By पं. संजीव शर्मा
अन्नदात्री माता की जयंती, पौष पूर्णिमा स्नान और पुष्य नक्षत्र में पूर्ण चंद्रमा का योग

पौष मास की पूर्णिमा की रात जब ठंडी हवा में पूरा चंद्रमा अपनी चांदनी बिखेरता है तब उत्तर से दक्षिण तक भारत के अनेक मंदिरों में एक विशेष उत्सव का समापन होता है। यह उत्सव है शाकम्भरी नवरात्रि, जो पौष शुक्ल अष्टमी से आरंभ होकर पौष पूर्णिमा पर पूर्ण होती है। इसी पूर्णिमा को माता शाकम्भरी के प्राकट्य का दिन माना जाता है, इसलिए इसे शाकम्भरी पूर्णिमा या शाकम्भरी जयंती कहा जाता है।
वर्ष 2027 में शाकम्भरी पूर्णिमा शुक्रवार, 22 जनवरी को मनाई जाएगी। यह दिन केवल देवी उपासना का ही नहीं बल्कि पौष पूर्णिमा के पवित्र स्नान, दान और प्रयाग में माघ मास के कल्पवास के आरंभ का भी दिन है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | शाकम्भरी पूर्णिमा, शाकम्भरी जयंती |
| तिथि | 22 जनवरी 2027 |
| वार | शुक्रवार |
| हिंदू मास | पौष |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | पूर्णिमा |
| शाकम्भरी नवरात्रि | 16 जनवरी से 22 जनवरी 2027 तक |
| चंद्रमा की स्थिति | कर्क राशि, पुष्य नक्षत्र |
| सूर्य की स्थिति | मकर राशि |
| दिल्ली में सूर्योदय | प्रातः लगभग 7:14 बजे |
| दिल्ली में सूर्यास्त | सायं लगभग 5:53 बजे |
| राहु काल (दिल्ली) | प्रातः लगभग 11:10 से दोपहर 12:30 बजे तक |
| आराध्य देवी | माता शाकम्भरी, बनशंकरी स्वरूप |
| उसी दिन के अन्य पर्व | पौष पूर्णिमा, थाईपूसम |
22 जनवरी को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि रहेगी, इसलिए स्नान, दान और देवी पूजा इसी दिन की जाएगी। पूर्णिमा तिथि इस दिन संध्या के आसपास समाप्त हो सकती है। जो भक्त पूर्णिमा का व्रत रखकर रात में चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं, वे अपने स्थानीय पंचांग में व्रत का दिन अवश्य देख लें, क्योंकि कुछ स्थानों पर पूर्णिमा व्रत एक दिन पहले, 21 जनवरी को पड़ सकता है।
शाकम्भरी पूर्णिमा माता दुर्गा के उस करुणामय रूप को समर्पित है जिसने भयंकर अकाल के समय संसार को अन्न और वनस्पति देकर जीवन दिया। "शाक" का अर्थ है साग, सब्जी और वनस्पति और "अम्भरी" का अर्थ है धारण या पोषण करने वाली। इस प्रकार शाकम्भरी का अर्थ है वनस्पतियों से संसार का पोषण करने वाली माता।
पौष शुक्ल अष्टमी से शुरू होने वाली शाकम्भरी नवरात्रि इसी पूर्णिमा पर पूर्ण होती है। जनवरी 2027 में यह नवरात्रि 16 जनवरी को बनदा अष्टमी के साथ आरंभ हुई थी। यह नवरात्रि शारदीय और चैत्र नवरात्रि की तरह ठीक 9 दिनों की नहीं होती। अष्टमी से पूर्णिमा तक की अवधि के कारण यह प्रायः 8 दिनों की होती है और तिथियों के घटने बढ़ने से कभी कुछ कम या अधिक भी हो सकती है।
दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक में माता को बनशंकरी के रूप में पूजा जाता है। बादामी के पास स्थित बनशंकरी मंदिर में इन दिनों बड़ी जात्रा लगती है और दूर दूर से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। उत्तर भारत में यही देवी शाकम्भरी के नाम से पूजी जाती हैं।
