By पं. अभिषेक शर्मा
माघ कृष्ण एकादशी का शुभ मुहूर्त, तिल के छह प्रयोग, पूजा विधि और ज्योतिषीय महत्व।

माघ मास के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का पावन व्रत 2 फरवरी 2027 को मंगलवार के दिन रखा जाएगा। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की तिल से षड्विध पूजा करने का विधान है। इस पावन व्रत का पारण 3 फरवरी 2027 को प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात विधिपूर्वक किया जाएगा।
षटतिला एकादशी माघ कृष्ण पक्ष की वह पावन तिथि है जिस दिन तिल का छह अलग रूपों में प्रयोग करके मनुष्य सभी पापों से मुक्ति और वैकुंठ धाम प्राप्त करता है।
सनातन धर्म की परंपरा में माघ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। वर्ष 2027 में यह पावन तिथि 2 फरवरी को मंगलवार के शुभ योग में पड़ रही है। मंगलवार का दिन होने से इस दिन की गई साधना से मंगल दोष शांत होता है और भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की परम कृपा प्राप्त होती है।
| पंचांग तत्व | शास्त्रोक्त विवरण |
|---|---|
| पावन व्रत | षटतिला एकादशी |
| निर्धारित दिनांक | 2 फरवरी 2027 मंगलवार |
| हिंदू पंचांग मास | माघ मास कृष्ण पक्ष |
| निर्धारित तिथि | एकादशी तिथि |
| मुख्य आराध्य | भगवान श्रीहरि विष्णु |
| विशेष द्रव्य | काला तिल और श्वेत तिल |
| व्रत पारण दिनांक | 3 फरवरी 2027 बुधवार |
| मुख्य फल | दारिद्र्य नाश और मोक्ष प्राप्ति |
गृहस्थ और सन्यास मार्ग के साधक इस दिन उदयाकालीन एकादशी का नियमपूर्वक पालन करते हैं। पद्म पुराण में वर्णित है कि जो फल हजारों वर्षों की कठिन तपस्या से भी दुर्लभ होता है वह फल इस दिन तिल दान करने मात्र से सहज ही सुलभ हो जाता है। अतः माघ की इस शीत ऋतु में यह अनुष्ठान आत्मिक शांति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
षटतिला एकादशी का मुख्य प्रयोजन मनुष्य के भीतर दानशीलता और त्याग की भावना को जगाना है। इस दिन तिल का उपयोग छह विशेष रूपों में किया जाता है जो शरीर और आत्मा के विकारों को दूर करते हैं। माघ मास में यह व्रत रखने से मनुष्य को जन्म मरण के बंधन से मुक्ति और आध्यात्मिक दिव्यता प्राप्त होती है।
शास्त्रों में छह प्रकार के तिलों के प्रयोग को मुक्तिदाता कहा गया है। इसमें तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन करना, तिल मिश्रित जल का तर्पण, तिल का दान और तिल युक्त फलाहार का सेवन सम्मिलित है। यह छह क्रियाएं मनुष्य की चेतना को पूर्णतः शुद्ध कर देती हैं।
संसार में अधिकांश मनुष्य केवल भौतिक संचय में लगे रहते हैं और दान धर्म की उपेक्षा करते हैं। इस एकादशी की पावन कथा बताती है कि बिना अन्न दान के व्यक्ति को परलोक में भी शांति नहीं मिलती है। तिल का दान करने से पूर्व जन्मों के संचित पाप नष्ट होते हैं और साधक के घर में अन्न और धन के भंडार सदैव भरे रहते हैं।
इस पावन दिन प्रातः काल तिल मिश्रित जल से स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके पश्चात पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करके पंचामृत और तिल से उनका अभिषेक किया जाता है। दिनभर सात्विक फलाहार रहकर रात्रि में दीपदान और जागरण करना शास्त्रसम्मत विधान है।
शास्त्रोक्त विधि का शुद्ध अंतःकरण से पालन करने पर साधक की सभी मनोकामनाएं सिद्ध होती हैं।
पूजा के समय ध्यान रखें कि भगवान श्रीहरि को अर्पित की जाने वाली प्रत्येक भोग सामग्री में तुलसी दल अवश्य होना चाहिए। तुलसी दल के बिना भगवान कोई भी नैवेद्य स्वीकार नहीं करते हैं।
