By पं. नरेंद्र शर्मा
कृत्तिका नक्षत्र, भगवान मुरुगन की कृपा और सोमवार के चंद्र संयोग का दिव्य प्रकाश

तमिल घरों में महीने का एक दिन ऐसा आता है जब सूर्यास्त होते ही आंगन, दहलीज, खिड़कियां और पूजा स्थान मिट्टी के छोटे छोटे दीपों से जगमगा उठते हैं। हवा में घी की सुगंध होती है, घर के बच्चे दीपों की कतारें सजाते हैं और मंदिरों से भगवान मुरुगन के भजनों की ध्वनि आती है। यह दिन मासिक कार्तिगई है। यह वह संध्या है जब चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में होते हैं और भक्त भगवान कार्तिकेय तथा भगवान शिव के दिव्य प्रकाश का स्मरण करते हुए दीप जलाते हैं।
वर्ष 2027 में जनवरी की मासिक कार्तिगई सोमवार, 18 जनवरी को मनाई जाएगी। यह तमिल थाई मास की कार्तिगई है और सौर पंचांग के अनुसार निर्धारित होती है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | मासिक कार्तिगई |
| तिथि | 18 जनवरी 2027 |
| वार | सोमवार |
| तमिल मास | थाई |
| पंचांग का आधार | सौर पंचांग और कृत्तिका नक्षत्र |
| नक्षत्र | कृत्तिका |
| चंद्र मास और पक्ष | पौष मास, शुक्ल पक्ष |
| चंद्र तिथि | शुक्ल दशमी के आसपास |
| सूर्य की स्थिति | मकर राशि |
| चेन्नई में सूर्योदय | प्रातः लगभग 6:35 बजे |
| चेन्नई में सूर्यास्त | सायं लगभग 6:05 बजे |
| दीप प्रज्वलन का श्रेष्ठ समय | सूर्यास्त के बाद, प्रदोष काल में |
| राहु काल (चेन्नई) | प्रातः लगभग 8:00 से 9:25 बजे तक |
| आराध्य देव | भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) और भगवान शिव |
मासिक कार्तिगई का निर्धारण कृत्तिका नक्षत्र के आधार पर होता है। जिस दिन संध्या के समय कृत्तिका नक्षत्र प्रबल होता है, उसी दिन दीप जलाए जाते हैं। नक्षत्र के आरंभ और समाप्ति का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है, इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग से सटीक समय अवश्य देख लें।
हर महीने चंद्रमा लगभग एक बार कृत्तिका नक्षत्र से होकर गुजरते हैं। जिस दिन चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में होते हैं, उस दिन को तमिल परंपरा में कार्तिगई कहा जाता है। इस प्रकार वर्ष में 12 या 13 बार मासिक कार्तिगई आती है। यह भगवान मुरुगन की उपासना का सबसे प्रिय दिन माना जाता है, क्योंकि उनका पालन पोषण कृत्तिका नक्षत्र की छह देवियों ने किया था।
इन सबमें सबसे बड़ा उत्सव तमिल कार्तिगई मास में आने वाला कार्तिगई दीपम है, जो नवंबर या दिसंबर में मनाया जाता है। उस दिन तिरुवन्नामलै में अरुणाचल पर्वत के शिखर पर महादीपम प्रज्वलित किया जाता है, जिसे दूर दूर तक देखा जा सकता है। मासिक कार्तिगई उसी महान पर्व का हर महीने आने वाला छोटा रूप है। जो भक्त वर्ष भर हर कार्तिगई पर दीप जलाता है, वह मानो हर महीने अपने घर में उसी दिव्य ज्योति का एक अंश आमंत्रित करता है।