देवी भागवत पुराण और दुर्गा सप्तशती में माता शाकम्भरी की कथा मिलती है। दुर्गम नाम के असुर ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से चारों वेद प्राप्त कर लिए। वेदों के लुप्त होने से यज्ञ, पूजा और धर्म के सभी कार्य रुक गए। देवताओं को आहुति मिलनी बंद हो गई और धरती पर वर्षा रुक गई। कई वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा, नदियां और तालाब सूख गए और जीव भूख से तड़पने लगे।
तब ऋषियों ने हिमालय पर जाकर देवी की स्तुति की। देवी प्रकट हुईं और अपनी संतानों की पीड़ा देखकर उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने सैकड़ों नेत्रों से लगातार 9 दिनों तक आंसू बहाए, जिससे धरती पर फिर से वर्षा हुई और नदियां भर गईं। इसीलिए वे शताक्षी कहलाईं। इसके बाद देवी ने अपने शरीर से साग, फल, कंद मूल और अनाज उत्पन्न करके भूखे संसार का पेट भरा। इसी रूप में वे शाकम्भरी कहलाईं।
अंत में देवी ने दुर्गम असुर से युद्ध करके उसका वध किया और वेद वापस लौटाए। दुर्गम का वध करने के कारण उनका नाम दुर्गा भी प्रसिद्ध हुआ। दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में देवी स्वयं इस अवतार की भविष्यवाणी करती हैं।
| देवी का रूप | कार्य | अर्थ |
|---|---|---|
| शताक्षी | सैकड़ों नेत्रों से आंसू बहाकर वर्षा लाना | करुणा, जो दूसरों का दुख देखकर पिघल जाती है |
| शाकम्भरी | वनस्पतियों से संसार का पोषण | पालन और पोषण की शक्ति |
| दुर्गा | दुर्गम असुर का वध | अधर्म और अज्ञान का नाश |
यह कथा माता के तीन गुणों को एक साथ दिखाती है। पहले करुणा, फिर पोषण और अंत में रक्षा। यही क्रम हर माता के जीवन में भी दिखाई देता है। वह पहले बच्चे का दुख समझती है, फिर उसका पालन करती है और आवश्यकता पड़ने पर उसकी रक्षा के लिए सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है।
| धाम | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| शाकम्भरी देवी मंदिर | सहारनपुर, उत्तर प्रदेश | शिवालिक पहाड़ियों में स्थित प्राचीन शक्तिपीठ परंपरा का स्थान |
| शाकम्भरी माता मंदिर | सांभर, राजस्थान | सांभर झील के पास, कहा जाता है कि सांभर नाम शाकम्भरी से ही बना |
| शाकम्भरी माता मंदिर | सकराय, सीकर, राजस्थान | अरावली की पहाड़ियों में स्थित प्राचीन मंदिर |
| बनशंकरी मंदिर | बादामी, कर्नाटक | चालुक्य राजवंश की कुलदेवी, पौष में बड़ी जात्रा |
राजस्थान के चौहान राजवंश में शाकम्भरी माता को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा है। इन सभी धामों में शाकम्भरी पूर्णिमा पर विशेष पूजा, मेला और भंडारे का आयोजन होता है।
शाकम्भरी पूर्णिमा के दिन ही पौष पूर्णिमा भी है, जो अपने आप में अत्यंत पवित्र तिथि है। शास्त्रों में पौष पूर्णिमा पर गंगा, यमुना और संगम में स्नान को विशेष पुण्यदायी बताया गया है।
परंपरा के अनुसार प्रयागराज में त्रिवेणी संगम के तट पर पौष पूर्णिमा से माघ मास का कल्पवास आरंभ होता है, जो माघ पूर्णिमा तक चलता है। कल्पवासी पूरे एक महीने संगम के तट पर रहकर प्रतिदिन स्नान, जप, सत्संग और एक समय सात्विक भोजन करते हैं। मान्यता है कि कल्पवास का पुण्य कई जन्मों के पापों को धो देता है।
