By अपर्णा पाटनी
काशी के चलते फिरते शिव का जीवन, मौन साधना और वैराग्य का अमर संदेश

काशी के घाटों पर सदियों से साधु, संन्यासी और योगी आते रहे हैं। लेकिन उनमें एक ऐसे महायोगी भी थे जिन्हें देखकर लोग कहते थे कि स्वयं भगवान विश्वनाथ मनुष्य का रूप लेकर गंगा किनारे बैठे हैं। वे घंटों गंगा की धारा पर लेटे रहते, कई दिनों तक मौन रहते, न भूख की चिंता करते न सर्दी गर्मी की। उनका विशाल शरीर, शांत आंखें और दिगंबर रूप लोगों के मन में श्रद्धा और आश्चर्य दोनों जगाता था। ये थे तैलंग स्वामी, जिन्हें काशी का चलता फिरता शिव कहा गया।
वर्ष 2027 में तैलंग स्वामी जयंती मंगलवार, 19 जनवरी को पौष शुक्ल एकादशी पर मनाई जाएगी। संयोग से इसी दिन गौण पौष पुत्रदा एकादशी भी है, जिसका व्रत शास्त्रों के अनुसार विशेष रूप से संन्यासियों और मोक्ष के साधकों के लिए बताया गया है। एक महान संन्यासी की जयंती का संन्यासियों की एकादशी के दिन आना अपने आप में अर्थपूर्ण है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | तैलंग स्वामी जयंती |
| तिथि | 19 जनवरी 2027 |
| वार | मंगलवार |
| हिंदू मास | पौष |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | एकादशी |
| संत का प्रमुख स्थान | वाराणसी (काशी) |
| संन्यास नाम | गणपति सरस्वती |
| सूर्य की स्थिति | मकर राशि |
| वाराणसी में सूर्योदय | प्रातः लगभग 6:45 बजे |
| वाराणसी में सूर्यास्त | सायं लगभग 5:25 बजे |
| राहु काल (वाराणसी) | दोपहर लगभग 2:45 से 4:05 बजे तक |
| उसी दिन के अन्य पर्व | गौण पौष पुत्रदा एकादशी, कूर्म द्वादशी, रोहिणी व्रत (जैन) |
इस दिन सुबह कुछ समय तक एकादशी तिथि रहेगी और फिर द्वादशी आरंभ होगी। जयंती की पूजा, ध्यान और सत्संग सुबह के समय करना श्रेष्ठ रहेगा। सटीक समय के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
तैलंग स्वामी का जन्म दक्षिण भारत के उस क्षेत्र में हुआ था जिसे पुराने समय में तैलंग देश कहा जाता था, यानी आज का आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का क्षेत्र। परंपरा के अनुसार उनका जन्म विजयनगरम क्षेत्र के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम नरसिंह राव और माता का नाम विद्यावती बताया जाता है। बचपन में उनका नाम शिवराम था।
उनके जन्म वर्ष को लेकर अलग अलग मत हैं। कई जीवनी लेखकों और भक्तों के अनुसार उनका जीवन असाधारण रूप से लंबा था और वे लगभग 280 वर्ष तक जीवित रहे। परंपरागत विवरण उनका जन्म 17वीं सदी के आरंभ में और महासमाधि 1887 में बताते हैं। इतिहासकार इस विषय पर एकमत नहीं हैं, लेकिन भक्तों के लिए उनकी आयु से अधिक महत्वपूर्ण उनकी साधना और उनका प्रकाश है।
बचपन से ही शिवराम का मन संसार में कम और शिव में अधिक लगता था। उनकी माता शिव की अनन्य भक्त थीं और कहा जाता है कि माता से ही उन्हें भक्ति के पहले संस्कार मिले। माता के देहांत के बाद उनका वैराग्य और गहरा हो गया। परंपरागत कथाओं के अनुसार वे कई वर्षों तक श्मशान भूमि में साधना करते रहे। यह साधना जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझने की तपस्या थी।
लंबी साधना के बाद शिवराम ने स्वामी भगीरथानंद सरस्वती से संन्यास दीक्षा ली, जिसका स्थान परंपरा पुष्कर बताती है। संन्यास के बाद उनका नाम गणपति सरस्वती रखा गया। इसके बाद वे वर्षों तक तीर्थों और हिमालय क्षेत्रों में भ्रमण करते रहे। कहा जाता है कि उन्होंने नेपाल, तिब्बत और भारत के अनेक तीर्थों की यात्रा की और अंत में काशी पहुंचे, जहां उन्होंने अपना शेष जीवन बिताया।
काशी के लोगों ने उन्हें उनके जन्म प्रदेश के नाम से पुकारना शुरू किया, यानी तैलंग देश से आए स्वामी। धीरे धीरे यही नाम प्रसिद्ध हो गया, तैलंग स्वामी या त्रैलंग स्वामी।
