तिथि की अधिष्ठात्री महागौरी को राहु से जोड़ा जाता है। जिनकी कुंडली में राहु के कारण भ्रम, अचानक बाधाएं या मानसिक अशांति हो, उनके लिए अष्टमी पर महागौरी की उपासना विशेष उपयोगी मानी जाती है। ज्योतिष की परंपरा में राहु और केतु के दोषों की शांति के लिए दुर्गा उपासना को सबसे प्रभावी उपायों में गिना गया है।

मासिक दुर्गाष्टमी व्रत के लाभ

  • शत्रु, भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा
  • मन में साहस, धैर्य और आत्मविश्वास का विकास
  • परिवार में सुख, शांति और सौभाग्य
  • राहु, केतु और शनि से जुड़े कष्टों में राहत
  • रुके हुए कार्यों में गति
  • नियमित साधना से आध्यात्मिक अनुशासन

इस व्रत का सबसे बड़ा लाभ उसकी नियमितता में है। वर्ष में एक बार की गई बड़ी पूजा का अपना महत्व है, लेकिन हर महीने एक निश्चित दिन माता के सामने बैठना मन में एक ऐसी स्थिरता लाता है जो धीरे धीरे पूरे जीवन को बदल देती है। जैसे बूंद बूंद से घड़ा भरता है, वैसे ही हर मासिक दुर्गाष्टमी साधक के भीतर शक्ति का भंडार भरती है।

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
सूर्योदय से पहले स्नान करके संकल्प लें राहु काल में पूजा का आरंभ न करें
माता को लाल पुष्प और चुनरी अर्पित करें तामसिक भोजन और नशे का सेवन न करें
सप्तशती या चालीसा का पाठ करें किसी स्त्री या कन्या का अपमान न करें
कन्याओं और जरूरतमंदों को भोजन कराएं क्रोध, झूठ और कटु वचन से बचें
शनिवार होने के कारण अन्न और काले तिल का दान करें दीपक को पूजा के बीच बुझने न दें

जब भीतर की शक्ति जागती है

माता दुर्गा केवल बाहर के असुरों का नाश नहीं करतीं। वे भीतर के भय, आलस्य, संदेह और निराशा जैसे असुरों का भी अंत करती हैं। मासिक दुर्गाष्टमी हर महीने यह याद दिलाने आती है कि शक्ति कहीं बाहर नहीं, साधक के भीतर ही सोई हुई है, जिसे केवल श्रद्धा और नियम से जगाना है। 16 जनवरी 2027 को, जब शाकम्भरी नवरात्रि का आरंभ होगा और शनिवार का दिन शनि की स्थिरता लेकर आएगा तब सच्चे मन से किया गया एक दीपक, एक पाठ और एक प्रार्थना पूरे वर्ष के लिए माता के आशीर्वाद का द्वार खोल सकती है।

FAQ

मासिक दुर्गाष्टमी जनवरी 2027 कब है?

जनवरी 2027 की मासिक दुर्गाष्टमी शनिवार, 16 जनवरी को पौष शुक्ल अष्टमी पर है।

मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत कैसे रखें?

प्रातः स्नान के बाद संकल्प लें, माता दुर्गा का पूजन करें, सप्तशती या चालीसा पढ़ें और फलाहार या एक समय सात्विक भोजन के साथ व्रत रखें।

दुर्गाष्टमी पर कौन सा मंत्र जपें?

"ॐ दुं दुर्गायै नमः" या नवार्ण मंत्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" का 108 बार जप शुभ माना जाता है।

अष्टमी पर माता के किस रूप की पूजा होती है?

अष्टमी पर माता के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा होती है, जो शुद्धि, शांति और करुणा का प्रतीक हैं।

शनिवार की दुर्गाष्टमी का क्या महत्व है?

शनिवार को दुर्गा उपासना शनि के कष्टों में राहत देने वाली मानी जाती है। इस दिन अन्न और काले तिल का दान विशेष शुभ है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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