जो लोग प्रयाग या गंगा तट नहीं जा सकते, वे घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल और थोड़े तिल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान के समय पवित्र नदियों का स्मरण करना भी उतना ही फलदायी माना गया है।
2027 में यह पूर्णिमा शुक्रवार को है। शुक्रवार माता लक्ष्मी का दिन है और पूर्णिमा पर लक्ष्मी पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है। संध्या के समय घी का दीपक जलाकर माता लक्ष्मी की आरती करें और खीर का भोग लगाएं। कई परिवार पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण की कथा भी करते हैं। अन्न की देवी शाकम्भरी और धन की देवी लक्ष्मी, दोनों की उपासना एक ही दिन होना घर में अन्न और धन, दोनों की समृद्धि का शुभ संकेत माना जाता है।
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ शाकम्भरी देव्यै नमः | अन्न, स्वास्थ्य और समृद्धि | 108 बार |
| ॐ दुं दुर्गायै नमः | रक्षा और बाधा निवारण | 108 बार |
| ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः | धन और सौभाग्य | 108 बार |
| ॐ सों सोमाय नमः | चंद्रमा की कृपा और मन की शांति | 108 बार |
पौष मास का नाम ही पुष्य नक्षत्र से बना है, क्योंकि इस मास की पूर्णिमा पर चंद्रमा प्रायः पुष्य नक्षत्र में होते हैं। 2027 में भी शाकम्भरी पूर्णिमा पर चंद्रमा कर्क राशि में पुष्य नक्षत्र में होंगे। वैदिक ज्योतिष में पुष्य को सबसे शुभ नक्षत्रों में गिना जाता है। "पुष्य" का अर्थ ही है पोषण करने वाला। इसके देवता बृहस्पति हैं और इसका प्रतीक गाय का थन माना गया है, जो पोषण और दूध का प्रतीक है।
यह संयोग अत्यंत अर्थपूर्ण है। जिस देवी का पूरा स्वरूप संसार के पोषण से जुड़ा है, उनकी जयंती पोषण के नक्षत्र पुष्य में पड़ रही है। इसके साथ ही कर्क चंद्रमा की अपनी राशि है। पूर्णिमा पर पूर्ण बलवान चंद्रमा अपनी ही राशि में, पोषण के नक्षत्र में होंगे। ज्योतिष में चंद्रमा माता, मन, जल और पोषण के कारक हैं। माता शाकम्भरी की उपासना के लिए इससे सुंदर ग्रह स्थिति शायद ही हो।
इस दिन सूर्य मकर राशि में और चंद्रमा ठीक सामने कर्क राशि में होंगे। मकर शनि की राशि है और पुष्य नक्षत्र के स्वामी भी शनि माने जाते हैं। शनि अन्न, कृषि, श्रम और गरीबों के कारक हैं। इसलिए इस दिन अन्न दान करना शनि को भी प्रसन्न करने वाला माना जाता है।
दिन शुक्रवार है। शुक्र सौंदर्य, समृद्धि, सुख और लक्ष्मी कृपा के कारक हैं। पूर्ण चंद्रमा और शुक्र का दिन, दोनों मिलकर इस पूर्णिमा को घर की सुख समृद्धि के लिए विशेष बनाते हैं।
| ज्योतिषीय तत्व | स्थिति | संकेत |
|---|---|---|
| चंद्रमा | कर्क राशि, स्वराशि, पूर्ण | मन की शांति, मातृ कृपा |
| नक्षत्र | पुष्य | पोषण, शुभता और वृद्धि |
| सूर्य | मकर राशि | तप, कर्म और उत्तरायण |
| वार | शुक्रवार | लक्ष्मी कृपा और समृद्धि |
| तिथि | पूर्णिमा | पूर्णता और सिद्धि |
| स्थिति | शाकम्भरी पूर्णिमा पर उपाय |
|---|---|
| चंद्रमा कमजोर हो | रात में चंद्रमा को दूध मिला जल अर्पित करें और चावल का दान करें |
| शनि की साढ़ेसाती या ढैया | गरीबों को अन्न और कंबल दान करें |