थाई मास तमिल परंपरा में भगवान मुरुगन से विशेष रूप से जुड़ा है। इसी मास में आगे थाईपूसम का पर्व भी आता है, जब भक्त कावड़ी लेकर मुरुगन मंदिरों की यात्रा करते हैं। इसलिए थाई मास की कार्तिगई का महत्व और भी बढ़ जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार सूरपद्मन नाम के एक असुर ने कठोर तप करके यह वरदान प्राप्त किया था कि उसे केवल भगवान शिव का पुत्र ही मार सकेगा। उस समय भगवान शिव गहरे ध्यान में लीन थे और देवताओं को लगा कि शिव का पुत्र कभी जन्म नहीं लेगा। सूरपद्मन ने इसी का लाभ उठाकर तीनों लोकों में आतंक फैला दिया।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से छह दिव्य चिंगारियां प्रकट कीं। इन चिंगारियों का तेज इतना प्रचंड था कि अग्नि देव और वायु देव ने उन्हें ले जाकर शरवण नामक सरोवर में रख दिया। वहां ये छह चिंगारियां छह सुंदर बालकों के रूप में कमल के फूलों पर प्रकट हुईं।
इन छह बालकों का पालन पोषण छह कृत्तिका देवियों ने किया। ये कृत्तिकाएं आकाश के कृत्तिका नक्षत्र की छह तारिकाएं हैं। बाद में माता पार्वती ने इन छहों बालकों को प्रेम से गले लगाया और वे छह मुखों वाले एक बालक में बदल गए। इसी कारण वे षण्मुख कहलाए, यानी छह मुखों वाले। कृत्तिकाओं द्वारा पाले जाने के कारण उनका नाम कार्तिकेय पड़ा और शरवण सरोवर में प्रकट होने के कारण वे शरवणभव कहलाए।
बड़े होकर कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बने। माता पार्वती ने उन्हें एक दिव्य भाला दिया, जिसे वेल कहा जाता है। इसी वेल से उन्होंने सूरपद्मन का वध किया। कथा के अनुसार सूरपद्मन के दो भाग हुए, जिनमें से एक मोर बना और दूसरा मुर्गा। मोर उनका वाहन बना और मुर्गा उनके ध्वज का चिह्न।
कार्तिकेय और कृत्तिका का संबंध केवल नाम का नहीं है। यह माता और पुत्र जैसा स्नेह का संबंध है। इसीलिए जिस दिन चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में होते हैं, उस दिन भगवान मुरुगन की उपासना करना ऐसा माना जाता है जैसे उनकी पालक माताओं के घर में उनका स्मरण किया जा रहा हो। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की गई प्रार्थना मुरुगन तक सबसे शीघ्र पहुंचती है।
कार्तिगई पर दीप जलाने की परंपरा भगवान शिव की एक कथा से भी जुड़ी है। एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच इस बात पर विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। तभी उनके बीच एक अनंत अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ। ब्रह्मा हंस बनकर उसका शिखर खोजने ऊपर गए और विष्णु वराह बनकर उसका मूल खोजने नीचे गए। दोनों ही उसका अंत नहीं पा सके। तब भगवान शिव उस अग्नि स्तंभ से प्रकट हुए और दोनों ने उनकी अनंतता को स्वीकार किया। माना जाता है कि यही अग्नि स्तंभ तिरुवन्नामलै का अरुणाचल पर्वत है।
कार्तिगई के दीप उसी अनंत ज्योति के प्रतीक हैं। एक छोटा सा मिट्टी का दीप यह याद दिलाता है कि ईश्वर का प्रकाश इतना विशाल है कि उसे कोई माप नहीं सकता, फिर भी वह इतना सरल है कि एक बाती और थोड़े से घी में उतर आता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से दीप का अर्थ और भी गहरा है।
जब इस दिन पूरे घर में दीप जलाए जाते हैं, तो यह केवल अंधेरा दूर करने का काम नहीं है। यह अपने भीतर के हर कोने में ज्ञान का प्रकाश फैलाने का संकल्प है।