वैदिक ज्योतिष में तिल को शनि ग्रह का मुख्य कारक माना गया है और माघ मास सूर्य देव की साधना का काल है। मंगलवार के दिन षटतिला एकादशी का योग बनने से शनि, सूर्य और मंगल का एक अत्यंत शुभ संतुलन निर्मित होता है। यह पावन संयोग कुंडली से शनि की साढ़ेसाती और पितृ दोष को शांत करता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार काला तिल शनि और राहु के दुष्प्रभावों को दूर करने में सबसे अधिक प्रभावी द्रव्य है। एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु को तिल अर्पित करने से ग्रहों की अशुभता समाप्त होकर व्यक्ति को मानसिक स्थिरता मिलती है। जो जातक लंबे समय से आर्थिक संकट या कर्ज से जूझ रहे हैं उनके लिए यह दिन अत्यंत लाभकारी है।
| ग्रह एवं दोष | ज्योतिषीय दुष्प्रभाव | निवारण का वैदिक उपाय |
|---|---|---|
| शनि दोष | कार्यों में अनावश्यक विलंब और जोड़ों का दर्द | काले तिल से हवन करें और निर्धनों को तिल का दान दें |
| मंगल दोष | रक्त विकार और अत्यधिक मानसिक क्रोध | भगवान को लाल चंदन लगाएं और तिल से बनी मिठाई अर्पित करें |
| पितृ दोष | वंश वृद्धि में रुकावट और गृह क्लेश | दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तिल मिश्रित जल से तर्पण करें |
| राहु दोष | निरंतर अज्ञात भय और भ्रम की स्थिति | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का 108 बार तुलसी माला से जप करें |
जिन जातकों की कुंडली में भाग्य भाव कमजोर है उन्हें इस दिन तिल से भरे तांबे के पात्र का दान करना चाहिए। ऐसा करने से भाग्य के अवरोध दूर होते हैं और करियर में उन्नति के नए मार्ग प्रशस्त होते हैं।
षटतिला एकादशी के दिन पूर्ण सात्विक दिनचर्या और मानसिक पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य है। इस दिन तिल का छह रूपों में प्रयोग करना और जरूरतमंदों की सेवा करना उत्तम फलदायी माना गया है। तामसिक आहार ग्रहण करना, दूसरों की निंदा करना और दिन में शयन करना इस व्रत में पूरी तरह वर्जित है।
धार्मिक नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से ही इस पावन व्रत की पूर्ण आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
इन नियमों का निष्ठा से पालन करने से साधक के अंतर्मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और परिवार में सुख और शांति का वातावरण बनता है।
निष्काम भाव से भगवान श्रीहरि की शरण में जाने से मनुष्य के सभी प्रकार के आध्यात्मिक और मानसिक संताप दूर हो जाते हैं। षटतिला एकादशी का व्रत केवल एक कर्मकांड नहीं है बल्कि यह मनुष्य को भौतिक आसक्ति से मुक्त करके मोक्ष की ओर अग्रसर करने वाला पावन साधन है।
कलियुग में दान और ईश्वरीय नाम संकीर्तन ही सबसे बड़ा संबल है। जब कोई व्यक्ति माघ के इस पावन अवसर पर तिल का दान करता है तब उसके संचित पाप धुल जाते हैं और अंतःकरण निर्मल हो जाता है। यह दिव्य व्रत साधक को जीवन की अनित्यता का बोध कराता है और उसे ईश्वरीय चेतना से जोड़ता है।
संसार की समस्त भौतिक संपदाएं यहीं रह जाती हैं परंतु भक्ति भाव से किया गया तिल दान परलोक में भी आत्मा का मार्ग प्रशस्त करता है। माघ मास की इस पुण्य तिथि पर भगवान विष्णु के चरणों में आत्मसमर्पण करके अपने जीवन को धन्य बनाएं।
षटतिला एकादशी 2027 में किस तारीख को है?
माघ मास की षटतिला एकादशी का पावन व्रत 2 फरवरी 2027 को मंगलवार के दिन रखा जाएगा।
षटतिला एकादशी पर तिल का उपयोग कैसे किया जाता है?
इस दिन तिल से स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, दान और तिल युक्त फलाहार का सेवन करने का विशेष विधान है।
क्या षटतिला एकादशी के दिन चावल खा सकते हैं?
एकादशी के दिन चावल का सेवन करना शास्त्रों में पूरी तरह वर्जित माना गया है अतः चावल का प्रयोग न करें।
शनि दोष के निवारण के लिए इस दिन क्या उपाय करना चाहिए?
शनि दोष से मुक्ति पाने के लिए इस दिन काले तिल से हवन करना चाहिए और जरूरतमंदों को तिल का दान देना चाहिए।
षटतिला एकादशी व्रत का पारण कब करना चाहिए?
इस पावन व्रत का पारण अगले दिन 3 फरवरी 2027 को प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात पूजा करके करना चाहिए।
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