| आर्थिक तंगी | माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं और श्री सूक्त का पाठ करें |
| स्वास्थ्य की समस्या | माता शाकम्भरी को हरी सब्जियां अर्पित करके उन्हें प्रसाद रूप में ग्रहण करें |
| मानसिक अशांति | पूर्ण चंद्रमा के सामने बैठकर "ॐ सों सोमाय नमः" का जप करें |
आज दुनिया भर में भोजन की बर्बादी और भूख, दोनों एक साथ दिखाई देती हैं। एक ओर थालियों में बचा भोजन फेंक दिया जाता है, दूसरी ओर लाखों लोग भूखे सोते हैं। माता शाकम्भरी की कथा इस विरोधाभास पर गहरा प्रश्न उठाती है। जिस देवी ने भूखे संसार को देखकर आंसू बहाए, उनकी सच्ची पूजा तभी होगी जब उनके भक्त भी किसी भूखे को देखकर द्रवित हों।
माता शाकम्भरी प्रकृति की देवी भी हैं। हर पेड़, हर खेत और हर हरी पत्ती उनका ही रूप है। इसलिए इस दिन एक पौधा लगाना, पानी बचाने का संकल्प लेना और भोजन की बर्बादी रोकना भी माता की उतनी ही बड़ी पूजा है जितना मंदिर में दीप जलाना।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें | सूर्योदय के बाद देर तक न सोएं |
| माता को ताजी सब्जियां और फल अर्पित करें | बासी या खराब वस्तुएं अर्पित न करें |
| अन्न, सब्जी और कंबल का दान करें | भोजन की बर्बादी न करें |
| रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य दें | राहु काल में पूजा का आरंभ न करें |
| एक पौधा लगाएं | हरे पेड़ों को अनावश्यक न काटें |
| सात्विक भोजन करें | मांस, मदिरा और तामसिक भोजन न लें |
शाकम्भरी पूर्णिमा याद दिलाती है कि ईश्वर का सबसे सुंदर रूप करुणा है। जिस माता ने संसार की भूख देखकर अपने आंसुओं से वर्षा कर दी और अपने शरीर से अन्न उगा दिया, वही माता आज भी हर खेत की हरियाली और हर थाली के अन्न में उपस्थित हैं। 22 जनवरी 2027 को, शुक्रवार के दिन, जब पूर्ण चंद्रमा अपनी ही राशि में पोषण के नक्षत्र पुष्य को प्रकाशित करेंगे तब माता के चरणों में अर्पित सब्जियों की एक टोकरी, किसी भूखे को दिया गया भोजन और संगम में लगाई गई एक डुबकी, जीवन को पोषण, शांति और समृद्धि से भर सकती है। जिस घर में अन्न का सम्मान होता है, वहां माता शाकम्भरी का भंडार कभी खाली नहीं होता।
शाकम्भरी पूर्णिमा 2027 कब है?
शाकम्भरी पूर्णिमा 2027 शुक्रवार, 22 जनवरी को पौष पूर्णिमा पर मनाई जाएगी। इसी दिन शाकम्भरी नवरात्रि पूर्ण होगी।
शाकम्भरी नवरात्रि 2027 कब से कब तक है?
शाकम्भरी नवरात्रि 16 जनवरी 2027 को बनदा अष्टमी से शुरू होकर 22 जनवरी को शाकम्भरी पूर्णिमा पर पूर्ण होगी।
शाकम्भरी पूर्णिमा पर क्या भोग लगाएं?
माता शाकम्भरी को ताजी हरी सब्जियां, पत्तेदार साग, मौसमी फल, कंद मूल और सब्जियों से बने व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
पौष पूर्णिमा पर कल्पवास क्यों शुरू होता है?
परंपरा के अनुसार पौष पूर्णिमा से प्रयागराज के संगम तट पर माघ मास का कल्पवास शुरू होता है, जो माघ पूर्णिमा तक चलता है।
शाकम्भरी पूर्णिमा का ज्योतिषीय महत्व क्या है?
इस दिन पूर्ण चंद्रमा अपनी राशि कर्क में पुष्य नक्षत्र में होंगे। पुष्य पोषण का नक्षत्र है, इसलिए अन्नदात्री माता की पूजा के लिए यह योग अत्यंत शुभ है।
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