काशी में तैलंग स्वामी अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका और पंचगंगा घाट जैसे स्थानों पर रहे। उनका जीवन इतना असाधारण था कि उसके प्रसंग आज भी काशी की गलियों में सुनाए जाते हैं।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने जब काशी में तैलंग स्वामी के दर्शन किए, तो उन्होंने उन्हें काशी का चलता फिरता विश्वनाथ कहा और उनकी अवस्था को सच्चे परमहंस की अवस्था बताया। क्रिया योग परंपरा के महान गुरु लाहिड़ी महाशय के साथ भी उनके आत्मीय संबंध का वर्णन मिलता है। इन महापुरुषों के कथन बताते हैं कि तैलंग स्वामी केवल चमत्कार करने वाले योगी नहीं बल्कि आत्मज्ञान में स्थित एक सिद्ध संत थे।
तैलंग स्वामी के जीवन से अनेक चमत्कारिक प्रसंग जुड़े हैं। कहा जाता है कि उन्होंने घातक विष पी लिया और उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। एक प्रसंग के अनुसार दिगंबर रहने के कारण अधिकारियों ने उन्हें बंदी बनाया, लेकिन वे बंद कोठरी से बाहर दिखाई दिए। ऐसे प्रसंग भक्तों में श्रद्धा से सुनाए जाते हैं।
लेकिन तैलंग स्वामी के जीवन का असली संदेश चमत्कारों में नहीं है। जो व्यक्ति शरीर को ही सब कुछ मानता है, उसके लिए भूख, सर्दी, अपमान और मृत्यु सबसे बड़े भय हैं। तैलंग स्वामी का जीवन दिखाता है कि जब मनुष्य अपनी आत्मा को पहचान लेता है, तो ये भय अपने आप छूट जाते हैं। उनके चमत्कार दरअसल उस आंतरिक स्वतंत्रता का बाहरी संकेत थे। भक्तों के लिए सच्चा चमत्कार यह है कि कोई व्यक्ति इतनी शांति, करुणा और निर्भयता के साथ जी सके।
तैलंग स्वामी अधिकांश समय मौन रहते थे, इसलिए उनकी शिक्षा उनके जीवन से ही अधिक मिलती है। उनके जीवन और उनसे जुड़े प्रसंगों से कुछ मुख्य सीखें स्पष्ट होती हैं।
| शिक्षा | जीवन में उसका अर्थ |
|---|---|
| मौन | कम बोलना और भीतर की आवाज सुनना |
| वैराग्य | वस्तुओं का उपयोग करना, पर उनसे बंधना नहीं |
| अद्वैत दृष्टि | हर जीव में एक ही परमात्मा को देखना |
| निर्भयता | शरीर और मृत्यु के भय से ऊपर उठना |
| करुणा | दुखी व्यक्ति की चुपचाप सहायता करना |
| शिव भक्ति | हर कर्म को शिव को समर्पित करना |
उनके लिए शिव कोई दूर बैठे देवता नहीं थे बल्कि हर सांस में अनुभव होने वाली सत्ता थे। इसी कारण लोग कहते थे कि उनके दर्शन करना स्वयं शिव के दर्शन करने जैसा है।
| मंत्र | उद्देश्य | जप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ नमः शिवाय | शिव कृपा और मन की शुद्धि | 108 बार |
| ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् | महामृत्युंजय मंत्र, भय से मुक्ति और स्वास्थ्य | 108 बार |
| गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः | गुरु वंदना, संतों के प्रति श्रद्धा | 11 बार |
वाराणसी में पंचगंगा घाट के निकट तैलंग स्वामी का मठ है, जहां उनकी तपस्या की स्मृतियां सुरक्षित हैं। जयंती के दिन यहां विशेष पूजा, भजन और भंडारे का आयोजन होता है। देश के अलग अलग हिस्सों से उनके भक्त इस दिन काशी पहुंचते हैं। जो लोग काशी नहीं जा सकते, वे घर पर ही मौन, ध्यान और शिव पूजा से इस दिन को सार्थक बना सकते हैं।
वैदिक ज्योतिष में वैराग्य, संन्यास और मोक्ष से जुड़े दो ग्रह विशेष माने जाते हैं, शनि और केतु। शनि त्याग, तपस्या, एकांत और कठोर अनुशासन के कारक हैं। केतु मोक्ष कारक कहलाते हैं और संसार से विरक्ति तथा आध्यात्मिक अनुभूति के प्रतीक हैं। कुंडली का 12वां भाव मोक्ष भाव माना जाता है। महान संतों और योगियों के जीवन में इन ग्रहों और भावों का प्रभाव गहराई से देखा जाता है।
2027 में तैलंग स्वामी जयंती के समय सूर्य मकर राशि में हैं, जो शनि की राशि है। सूर्य आत्मा के कारक हैं और शनि की राशि में उनका होना आत्मा की तपस्या और वैराग्य का प्रतीक माना जा सकता है। इस समय संतों का स्मरण और तपस्या से जुड़ी साधना विशेष रूप से अनुकूल मानी जा सकती है।