| सामग्री या प्रसाद | उपयोग और अर्थ |
|---|---|
| मिट्टी के दीप | घर को प्रकाशित करने के लिए, अनंत ज्योति का प्रतीक |
| घी या तिल का तेल | दीप जलाने के लिए |
| लाल पुष्प और चंदन | भगवान मुरुगन के पूजन के लिए |
| पंचामृत | अभिषेक के लिए |
| पोरी उरुंडै | मुरमुरे और गुड़ के लड्डू, कार्तिगई का पारंपरिक प्रसाद |
| अप्पम | चावल और गुड़ से बनी मिठाई |
| अडै | दाल और चावल से बना व्यंजन |
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ शरवणभवाय नमः | भगवान मुरुगन की कृपा, साहस और विजय | 108 बार |
| ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि, तन्नो स्कन्दः प्रचोदयात् | स्कंद गायत्री, बुद्धि और शक्ति | 108 बार |
| ॐ नमः शिवाय | भगवान शिव का आशीर्वाद और मन की शांति | 108 बार |
"शरवणभव" छह अक्षरों का मंत्र है, जिसे षडक्षर मंत्र कहा जाता है। ये छह अक्षर भगवान मुरुगन के छह मुखों और छह दिशाओं का प्रतीक माने जाते हैं। तमिल परंपरा में इस मंत्र को अत्यंत शक्तिशाली माना गया है।
वैदिक ज्योतिष में कृत्तिका नक्षत्र के स्वामी सूर्य हैं और इसके अधिष्ठाता देवता अग्नि हैं। इसलिए यह नक्षत्र तेज, शुद्धि और प्रकाश से जुड़ा है। इस नक्षत्र का प्रतीक उस्तरा या धारदार अस्त्र है, जो अज्ञान और भ्रम को काटने का संकेत देता है। जिस नक्षत्र के देवता अग्नि हों, उस दिन दीप जलाना अपने आप में एक ज्योतिषीय उपाय बन जाता है।
कृत्तिका नक्षत्र का पहला चरण मेष राशि में और बाकी तीन चरण वृषभ राशि में आते हैं। वृषभ राशि में 3 अंश पर चंद्रमा उच्च के होते हैं और यह बिंदु कृत्तिका नक्षत्र के भीतर ही आता है। इसका अर्थ है कि कृत्तिका में चंद्रमा अपनी सबसे बलवान स्थिति के निकट होते हैं। ज्योतिष में चंद्रमा मन के कारक हैं, इसलिए इस दिन की गई साधना मन को स्थिर और प्रसन्न रखने में सहायक मानी जाती है।
जनवरी 2027 में मासिक कार्तिगई सोमवार को पड़ रही है। सोमवार चंद्रमा का दिन है और भगवान शिव का भी प्रिय दिन है। चंद्रमा का अपने ही दिन, अपनी उच्च स्थिति के निकट होना और शिव पुत्र मुरुगन की उपासना, ये सब मिलकर इस कार्तिगई को विशेष बनाते हैं। इसी समय सूर्य मकर राशि में हैं, जहां परंपरा के अनुसार उत्तरायण चल रहा है।
ज्योतिष में भगवान कार्तिकेय को मंगल ग्रह का अधिष्ठाता माना जाता है। दोनों का संबंध साहस, युद्ध, ऊर्जा, भूमि और भाई से है। इसलिए जिनकी कुंडली में मंगल दोष हो, विवाह में देरी हो, भूमि संबंधी विवाद हों, क्रोध अधिक हो या रक्त से जुड़ी परेशानियां हों, उनके लिए मुरुगन उपासना को श्रेष्ठ उपाय माना गया है।
| समस्या | मासिक कार्तिगई पर उपाय |
|---|---|
| मंगल दोष | मुरुगन को लाल पुष्प अर्पित करें और षडक्षर मंत्र का जप करें |
| अधिक क्रोध | दीप के सामने बैठकर 108 बार "ॐ शरवणभवाय नमः" जपें |
| भूमि विवाद | मुरुगन मंदिर में दीप दान करें |
| मानसिक अशांति | सोमवार होने के कारण शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं |
| सूर्य की कमजोरी | प्रातः सूर्य को अर्घ्य दें, क्योंकि कृत्तिका के स्वामी सूर्य हैं |
तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के छह प्रमुख मंदिर हैं, जिन्हें आरुपडै वीडु कहा जाता है। कार्तिगई के दिन इन मंदिरों में विशेष पूजा होती है और भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
| धाम | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| तिरुप्परंकुंड्रम | मदुरै के पास | देवसेना से विवाह का स्थान |
| तिरुच्चेंदूर | समुद्र तट पर | सूरपद्मन पर विजय का स्थान |
| पलनी | डिंडीगुल जिला | दंडायुधपाणि रूप, वैराग्य का प्रतीक |
| स्वामीमलै | कुंभकोणम के पास | पिता शिव को प्रणव मंत्र का अर्थ बताया |
| तिरुत्तणी | तिरुवल्लूर जिला | वल्ली से विवाह के बाद शांत रूप |
| पलमुदिरचोलै | मदुरै के पास | वन में स्थित, अव्वैयार की कथा से जुड़ा |
जो भक्त इन धामों तक न जा सकें, वे घर पर ही सच्चे मन से दीप जलाकर वही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि भगवान भाव के भूखे होते हैं, स्थान के नहीं।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| सूर्यास्त के बाद ही दीप जलाएं | टूटे या गंदे दीप का उपयोग न करें |
| घर के हर कोने में प्रकाश करें | दीप जलाकर उन्हें अनदेखा न छोड़ें |
| शुद्ध घी या तिल के तेल का उपयोग करें | इस दिन मांस, मदिरा और तामसिक भोजन न लें |
| षडक्षर मंत्र का जप करें | क्रोध और विवाद से दूर रहें |
| मुरुगन मंदिर में दीप दान करें | बिना पूजा के व्रत का पारण न करें |
मासिक कार्तिगई की संध्या एक सरल सत्य सिखाती है। एक दीप से हजार दीप जलाए जा सकते हैं और फिर भी पहले दीप का प्रकाश कम नहीं होता। भगवान मुरुगन का प्रकाश भी ऐसा ही है, जो हर भक्त के भीतर उतरकर भी कभी कम नहीं होता। 18 जनवरी 2027 को, सोमवार की संध्या, जब चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में अपनी उच्च स्थिति के निकट होंगे तब घर के आंगन में जलाया गया हर दीप भक्त के जीवन से भय, भ्रम और अंधकार को दूर करने का संकल्प बन सकता है। जहां दीप जलता है, वहां षण्मुख की कृपा स्वयं चलकर आती है।
मासिक कार्तिगई जनवरी 2027 कब है?
जनवरी 2027 की मासिक कार्तिगई सोमवार, 18 जनवरी को है, जब चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में होंगे।
मासिक कार्तिगई पर किसकी पूजा होती है?
इस दिन भगवान मुरुगन यानी कार्तिकेय और भगवान शिव की पूजा होती है। संध्या के समय घर में दीपों की कतारें जलाई जाती हैं।
कार्तिगई पर दीप क्यों जलाते हैं?
दीप भगवान शिव के अनंत अग्नि स्तंभ का प्रतीक हैं। कृत्तिका नक्षत्र के देवता अग्नि हैं, इसलिए इस दिन दीप जलाना शुभ माना जाता है।
कार्तिगई पर कौन सा मंत्र जपें?
"ॐ शरवणभवाय नमः" षडक्षर मंत्र का 108 बार जप सबसे शुभ माना जाता है। स्कंद गायत्री का जप भी किया जा सकता है।
मंगल दोष में कार्तिगई व्रत कैसे मदद करता है?
भगवान कार्तिकेय को मंगल का अधिष्ठाता माना जाता है। कार्तिगई पर उनकी पूजा, लाल पुष्प और षडक्षर जप मंगल दोष की शांति में सहायक माने जाते हैं।
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