इस वर्ष जयंती मंगलवार को है। मंगल ऊर्जा और अनुशासन के ग्रह हैं और हनुमान जी की तरह ब्रह्मचर्य और तप के बल का प्रतीक भी हैं। इसी दिन चंद्रमा वृषभ राशि के रोहिणी नक्षत्र में होंगे, जो चंद्रमा की उच्च राशि और प्रिय नक्षत्र है। बलवान चंद्रमा मन को स्थिर करता है और ध्यान के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है। एकादशी तिथि स्वयं मन और इंद्रियों के संयम की तिथि है। इस प्रकार ग्रह, तिथि और वार, तीनों मिलकर इस दिन को ध्यान और आत्म चिंतन के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
| स्थिति | उपाय |
|---|---|
| केतु के कारण भ्रम या बेचैनी | शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और कुछ समय मौन रहें |
| शनि की साढ़ेसाती या ढैया | साधुओं और गरीबों को भोजन कराएं, काले तिल दान करें |
| मन अस्थिर रहता हो | प्रातः 20 मिनट ध्यान करें और "ॐ नमः शिवाय" जपें |
| मृत्यु या बीमारी का भय | महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जप करें |
| गुरु या मार्गदर्शक की कमी | किसी संत के जीवन का अध्ययन करें और गुरु वंदना करें |
आज का मनुष्य लगातार बोलता, सुनता और देखता रहता है। मोबाइल, संदेश और सूचनाओं के शोर में मन को एक पल का मौन भी नहीं मिलता। ऐसे समय में तैलंग स्वामी का मौन एक गहरी सीख देता है। मौन केवल बोलना बंद करना नहीं है। यह भीतर लौटने का मार्ग है।
हर व्यक्ति संन्यास नहीं ले सकता और न ही यह आवश्यक है। लेकिन हर व्यक्ति अपने दिन में कुछ समय मौन रह सकता है, कुछ वस्तुओं का मोह छोड़ सकता है और किसी दुखी व्यक्ति की चुपचाप सहायता कर सकता है। तैलंग स्वामी जयंती पर यदि कोई व्यक्ति केवल एक घंटे का मौन, एक जरूरतमंद को भोजन और शिव का सच्चा स्मरण कर ले, तो उसने इस महायोगी को सच्ची श्रद्धांजलि दे दी।
| क्या करें | क्या न करें |
|---|---|
| सुबह स्नान करके शिव पूजा करें | संतों का उपहास या अनादर न करें |
| कुछ घंटे मौन व्रत रखें | व्यर्थ की बातचीत और विवाद से बचें |
| साधुओं और गरीबों को भोजन दें | भोजन की बर्बादी न करें |
| ध्यान और सत्संग करें | मांस, मदिरा और नशे से दूर रहें |
| गंगा और नदियों का सम्मान करें | नदियों में कचरा न डालें |
तैलंग स्वामी ने जीवन भर बहुत कम बोला, फिर भी उनका जीवन सदियों तक बोलता रहेगा। उन्होंने दिखाया कि जो व्यक्ति भीतर से शिव में स्थित हो जाता है, उसके लिए गंगा की धारा भी आसन बन जाती है और संसार का शोर भी मौन। 19 जनवरी 2027 को, जब संन्यासियों की एकादशी और इस महायोगी की जयंती एक साथ आएंगी तब एक दीप, थोड़ा सा मौन और शिव का सच्चा स्मरण किसी भी साधक के मन में काशी का प्रकाश जगा सकता है। जहां मौन गहरा होता है, वहां शिव स्वयं प्रकट होते हैं।
तैलंग स्वामी जयंती 2027 कब है?
तैलंग स्वामी जयंती 2027 मंगलवार, 19 जनवरी को पौष शुक्ल एकादशी पर मनाई जाएगी।
तैलंग स्वामी कौन थे?
तैलंग स्वामी दक्षिण भारत में जन्मे एक महान योगी और शिव भक्त संत थे, जिन्होंने अपना जीवन काशी में बिताया। उन्हें काशी का चलता फिरता शिव कहा जाता है।
तैलंग स्वामी का संन्यास नाम क्या था?
संन्यास दीक्षा के बाद उनका नाम गणपति सरस्वती रखा गया था। तैलंग देश से आने के कारण काशी में वे तैलंग स्वामी कहलाए।
तैलंग स्वामी जयंती कैसे मनाएं?
इस दिन स्नान के बाद शिव पूजा करें, कुछ घंटे मौन रखें, ध्यान करें, उनके जीवन प्रसंग पढ़ें और साधुओं तथा जरूरतमंदों को भोजन दें।
तैलंग स्वामी का मठ कहां है?
वाराणसी में पंचगंगा घाट के निकट तैलंग स्वामी का मठ है, जहां जयंती पर विशेष पूजा और भंडारा होता है।
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